इस्लाम और जिन्सियात

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इस्लाम और जिन्सियात लेखक:
कैटिगिरी: अख़लाक़ी किताबें

इस्लाम और जिन्सियात

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

लेखक: डा. मोहम्मद तक़ी अली आबदी
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इस्लाम और जिन्सियात
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इस्लाम और जिन्सियात

इस्लाम और जिन्सियात

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

इस्लाम और जिन्सियात

लेखकः डा. मोहम्मद तक़ी अली आबदी

नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है और इस किताब मे टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो को सुधार दिया गया है।

Alhassanain.org/hindi

लेखक एक दृष्टि में

नामः डा. मोहम्मद तक़ी अली आबदी

पिताः श्री सैय्यद हैदर अली आबदी

माताः श्रीमती सैय्यदा ज़किया बेगम

जन्म तिथि व स्थानः- दो जुलाई उन्नीस सौ बासठ ई. ( 02-07-1962), लखनऊ , यू.पी.

भाईः मोहम्मद सफ़दर अली (बड़े) , मोहम्मद नक़ी अली , मोहम्मद रज़ा अली (छोटे)

बहनः सैय्यद हैदरी बेगम (बड़ी)

पत्नीः सैय्यदः साजिदा बानो पुत्री सैय्यद सज्जाद अली आबदी

पुत्रः अस्करी मेंहदी अकबर

शैक्षिक योगताः पी. एच. डी. (फ़ारसी , लखनऊ विश्वविधालय) , सनदुल अफ़ाज़िल (सुल्तानुल मदारिस , लखनऊ) , मौलवी , कामिल , फ़ाज़िले फ़िकह (अरबी व फ़ारसी इलाहाबाद बोर्ड)

पुस्तकेः- 1. परवीन ऐतीसामी के हालात और शायरी , 1984 ई. नामी प्रेस , लखनऊ.

2. जदीद फ़ारसी शायरी , 1988 ई. नामी प्रेस , लखनऊ. (उ.प्र. उर्दू अकादमी , लखनऊ से ईनाम पाई हुई)

3. फ़ारसी अदब की शख्सियात 1992 ई , निज़ामी प्रेस , लखनऊ , (उ.प्र. उर्दू अकादमी , लखनऊ से ईनाम पाई हुई) (उपरोक्त सभी पुस्तकें फखरूद दीन अली अहमद मेमोरियल कमेटी , हुकूमत उ.प्र. लखनऊ की मदद से प्रकाशित)

4. इस्लाम और जिन्सियात , 1994 ई. अब्बास बुक एजेन्सी , लखनऊ की मदद से प्रकाशित।

5. इस्लाम और सेक्स (हिन्दी) , 1995 ई. अब्बास बुक एजेन्सी , लखनऊ की मदद से प्रकाशित।

6. रिसालः –ए- नख्लबन्दी , मुकददमः , हवाशी और तर्जुमे के साथ (प्रकाशनाधीन)

और लगभग ( 50) धार्मिक और साहित्यिक लेख प्रकाशित

कार्यः- 1. पार्ट टाईम लेक्चरर ( Part time Lecturer) डिपार्टमेन्ट आँफ ओरिएन्टल स्टडीज़ इन अरबिक एण्ड परशियन , लखनऊ , यूनिवर्सिटी।

2. शोध विषय – तरतीब व तसहीह तज़किरः ए अरफ़ात अल आशिकीन अज़ तक़ी औहदी – डी. लिट. के लिए (रिसर्च ऐसोसिएट , यू.जी.सी. डिपार्टमेन्ट आँफ़ परशियन , लखनऊ यूनिवर्सिटी)

पताः हैदर मंज़िल , 450/128/13, फ्रेन्डस कालोनी , न्यु मुफ़ती गंज , लखनऊ – (226) 003 (यू.पी.)

प्राक्कथन

सब से पहले खुदा की बारगाह मे अपने सर को झुकाने के साथ साथ मुहम्मद (स.) , आले मुहम्मद (आ.) और असहाबे पैग़म्बर (स.) पर दुरूद व सलाम भेजने मे गर्व महसूस करता हूँ जिनकी दया और कृपा से यह काम समाप्ति की मंज़िल तक पहुँचा।

कहना यह है कि ------ आज से लगभग छ: महीने पहले मै सुबह की नमाज़ और कुर्आन शरीफ को पढकर नाश्ते पर बैठने ही वाला था कि घंटी बजी बाहर निकल कर आया तो देखा मौलाना अली अब्बास तबातबाई गेट पर मौजूद हैं। अभी ठीक से सलाम व दुआ भी न होने पाई थी और मै इसी बीच सोच ही रहा था कि मौलाना ने मुझे अपनी तरफ आकर्षित करते हुए शीकायती अन्दाज़ मे कहा कि तक़ी साहब , आप के पास कई लोगों से पैगाम भिजवा चुके हैं , आप को मतलब मालूम ही हो गया होगा , मै उसी काम के सिलसिले मे आप का इन्तिज़ार करते करते आप के पास सुबह सुबह आ धमका ताकि आप के घर से निकलने से पहले ही मुलाक़ात हो जाये और बात तय हो जाये------- यह वह जुमले थे जिसने मेरी सोच मे बढोतरी कर दी। जिस की वजह से थोड़ी ही देर मे कई सवाल दिमाग मे आये---- क्या पैगाम था ? क्या मतलब है ? क्या तय करने आये हैं ? और हर सवाल का जवाब था--- हमें नही मालूम --- फ़ौरन सभी सवलों का जवाब मिलते ही मैं ने कहा ------- अब्बास भाई आप ने किस-किस से क्या पैग़ाम भिजवाया ? क्या मतलब है ? क्यों इन्तिज़ार करते रहे ? क्या तय करना है ? मुझे तो कुछ मालूम नही---- आख़िर मामला क्या है ? कुछ बताइये तो समझ मे आ सके --- अच्छा रूकिये मै बाहरी कमरा खोलता हूँ बैठकर सुक़ून से बात होगी------ मै यह कह कर पलटा --- अब्बास साहब ने नाम गिनाना शुरू किये , असद साहब से , सईद साहब से , फाज़िल साहब से--- मै नाम सुनते सुनते घूम कर कमरे मे पहुँच चुका था। दरवाज़ा खोलकर उनको कमरे मे बुला चुका था---- उनके बैठते-बैठते मैने कह भी दिया कि नही भाई मुझे किसी से कोई पैग़ाम नही मिला ---- तब उन्होंनें कहा ठीक है आप बैठें मै खुद आप को पैग़ाम देता हूँ।

“हमारी क़ौम मे शादी के तरीक़े से सम्बन्धित कोई मालूमाती किताब न होने की वजह से अक्सर लोग हराम मे पड़ जाते हैं-------- इसलिए मैं यह चाहता हूँ कि आप एक ऐसी किताब लिख दें कि जिस से कौंम के नौजवानों को कुछ शादी से सम्बन्धित मालूम हो सके। अकसर लोग दुक़ान पर आते हैं। जो इस समय की खास आव्यश्कता है। यह तो एक दीनी और मज़हबी काम है। जिस मे आप की मदद चाहता हूँ। इस सिलसिले में खुदा आपको बहुत सवाब देगा ”।

इन वाक्यों को सुनते ही मैने बिना कुछ सोचे समझे शादी के विषय पर किताब लिखने का वादा करते हुवे कही ठीक है मुझे भी आज से लगभग दस साल पहले शादी के समय ऊर्दू या हिन्दी में एक ऐसी मज़हबी उसूल और क़ानून की किताब की तलाश थी जिसमें शादी की सभी बातें लिखी हों ताकि मज़हबी उसूल की रौशनी में सेक्सी मज़ा हासिल कर सकूँ। लेकिन इस सिलसिले मे उस समय ऊर्दू मे “तहज़ीब-उल-अखलाक़ ” के अलावा कोई और दूसरी किताब न मिल सकी। इस के अलावा कुछ उसूली बातें तोहफ़त-उल-अवाम से सीखीं और उसी को काफी समझा। क्योंकि उस समय शोध की ओर ज़्यादा ध्यान नही दिया-------- इसलिए आप की बात शत प्रतिशत सही मालूम होती है कि आप की दुक़ान पर कुछ लोग सेक्स से सम्बन्धित किताब तलाश करते हुवे आ जाते हैं और वह शायद इसलिए ऐसा करते होगें कि इस्लाम ने सेक्स से सम्बन्धित हर बात को खुब समझा कर बताया होगा (जो सच है) जिसकी रौशनी में सेक्सी बातों को बहुत आसानी से समझा जा सकता है। हालांकि मुमकिन है कि कुछ लोगों को यह बात अजीब व गरीब लगे कि क्या इस्लाम मे भी एक ऐसे विषय से सम्बन्धित कुछ मिल सकता है जो समाज का बहुत ही खराब और गिरा हुवा विषय समझा जाता है। एक ऐसा विषय है जिसका समाज मे नाम लेना , जिस से सम्बन्धित कुछ सोचना , कुछ बातें करना या कुछ पढना भी बहुत बुरा समझा जाता है। लेकिन क्या कहना इस्लाम धर्म का जिसने ज़िन्दगी के हर हिस्से के साथ सेक्स जैसे मुख्य और आवश्यक हिस्से से सम्बन्धित भी हर बात को विस्त्रत रूप से बयान किया है ताकि हर मनुष्य इस्लाम की रौशनी में सेक्सी बातों को समझ सके।

इस्लाम ने शुरूअ जवानी में पैदा होने वाली प्राकृतिक सेक्सी इच्छा और उसको पूरा करने के ग़लत और हराम तरीक़ों (मुश्त ज़नी (हस्तमैथुन) , इग़लाम बाज़ी (गुदमैथुन) और ज़िना कारी (जारकर्म , हरामकारी , बलात्कार) की तरफ इशारा करने के साथ जायज़ और हलाल तरीक़ों (थोड़े समय या पूरी उम्र के लिये निकाह) की तरफ इशारा किया है जिसको आज के तरक्क़ी करते हुवे वैज्ञानिक दौर मे भी माना जा रहा है। उदाहरण स्वरूप इस्लाम ने 1400 साल पहले हस्तमैथुन , गुदमैथुन और बलात्कार के व्यक्ति , समाज और माहौल पर पड़ने वाले खराब असर को बताया। जिसे आज बड़े से बड़े समाज शास्त्री , सेक्स शास्त्र , और मर्दों व औरतों की शारीरिक सेक्सी बीमारियों को दूर करने वाले डाक्टरों ने भी माना है। साथ ही तरक्क़ी करने वाले देशों मे मनुष्य को विभिन्न बीमारियों और बुराईयों से बचने के लिए ही थोड़े समय की शादी या जानकारी की शादी को जगह दी जा रही है (जो इस्लाम धर्म में मुतअ: की शक्ल मे शुरू से मौजूद है) ताकि मनुष्य प्राकृतिक सेक्सी इच्छा को पूरा करने के लिए ग़लत तरीक़ों का प्रायोग न करे जिसके मनुष्य और समाज दोनो पर बुरे असर पड़ते हैं।

बहरहाल सेक्स एक ऐसा मुख्य और आव्यशक विषय है जिससे कोई भी मनुष्य बच नही सकता। क्योंकि नौजवानी मे कदम रखने के साथ ही हर नौजवान पुरूष और स्त्री का ------- शारीरिक मशीन की इच्छा की बुनियाद पर प्राकृतिक और कुदरती तौर पर एक दूसरे की तरफ लगाव होने लगता है ताकि प्राकृतिक सेक्सी इच्छाओं को पूरा कर सकें।

चूँकि हर स्वस्थ और निरोग मनुष्य में प्रकृति की ओर से सेक्सी इच्छा मौजूद होती है और वह सेक्सी इच्छा को पूरा करने के तरीके तलाश करता रहता है। इसीलिए हर धर्म मे प्ररकृतिक सेक्सी इच्छा को पूरा करने के लिए शादी का रिवाज है (कुछ धर्मो मे बिना शादी 7 के रहने को ही अच्छा समझा जाता है) और इस्लाम में तो खुदा के नज़दीक सब से ज़्यादा अज़ीज़ और महबूब (अर्थात पसन्द की जाने वाली) चीज़ शादी को ही बताया गया है।

इस्लाम धर्म मे जहाँ ज़िन्दगी के सभी हिस्सों से सम्बन्धित पूरी मालूमात दी है वहीं ज़िन्दगी के वणिर्त आवश्यक और मुख्य हिस्से “सेक्स ” से सम्बन्धित भी खुल कर बयान किया है ताकि हर मुस्लमान इस्लामी दायरे मे रहकर भरपूर सेक्सी आनन्द और स्वाद उठा सके -------- अत: हर मुसलमान का कर्तव्य है कि जिस तरह वह ज़िन्दगी के और हिस्सों से सम्बन्धित इस्लामी शीक्षा को सीखता , मालूम करता और अमल करता है उसी तरह सेक्स से सम्बन्धित भी मालूमात हासिल करे , और इसमे किसी तरह की बुराई न समझे ताकि हराम (अर्थात वह काम जिसके करने पर गुनाह या न करने पर सवाब न हो) , मुस्तहब (अर्थात वह काम जिसके करने में सवाब और न करने पर गुनाह न हो) और वाजिब (अर्थात वह काम जिसके करने पर सवाब और न करने पर गुनाह हो) की मालूमात हो सके और मामूली गलती या थोड़ी देर के मज़े की कारण हराम काम न कर बैठे या ज़हनी बेचैनी (जैसे बच्चे की शारीरिक कमज़ोरी और खराबी , औरत और मर्द का अलगाव या बीमारीयों में घिर जाना आदि) न हो सके। बल्कि इस तरह मज़ा (लज़्ज़त , स्वाद) उठाये कि सवाब भी मिल सके और इस सवाब के नतीजे में मिलने वाली औलाद नेक और शारीरिक कमज़ोरी और बुराई से दूर भी हो।

इस्लाम ने सेक्सी स्वाद उठाने में किसी तरह की रूकावट नहीं डाली है। बल्कि सेक्सी रूचि दिलाने के लिए यह ज़रूर कहा है कि औरतें तुम्हारी खेतियाँ हैं , तुम जिस तरह , जैसे और जब चाहो उनसे स्वाद हासिल करो , उनके पास पहुँच कर सुकून और आराम हासिल करो , उनके रहिनम (गर्भाशय) मे अपना नुतफा (वीर्य) डालो इतियादि। यह वह कुर्आनी आयतें हैं जिन से सेक्स से सम्बन्धित हर पहलू पर भरपूर रौशनी पड़ती है और जहाँ विवरण या विस्तार की आवश्यकता महसूस की गई है वहां मुहम्मद (स.) व आले मुहम्मद (अ.) ने खुद से अपने सुनहरे प्रवचन से या किसी के सवाल करन पर अपने जवाबों से उसको विस्तार से बयान कर दिया है ताकि मनुष्य हराम व हलाल या फायदा व नुक़सान को आसानी से समझ सके।

इसी हराम व हलाल या फायदे और नुक़सान को सामने रखते हुए ही लेखक ने – इस्लाम और सेक्स – किताब कुर्आन , आइम्मा –ए- मासूमीन के प्रावचनों की रौशनी में लिखने की कोशीश की है। इस कीताब को छह अध्यायों में बाटा गया है।

पहले अध्याय मे –सेक्स और प्राकृति- से बहस की गई है। जिसमें मनुष्य के द्वारा प्राकृतिक सेक्सी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अप्राकृतिक और हराम तरीकों (हस्तमैथुन. गुदमैथुन , बलात्कार) का वर्णन किया गया है और कुर्आन और आइम्मा –ए- मासूमीन के प्रावचनों की रोशनी में यह बात साबित (स्पष्ट) करने की कोशीश की गयी है कि हस्तमैथुन. गुदमैथुन , और बलात्कारी से मनुष्य अपनी सेहत और तनदुरुस्ती को खराब करने के साथ साथ गुनाह (पाप) का पात्र भी हो जाता है। अत: सेक्सी इच्छओं की पूर्ति के लिए जाएज़ (सही) और हलाल तरीक़ा ही अपनाया जाए।

इस्लाम के बताए हुए जाएज़ और हलाल तरीक़े से सम्बन्धित बहस किताब के दूसरे अध्याय -इस्लाम और सेक्स- मे पेश किया गया है। जिसमें पूरी ज़िन्दगी के लिए निकाह (शादी) और थोड़े समय के लिए निकाह (मुतअः) का वर्णन किया गया है और हज़रत अली (अ ,) के प्रवचन से यह बात साबित करने की कोशिश की गयी है कि थोड़े समय का निक़ाह (मुतअः) ही दुनिया से बलात्कारी को खत्म करने का अकेला तरीक़ा है। जिसे इस्लाम ने 1400 साल पहले बताया।

तीसरा अध्याय –स्त्री और पुरूष- विषय पर आधारित है। जिनका सेक्सी इच्छा की पूर्ति के लिए एक दूसरे के लिए होना आवश्यक है। इसी अध्याय में अच्छी और बुरी स्त्री और अच्छे और बुरे पुरूषों की पहचान बताई गय़ी है।

किताब के चौथे अध्याय में –शादी का तरीक़ा- बताया गया है। जिसमें शादी का ख्याल पैदा होने पर दुआ , महीना , तारीख , दिन , और समय को ध्यान में हुए निकाह की तारीख़ों का तय करना , महर , दहेज , निकाह , रुखसती (विदाई) वलीमः (बहू भोज) आदि का वर्णन है।

पाचवे अध्याय में –जिमाअ (मैथुन , संभोग) के आदाब- (अर्थात मैथुन के तरीकों) का वर्णन किया गया है। जिसमे मैथुन के वर्जित होने (हुर्मत-ए-जिमाअ) , वह मैथुन जिस से घिन आये (मक्रूहात-ए-जिमाअ) वह मैथुन जो अच्छा हो और करने पर पुण्य मिले (मुसतहिब्बात-ए-जिमाअ) और वह मैथुन जो ज़रूरी हो (वाजेबाते-ए-जिमाअ) के साथ-साथ विवाहित ज़िन्दगी को अच्छा बनाने के लिए इस्लाम के बताए हुवे स्त्री और पुरूष के अधिकार और कर्तव्य को भी बयान किया गया है ताकि मनुष्य की विवाहित ज़िन्दगी लाजवाब और बेमीसाल बीत सके।

आखरी अर्थात यानी छटा अध्याय –सेक्स और परलोक- शीर्षक पर आधारित है। जिसमें यह बताने की कोशिश की गयी है कि दुनिया के नेक कार्य की परलोक की ज़िन्दगी को बना सकते हैं। जहाँ सेक्सी इच्छा को पूरा करने और आराम व सुकून के लिए हूर और ग़िलमान मौजूद हैं।

लेखक ने इस किताब में अपने बस भर सभी बातें कुर्आन या मासूमीन (आ.) के प्रावचनों से सहारा लेकर ही लिखने की कोशिश की है ताकि लेख में वज़न पैदा हो और बात पूरे सुबूत से साबित हो सके। लेकिन मुमकिन है कि इसमें कुछ जगह कमीयाँ या गलतीयाँ हुई हों या नतीजे निकालने में गलतियाँ पैदा हुई हों। इसलिए मै खुदा-ए-रब्बुल इज़्ज़त और आइम्मः-ए-मासूमीन (आ.) की बारगाह में सच्चे दिल से अपनी ग़लतियों को मानते हुवे तौबः करता हूँ और आप से दुआ चाहता हूँ ताकि मेरी गलतियों को माफ कर दिया जाये--- और वह (खुदा) तो बड़ा ग़फूर व रहीम (माफ करन और बख्शने वाला) है।

मुझे इस बात का पूरी तरह अहसास है कि मैने अब तक जो भी लिखा है उसमें सब से मुख्य किताब यही है। क्योंकि अगर मैने या किसी और ने सेक्स से सम्बन्धित इस्लामी शीक्षा की रौशनी में अपनी दुनिया की ज़िन्दगी ग़ुज़ार ली तो अवश्य ही परलोक (आखिरत) की ज़िन्दगी भी बेहतर हो जाएगी।

मुझे इस बात का भी अहसास है कि मैं यह किताब उस वक्त तक पेश नही कर सकता था जब तक के मेरे कुछ दोस्तों विषय से सम्बन्धित कुछ किताबें तलाश करने व जुटाने में मेरा साथ न दिया होता या सेक्स से सम्बन्धित बात चीत कर के कुछ बातों की तरफ इशारा न किया होता। अतः यह मेरे लिए ज़रूरी है कि मैं अपने उन दोस्तों का दिल की गहराईयों से शुक्रीया अदा करूँ जिन्होंने इस सिलसिले में मेरी मदद फरमाई। इन लोगों में रज़ा आबिद रिज़वी (ज्योलोजिकल सर्वे आँफ़ इन्डिया , लखनऊ) सैय्यद असरार हुसैन (सूचना एवं जनसमंपर्क विभाग , लखनऊ) साजिद ज़ैदपुरी (सुल्तानुल मदारिस , लखनऊ) मोहम्मद सादिक़ (उ.प्र. उर्दू अकादमी , लखनऊ) अली मेहदी रिज़वी एडवोकेट (मशक गंज लखनऊ) सैय्यद एहतिशाम हुसैन (टांडा) , डा एहतिशाम अब्बास हैदरी (तनज़ीमुल मकातिब , लखनऊ) सैय्यद मोहम्मद जाफर रिज़वी (उ.प्र. सचिवालय) अज़ीज़ुल हसन जाफरी (ईरान कलचरल हाऊस , नई दिल्ली) मौलाना मुहम्मद ज़फर-अल-हुसैनी (बनारस) इरफान ज़ंगीपुरी (उ.प्र उर्दू अकादमी , लखनऊ) सैय्यद मुनतज़िर जाफरी (दूल्हीपुर , बनारस) डा. महमूद आबदी (शीया डिग्री कालेज , लखनऊ) के नाम विशेष रूप से ज़रूरी हैं। जिन्होने किताबें दी या विशेष बातों की तरफ ध्यान आकर्षित कराया।

इसके अलावाः डा. इराक़ रज़ा ज़ैदी (पंजाबी यूनीवर्सिटी , पटीयाला) मौलाना सैय्यद अली नक़वी (लखनऊ , यूनीवर्सिटी , लखनऊ) मौलाना मुजताबा अली खाँ अदीब-उल-हिन्दी (लखनऊ) मौलाना सैय्यद जाबिर जौरासी (सम्पादक , इस्लाह लखनऊ) डा. निजाबत अदीब (बरेली) सईद हसन (शिया कालेज सिटी ब्रान्च , लखनऊ) असद रज़ा (मुफ्तीगंज , लखनऊ) भी धन्यवाद के पात्र हैं। जिनसे पूरी किताब या किताब के किसी न किसी हिस्से पर खुल कर बात चीत हुई। जिस्से कुछ नतीजे निकालने में आसानी हुई। खास तौर से शुक्रिया के पात्र मौलाना सैय्यद फरीद महदी रिज़वी (जामे-उत-तबलीग , लखनऊ) हैं। जिन्होनें मुझे इस काम में फंसवाकर छः महीने तक किसी दूसरे काम का नही रखा। उपर्युक्त लोगों के साथ घर के सभी लोगों मुख्य रूप से अपनी धर्म पत्नी सैय्यदः साजिदा बानो का शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्होंने मुझे काम करने का पूरा मौका दिया और किताब का पुरूफ पढने में पूरा साथ भी। वास्तव में इन लोगों का शुक्रिया ज़बान या कलम से अदा नही किया जा सकता क्योंकि यह बहुत कम है।

आखिर में मौलाना अली अब्बास तबातबाई (अब्बास बुक एजेन्सी , लखनऊ) का शुक्रिया अदा करना भी ज़रूरी है जिन्होंने (एजेन्सी के अलिफ , ये को को निकाल कर जिन्सी) किताब लिखने की फरमाईश की , किताबें दी , समय समय पर किताब जल्दी पूरी करने के लिए टोका और किताब को छपवाने की पूरी ज़िम्मेदारी निभाई। जिससे यह किताब छप कर सामने आ सकी।

यहाँ पर उल्लेख ज़रूरी है कि यह किताब पहले फारसी (उर्दू) लिपि में लिखी गई जो अगस्त 1994 ई. मे एजेन्सी की ओर से प्राकाशित हो चुकी है। जिसकी बढती हुई लोकप्रियता को देखते हुए अब्बास साहब ने इसे राष्ट्र भाषा हिन्दी (देवनागरी) लिपि में करने कि ज़िम्मेदारी भी मुझ पर सौंपी। ताकि इस किताब से उर्दू न जानने वाले लोग भी लाभान्वित हो सकें।

बहरहाल किताब पूरी होकर अब आपके सामने है। जिसका खास मकसद नौजवान मुसलमानों को इस्लामी दायरे में रहकर भरपूर सेक्सी आन्नद और मज़ा उठाने के तरीकों की मालूमात देना है और ये काम केवल धार्मिक भावना (दीनी जज़बः) की खातिर किया गया है। इसमें मुझे कहाँ तक कामयाबी मिलती है इसका अनदाज़ः पाठक गणों के पत्रों से ही लगाया जा सकता है। इस मौक़े पर मेरी पाठक गणों से यह गुज़ारिश ज़रूर है कि अगर उन्हे इस किताब में कोई गलती या कमी महसूस हो तो कृपया मुझे बता दें ताकि बाद में उस ग़लती और कमी को दूर किया जा सके।

अन्त में खुदा वन्दे करीम से केवल यही दुआ है कि खुदाया हम सब को कुर्आन-ए-करीम और आइम्मः-ए-मासूमीन के प्रावचनों की रोशनी में सेक्सी मसलों को समझने , उनका हल निकालने और आन्नद और मज़ा उठाने की उमंग अता फ़र्मा। आमीन सुम्मा आमीन।

मोहम्मद तक़ी अली आबदी हैदर मंज़िल , 450/128/13, फ्रेन्डस कालोनी , न्यू मुफ़्तीगंज लखनऊ - 226003 (यू.पी.) ( 10) सितम्बर 1994

पहला अध्याय

सेक्स और प्रकृति

अ- जवानी की पहचान

ब- हस्त मैतुन

स- गुद मैतुन

द- बलात्कार

इस्लाम वह बड़ा और अच्छा धर्म है जिसने ज़िन्दगी के सभी हिस्सों से सम्बन्घित हर बात को विस्तार से बयान किया है ताकि एक सच्चे मुसलमान को ज़िन्दगी के किसी भी हिस्से मे नाकामयाबी या मायूसी ना हो। इन्ही सब हिस्सो मे से एकहिस्सा सेक्स का भी है।

आम तौर से समाज मे सेक्स से सम्बन्धित कुछ बाते करना , सोचना , पढ़ना बहुत ही बुरा समझा जाता है और फिर इस हस्सास (संवेदनशील) विषय पर कुछ लिखना----- लेकिन इस्लाम सेक्स से सम्बन्धित अमल (कार्य) और सेक्सी हरकत के आख़िरी नुक़ते स्त्री और पुरुष की मैथुन क्रिया के तरीक़े भी विस्तार से बयान करता है ताकि मनुष्य गुमराही और बुराई से बचकर संयम नियम का पालन करने तथा इद्रिंयों को वश मे करने वाला (तक़्वा और परहेज़गारी करने वाला) बन सके।