तारीख़े इस्लाम भाग 1

तारीख़े इस्लाम  भाग 10%

तारीख़े इस्लाम  भाग 1 लेखक:
कैटिगिरी: इतिहासिक कथाऐ

तारीख़े इस्लाम  भाग 1

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

लेखक: जनाब फरोग़ काज़मी साहब
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तारीख़े इस्लाम भाग 1
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तारीख़े इस्लाम  भाग 1

तारीख़े इस्लाम भाग 1

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

हज़रते सुलेमान अ 0

हज़रते ईसा से 1033 साल क़ब्ल हज़रते सुलेमान पैदा हुए। हज़रते दाउद के 19 बेटे थे और उनमें से एक अपने बाप की विरासत व हुकूमत का दावेदार था। जब हज़रते दाउद की रेहलत का वक़्त क़रीब आया और हुकूमत के लिए आपके बेटों में निज़ाई सूरत पैदा हुई तो आपको जिब्रइल के ज़रिेए एक मोहरबंद आसमानी मकतूब उसूल हुआ। जिसमें चंद सवालात थे। और इनके साथ यह सराहत भी थी कि तुम्हारे बेटों में जो इन सवालात का जवाब देगा वही तुम्हारा वारिस व जानशीन होगा। चुनान्चे आपने तमाम अराकीने हुकूमत और अमायदीने शहर को जमा किया और सब बेटों के सामनें बारी-बारी वह सवालात पेश किये मगर जनाबे सुलेमान के अलावा किसी ने कोई जवाब न दिया आखि़रकार आप ही अपने वालिद दाउद के वारिस व जानशील क़रार पाये। आपको अपने बाप से जो हुकूमत विरासत में मिली थी इस पर क़ाबिज़ व मुतासर्रिफ़ होने के बाद आपने इसकी वुसअत के लिए खुदा की बारगाह में यह दुआ की कि पालने वाले मुझे बख़श दे और मुझे वह हुकूमत अता कर कि मेरे बाद यह शरफ फिर किसी को न निले। बेशक तू बड़ा अता करने वाला है (कुरआने मजीद सूरए साद आयत 35)।

इस दुआ की बुनियाद पर खुदा वन्दे आलम ने तमाम जिन्नो इन्स , जमादात व नबातात व हैवानात पर वह इख़्तेयार दे दिया कि जिसकी मिसाल सलतीने दुनिया की तारीख़ में नहीं मिलती।

इन्सानों के अलावा आप का लशकर जिन्नातों , देवज़ादो , दरिंदों परुदों , चरिंदों , पर भी मुश्तमिल थी। और दो सौ मुरब्बामील के तवील व अरीज़ रक़बे में फैला रहता था। जिसकी तरतीह इस तरंह होती थी कि पचास मुरब्बे मील में इन्सानों की फ़ौज रहती थी। पचास मुरब्बा मील में जिन्नातों और देवज़ादों का लशकर रहता था। रचास मुरब्बे में दरिन्दों का मस्कन था। और पचास मुरब्बे मील के रक़बे मील के रक़बे में चरीनादों और परीन्दों का जगघटा लगा रहता था।

आपने तीन मील लम्बी डेढ़ मील चौड़ी एक अजीमुश्शान बिसात बनायी थी। जिसमें लकड़ियों पर शीशों के बने हुए एक हज़ार महल थे। सोने , चांदी , हीरे और जवारेरात से मरस्सा एक वसी और अरीज़ तख़्त था। जिसके दरमिय़ा में एक याकूत का मिम्बर था। और उसके चारों तरफ सोने व चांदी की तीन हज़ार कुर्सियाँ थीं। जिन पर आपके वुज़रा , मख़सूसीन और मुसाहेबीन जलवा अफ़रोज होते थे। इनके गिर्द जिन्नतों और देवज़ादो की क़तारें होतीं थीं। और पूरी बिसात पर परिंदे अपने परों का साया किये रहते थे। और हवा इस बिसात को आपकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ एक मकाम से दूसरे मक़ाम तक अपने दोश पर उठा कर ले जाती थी। इसी बिसात को बिसाते सुलेमानी कहा जाता है।

आपकी बीवियों का तादात 300 बतायी जाती है। और कहा जाता है कि उनते लिए भी आपने 72 मुरब्बा मील के रक़बे में एक आलीशान महल ताम़ीर कराया था। जिसकी ईंटे सोंने और चांदी की थीं। फर्श याकूत और जमर्रुरद का था।

आराइश और जेहबाइश

कुरआने मजीद से पता चलता है कि तख़्ते सुलेमानी की आराइश और ज़ेबाइश के लिए जिन्नात तरह तरह के मूरतें बनाते थे। तफसीर से यह भी वाज़ेह है कि वह नबियों और फरिशतों और मस्जिदों के मुरक्के बनाते थे। ताकि इन्हें देखकर लोग इबादत की तरफ़ रूजू हों। यह अम्र काबिले तवज्जो है कि हज़रते सुलेमान के दौर में इनके हुक्म से फरिश्तों और नबियों की तस्वीर इसलिए बनायी जाती थीं कि उस ज़माने के लोग इन्हें देखकर इबादत की तरफ रूजू हों। तो मौजूदा जमाने में हज़रते इमामे हुसैन अ 0 के रौज़ए अक़दस की तस़्वीर ताजिये पर ऐतेराज़ और बिदअत के फ़तवे एक बेजां और मोहमल बात है.। क्योंकि तस्वीर ताजिये की ग़र्ज भी यही होती है कि इसको देखकर लोग मज़लूमे करबला हज़रत इमाम हुसैन अ 0 की शहादत को याद करें। और तज़केरा और ग़िरया करें। चुंकि पैगम्बर इस्लाम भी इमामे हुसैन अ 0 की शहादत की ख़बर क़ब्ल अज़ वक्त सुनकर बार बार रोये थे। और वाक़ये शहादत के बाद भी हज़रत उम्मे इब्ने अब्बास वगैरह ने ख़्वाब में आन हज़रत को रोते हुए देखा था। तो इस वजह से रसूले अकरम स 0 अ 0 की ताअस्सी की ताअस्सी में हज़रते इमाम हुसैन अ 0 पर रोना भी इबादत है।

मखलूक़ात की दावत

जनाबे सुलेमान को जब मग़रिब से मशरिक़ तक तसल्लुत हासिल हो गया और हर शय इनके ज़ेरे इकतेदार आ गई तो इनके दिल में यह ख़्याल पैदा हुआ कि खुदा ने मुझे इतनी बड़ी हुकूमत अता की है क्यों न एक दिन सारी मख़लूकात की दावत की जाये। इस पर वही नाज़िल हुई कि ऐ सुलेमान ये तुम्हारे बस कि बात नही यह मेरा ही काम है कि तमाम मख़लूक़ात तक रिज़क़ पहुचाता हूँ। जनाबे सुलेमान ने अर्ज़ कि की पालने वालेतूने मुधे बहुत कुछ दिया है और मुझे उम्मीद है कि मैं तेरी मख़लूक़ात को शिकम सेर कर सकूंगा। लिहाज़ा तेरी बारगाह में ग़ुज़ारिश है कि तू इस अम्र की मुझे इजाज़त मरहमत फरमादे। चुनान्चे आपको इजाज़त मिली और आपने समुंदर के किनारे एक वसी और अरीज़ मैदान में दावत का एहतेमाम किया। लाखों इन्सानो और जिन्नातों ने मिनकर खाना जमा किया और जब आपको इत्मेनान हो गया कि ज़रुरत से ज़्यादा खुरदनी अशिया जमा हो गयी है तो आपने एक वक़्त मुक़र्रर करके हवा के ज़रिये तमाम मखलूक़ात के कानों तक अपनी तरफ़ से दाबत की आबाज़ पहुंचाई। अछभी एक मरकज़ पर मख़लूक़ात के जमा होने का इन्तेज़ार हो रहा था। कि समुंद्र से एक मछली ने सर निकाला और उसनें जनाबे सुलेमान से कहा कि सुना है आपने तमाम मख़लूक़ात की दावत कि है। लिहाज़ा मैं भी आयी हुँ मुझे सेर कीजिये। जनाबे सुलेमान ने फरमाया अभी कुछ देर इन्तिज़ार कर जब सब जमा हो जायेगें तो खाना खिलाया जायेगा। उसने कहां मैं तो बहुत भूखी हूँ मज़ीद इन्तेज़ार मेरी कूवते बरदाश्त से बाहर है। यह सुनकर जनाबे सुलेमान ने फरमाया जो मौजूद है उसमें से खा ले। कहा जाता है कि जो खाना तमाम मख़लूक़ात के लिए उस जगह जमा किया था मछली तन्हा उसे खा गई और मज़दी खाने की तालिब हुई यह देखकर जनाबे सुनेमान सजदए ख़ालिक़ में गिर पड़े और रो- रो कर कहने लगे कि ऐ पालन वाले रिज़क़ पहुंचाना बेशक तेरा की काम है। मुझसे ग़लती हुई तू मुझे माफ कर दे। यह भी कहा जाता है कि उस दिन तमाम मख़लूक़ात जिन्हें जनाबे सुलेमान ने मदू किया था सब भूखीं रह गयी।

चींटी से मुलाकात

हज़रते सुलेमान एक मरतबा अपने लशकर के साथ हवा के दोश पर परवाज़ कर रहे थे कि अचानक आपने एक वादी में उतरने का क़स्द किया जो चीटियों की अमाजगाह थी। हवा ने आहिस्ता आहिस्ता आपको इस बादी पर उतारने का क़स्द किया। तो एक चीटी ने (जो तमाम चीटियों की मलका थी) कहा की ऐ चीटीयों तुम अपने अपने ठिकानों पर चली जाओ इसलिए कि हज़रते सुलेमान का लशकर हमारी ज़मीन पर उतर रहा है। ऐसा न हो की तुम रौंदी जाओ। जनाबे सुलेमान को इसकी खबर भी न हो यह आवाज़ जनाबे सुलेमान के कानों तक पहुचाई। आपाने चीटियों कि उस मलका को तलब किया और अपनी हथेली पर उठाया और फरमाया कि क्या तेरे नज़दीक सुलेमान ज़ालिम है उसने कहा कि मैं आपको ज़ालिम नही समझती। मुझे अपनी रियाया की हिफाज़त करना फ़र्ज़ है मैने इस फर्ज़ के तहत इन्हे आगाह किया था ताकि वह जानी नुकसान से महफुज़ रहे। जनाबे सुलेमान ने फरमाया कि क्या तुम अपनी रियाया पर इस शफक्कत को रवा रखती हो। मलका ने कहा क्योकि खुदा ने मुझे इनकी सरदारी अता की है। इसलिए इन पर शफ़क्कत भी मेरे लिए वाजिब है। फिर जनाबे सुलेमान ने फरमाया कि क्या तुम्हारी हूकुमत बेहतर है या मेरी।उसने कहा इस वक्त तो मेरा मरतबा आपसे बलन्द है क्यों की मै आपके हाथ में हुँ। आप के अज़ीम बादशाह होने के साथ साथ अल्लाह के नबी भी है। यह सुनकर जनाबे सुलेमान के आँखो मै आ गये आपने सर झुका लिया और खामोश हो गए।

मलक़ए बिलक़ीस बिन्ते शराजील का वाक़ेया

हज़रते सुलेमान एक दिन आपने दरबार में तशरीफ़ फ़रमा थे और परिन्दे हस्बे दस्तूर आप पर साया किये थे। एक ख़ला से धूप की किरने आपके चहरे पर पड़ी नज़र उठा करे जायज़ा लिया तो देखा कि हूदहूद की जगह खाली है। आपने फरमाया की हूदहूद कहां है पता लगाओं मै उसको सख्त सज़ा दुँगा। अभी थोड़ी ही देर ग़ज़री थी की हुदहूद होंपता कांपता खिदमत मै हज़िर हुआ। आप ने फरमाया कि तु कहा था उसने कहां की हुज़ूर एक ऐसी ख़बर लाया हूँ कि ग़ालेबन आप को भी नही है फरमाया बयान कर उसने कहा मुल्के यमन मै दो पहाड़ियों के दरमियान सबा नामी एक शहर है , जो वहां की हसीन तरीन मलका बिल्कीस बिन्ते शराजील इब्ने मालिक का दारुस्सलतनल है। इस मलका की अपनी बादशाहत है और शाही का तमाम साज़ो समान इसके पास मुहैया था। सोने , चाँदी ,हीरे ,जवाहेरात से बना हुआ उसका तख्त तीस ग़ज लम्बा , तीस गज़ चौड़ा , तीस ग़ज ऊँचा है। इनमें सात खाने है और हर खाने में बड़े बड़े कीमती मोती और आवेज़ा है। इसके चारों पाये याकुतो ज़मर्रुदो पुखराजो मोती के है और वह इस तरह आरास्ता और पैरास्ता है. कि देखने वालो की निगाह नही ठहरती। मगर सबसे बड़ा ऐब यह है कि वह मलका और उसकी रियाया आपताब को सज़दा करती है और शैतान ने उसे बहका रखा है.।

हज़रते सुलेमान चुंकि अल्लाह के नबी थे। बनी नोए इन्सान की हिदायत पर मअमुर थे। इसलिए हुद हुद की ज़बान में ग़ैरउल्लाह की परशतिश का हाल सुनकर आपकी पेशानी पर नागवारी की शिकने नमुदार हुई। चुनान्चे आपने बिल्कीस के नाम एक खत लिखा और हुद हुद से कहां कि यह खत ले जा और इसे मलका तक युँ पहूचा दे कि उसे यह न मालूम हो की किस तरह आया है। हुदहुद यह खत ले कर रवाना हुआ और जब वह वहां पर पहुचा तो उस वक्त बिल्किस अपने मखसुस कमरे में महवें इस्तेराहत थी। यह रौशन दान से कमरे में दाखिल हुआ और मलका के सीने पर खत रख कर चला आया और जब वह सो कर उठी तो उसने अपने सीने पर सुलेमान का खत देख कर सख्त मुताअज्जि और हैरान व परेशान हुई। पहरे दारों से पुछा तो सभी ने लाइल्मी ज़ाहिर की। ग़र्ज कि उसने खत खोला और पढ़ा तो होश उड़ गये। इसमें लिखा था कि हमें मालुम हे कि तुम लोग खुदा की इबादत करने के बजाए ग़ैरुल्लाह की परशतिश में मसरुफ हो। और आपताब को सजदा करते हो। मैं एक नबी की हैसियत से तुम लोगो को दीने हक इख़तेयार करने की दावत देता हूँ और हिदायत देता हुँ की अगर तुम लोग न माने और कुर्फ़ो ज़लालत पर कायम रहे तो याद रखो कि में तुम पर हमला करके तुम्हारी सारी सलतनत को नेस्तोनाबूद कर दुँगा। खत पढ़ने के बाद बिलकिस पर लज़्जा तारी हो गया। वह इस क़द्र तशवीश व तरद्दुद में मुब्तेला हुई कि उसने फौरी तोर पर तमाम वज़ीराने ममलेकत अराकीने हुकूमत अपने तमाम फौज़ के सरदारो को तलब किया और पूरे वाक़्ये कि तफसील बयान कर हज़रते सुलेमान का वह मकतुब रखा और उन लोगों से पुछा कि इस बारे में तुम्हारी क्या राय है.। उन्होने कहां की हम लोगों के पास ताक़त व शुजाअत दोनों चीज़े है आइन्दा आप को इख्तेयार है। अन्जाम को सामने रखते हुए जो हुक्म सादिर फरमायें हम उसके लिए हर वक्त तैयार हैं..।

बिलकिस ने कहा की यह दुनिया का उसूल है कि जब कोई बादशाह किसी हुकूमत पर हमला करता है तो वह उसे तबाह व बरबाद करने व बाइज़्ज़त लोगों को ज़लीलो रुसवा करने की कोशिश करता है। लिहाज़ा इस टकराव से बचना चाहिए। मेरा यह ख्याल है कि मै पहले सुलेमान के पास इम्तेहान्न कुछ कीमती तोहफा भेजू अगर वह वाक़्यी पैग़म्बर है तो वापस कर देंगे वरना क़बूल कर लेगें। चुनान्चे तोहफे में उसने ज़नाना लिबास में मलबूस 500 ग़ुलाम और मर्दाना लिबास में मलबूस 500 कनीज़े उनके साथ जडाऊ जीन से आरास्ता 1000 अरबी घोड़े 1000 सोने चाँदी की ईटे और एक जड़ाउ ताज , कुछ मुश्को अम्बर नासिफ और नासुफता मोतियो का एक डिब्बा अपने वज़ीर मुन्ज़र बिन अमरो के हाथ रवाना किया मुन्ज़र ने यह हिदायत कर दी थी कि अगर सुलेमान यह शिनाख्त कर ले की गुलामों और कनीज़ो में कौन ग़ुलाम और कौन कनीज़ है। तो समझ लेना की वह कोई ग़ैर मामुली इन्सान है.। फिर उसने कहा कि वह इन मोतियों में किसी ऐसी मख्लुक़ से सुराख करा ले जो जिन्ना हो न इन्सान , अगर वह इस अम्र को पाए तकमील तक पहुंचा दे तो यकीन कर लेना की वह पैग़म्बर है। हज़रते सुलेमान ने खबर गीरी के लिए हुद हुद को मामुर कर रखा था। चुनान्चे जब उसने इस तमाम बातो की इत्तेला आपको दी तो आपने भी अपने दरबार को आरास्ता करने का हुक्म दिया सात मील तक सोने और चाँदी की ईंटे बीझा कर उन पर याकूत का जड़ाऊ फर्श बनाया गया। दरमियान में शाही तख्त रखा गया उसके गिर्द चार हज़ार तिला व नुकरा की कुर्सिया बिछायी गयी। इन पर वज़रा व अमरा बिठाये गये। इसके बाद इन्सानो जिन्नातो और दरिंदो का लश्कर सफबस्ता खड़ा हुआ। फिर परिन्दो नें अपने परों का साया किया किया। ग़र्ज़ इस शान से मन्ज़र इस्तेक़बाल किया गया कि वह अपने तहाएफ़ को हक़ीर ख्याल करके खुद ही नादिम हो गया। इसके बाद जनाबे सुलेमान ने मुन्ज़र से गुफ्तगु की उसे खुदा की इबादत की तरग़ीब दी। गुलामों कनीज़ो को पहचाना और एक कीड़े को हुक्म दिया की वह बिलकीस के इरसाल कर्दा नासोफता मोतियों मे सुराख कर दे। जब यह तमाम मराहिल तय हो गये तो आप ने मन्ज़र से फरमाया कि मुझे तुम्हारे तोहफे की हाजत नही है इन्हे वापस ले जाऔ और मेरे खुदा ने मुझे बहूत अता किया है। और तुम्हारे माल से बेहतर है।

कस्रे सुलेमान मे बिलकीस का वरुद

बिलकीस काफिर सतादा मन्जर जब अपने वतन वापस गया हो वहां उसने हज़रते सुलेमान का जाहो हशम आपकी खुदाई ताक़त , अज़मतों जलालत का सारा हाल बयान किया। जिसे सुन कर मलका बेहद मुताअस्सिर हुई और उसने तय किया कि सुलेमान की इताअत क़ुबूल करने ही में आफियत है। चुनान्चे उसने दुबारा फिर अपना क़ासिद रवाना किया और उसके पीछे खुद भी बारह हज़ार अमीरों और लश्करीयों के हमराह रवाना हुई। क़ासिद चुंकि पहले ही पहूंच गया था और उसने हज़रते सुलेमान को बिलकीस की आमद व इरादे मुत्तेला कर दिया था।

लिहाज़ा आपने भी मलका की शायाने शान इस्तेकबाल की तैयारीयां कर ली थी। लेकिन आपकी ख्वाहिश यह थी की बिलकीस जब हमारे महल में दाखिल हो तो वह अपने ही तख्त पर फरोकश हो। चुनान्चे आपने दरबारियों से फरमाया कि तुम्में से कौन ऐसा है जो मलिकाए सबा के यहां पहुचने से पहले उस शाही तख्त को ले आये। क़ौमे जिन्न में से एक ने कहा कि मै दरबार बर्खास्त होने से पहले इस काम को अन्जाम दे सकता हूँ। इस पर आसिफ बिन बरकिया जो आपका वज़ीर था। जिसे खुदा ने कुरआन का इल्म दे रखा था। एक रवायत के मुताबिक़ वह इसमे आज़म ज़रिये मंगवा सकता हूँ इसके बाद उसने कुछ पढ़ कर इसारा किया औप वह तख्त हज़रते सुलेमान के क़दमों मैं आ गया। आप ने फरमाया कि तख्त में कुछ तबदीली पैदा कर दो।

मै यह देखना चाहता हूँ कि मलिकए सबा अपनी मिलकियत को पहचानती है कि नही। ग़र्ज की बिलकिस जब हज़रते सुलेमान के महल में दाखिल हुई तो वहां अपना तख्त देख कर हैदरत ज़दा रह गयी। हज़रते सुलेमान ने फरमाया कि क्या तुम्हारा तख्त ऐसा ही है उसने जवाब दिया की मै अब आपकी इताअत कुबूल कर चुकी हूँ। खुदा की मारेफत का नूर हासिल कर चुंकि हूँ। लिहाजा कोई चीज मेरी नज़रो से पोशिदा नही रह सकती इसके जवाब पर हज़रते सुलेमान मुस्कुरा दिये। इसके बाद आपने हुक्में इलाही के मुताबिक बिलकीस से अक़द फरमाया। उसे खुसुसी शरफ़ व मन्ज़ेलत से सरफ़राज़ किया।

घोड़ो की क़ुरबानियां

कुरआन मजीद के पारा 23 सूरए साद की आयात 31-34 में यह वाक़या मज़कूर है। जिसकी तफसीर में मौलाना फरमान अली साहब किब्ला रक़म तराज़ हैं कि हज़रते सुलेमान एक अज़ीमुश्शान बादशाह थे मगर फिर भी नबी थे दमिश्क व नसाबीन के कुफ़फ़ार पर चढ़ाई और जेहाद का इरादा था। जिसकी तैयारी में उन्होने उम्दा किस्म के घोड़े अपने सामने तलब किये जो किसी ने तोहफतन भेजे थे। आप इनको देखने में ऐसे मुनहमिक हुए कि आखिर वक्त जो दुआए या वज़ाएफ़ पढ़ा करते थे वह तर्क हो गया। और आफताब ग़ुरुब हो गये। इसका आप को ऐसा सदमा हुआ कि इस मुस्तहबी वजाएफ के कफ्फारे में अपने खुदा की राह में इन्ही घोड़ो की कुरबानी कर दी और इनका गोश्त फ़ोकरा व मसाकीन में तकसीम कर दिया। इस किस्से के मुत्तालिक मुफस्सरीन केऔर अक़वाले लग़ो और बातिल है। यह एक पैग़म्बर पर खां मखां का इलज़ाम है.। जिसे किसी तरह अक़ले सलीम क़ुबूल नही करती।

बैतुलमुक़द्दस की तामीर

बैतुलमुक़द्स की इब्तेदा सबसे पहले हज़रते सुलेमान मे की इसके बाद हज़रते दाउद ने इसका कुछ हिस्सा तामीर किया। फिर हज़रते सुलेमान को इसकी तामीर का हुक्म हुआ तो आपने इसमें क़ीमती पत्थरों को तरशवा कर सरेनवं इसकी तामीर करवाई। याकूत व ज़मुर्ररुत और सोने और चांदी की तखतियों से दीवारे बनीं.। ज़बर जद के सूतून बनाये गये। फीरोज़े से मेहराबो दर बने और इसमें कीमती मोती आवेज़ा किये गये जवाहेरात की जडाउ छत बनी। जिसमें इस कद्र चमक थी की रात में रौशनी की ज़रुरत न थी। याक़ूत व ज़मर्ररुत फ़ीरोज़ा फर्श में इस्तेमाल किया गया। इसमें शक नही कि यह मस्जिदे सुलेमानी सहकारथी। जिसे 454 के बाद बाबुल के बादशाह बख्ते नस्र ने तबाह व बर्बाद कर दिया और सारा साज़ो समान लूट कर अपने साथ ले गया। यह इमारत जो बाक़ी है बहूत बाद की बनाई हुई है।

हज़रते सुलेमान की वफात

हज़रते सुलेमान जब 16 साल के थे तब हज़रते दाउद के वारिस व जानशीन हुए। 40 साल आपने हुकूमत की इस तरह वक्ते वफात आप की उम्र 56 साल की करार पाई। लेकिन इस मुद्दत के बारे में मुहक्केकीन के दरमियान इख्तेलाफ है। यहं तक एक रवायत में है कि आप की उम्र 712 साल की मज़कूर है। लेकिन हालात और वाकेयात के पेशनज़र यह मुद्दत करीन क़यान हरगिस नही है। आपके इन्तेक़ाल की हिकायतें भी मुख्तलीफ है। मगर मेरे नज़दीक दुरुस्त यह है कि आपने समुंद्र के साहिल पर एक शीशे का कुब्बा बनवाया था। जो इस कद्र बूलन्द था कि इस पर खड़े हो कर अकसरों बेंशकर आप अपनी अफवाज़ का मुआयना किया करते थे।

चुनान्चे एक दिन आप असा के सहारे खड़े होकर फरमा रहे थे। कि एक खुबसूरत नौजवान इस क़ूब्बे में दाखिल हुआ इसे देख कर आपने पुछा तु कौन है और किसकी इजाज़त से यहा आया है। उसने कहा कि मैं मलकूल मौत हुं और में खुदा की इजाज़त से आया हुँ आप ने फरमाया कि क्या इतनी मोहल्त है कि बैठ जाउं। इसने कहा कि अम्रे इलाही यही कि मै इसी हालत में आपकी रुह क़ब्ज़ कर लूं। चुनान्चे रुह क़ब्ज़ कर ली गयी.। आप खड़े के खड़े रह गये। एक साल ग़ुज़रने के बाद फौज म बेचेनी हुई तो खुदा ने दीमक को हुक्म दिया और उसने आप के खा लिया और जब असा टुटा तो नबी ज़मीन पर गिरे तो लोगो को मालूम हुआ की नबी हमारे दरमियान से ग़ुज़र गये।

मुख्तलिफ अम्बिया व औसिया

हज़रते सुलेमान की वफात के बाद तमाम दरिन्दे चरिन्दे परिन्दे देवज़ादे और जिन्नात वगैरा सब के सब आज़ाद हो गये थे। और सुलेमानी हुकूमत का दायरा इखतेयार सिमट कर सिर्फ इन्सानों पर हुक्म रानी तक महदुद रह गया था। ना वह दबदबए इख्तेदार था और न वह जाहो हशम। बहरहाल जो कुछ भी था उसके वारिस जनाबे सुलेमान के साहब ज़ादे जनाबे रहीम क़रार पाये और उऩ्होने 17 साल तक मस्नदे एख्तेदार पर रहकर कारे तब्लीग़ अन्जाम दिया। उनके बाद इनके साहब ज़ादे आफिया बिन रहीम बरसरे इक़तेदार आये और उन्होऩे 63 साल तक हुकूमत की इसके बाद इनके फ़रज़न्द असा बिन आफिया तख्ते हुकूमत पर मुतामुक्किन हुए उन्होने भी एक अरसए दराज़ तक तब्लीग़ी उमुर अन्जाम दिये।

इसी तरह बिला तरतीब यके बाद दीगरे सैकड़ो बरस तक हज़रते सुलेमान की नस्ल में हुकूमत चलती रही। फिर एक दो दौर ऐसे भी आये आबाओं अज़दाद के पुराने मसलक की तरफ पलटने लगे। तो इनके रोक थाम के लिए खुदा ने दो पैग़म्बरो को बयक वक्त उन्की हिदायत के लिए मअमूर किया। जिन्हे तारिख हज़रते हीकूक़ और हज़रते शैया के नाम से जानती है।

मगर इनके हालात वाक्यात से बे बहरा है। हज़रते शेबा के बाद खुदा ने बनी इस्राइल पर ह़ज़रते अरमिया को मामूर फरमाया जिन्का सिलसिलए नसब हज़रते हारुन बिन इमरान पर तमाम होता है। जनाबे आरमिया की इसलाही कोशिशों और तब्लीग़ी उमूर मे जैसे जैसे शिद्दत पैदा होती गयी वैसे वैसे उन्की क़ौम की सरकशी और जिद में इज़ाफा होता गया। यहां तक कि यह लोग एलानिया तौर पर बुत परस्ती पर आमादा हो गये। और किसी सुरत से राहे रास्त पर आने को तैयार न हुए तो परवरदिगार ने हज़रते आरमिया के ज़रिये इन्हे सख्त वारनिंग दी और फरमाया कि अगर तुम लोग राहे रास्त पर न आओगे तो हम ऐसे ज़ालिम व जाबिर को तुम पर मुसल्लत कर देंगे जो ज़नाज़ादा होगा। जिसकी परवरिश ग़लीज़ और बदतरीन ग़िज़ा की मरहुने मिन्नत होगी। और जो तुम्हारे मर्दों को क़त्ल तुम्हारी औरतों को असीर करेगा।

इसके बाद ख़ल्लाक़े आलम ने हज़रते अरमिया की ख़्वाहिश पर उन्हे उस बादशाह की ख़ुसुसी अलामतें और निशानियां बता दी.। नीज़ यह भी ज़ाहिर कर दिया था कि इसका नाम बखते नस्र होगा। वह तुम्हारे ही ज़माने में तुम्हारी ही क़ौम (बनी इस्राईल) पर खुरुज करेगा।

बखते नस्र के वाक़ेयात

मुताज़क्केरा बाला ख़बर के बाद हज़रते आरमिया को यह फिक्र लाहक़ हुई कि खुदा की बतायी हुई आलामतों और निशानियों की रोशनी में बख़ते नस्र को तलाश करना चाहिए। चुनान्चे आप उसकी जुस्तजु में निकल खड़े हुए और मुख़तलिफ मुक़ामात का सफर तय करते हुए बाबुल पहुंचे। वहां एक गाँव से गुज़र रहे थे तो आपने देखा कि चार पांच बरस का एक बच्चा मुख्तलिफ बीमारियों में मुब्तेला है इन्तेहाई हक़ीर हालत से एक मज़बिले (घूरे) पर पड़ा है और उसके ही क़रीब एक औरत बैठी हुई है जो कुत्तिया का दुध निकाल रही है। यह मन्ज़र देख कर आप ठहर गये। जब वह कुत्तिया का दुध निकाल चुकी तो इस औरत ने इस दुध में रोटीयों के चन्द टुकड़े भिगोये और उस लड़के को खिलाकर वहां से चली गयी। जब वह तन्हा रह गया तो हज़रते आरमिया उसके क़रिब गये ताकि उसका कुछ हाल मालूम करें चुनान्चे सबसे पहले आपने उसका नाम पुछा इसने कहां मेरा नाम बखते नस्र है लेकिन बद बख्ती का शिकार हुँ आप ने फरमाया इस हाल में क्यों पड़ा है। उसने कहा ज़िना ज़ादा हुँ लिहाज़ा इस जुर्म की सज़ा में यहा के लोगों ने मुधे इस मज़बले पर ड़ाल रखा है। सिर्फ कुत्तिया का दुध मेरी परवरिश का ज़रिया है.।

इतना सुन लेने के बाद जनाबे अरमिया को मज़ीद कुछ पुछने की हाजत न रह गयी। आप समझ गये कि यह वही लड़का है जिसकी अलामतें व निशानियां खुदा ने ज़ाहिर की थी। यह एक दिन बनी इस्राईल पर ग़लबा हासिल करेगा। इन पर अज़ाब बनकर मुसल्लत होगा। चुनान्चे उसकी तरफ से आपने आपनी पुरी तवज्जो मबजूल कर दी। उसी गांव में आप ठहर गये उसका इलाज कराया और उसकी खुर्दोनोश पर ध्यान दिया। यहां तक वह अच्छा भला न्दुरुस्थ हो गया। आप पांच बरस तक वहां मुक़ीम रहे और उसकी तालीम व तरबियत पर तवज्जो देते रहे।

जब वह तकरीबन ग्यारह बारह साल का हो गया तो आपने उससे अपना तअर्रुफ कराया और कहा मैं बनी इस्राईल का पैग़म्बर अरमिया हूँ। खुदा ने तुम्हारे मुताअल्लिक़ ख़बर दी है कि वह अन्क़रीब तुम्हे मिरी क़ौम पर मुसल्लत करे और तुम बादशाह होगे। मगर जब तुम्हें ग़लबा हासिल हो जाये तो मुझे भूल न जाना। इसने कहा कि भला यह क्यों कर मुमकिन है कि मैं अपने मोहसिन को भुल जाऊँ। आपने फ़रमाया कि अब मैं अपने वतन जाना चाहता हुँ। लिहाज़ा मेरी ख्वाहिश है कि तुम मुझे एक अमान नामा लिख दो ताकि वक़्त पर काम आये। ग़र्ज़ कि इसने एक आमान नामा लिख दिया जिसे लेकर आप वहां से वापस चले गये।

बख्ते नस्र जब जवान हुआ और उसने बनी इस्राईल के मज़ालिम की दास्ताने सुनी तो इसकी की तरफ से इसके दिल में नफ़रतैं पैदा हो गयी इसने इनके खिलाफ लोगों को उभारना शुरु किया। मशीयते इलाही भी यही थी। लिहाज़ा लोगों ने उसका साथ दिया यहां तक कि एक कसीर जमीयत इसके साथ हो गयी। जिसे मुनज़्ज़ करके उसने पहले अपने ही शहर बाबुल पर चढाई कर दी। और जब बाबिल पर मुक्कमल तसल्लुत हासिल हो गया और उसकी बादशाहत मुस्तहकम हो गयी तो उसने अपनी कूवत व ताक़त में खातिरे ख्वाह इज़ाफा करके बनी इस्राइल के दारुस सलतनत बेतुल मुक़द्दस पर हमला कर दिया। हज़रते अरमिया अ 0 भी उस वक़्त मौजूद थे जब आप को बकते नस्र के हमले का हाल मालूम हुआ तो उसके तहरीरकर्दा आमान नामा को लेकर उसके पास गये आपको देखते ही उसने फौरन पहचान लिया और बड़ी तकरीमों ताज़ीम के साथ पेश आया। इसने आपके तहफ़फुज़ का माकूल इन्तेज़ाम किया।

बनी इस्राइल ने पहले ही रेले मे सिपर ड़ाल दी थी। इसलिए बखते नस्र ने इन पर क़ाबू पाते ही उनके क़त्ले आप का हुक्म दे दिया। जिसके नतीजे में बैतुल मुक़द्दस की सर ज़मीन इन्सानों के खून से सुर्ख हो गयी। अल्लामा मजलिसी अ 0 र 0 ने साआलबी के हवाले से तहरीर फ़रमाया है कि बेशुमार क़त्लेआम के बाद जब लोग गिरफ़तार हुए तो उनमें से बच्चों की तादाद 70 हज़ार थी। तबरी का कहना है कि कैदियों में हज़रते अज़ीज़ और हज़रते दानियाल भी शामिल थे जो उस वक़्त बैतुल मुक़द्दस में तबलीग़ी उमुर अंजाम दे रहे थे , दीगर तारीखी शबाहिद से पता चलता है कि दो तिहाई आबादी शहर की ख़त्म हो चुकी थी और बैतुल मुक़द्दस का सारा क़ीमती असास लूट कर उसे बिल्कुल तबाह और बरबाद कर दिया गया था.। हज़रते अरमिया अर्ज़े मुक़द्स की तबाही और बरबादी को देखकर और दिल ही दिल मे सोचा करते थे कि शायद अब यह सरज़मीन पहले की तरह आबाद न हो सके।

आपकी इस कैफियत को देक कर परवरदिगार आलम ने फरमाया कि ऐ अरमिया तुम रन्जीदा और मलूल न हो हम इस शहर को उसी तरह दुबारा फिर आबाद करेंगे। और तुम देखोगे कि तुम्हारे खुदा ने अपना वादा किस तरह पूरा किया।

हज़रते अरमिया अ 0 एक रात जब सोये तो परवरदिगारे आलम ने इन पर सौ बरस की नींद तारी कर के इन्हें जिब्रील के ज़रिये दुनिया की निगाहों से पोशीदा कर दिया। और शाह फ़ारस को इस अम्र पर मामूर कर दिया कि वह अस्सरे नौ बैतुल मुक़द्दस की ज़मीन को आबाद करे। ग़र्ज़ कि उसने अपनी तमाम कोशिशें सर्फ करके 72 साल में अर्ज़े मुक़द्दस को पहले की तरह फिर आबाद कर दिया। और नजब सौ बरस का वक्फा रूरा हो गया तो मशीयते ख़ुदी वन्दी ने हजडरते अरमाया को फिर बेदार किया आपने शछहर को जब उसी तरह आबाद व बा रौनक़ देखा तो बेहद ख़ुश हुए और सजदए शुक्र किया इसके बाद हज़रते अरमिया अ 0 काफी अरसे तक हयात रहे। बाज़ मुफस्सेरीन ने इस वाक़ये को हज़रते अज़ीज़ अ 0 की तरफ मन्सूब किया है। जो मेरी तहक़ीक़ के लिहाज़ से ग़लत है।

हज़रते दानियाल अ 0

हज़रते दानियाल हज़रते याकूब अ 0 की नस्ल से हज़रते अरमिया के हमअस्र थे। इमामे जाफ़रे सादिक़ अ 0 का क़ौल हे कि बचपने में ही आप के वालदैन का साया सर से उठ गया था। आप यतीम हो गये थे। बनी इस्राइल की एक बूढ़ी औरत ने आपकी परवरिश की थी। हज़रते मूसा अ 0 की शरीयत पर अमल पैरा थे और बनी इस्राइल को खुदा परस्ती का दर्स दिया करते थे। खुदा ने आपको अक़लो खेरद फहमो इदराक के साथ पैगम्बरी से सरफराज़ किया था। बख्ते नस्र बादशाह आपको बैतुल मुकददस में कैद करके अपने वतन (बाबूल) ले गया और उसने आपको वहां ऐसे अन्धे कुएं में डाल दिया था जो पहले से ही उसकी पली हुई एक खुंखार शेरनी का मसकन था। यह मसलहते इलाही थी कि शेरनी ने आप को कोई गज़न्द नही पहुचाया बल्कि खिलाफे फितरत उसने आपको दूध पिला पिला कर इस वक्त तक आपको ज़िन्दा रखा जब तक की खुदा ने आप को निकालने का कोई सबील पैदा न की। हज़रते दानियाल को इस कुंए से निजात क्योकर मिली। इस ज़िम्न में कहा जाता है कि बख्ते नस्र ने एक दिन ख्वाब में देखा कि आसमान से फरिश्तों की जमाअत इस कुएं पर आती है। वहां नमाज़ पढती है और फिर वापस चली जाती है। ख्वाब से जब ये बेज़ार हुए तो उसके दिल में हज़रते दानियाल का हाल मालूम करने कि जूसत जू पैदा हुई चुनान्चे रात ग़ूज़री और जब सुबह को उसे यह मालूम हुआ कि आप ज़िन्दा है। शेरनी ने आप को कोई ज़र नही पहुचाया तो उसके दिल में आपकी तरफ से हैबत पैदा हो गई और उसने इज़्ज़त व एहतेराम के साथ उस कुएं से निकलवाया लेकिन फिर भी उन्हे आज़ाद नही किया बल्कि अपने खुसुसी हिरासत में रखा ताकि आवाम से हज़रते दानियाल का कोई राब्ता क़ायम न हो सके।

कुएं के बाद जो आपको कैदखाना मिला था। एक कुशादा मकान की शक्ल में था। इसके चारो तरफ फौज का पहरा रहता था। ताकि वहां पर किसी शख्स का ग़ूज़र न हो। ग़र्ज़ कि आप सात बरस तक इसी कैद खाने में मसरुफे इबादत रहे।

एक दिन बख्ते नस्र ने फिर ऐसा ही ख्वाब देखा जिससे वह परेशान व खौफज़दा हुआ। लेकिन जब सुबह हुई तो वह उस ख्वाब को भूल गया और इन्तेहाई ग़ौरव ख़ौज करने पर भी याद न आया तो उसने तमाम मुनज्जिमों और काहीनों को जमा किया और उनसे कहा कि मैंने बहूत ही ख़ौफनाक ख्वाब देखा है मगर भूल गया हूं। तुम लोग अपने इल्म के ज़रिये बताओ कि मैंने क्या देखा। ख्वाब की ताबीर क्या है। उन लोगो ने कहा ख्वाब पता हो तो हम लोग ताबीर बता सकते है.। लेकिन ख्वाब का बताना हमारे लिए मुमकिन नहीं है। बखते नस्र ने कहा कि मैं तीन दिन का मौका तुम लोगो को देता हूं इस दरमियान तुम खूब ग़ौर कर लो और न बता पाये तो सोच लो मैं तुंम लोगो को क़त्ल कर दुंगा। ग़र्ज़ जब यह खबर मशहूर हुई जहां हज़रते दानियाल कैद थे वहां के किसी पहरे दार ने यह वाकया आपको सूनाया तो आपने फरमाया कि तू बादशाह से जा कर यह कह दे कि यह खवाब बता देना काहिनो और नज़ूमियो के बस में नही है। अलबत्ता वह मुझसे रुजू करें तो मैं इसका ख्वाब और इसकी ताबीर दोनों बता सकता हूँ।

बखते नस्र को जब यह मालूम हूआ तो उसने फौरन हज़रते दानियाल को क़ैद खाने से तलब किया और उनसे कहा बताइये कि मैने ख्वाब में क्या देखा है और इसकी ताबीर क्या है। आपने फरमाया कि तुने ख्वाब में यह देखा है कि तुने ख्वाब में एक ऐसे बूत को देखा है जिसका पैर ज़मीन पर है और सर आसमान पर है। इसका सर सोने का है दरमियानी हिस्सा चांदी का है। ज़ानू ताबें के हैं. पिंडलिया लोहे की है और क़दम मिट्टी के हैं जब तू इसे ग़ौर से देख रहा था तो नागहा आसमान से किसी ने उसके सर पर एक पत्थर मारा जिससे उसका कद इतना छोटा हो गया कि उसके सारे अज़ाए जिसमानी एक दुसर में पैवस्त हो गये। फिर तुने यह देखा कि जो पत्थर उसके सर पर मारा गया था वह बड़ा होने लगा और रफता रफ़ता तमाम कायनात पर मुहीत हो गया।

बखते नस्र ने कहा बेशक मैने यही ख्वाब देखा था। अब आप यह बताइये कि इसकी ताबीर क्या है ? आपने फरमाया कि ऐ बादशाह उस बूत से मुराद उम्मते है जो तेरे बाद दरमियान व आखिर में होंगी तलायी हिस्सा जिस्म से मुराद मौजूदा उम्मत और , तेरी बादशाही का ज़माना है नुक़रयी हिस्सा जिस्म से मूराद तेरे बेटे की हुकूमत का ज़माना होगा ताम्बे से मुराद अहले रुम है। लोहे से मुराद फारस और अज़म के लोग है। जिस पत्थर ने इस बुत के क़द को छोटा किया था उससे मुराद वह दीन है जो आखिरी दौरे पैग़म्बरी में उस वक्त की उम्मत पर नाज़िल होगा और दुसरे दीनों को खत्म कर देगा। अरब की सरज़मीन पर खुदा उस पैग़म्बर को मबउस करेगा। जो तमाम नबियों में आखरी नबी होगा। जिसका दीन तमाम दुनिया मं फैलेगा। जिस तरह वह पत्थर पूरी कायनात पर मुहित हो गया। उसी तरह आखरी नबी का दीन भी पुरी कायनात पर छा जाऐगा। बखते नस्र यह सुनकर बहूत मुताअस्सिर हुआ और कहने लगा कि ऐ दानियाल मैं आपसे बहुत शर्मिन्दा हूँ मैंने आप पर जुल्म के सिलसिले को रवा रखा। आज से आप आज़ाद है जहां चाहें जा सकते है। आपने फरमाया तुनें मैरा वतन उजाड़ दिया है। अब कहां जाउ यही रहना चाहता हूँ। जैसे भी तुम रखो। बिला आखिर बखते नस्र ने आपको अपना मुशीर खास मुकर्रर किया और तमाम अराकीने हुकूमत को यह हिदायत जारी कर दी कि वह हज़रते दानियाल से मशवेरा किए बगैर कोई काम न करें।

हज़रते दानियाल इस मन्सबे शाही पर तीस साल तक फ़ायज़ रहे। यहां तक कि बखते नस्र को उसीके एक गुलाम ने क़त्ल कर दिया। उसके बाद बख्ते नस्र का बेटा महरुया या फलशताश तख्त नशीं हुआ। उसने सत्तरह साल बीस दिन तक हुकूमत की। उसी ज़माने में हज़रते दानियाल ने बाबूल के एक मकाम सुस में इन्तेकाल फ़रमाया और वहीं दफन हुए। इमामे सालवी का कहना है कि हज़रते उमर के दौर में जब सुस फतेह हुआ और अबू मुसा अशरी वहां के हाकिम हुए तो दारुल अमारा के एक मुक़फ्फल कमरे में इन्हे तवीलुल क़ामत एक मय्यत रखी हुई मिली जिसका मुंह खुला था और लाश ख़राब होने से महफूज़ थी। उसने मय्यत का हाल मालूम करने में बहुत कोशिश की मगर जब कुछ पता न चला तो उसने इस वकये की तफसील से हज़रते उमर को आगाह किया और दरियाफत किया कि इस मय्यत के मताअल्लिक हम क्या करें। जब दरबारे खिलाफत में भी यह मसला हल न हुआ तो अमीरल मोअमेनीन हज़रते अली इब्ने अबूतालिब अ 0 की तरफ रुजु किया गाया। आपने फ़रमाया कि वह लाश हज़रते हज़रते दानियाल की है जो बख़ते नस्र के ज़माने में थे। फिर आपने ह़ज़रते दानियाल की है जो बखते नस्र के ज़माने में थे। फिर आपने हज़रते दानियाल के हालात बयान किये और उमर को यह मशविरा दिया कि अबू मुसा को लिख दिया जाये कि वह इस मय्यत पर नमाज़ पढ कर ऐसी जगह दफन कर दे जहाँ अहले सूस की रसाई न हो। चुनान्चे अबू मूसा अशरी ने नहर के पानी को रोक कर उसके दरमियानी हिस्से में मय्यत को दफन करके नहर का पानी फिर बदस्तूर जारी कर दिया। इसी वजह से बाज़ मोहर्रेखीन ने लिखा है कि हज़रते दानियाल नहरे सूस में दफन है।

हज़रते अज़ीज़ अ 0

हज़रते अज़ीज़ अ 0 जनाबे हारुन की नस्ल से थे और अपने भाई उरज़ा के साथ जुड़वां पैदा हुए थे। आपके वालिद का नाम शरहिया था साहेबे रोज़तुस्तुस्सफा का कहना है कि आप अपने बचपन से जवानी के ज़माने तक बखते नस्र की कैद में रहे और जब रिहाई मिली तो अपने वतन तशरीफ ले गये।

कैद से छुटने के बाद आप दीन की तब्लीग़ में मसरुफ रहे। यहां तक की जब आपकी उम्र 50 बरस की हुई तो आपको एक सफर में जाने का इत्तेफाक हुआ। चुनान्चे आप गदहे पर सवार होकर रवाना हुए। रास्ते में एक ऐसी उजड़ी हुई बस्ती मिली जिसकी पुरी आबादी ताउन की बीमारी मे मुब्तेला होकर ख़त्म हो चुकी थी और लातादाद इन्सानी ढ़ाचे जां बजां बिखरे हुए पड़े थे। नीज़ इस सानेहे को इतनी मुद्दत गुज़र चुकी थी की उनके मकानों की छत और दीवारें मुनहदिम होकर खन्डरात में तबदील हो गयी। एक अरसए तवील गुज़र जाने के बाद यह देखकर आप पर हैरत व इत्तेजाब का एक आलम तारी हुआ और दिल पर एक ऐसा सदमा ग़ुज़रा कि आपके जिस्म से रुह परवाज़ कर गयी।

सौ बरस तक आप वहां मुर्दा पड़े रहे। आखिरकार मशीयते एज़दी ने आपको फिर ज़िन्दा किया और आपके साथ वह तमाम लोग भी ज़िन्दा हो गये। जो आपसे क़ब्ल मर चुके थे। अल्लामा मजलिसी का कहना है कि उनकी तादाद एक लाख थी। इस वाक्ये के बाद आप मजीद पचास साल तक ज़िन्दा रहे। आपका तज़केरा कुरआने मजीद में मौजूद है। यहूदी आपको ख़ुदा का बेटा कहते है।

हज़रते यूसुफ बिन मता अ 0

आप हज़रते मूसा की शरीयत के पाबन्द थे और बनी इस्राइल पर तबलीग़ के लिए मअमूर हुए थे यह वाकया बहुत मशहूर है कि आप एक मरतबा कशती पर सवार दरियाये दज़ला में महवे सफर थे कि अचानक वह कशती उलट गयी और दरिया में गिर गये गिरते ही आपको एक बहूत बड़ी मछली ने निगल लिया। तीन या सात रात या चालीस रोज़ तक आप उस मछली के पेट में मसरुफे इबादत रहे। यहां तक कि खुदा के हुक्म से उस मछली न आपको फिर उगल कर अपने शिकम से बाहर निकाला। इसी वजह से आपको जुननून और साहेबे हौत भी कहा जाता है। आपने 147 साल की उम्र में वफात पायी।

हज़रते ज़करिया अ 0

आप हज़रते सुलेमान की नस्ल में युहन्नाबिन ऊन के बेटे थे। आप की तारीखे विलादत के बारे में किलाबे खामोश है।

आप की ज़ौजा इमरान बिन मतान की बेटी और मरयम मादरे ईसा की हकीकी बड़ी बहन थी। लेकिन इनके नाम में इखतेलाफ है। बाज़ मोअर्रेखीन ने इसाअ बाज़ ने हनाना और बाज़ ने उम्मे कुल्सुम तहरीर किया है लेकिन मेरे नज़दीक आखिउज़जिक्र ज्यादा मुस्तनद है।

आप चुंकि हज़रते सुलेमान की नस्ल से थे इसलिए बैतुल मुकददस के मुन्तज़िम व मुतावल्ली भी थे। जब आपकी उम्र 98 साल की हो गयी और आप नेअमते औलाद से महरुम रहे। तो आपको यह तशवीश पैदा हुई कि मेरे बाद मेरा वारिस और खुदा के घर का मुतवल्ली कौन होगा। चुनान्चे आपने बारगाहे इलाही में दुआ की जो कुबूल हुई और खुदा वन्दे आलम ने आपको यहिया जैसा बेटा अता किया जिसका तज़केरा क़ुरआने मजीद में इन अलफ़ाज़ के साथ मौजूद है।

जब जनाबे ज़करिया ने अपने परवरदिगार को धीमी आवाज़ से पुकारा और अर्ज़ कि ऐ मेरे पालने वाले में तेरी बारगाह में दुआ करके आज तक महरुम नही रहा हुं बुढापे की वजह से मेरी हडडियां कमज़ोर हो चुकी है. और सर के बाल सफेद हो चुके है। अपने मरने के बाद मैं अपने वारिसों की तरफ से फिक्रमंद हुँ वह दीन को बरबाद न कर दे। मेरी बीवी बांझ है। बस तू अपनी कुदरते कामेला से एक ऐसा फइज़ब्त अता फरमा जो मेरी और याक़ूब की मीरास का वारिस हो।

खुदा ने फरमाया हम तुमको एक फरज़न्द की वेलदत की खुशखबरी देते है। इनको एक नेक और सालेह बेटा अता फरमाया जिसका नाम यहिया होगा। और हमनें इससे पहले किसी को सका हमनाम नही पैदा किया ज़करिया ने कहा परवरदिगार लड़का क्योकर होगा मेरी बीवी बांझ है और मै हद से ज़्यादा बूढ़ा हुँ। इरशाद हुआ ऐसा ही होगा यह बात मेरे लिए बहुत आसान है। हज़रते यहिया की विलादत से क़ब्ल आपने हज़रते मरयम मादरे ईसा को भी अपनी औलाद की तरहं पाला था। चुनान्चे जब वह सिने बुलूग़ तक पहूचीं तो मसलहते इलाही ने उनके बदन मे बगैर किसी मर्द का साया पड़े हज़रते ईसा का हमल कर दिया। जब वह वाज़ह हुआ तो जाहिलों ने आप (ज़करिया) पर मरयम से नाजायज़ तअल्लुकात का इल्ज़ाम आयद किया और आपको घेरकर आपको क़त्ल करना चाहा।

चुनान्चे आप इस खौफ से भागे इसी असना में एक दरखत बहुकमे खुदा दरमियान से शिगाफता हुआ और आप इसी मे दाखिल हुए तो वह फिर अपनी असली हालत में आ गया। क़ज़ाये कार कि आपके दामन का एक कोना बाहर ही निकला रह गया। जिसकी वजह से मुखालेफीन समझ गये कि आप इसी दरखत में पौशीदा है। ग़र्ज़ कि उन लोगो ने दरखत को मय आपके आरे से चीर दिया जिसके नतीजे मे आप शहीद हो गये। इस वक्त आपकी उम्र सौ साल की थी और हज़रते ईसा पैदा हो चुके थे।

हज़रते यहिया बिन ज़करिया अ 0

हज़रते यहिया अ 0 हज़रते ईसा इब्ने मरियम से छह माह कल्ब पैदा हुए चार साल की उम्र मे आपने तौरेत हिफ़ज़ की , दस साल की उम्र में तमाम अहकाम से वाक़िफ होकर मन्सबे नबूवत पर फ़ाएज़ हुए। और बनी इस्राइल के दरमियान बाक़ायदा तबलीग़ की तरफ मुतावज्जा हो गये।

ज़ोहद तक़वा और परहेज़गारी आपका तुर्ररए इमतेयाज़ था लेकिन इसके साथ खौफे खुदा भी आपके दिल मे इस क़द्र था कि तमाम उम्र आपको किसी ने हंसते नही देखा ख़ुश्क रोटी खाते टाट के कपड़े पहनते और तौरेत में जब आज़ाबे इलाही का तज़केरा पढते या अपने बाप ज़करिया की ज़बानी सुनते तो इस क़द्र रोते थे कि आपके रुखसारों का गोश्त गल गया था। और दांत नुमाया हो गये थे। हज़रते ज़करिया ने एक बार अपने वाज़ में जहन्नुम का तज़केरा किया तो रोते पीटते आप सहरा की तरफ निकल गये।

आपके वालदेन जब तलास में निकले तो तीन दिन के बाद सजदे की हालत में आपको बेहोश पाया आपने इस क़द्र गिरया किया कि उस जगह की मिट्टी आंसुओ से तर होकर कीचड़ हो गयी थी। चुनान्चे आपकी वालिदा ने जब आपके गर्द आलूदा चेहरे को साफ करना चाहा तो आपने यह समझा कि इज़राइल है। फरमाया कि बस इतना ठहर जा कि मैं अपने वालदैन से एक बार मिल लूँ मां ने कहा बेटा मैं तेरी मां हूँ। यह यह सुनकर आप ने आँखे खोली और सहरा की तरफ फिर भागने का क़स्द किया। मगर उन्की मां ने उन्हे मजबूर करके उनहे अपने घर ले आयी। इस वाक्ये से आपकी खुदा परस्ती रहम दिली पाकीज़गी और परहेज़गारी नुमाया है. जैसा कि परवरदिगारे आलम कूरआने मजीद में इरशाद फरमाता है। कि-

हमने इन्हे बचपने ही मे अपनी बारगाह से नबूअत , रहमदिली पाकीज़गी अता फरमायी और वह ख़ुद भी परहेज़गार और अपने वालदैन के हक़ में सआदत मंद थे। हमारी तरफ से इल पर बराबर सलाम है।

आपकी शहादत का वाकेया यह बयान किया जाता है कि आपके दौर मे हरदुस नामी एक इस्राइली बादशाह था।

जिसने अपने भाई क़ैसुस की खुबसुरत हसीन व जमील बेवा हैरदोआबा से अक़द कर लिया था। क़ैसुस से एक लड़की भी थी जो हरदुस की सगी भतीजी थी। चुनान्चे जब वह लड़की जवान हुई तो हरदूस ने उनकी मां की मरज़ी से इसे अपने तसर्रुफ में लेना चाहा तो लोगों ने कहा कि शरीयत के लिहाज़ से यह तुझ पर हराम है। इससे अक़द जायज़ नही है। मगर चुंकि इसकी तबीयत अपनी भतीजी की तरफ रुजू हो चुकी थी नीज़ इसकी मां ने भी कहा कि यह लड़की आपके नुत्फे से होती तो हराम करार पाती। लेकिन जब आपके नुत्फे से नही हैं तो फिर क्योकर हो सकती है। बेहतर यह है कि आप इस मसले को यहिया से मालूम करे। चुनान्चे उसने हज़रते यहिया को तलब किया और उससे दरियाफत किया कि मैं इस लड़की से शादी कर सकता हूँ या नहीं। आपने फरमाया कि शरीयत के तहत यह आप कर क़तई जायज़ नही है।

उस लडकी की मां ने भी अपने शौहर की इस शैतानी ख्वाहिश की हिमायत में हज़रते यहिया से भी खुब तकरार की यह लडकी जब बादशाह के नुत्फें से नही है तो फिर किस तरह इनके लिए हराम हो सकती है। हज़रते यहिया ने फरमाया कि हुक्मे खुदा यही है जो मै बयान कर रहा हूँ और इस अम्र मे मुदाखेलत का हक़ किसी को नही है।

हज़रते यहिया तो यह कह कर चले गये मगर बादशाह और उसकी बीवी को यह फैसला इन्तेहाई शाक़ गुज़रा। उसकी बीवी ने कहा कि जब भाई की बीवी के साथ अकद हो सकता है तो भाई की लडकी क्यो कर हराम हो सकती है।यह तो यहिया की सरासर ज़्यादती मालूम होती है। अगर यहिया की तरफ से आपको कुछ अन्देशा है तो उन्हे क़त्ल कराके अक़द कर सकते है।

बादशाह पर नफ़सानी ख्वाहिश की तकमील के लिए इस लड़की की तरफ से इश्क का भूत बूरी तरह सवार था। लिहाज़ा वह अपनी बीवी के इस जाहिलाना मशविरे पर तैयार हो गया और उसने यहिया के क़त्ल का फरमान जारी कर दिया और आखिरकार वह इबादत की हालत मे क़त्ल कर दिये गये। और इनका सर काट कर एक तश्त में रखकर बादशाह के सामने दरबार में पैश कर दिया गया। तारिखी शवाहिद से पता चलता है कि जिस वक्त हज़रते यहिया का सर उसके सामने रखा गया वह शराब पी रहा था और नशे की हालत मे था चुनान्चे उसने आपके सर के साथ जब तौहीन आमेज़ गैर शाइस्ता रवैया इख्तेयार किया तो सर से आवाज़ आयी कि ऐ बादशाह मेरे क़त्ल के बाद भी वह लड़की तुझ पर जायज़ नही हो सकती मगर उस बदबख्त पर इस आवाज़ का कोई असर न हुआ और वह दुसरे ही दिन अपनी सगी भतीजी पर मुतासर्रिफ हो गया।

हज़रते यहिया अ 0 के खूने नाहक का असर यह हुआ कि पत्थरों से खून जारी हुआ और चालीस दिन तक आफताब को गहन लगा रहा नीज़ परवरदिगार ने इस खून का बदला इस तरह लिया कि शाहे रुम तैतुस के ज़रिये हरदुस और इस कौम के 70 आदमियों को क़त्ल करा दिया।

इमामे हाकिम वग़ैरा ने इब्ने अब्बास से रवायत की है कि खुदा ने हज़रते रसूले खुदा से वही के ज़रिये फरमाया है कि मैनें यहिया बिन ज़करिया के खून के एवज़ 70 हज़ार आदमियो को क़त्ल कराया है और तुम्हारे फ़रज़न्द हुसैन के खून के एवज़ एक लाख चालीस हज़ार आदमियों को क़त्ल कराउँगा। तबरी का कहना है कि हज़रते यहिया के खून का क़ेसास परवरदिगार ने यूं लिया कि तैतुस क़ैसरे रुम ने मुल्क शाम पर चढायी की और बैतुलमुक़ददस को तबाह व बरबाद कर दिया। क़त्लेआम के नतीजे में बैशुमार लोग मारे गये।

वाकेयात में हमआंहगी और यकसानियत

हज़रते यहिया अ 0 और हज़रते इमामे हुसैन अ 0 के हालात और वाकेयात में मुन्दरजा जैल हमआंहगी और यकसानियत पायी जाती है।

1. हज़रते यहिया अ 0 और हज़रते इमाम हुसैन आ 0 दोनों ही छह माह की मुददत हमल मे मुतावल्लिद हुए।

2. हज़रते यहिया जिस तरह से दींन और शरीयत के मामले में क़त्ल किये गये उसी तरह हज़रते इमाम हुसैन अ 0 भी दीन व शरीयत के लिये शहीद हुए।

3. हज़रते यहिया अ 0 का सर जिस तरह तन से जुदा होने के बाद तश्त मे हरदूस के सामने पेश किया गया उसी तरह हज़रते इमामे हुसैन अ 0 का सर भी तन से जुदा करके तश्त मे यज़ीद मलउन के सामने दरबार में पैश किया गया।

4. हज़रते यहिया अ 0 का क़ातिल हरदूस शराबी और बदकार था उसी तरह यज़ीद भी शराबी और बदकार था।

5. हज़रते यहिया अ 0 के सर से जिस तरह हरदूस ने बेअदबी और गुस्ताखी की उसी तरह यज़ीद भी हज़रते इमाम हुसैन अ 0 के सरे अक़दस से बेअदबी और गुस्ताखी का मुरतकिब हुआ।

6. हज़रते यहिया अ 0 के सर ने जिस तरह तन से जुदा होने के बाद भी कलाम किया इसी तरह हज़रते इमाम हुसेन अ 0 के सरे अक़दस ने कलामें पाक की तलावत की।

7. हज़रते यहिया अ 0 की शहादत के बाद जिस तरह पत्थरों से खुन जारी हुआ इसी तरह मज़लूमें करबता की शहादत के बाद पत्थरों से खुन जारी हुआ और आसमान व ज़मीन ने गिरया किया।

8. हज़रते यहिया अ 0 की शहादत के बाद जिस तरह गहन आपताब को लगा उसी तरह हज़रते इमामें हुसैन अ 0 की शहादत के बाद आफताब व महताब को गहन लगा और सारी दुनिया अंधेरे में डूब गयी।

ग़ालेबन यही वजह थी कि हज़रते इमामें हुसैंन अ 0 अपने सफर करबला के दौरान हज़रते यहिया को बार बार याद करते थे।

हज़रते ईसा इब्ने मरियम

हज़रते मरियम खुदा की कुदरते कामेला से शौहर के बगैर जिस वक्त हामेला हुई इस बक्त आप की उम्र 11या 13 या 15 और 20 साल की बतायी जाती हैं.। इस तरह हमल की मुददत में भी इख्तेलाफ है। मोहक़्क़ेक़ीन व मुफ़स्सेरीन में से किसी ने 6 माह किसी ने 8 माह और किसी ने 9 माह और किसी ने सिर्फ 9 घण्टेँ तहरीर किये है।

बत्ने मरियम में स तकरारे हमल और विलादते ईसा के बारे में खुदा की तरफ से जो रुदाद कुरआने मजीद में मज़कूर हुई है उसका खुलासा यह है कि हज़रते मरियम एक दिन अपने हुजरे ए इबादत से निकल कर मकान के मशरिकी हिस्से मे तशरीफ ले गयी और वहां उन्होने खलवत इख्तेयार की तो परवरदिगार ने जिबरईल को इन्सानी शक्ल में उनके पास भेजा जब वह वारिद हुए जनाबे मरियम उन्हे देखकर घबरायीं और कहने लगीं कि अगर तू परवरदिगार है तो मैं तुझसे ख़ुदा की पनाह मांगती हुँ। जिबरईल ने कहा घबराओ नहीं में तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से भेजा हुआ एक फरिशता हुँ और तुम्हारे बत्न से एक पाको पाकीज़ा लड़के की विलादत की बशारत देने आया हूँ। यह सुनकर जनाबे मरियम ने फरमाया न मै बदकार हूं और न ही किसी मर्द का साया मुझ पर पड़ा है तो मेरे बत्न से लड़का पैदा होने का क्या सवाल है। जिबरईल ने कहा तुम ठीक कहती हो लेकिन तुम्हारा परवरदिगार कहता है कि बिन बाप के लड़का पैदा करना मेरे लिए बहूत आसान है। मै चाहता हूँ कि इसे अपने कूदरत की निशानी करार दूं और अपनी रहमते खास का ज़रिया बनाऊं और यह अम्र यक़ीनी और तय शुदा है।

इसके बाद हज़रते मरियम मशीयत के इशारे से खुद ब खुद हामेला हो गयीं मगर हमल उस वक्त जाहिर न हुआ जब तक कि हज़रते ईसा की विलायत का वक्त बिलकुल क़रीब नही आया।

चुनान्चे जब आपको तकलीफ महसुंस हुई और दर्दे ज़ेह मे मुबतेला हुई तो घर से निकल कर बैतुलमुकददस में तशरीफ लायीं। मगर वहां एक गैबी आवाज़ ने आपको मुतानब्बे किया कि ऐ मरियम यह विलादत की जगह नही है। बल्कि इबादत का मुक़ाम है लिहाज़ा आप फौरन इसके हुदूस से निकल जाइये। यह बात सुनकर आप पर खौफ़ तारी हुआ और मायूसी की हालत में आप वहां से निकलकर उलटे पाँव वापस आयीं। इसके बाद दर्द की शिद्त ने आप को दुसरा ठिकाना ढूंढने पर मजबूर किया। तो आप किसी महफूज़ जगह की तलाश में एक ना माकूल मुक़ाम की तरफ रवाना हुई रास्ते में कुछ लोगों से मुलाक़ात हुई जो क़ौम के जुलाहे थे। उन लोगों ने आपका मज़ाक उड़ाया आपने उन्हें बद्दुआ दी और आगे बढी तो फिर कुछ ताजिरों से मुलाक़ात हुई तो उन्होंने एक खजूर के दरख्त का पत्ता बताया आप इन्हें दुआऐं देती हुई जब इस दरख़त के क़रीब पहुंची तो वह बिलकुल खुश्क था। जैसे ही आप इसकी जड़ से लग कर बैठी वह हरा भरा हो गया। इसकी शाखें फ़ूटी और आप को चारों तरफ से घेर कर परदें में ले लिया फिर ख़ोशे निकले और फल तैयार हुए। जो आपकी ग़िज़ा क़रार पायी। खुदा ने आबे शीरीं का एक चश्मा जारी कर दिया जो पिने के काम आया ग़र्ज़ कि हूरों की मदद से हज़रते ईसा इसी मुक़ाम पर पैदा हुए। बाज़ मुफ़स्सेरीन ने तहरीर किया है कि इस मुक़ाम का नाम नासेरा था। इसी वजह से वहां के लोगों ने खुद को अन्सार उल्लाह कहा जो बाद में नसारा हुआ।

विलादत के बाद हज़रते मरियम की नज़र जब अपने फ़रज़न्द पर पड़ी तो उनके दिल में यह ख़याल पैदा हुआ कि ख़ुदा ने इस बच्चे को बग़ैर बाप के पैद तो कर दिया है मगर जब मेरी क़ौम इसे देखेगी तो मेरे बारे में क्या सोंचेगी। काश मैं पहले ही मर गयी होती यह दिन देखना मुझे नसीब न होता। नागहा एक आवाज़ आयी ऐ मरियम तुम फ़िक्र मंद क्यों हो खुदा तुम्हारी इज़्ज़तो अज़मत का निगेहबान व मुहाफिज़ है। तुम इस नेअमत के एवज़ तशक्कुर का रोज़ा रखो। और अगर तुमसे कोई कुछ पुछे तो क़तई जवाब न दो।

तीसरे दिन मरियम अपने फ़रज़न्द ईस को गले से लगाये हुए जब अपने घर में दाखिल हुए तो बनी इस्राईल के मर्दो और औरतों ने इन्हे चारो तरफ से घेर लिया लानतो मलामत करने लगे और कहने लगे कि ऐ मरियम तूने बहूत ही बुरा का किया है। ऐ हारुन की बहन न तो तेरी मां बदकार थी न तेरा बाप ही बुरा आदमी था। मगर तुने बनी इस्राइल की नाक कटवा दी। आखिर तुने यह क्या किया।

चुंकि उस वक़्त आप रोज़े की हालत में थी इसलिए कोई जवाब देने के बजाये आपने बच्चे की तरफ इशारा किया जिसका मक़सद यह था कि जो तुम्हें पूछना है इस बच्चे से पूछ लो। इस पर लोगों ने कहा कि यह नौज़ाएदा और शीर ख्वार बच्चा क्योंकर बात कर सकता है। मालूम नही मरियम को क्या हो गया है।

बस यह वह मौक़ा था कि जब हुक्में इलाही से हज़रते ईसा अ 0 ने ज़बान खोली और बोल उठे ऐ बनी इस्राइल के सरकश लोग होश में आओं मैं ख़ुदा का बन्दा हुँ उसने मुझे बा बरकत क़रार दिया है। नबी बनाया है और किताब अता की है। उसने मुझे हुक्म दिया है कि मैं ता ज़िन्दगी नमाज़ व ज़िक़ात अदा करुँ और अपनी मां के साथ नेकियों का बरताव करुँ। मुझे मेरे खुदा ने बद बख्त ज़ालिम और जाबिर नही बनाया है। मुझ पर सलामती है कि जब मै पैदा हुआ जिस दिन मरुंगा और जिस दिन फिर ज़िन्दा किया जाऊंगा। लोगों ने जब ईसा अ 0 की गुफ्तगू सुनी तो कहने लगे कि मरियम बेगुनाह है। और यह सब खुदा का मौजज़ा है।

बतने मरयम में हज़रते ईसा अ 0 का हमल बरोज़े चुमा मुस्तक़िर हुआ और पच्चीस ज़ीक़ाद बरोज़े मंगल आप की विलादत अमल में आयी। आप बनी इस्राइल के आख़री उलुल अज़म पैग़म्बर थे। आपके और हज़रत मूसा अ 0 के दरमियान खुदा की तरफ से छह सौ पैग़म्बर और भी तशरीफ लाये जिन्की तादाद का तज़केरा तो मिलता है लेकिन चन्द के आलावा बाक़ी पैग़म्बरों के नाम और हालात की सराहत किताबों में नही है।

हज़रते मरियम की हिजरत

हज़रते ईसा की विलादत और उनके ज़ैल में रुनुमा होने बले वाकेयात की खबरें जब वहा के बादशाह बहरुस की कानों तक पहुंची तो उसने इरादा किया कि इन्हे क़त्ल कर दे। खुदा ने बीबी मरियम को हुक्म दिया कि वह ईसा अ 0 को लेकर शाम से मिस्र की तरफ हिज़रत कर जायें चुनान्चे वह अपने रिश्ते के एक भाई यूसुफ निजार के महराह मिस्र की तरफ चली गयी। और वहां बारह साल तक रही। यहां तक की जब बहरुस मर गया तो अपने वतन वापस आयीं एक शरीफ इन्सान ने अपने मकान में आपको ठहरने की जगह दे दी थी। क़सबे माश के लिए आपने सम्भल की फराहमी और कपड़े की बिनाई का काम शुरु कर दिया था। जिससे गुज़र बसर होती थी।

हज़रते ईसा और इब्तेदाई तालीम

मिस्र में आपने क़याम के दौरान बीबी मरियम ने हुसूले तालीम के लिए हज़रते ईसा को एक बाईमाल मोअल्लिम के सिपुर्द कर दिया था। चुनान्चे पहले दिन जब उस मोअल्लिम ने हज़रते ईसा को पढ़ाना शुरू किया तो उसने कहा कि कहो बिस्मिल्ला हिर रहमानिर रहीम आपने कहा बिस्मिल्ला हिर रहमानिर रहीम फिर उसने कहा कहो अब जद आपने फ़रमाया अब जद और इसके साथ ही यह सवाल कर बैठे कि अब जद में जो अलाहदा अलाहदा हुरूफ है इनके माइने क्या है। यह सुनकर मोअल्लिम ने कहा मैं जो पढ़ा रहा हुँ वो पढ़ो। बिला वजह कठ हुज्जती मत करो। आप ने फरमाया अच्छा तो फिर यह बताइये कि बिस्मिल्लाह हिर रहमानिर रहीम में ब सीन और मीम के क्या मानी है। आप की यह बातें सुनकर मोअल्लिम को सख्त गुस्सा आया उसने कहा तुम पढ़ने आये हो या मेरा इम्तेहान लेने। आपने फरमाया कि अगर आप को नहीं पता तो मैं बताऊँ। वह और बरहम हुआ और हज़रते ईसा को लेये हुए बीबी मरियम के पास आया और कहने लगा तुम्हारा फ़रज़न्द वह जानता है जो तुम्हें नहीं मालूम लेहाज़ा मैं इसे नही पढ़ा सकता

हज़रते ईसा के मोअज़िज़े

हज़रते ईसा को जो मोअज़िजे खुदा की तरफ से अता हुए थे। इनमें से मुर्दो को ज़िन्दा करना और बीमारों को शिफा देना और पत्थरों को जवाहेरात में तबदील करना , पानी पर चलना , ग़ैब का हाल बताना , मिट्टी के परिन्दे बना कर इन्में जान पैदा करना वग़ैरह शामिल है इन मोअजिज़ात के अलावा भी हस्बे ज़रुरत मामूली मामूली आपके मोअजिज़े आप की ज़ात से ज़हुर पज़ीर हुआ करते थे। मसलन यह वाक़या बहूत मशहूर है कि जब आप कमसिन थे उस वक़त आप की मादरे गिरामी ने आपको कपड़ा रंगने वाले एक शख्स के यहा मज़दूरी पर रख दिया था। एक दिन इस रंग रैज़ ने आपको कुछ कपड़े दिये और कहा कि हर कपड़े के साथ एक रंगीन धागा बन्धा हुआ है। इसी धागे के मुताबीक़ इन कपड़ो पर रंग चढ़ाओ। यह कह कर वह कहीं चला गया आपने सारे कपड़े उठाये और एक ही रंग के मठके में इन्हे ड़ाल दिया और जब वह वापस आया तो उसने पुछा कि क्या कपडे रंग गये तो आपने फरमाया कि हां रंग गये। उसने पुछा कि कहा हैं आपने मठके कि तरफ इशारा कर के बताया कि उस मठके में पड़े है। यह सुनकर उसने मुंह पीट लिया और कहने लगा तुम्ने तो सब चौपट कर दिया। मैने अलग अलग रंगो मैं रंगने को कहा था और तुम्ने एक ही रंग के मटके में झोक दिया अब में ग्राहकों को क्या जवाब दुंगा आप ने मुस्कुराते हुए फरमाया कि ए भाई इस कद्र ख़फ़ा क्यो होते हो इन्हे मटके से बाहर निकाल कर तो देखो ग़र्ज़ कि जब उसने यह कपड़े मटके से निकाले तो हैरत अंगैज़ माजरे को देख कर शशदर रह गया। सब का रंग अलग अलग और इनमें बन्धे धागों के मुताबिक थे। चुनान्चे वे उसी वक़्त हज़रते ईसा पर ईमान ले आया।

सदक़े की अहमियत

एक शादी के मौक़े पर हज़रते ईसा ने फरमाया कि ये दुल्हा कल मर जाएगा। आप की इस बात से तमाम अफराद के दरमियान रंज व ग़म की एक लहर दौड़ गयी। दुसरे दिन जब वे ज़िन्दा सलामत व बखैरियत रहा तो लोगों ने आप को बुरा भला कहना शुरू किया यह सुनकर आप ने इस तकज़ीब करने वालो को अपने हमराह लिया और इस दुल्हे के घर तशरीफ ले गये। दुल्हन को बुलाया और उससे फरमाया कि रात में जो कुछ तुमने कारे खैर अंजाम दिया हो उसे बयान करो। उसने कहा कि मैनें खुदा के नाम पर एक फक़ीर को खाना खिलाया था। इसके अलावा कुछ नही हुआ। फिर आपने बढ़कर उस दूल्हा का बिस्तर हटाया तो लोगो ने देखा कि उसके पास एक खतरनाक किस्म का साँप मौजूद है। आप ने फरमाय कि इसी साँप के ज़रियें दुल्हा की मौत थी मगर इसकी बीबी के सदक़े में इसकी जान बच गयी। चुँकि खिदा की राह में दिया हुआ सदक़ा तमाम बलाओं को दुर करता है।

नुज़ूले माएदा

हज़रते ईसा की दुआओं के बदौलत उसकी उम्मत पर नुज़ूले माएदा का ज़िक्र कुरआने मज़ीद में इजमालन मौजुद है। जिसकी तफ़सील में मुफ़स्सेरीन का कहना है कि एक दिन हज़रते ईसा ने अपने कुछ हवारीन की ख्वाहिश पर खुदा की बारगाह में नुजूले माएदा की इसते दुआ की चुनान्चे एक ख्वान आसमान से उतरा जिसमें एक भुनी हुई मछली , कुछ मुख्तलीफ किस्म की सब्ज़िया , पांच अदद रौंगनी रोटियां , नमक ,लहसुन और सिरका रखा हुआ था। चुनान्चे जब खाने का वक्त आया तो आपके हवारीन ने कहा कि ऐ खुदा के रसूल हमारी ख्वाहिश है कि हम इस ख्वान की मछली को ज़िन्दा देखे। यह सुनकर आपने बिस्मिल्लाह कह कर इस पर अपना हाथ फैरा और बा हूक्में खुदा का वह ख्वान पर चलने फिरने लगी। दुबारा फिर अपने हाथ फेरा तो वह जैसी थी वह वसी ही हो गयी। आपके इस मोजिज़े को देख कर सब के सब हैरत ज़दा रह गये।

इसके बाद जिसने यह खाना खाया फ़ायदे में रहा इसमें अगर कोई बीमार था तो इसे शिफा मिल गयी परेशान हाल था तो ख़ुश हाल हो गया , नादार थआ तो मालदार हो गया। और बावजूद कि कसीर तादाद ने इस खाने को खाया और शिकम सेर हुए। मगर इसमें कोई कमीं वाके न हुई .। रवायतों से पता चलता है कि इस मायदे का नुज़ूल बराबर 40 दिन तक होता रहा। और तमाम शहर के लोग इससे शिकम सेर हुए। मुस्तफीज़ होने वालों में चुंकी दौलत मंद तब्का भी शामिल होने लगा इस लिए ईसा ने खुदा की हूकमत से इसे सिर्फ ग़ुरबा व मसाकिन के लिए मखसूस कर दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि लोग नारारज़ हो कर दीन से फिर गये और बग़ावत कर आमादा हो कर हज़रते ईसा की तकज़ीब करने लगे। और यहूदियों की तरह साहिर व जादूगर कहने लगे। नीज़ इस ख्वाने नेअमत का मज़ाक उड़ाने लगे। इस्राइलियों की यह बात खुदा वन्दे आलम को इस कद्र नाग़वार ग़ुज़री की उसने यह सिलसिला बन्द कर दिया और बग़ावत और सरकशीरी करने वालों को इस अज़ाब में मुब्तेला कर दिया कि वह रात में अच्छें भले इन्सान की तरह सोये लेकिन जब सुबह उठे तो लोग बन्दर ,सुअर ,रीछ और ना जाने क्या क्या बन चुके थे.।

तफसीर हज़रते इमामे अस्करी अ 0 हज़रते रसूले खुदा ने मन्कूल है कि नुजूले माएदा की नाकदरी और हज़रते ईसा को बूरा भला कहने की वज़ह से खुदा ने इन्हे चार सौ किस्म के हैवानों की सुरत में मस्ख कर दिया था। और वह लोग तीन दिन तक इसी हालात में रहने के बाद हलाक़ हो गये।

तब्लीग़ी सरगरमियां

हज़रते ईसा यूं तो बचपन चही चसे कारे तब्लाग़ की अन्जाम दे ही में मसरुफ रहे लेकिन जब आप की उम्र तीस साल की हुई तो आपने एतेराफ और जवानिब में अपने नायेबीन भेजने शुरू किये और ब हुक्में खुदा इन्हे अपने मोअज़िज़ात के इस्तेअमाल की इजाज़त भी दे दी ताकि तब्लीगी उमूर में इन्हें कोई दुशवारी न हो।

आपने दीगर शहरों के साथ शहरे अन्ताकिया में भी सादिक और सिददीक़ नामी अपने दो नाएबीन भेजे जहां का फरमान रवां ख़ुदा भी बुत परस्त था और अपनी रियाया को भी बुतपरस्ती के लिए मजबूर करता था। जब यह दोनें अन्ताकिया शहर के नज़दीक पहुंचे तो उनकी मुलाकात सबसे पहले एक बूढ़े शख्त से हुई जो अपनी बकरियां चरा रहा था। इन लोगों ने इसे सलाम किया इसने जवाबे समाल दिया। और पुछा कि तुम कौन हो और कहां से आ रहे हो। इन लोगों ने कहा कि हम हज़रते ईसा के नायब हैं और तब्लग़ी की ग़रज़ से यहां आये है। इसने कहा कि तुम्हारे पास क्या इसका क्या सबूत है.। तो उन्होने कहा कि इब्ने मरियम ने हमें मोअज़िज़े देकर भेजा है। हम बीमारों को शिफा और अंधो को आंखे दे सकते है। बूढ़े शख्स ने कहां कि मेरा बेटा मुददत से बीमार है। क्या तुम लोग इसे शिफा दे सकते हो ? इन लोगों ने कहा हमें अपने घर ले चलो।

चुन्नाचे वह इन्हे अपने घर ले आया सादिक और सिददीक़ ने खुदा की बारगाह में दुआ कि और लडके के सर पर हाथ फेरा कूदरते इलाही से उसी वक्त अच्छा भला हो गया और उसकी सारी बीमारी दूर हो गयी। यह देख कर पूरे घर ने इस दिन से मसीही दिन इख्तेयार कर लिया। इस बूढ़े शख्स का नाम हबीब निज़ार था.। जिन्हे मोमिने आले यासीन के नाम से दुनिया याद करती है। लड़के का शिफा याब होना था कि उसकी शोहरत तमाम शहर में हुई लोग सादिक़ और सिददीकी के गिर्दे जमा होने लगे और बीमारों को शिफा और अन्धों को आँखे मिलने लगी। यहां तक की हज़ारों लोगों ने हज़रते ईसा का दीन इख्तेयार कर लिया और बुत परस्ती से मुन्हरिफ हो गये। रफ्ता रफ्ता यह खबर वहा के बादशाह जिसका नाम शलाखिन था को मालूम हुई तो इन दोनो मुबल्लेग़ीन को गिरफ्तार करा करा कर शाही बुत खाने में क़ैद कर दिया। हज़रते ईसा को जब यह इत्तेला फ़राहम हूई कि सादिक़ और सिददकी को अन्ताकिया के बादशाह ने क़ैद कर लिया है तो आपने सुलूम नामी एक तीसरे शख्स को अपना नायब बना कर वहां रवाना किया। और यह हिदायत कर दी कि वह अपना दीन न ज़ाहिर करे बल्कि तक़य्ये की हालत में रह कर ख़ुफिया तौर पर कारे तब्लीग़ अन्जाम दे और उन दोनों नायबीन को बादशाह की क़ैद से छुड़ाने की कोशिश भी करे।

सलूम जब अन्ताकिया पहुंचे तो उन्होने भी मरीज़ो को शिफ़ा देने और अंधों को अच्छा करने का काम शुरू कर दिया। जिन्की वजह से इन्की बहूत जल्द शौहरत हो गयी मगर उन्हे अपने मसीही मस्लक़ का इज़हार नही किया बल्कि ज़ाहिर यही किया कि हमारा मज़हब वही है। जो यहां के बादशाह का।

जब बादशाह से लोगो ने बताया कि एक नया शख्स शहर में दाखिल हुआ है। और वह भी मरिज़ो को शिफ़ा और अंधों को आँखे देता है। लेकिन वह ईसाई नही है। बल्कि उसका भी मज़हब वही है। जो हमारा है। तो वह बहुत खुश हुआ। और सलूम को अपने पास तलब कर के उसने बचशम खुद बीमारो को अच्छा करते हुए देखा तो अपना मुकरिबे खास बना लिया।

सुलूम ने वहां रहकर जब खुफिया तरीके से पता लगाया कि सादिक व सिद्दीक शाही बुतखाने में कैद हैं तो एक दिन उन्होने बादशाह से कहा कि मैं शाही बूतखाने में इबादत करना चाहता हूँ। बादशाह की तरफ से इजाज़त मिल गयी। इसलिए वह वहां आने जाने लगे। चुनान्चे मौका पाकर उन्होनें इन दोनों मुबल्लेगीन से गुफतुगू की इनके हालात मालूम किये और उनके साथ ही यह ताकीद भी कर दी कि कभी यह ज़ाहिर न होने पाये कि हम एक दूसरे को जानते हैं। या एक ही मज़हब से हमारा तअल्लुक है।

मुख़तसर यह कि सुलूम ने वहां रहकर बादशाह पर जब अपना काफी असर जमा लिया तो मौका महल देखकर एक दिन उसने उससे दरियाफ़त किया कि वह दो आदमी कौन है ज़ो बुतखाने में कैद हैं। बादशाह ने कहा कि वह लोग भी आपकी तरह मरीजों और अंधो को अच्छा करते हैं। लेकिन वह हमारे खुदाओं को बुरा भला कहते हैं। और अपने खुदा की परस्तिश कराना चाहते हैं। यहां के लोगों ने उनकी करामात देख देख कर हमारे खुदाओं को छोड़ कर उनका मज़हब कुबूल करना शुरू कर दिया। तो हमने इन्हें कैद कर लिया ताकि यहां के आवाम से इनका कोई राबेता न रह जाये। यह सुनकर सुलूब ने कहा अगर आप मुनासिब समझें तो इन्हें किसी दिन अपने दरबार में बुलायें और हम मुबाहेसा करें ताकि हक़ और बातिल का पता चले। नीज़ उनकी अच्छाईयों और बुराईयों के बारे में कोई नज़रिया कायम हो सके।

बादशाह ने सुलूक की तजवीज़ मान ली और दूसरे ही दिन सादिक और सिद्दीक दरबार में तलब किये गये। बादशाह और दरबारियों की मौजूदगी में सुलूम ने इनसे पूछा कि तुम लोग कौन हो और यहां तुम्हारे आने का मकसद़ क्या हैं। उन्होनें कहा कि हम लोग खुदा के रसूल हज़रते ईसा अ 0 के फ़रिस्तादा हैं और यहां तब्लीग की रहे हो। उहोंने कहा कि हम लोग बुतपरस्तों को ख़ुदा परस्ती की दावत देते हैं। और इसकी दलील में मोजिजे़ से काम लेते हैं।

सुलूम ने कहा कि तुम लोग किस किस्म के मोज़िज़े ज़ाहिर करते हो। उन्होने कहा हम बीमारो को अच्छा करते हैं और अंधों को आंखें देते हैं और अपाहिजों और कोढ़ियों को शिफा अता करते हैं सुलूम ने कहा यह सब कुछ तो हमें भी आता है कोई नई बात बताओ जो इन्सान से मुमकिन न हो। उन लोगों ने कहा हमारे बादशाह का एक बेटा मर चुका है। और वह फुलां मुकाम पर दफन है अगर तुम उसे जिन्दा कर दो तो हम वादा करते हैं कि हम लोग भी तुम्हारा दीन क़ुबूल कर लेंगे वरना तुम्हारी गर्दनें उड़ा दी जायेंगी।

ग़र्ज़ कि बहामी मुहायदा और कौलो इक़रार के बाद सादिक़ और सिद्दीक़ ने दो रकत नामज अदा की और सजदे में बादशाह के उस लड़के के ज़िन्दा किये जाने की दूआ की जिसे मरे हुऐ काफी अरसा हो चुका था.। इसके बाद उन्होने कहा कि बादशाह का लड़का ज़िन्दा होकर कब्र से बाहर आ चुका है। कुछ लोगों को वहां भेजिये कि वह उसे यहां ले आयें। सुनकर बादशाह ख़ुद अपने लड़के कि कब्र की तरफ भागा उसके पीछे और लोग दौड़े वहां पहुंच कर उन लोगो ने देखा कि वह लड़का अपनी कब्र के पास खड़ा हुआ अपने चेहरे और सर से गर्दों गुबार झाड़ रहा है। बादशाह ने दौड़ कर इसे गले से लगा लिया और पूछा कि बेटा तुम क्योंकर ज़िन्दा हुए उसने कहा कि मैंने मुर्दा हालत में यह देखा कि दो आदमी सजदे में मेरे ज़िन्दा किये जाने की दुआ मांग रहे है।

बस उनकी दुआ कुबूल हुई और हमें ज़िन्दा कर दिया गया। फिर दो आदमियों ने हमारी कब्र खोद कर हमें बाहर निकाल कर खड़ा कर दिया। और ग़ायब हो गये। यह वाक़या सुनकर बादशाह के रोंगटे खड़े हो गये। उसने पूछा कि क्या तुम उनहे पहचानते हो। लडके ने कहा हां यक़ीनन मैं उन्हे पहचान लूंगा। दुसरे दिन बादशाह ने दोनो मुबल्लेग़ीन क़ैदियों सादिक़ और सिददक़ के हमराह अपने रियाया को भी एक बड़े मैदान में जमा किया और अपने लड़के को ले कर एक मक़ाम पर खड़ा हो गया। एक शख्स जब उस लड़के के सामने से गुज़रता रहा। वह कहता रहा कि यह नही है और जब वह दोनों कैदी सादिक़ और सिददीक़ इसके सामने से गुज़रने लगे तो उसने कहा कि यह यही है।

बादशाह ने उनके साथ जो नारवा सुलूक किये थे उन पर वह नादिम हुआ और उसी वक्त उस ने मसीही दीन इख्तेयार करने का एलान कर दिया। इसके साथ उसकी रियाया में भी हज़ारो लोग ईमान ले आये। लेकिन यहूदियों ने ईसा की तक़जीब की जिस पर हबीबे नज्जार बिगड़ गये और उन्होने कहा कि ऐ यहूदियों इन पैग़म्बरो का इत्तेबा करो। क्योकि यह हिदायत याफ़ता है और तुमसे कोई अज्र नही मांगते। यह सुनकर एक यहूदी आगे बढ़ा और इसने हबीब को वहीं क़त्ल कर दिया। इस ख़ुन के बदले में खुदा ने इन पर अज़ाब नाज़िल किया और वह सब के सब हलाक हो गये। इसके बाद तीनो मुबल्लेग़ीन सुलूम , सादिक़ और सिददीक़ अन्ताकिया से वापस आये और हज़रते ईसा से सारे वाक़ेयात बयान किये।

हज़रते ईसा के हव्वारीन

इस अम्र मे कोई इख्तेलाफ नही है कि आपके खुसूसी हवारीन की तादाद बारह ती अलबत्ता इनके नामों में मोअर्रेखीन ने इख्तेलाफ किया है बहर हाल जिन नामों पर मोअर्रेखीन की अकसरियत मुत्तफिक़ है वह दर्ज ज़ैल है।

1 याकूब ज़बदी

2 शमउन क़ेनाली

3 अनोराउस

4 शमुन बिन हमून

5 याक़ूब बिन हलफी

6 पुलूस

7 हरतोलूमाउस

8 युहन्ना

9 यहूदा

10 मता

11 मारकूस

12 लुक़ा

सालबी का कहना है कि यह ऐसे असहाब थे जिन पर हज़रते ईसा को बड़ा ऐतमादो भरोसा था। और यहीं बारह आदमी आप पर सबसे पहले ईमान लाये। मौलाना फरमान अली साहब कुरआने मजीद में सुरह आले इमरान के हाशिये पर एक जगह रक़म तराज़ है कि वह बारह आदमी जो सबसे पहले आप पर ईमान लाये हवारी कहलायेय़। इब्रानी ज़बान में हूर के माने खालिस सफेदी के है। पस इन्हे हवारी इन्हे इस वजह से कहते है कि पहले यह लोग धोबी का पेशा करते थे। औप कपड़ो को निखार कर सफ़ेद करने की वजह से यह नाम हुआ हो।

इस वजह से कि हज़रते ईसा ने इऩ्हे ग़ुस्ले इस्तेबाग़ दिया था। जो अब तक नस्रानियों में जारी है। यह इस वजह से कि हज़रते मरियम ने हज़रते ईसा को काम सिखाने की ग़रज़ से एक रंग रेज़ के पास रख दिया था। या फिर इस लिए कि वह नुफूस को गुनाहों की आमोजिश से पाक व साफ रखते थे और दुसरों को भी पाक करते रहते थे। इस वजह से इन्हे हवारी कहते है। यह लोग ज़बर्दस्त वायज़ थे खुसुसन लूका। जिनकी तरफ इन्जील का एक हिस्सा मन्सुब है। यह भी याद रखने की बात है। कि जिस तरह बनी इस्राइल के बारह नक़ीब थे। हज़रते ईस के बारह हवारी थे। इसी तरह उम्मते मुस्लेमा के भी बारह आईम्मा है। मौलाना ने हवारीन के बारे में जों मुख्तलिफ बयानात बयान फरमाये है। इससे पता चलता है कि मुअर्रेखीन इस अम्र में सही नतीजा नही अक़ज़ कर सके है कि हवारीन कहलाने का असल सबब क्या है। और शायद यह वजह है कि गलत फहमी के बिना पर हज़रते ईसा के हवारीन को किसी ने धोबी और किसी ने अंग्रेज़ तसव्वर किया है। मेरी तहक़ीक के मुताबिक़ हवारीन के लुग़वी मानी मददगार के है।

लिहाज़ा ज्यादा करीने क़यास बात यही है कि हज़रते ईसा के जो सच्चे मोईन व मदद गार थे वही हवारीन कहलाये। जैसा कि इमामे रज़ा अ 0 के इस क़ौल से साबित है कि हज़रते ईसा को अस्हाबे खास को हवारीन इस लिए कहा जाता है। कि वह मवाएज़ और नसीहतों के ज़रीये गुनाहो से दुर रखते और हज़रते ईसा के मोईन व मदद गार थे। हवारीन के माने चुँकि साफ करने वाले के भी है। इसलिए लोगों ने धोखा खाया। इसलिए किसी ने धोबी किसी ने रंगरेज़ लिख दिया।

हज़रते ईसा अ 0 का आसमान पर उठाया जाना

हज़रते ईसा जब शामून बिन हामुन को अपना खलीफा और जानशीन मुकर्रर कर चुके तो आप ने हवारीन को हुक्म दिया कि तुम लोग अतराफे आलम में तब्लीग़ व हिदायत के लिए फैल जाओ चुनान्चे जब वह लोग ग़ैर मुल्को में चले गये तो आपको तनहा देखकर इस्राइली यहूदी ने जिनकी फ़ितरत और सरिश्त में शरारत और शैतनत भरी हुई थी। एक मन्सूबा तैयार किया कि किसी तरह क़त्ल कर दिया जाये। चुनान्चे मुखतलिफ़ हीलों बहानों से एक शब इन लोगों ने आपकों गिरफ्तार करके एक घर में मुकय्यद कर दिया। खुदा का करिश्मा देखिये कि जिब्रील आये और एक रौशन दान से निकल कर आपको आसमान पर ले गये।

जब सुबह तड़के यहूदी हज़रते ईसा को फांसी देने के इरादे से वहां पहुंचे तो उनका एक सरदार जिसका नाम यहूदा था आपको बाहर लाने के लिए घर के अन्दर दाखिल हुआ। खुदा ने अपनी कुदरत से यहूदा को हज़रते ईसा की शक्ल में तब्दील कर दिया। हज़रते ईसा को न पाकर जब वह अपने साथियों से माजरा बयान करने बाहर निकला तो इसे देखते ही ईसा समझ कर इसके उपर टूट पड़े दबोच लिया और वह लाख चीख़ता चिल्लाता रहा कि मैं ईसा नहीं हुं बल्कि तुम्हारा साथी यहूदा हूँ।

आखिर इसे सुली पर चढ़ा ही दिया जब उसका काम तमाम हो गया तो इऩ बदबख़तों ने इसकी लाश पर तबर भी बरसाये। जब यह सब कुछ हो चुका तो खुदा ने फिर यहूदा को उसकी अपनी असली शक्लों सूरत में कर दिया। यह देख कर उन लोगों ने अपना मुंह पीट लिया और हाथ मल कर रह गये। यह वाक्या 21 रमज़ानुल मुबारक का बताया जाता है।

हज़रते ईसा के बारे में यहूद नसरा दोनों ही शुबहे में पड़े हुए थे। यहूदी आपके बारे में बेहूदा ख्यालात रखते थे जबकि नसारा आपको खुदा का बेटा कहते थे। परवर दिगार ने ह़रते आदम की मिसाल देकर दोनों की तशफफी कर दी यहूदियों को यह करहर मुतमइन कर दिया कि जब आदम की खिलकत मिट्टी से हो सकती हो तो ईसा का ब़गैर बाप के पैदा होना तअज्जुब खेज़ क्यों। और नसारा को यह कह कर समझा दिया कि ईसा का बग़ैर बाप का पैदा होना खुदा या खुदा का बेटा होने की दलील हो तो हज़रते आदम के मां और बाप दोनों ही नही थे। लिहाज़ा सबसे पहले इन्हे खुदा या ख़ुदा का बेटा होना चाहिए था।

हज़रते ईसा के आसमान पर उठा लिये जाने क् बाद शमून अपनी पूरी ज़िम्मेदारीयों के साथ बहैसियते वसी अपने फ़राज़ और तब्लीग़ उमूर अन्जाम देते रहे। और उनकी वसीयत के सिलसिलें इनके बाद भी हज़रते सरकारे कायनात रसूले खुदा स 0 अ 0 की बेसत तक बराबर जारी व सारी रहा। और शमून इब्ने हमून के बाद यहिया बिन ज़करिया मंज़र बिन शमउन सलेमा बिन मन्ज़र बरज़ा बिन सलमा , अबी बिन बरज़ा , दुस बिन अबी , असीद बिन दोस , होफ बिन असीद यहिया बिन होफ। बजीरा राहिब और बाज़ रवायात की बिना पर जनाबे सलमान फ़ारसी बित्तरतीब एके बा दीगरे एक दुसरे के वसी मक़र्रर होते रहे। और यह तमाम हज़रात तालीमातो शरीयत ईसा की तब्लीग़ के सिलसिले के साथ पैग़म्बरे आख़्रुज़मा की बशरत भी किया करते थे। जनाबे सलमाने फ़ारसी वही बुज़ुर्ग हैं जो बाद में मुशर्रफ ब इस्लाम हुए और ईमान के दस दरजे पर फ़ायज़ थे। और इऩ्ही के बारे में हज़रते रसूले ख़ुदा स 0 अ 0 ने फरमाया था कि सलमान मेरे अहलेबैत में से है।

यह बात भी तय शुदा है कि क़रीब क़यामत जब आख़री इमाम हज़रते मेंहदी आखिरउज़्ज़मा जूहुर फरमायेगें तो हज़रते ईसा भी आसमानें चहारूम से ज़मीन पर तशरीफ लायेंगे। उनकी इमामत की तस्दीक़ करेंगे और उन्ही की इमामत में नमाज़ पढ़ेगे।

इमामे फ़ख़रुद्दीन राज़ी अपनी तफसील में लिखते हैं कि जिस वक्त इमामें मेंहदी का जुहूर होगा हज़रते ईसा अर्शे चहररुम से ज़मीन पर तशरीफ लायेगें। तो उस वक्त उनकी हैसियत एक उम्मती से ज़्यादा न होगी।

मौलाना फरमान अली साहब कुरआने मजीद में सुरह आले इमरान के हाशिये पर एक जगह रक़म तराज़ है कि वह बारह आदमी जो सबसे पहले आप पर ईमान लाये हवारी कहलायेय़। इब्रानी ज़बान में हूर के माने खालिस सफेदी के है। पस इन्हे हवारी इन्हे इस वजह से कहते है कि पहले यह लोग धोबी का पेशा करते थे। औप कपड़ो को निखार कर सफ़ेद करने की वजह से यह नाम हुआ हो।

इस वजह से कि हज़रते ईसा ने इऩ्हे ग़ुस्ले इस्तेबाग़ दिया था। जो अब तक नस्रानियों में जारी है। यह इस वजह से कि हज़रते मरियम ने हज़रते ईसा को काम सिखाने की ग़रज़ से एक रंग रेज़ के पास रख दिया था। या फिर इस लिए कि वह नुफूस को गुनाहों की आमोजिश से पाक व साफ रखते थे और दुसरों को भी पाक करते रहते थे। इस वजह से इन्हे हवारी कहते है। यह लोग ज़बर्दस्त वायज़ थे खुसुसन लूका। जिनकी तरफ इन्जील का एक हिस्सा मन्सुब है। यह भी याद रखने की बात है। कि जिस तरह बनी इस्राइल के बारह नक़ीब थे। हज़रते ईस के बारह हवारी थे। इसी तरह उम्मते मुस्लेमा के भी बारह आईम्मा है। मौलाना ने हवारीन के बारे में जों मुख्तलिफ बयानात बयान फरमाये है। इससे पता चलता है कि मुअर्रेखीन इस अम्र में सही नतीजा नही अक़ज़ कर सके है कि हवारीन कहलाने का असल सबब क्या है। और शायद यह वजह है कि गलत फहमी के बिना पर हज़रते ईसा के हवारीन को किसी ने धोबी और किसी ने अंग्रेज़ तसव्वर किया है। मेरी तहक़ीक के मुताबिक़ हवारीन के लुग़वी मानी मददगार के है।

लिहाज़ा ज्यादा करीने क़यास बात यही है कि हज़रते ईसा के जो सच्चे मोईन व मदद गार थे वही हवारीन कहलाये। जैसा कि इमामे रज़ा अ 0 के इस क़ौल से साबित है कि हज़रते ईसा को अस्हाबे खास को हवारीन इस लिए कहा जाता है। कि वह मवाएज़ और नसीहतों के ज़रीये गुनाहो से दुर रखते और हज़रते ईसा के मोईन व मदद गार थे। हवारीन के माने चुँकि साफ करने वाले के भी है। इसलिए लोगों ने धोखा खाया। इसलिए किसी ने धोबी किसी ने रंगरेज़ लिख दिया।

हज़रते ईसा अ 0 का आसमान पर उठाया जाना

हज़रते ईसा जब शामून बिन हामुन को अपना खलीफा और जानशीन मुकर्रर कर चुके तो आप ने हवारीन को हुक्म दिया कि तुम लोग अतराफे आलम में तब्लीग़ व हिदायत के लिए फैल जाओ चुनान्चे जब वह लोग ग़ैर मुल्को में चले गये तो आपको तनहा देखकर इस्राइली यहूदी ने जिनकी फ़ितरत और सरिश्त में शरारत और शैतनत भरी हुई थी। एक मन्सूबा तैयार किया कि किसी तरह क़त्ल कर दिया जाये। चुनान्चे मुखतलिफ़ हीलों बहानों से एक शब इन लोगों ने आपकों गिरफ्तार करके एक घर में मुकय्यद कर दिया। खुदा का करिश्मा देखिये कि जिब्रील आये और एक रौशन दान से निकल कर आपको आसमान पर ले गये।

जब सुबह तड़के यहूदी हज़रते ईसा को फांसी देने के इरादे से वहां पहुंचे तो उनका एक सरदार जिसका नाम यहूदा था आपको बाहर लाने के लिए घर के अन्दर दाखिल हुआ। खुदा ने अपनी कुदरत से यहूदा को हज़रते ईसा की शक्ल में तब्दील कर दिया। हज़रते ईसा को न पाकर जब वह अपने साथियों से माजरा बयान करने बाहर निकला तो इसे देखते ही ईसा समझ कर इसके उपर टूट पड़े दबोच लिया और वह लाख चीख़ता चिल्लाता रहा कि मैं ईसा नहीं हुं बल्कि तुम्हारा साथी यहूदा हूँ।

आखिर इसे सुली पर चढ़ा ही दिया जब उसका काम तमाम हो गया तो इऩ बदबख़तों ने इसकी लाश पर तबर भी बरसाये। जब यह सब कुछ हो चुका तो खुदा ने फिर यहूदा को उसकी अपनी असली शक्लों सूरत में कर दिया। यह देख कर उन लोगों ने अपना मुंह पीट लिया और हाथ मल कर रह गये। यह वाक्या 21 रमज़ानुल मुबारक का बताया जाता है।

हज़रते ईसा के बारे में यहूद नसरा दोनों ही शुबहे में पड़े हुए थे। यहूदी आपके बारे में बेहूदा ख्यालात रखते थे जबकि नसारा आपको खुदा का बेटा कहते थे। परवर दिगार ने ह़रते आदम की मिसाल देकर दोनों की तशफफी कर दी यहूदियों को यह करहर मुतमइन कर दिया कि जब आदम की खिलकत मिट्टी से हो सकती हो तो ईसा का ब़गैर बाप के पैदा होना तअज्जुब खेज़ क्यों। और नसारा को यह कह कर समझा दिया कि ईसा का बग़ैर बाप का पैदा होना खुदा या खुदा का बेटा होने की दलील हो तो हज़रते आदम के मां और बाप दोनों ही नही थे। लिहाज़ा सबसे पहले इन्हे खुदा या ख़ुदा का बेटा होना चाहिए था।

हज़रते ईसा के आसमान पर उठा लिये जाने क् बाद शमून अपनी पूरी ज़िम्मेदारीयों के साथ बहैसियते वसी अपने फ़राज़ और तब्लीग़ उमूर अन्जाम देते रहे। और उनकी वसीयत के सिलसिलें इनके बाद भी हज़रते सरकारे कायनात रसूले खुदा स 0 अ 0 की बेसत तक बराबर जारी व सारी रहा। और शमून इब्ने हमून के बाद यहिया बिन ज़करिया मंज़र बिन शमउन सलेमा बिन मन्ज़र बरज़ा बिन सलमा , अबी बिन बरज़ा , दुस बिन अबी , असीद बिन दोस , होफ बिन असीद यहिया बिन होफ। बजीरा राहिब और बाज़ रवायात की बिना पर जनाबे सलमान फ़ारसी बित्तरतीब एके बा दीगरे एक दुसरे के वसी मक़र्रर होते रहे। और यह तमाम हज़रात तालीमातो शरीयत ईसा की तब्लीग़ के सिलसिले के साथ पैग़म्बरे आख़्रुज़मा की बशरत भी किया करते थे। जनाबे सलमाने फ़ारसी वही बुज़ुर्ग हैं जो बाद में मुशर्रफ ब इस्लाम हुए और ईमान के दस दरजे पर फ़ायज़ थे। और इऩ्ही के बारे में हज़रते रसूले ख़ुदा स 0 अ 0 ने फरमाया था कि सलमान मेरे अहलेबैत में से है।

यह बात भी तय शुदा है कि क़रीब क़यामत जब आख़री इमाम हज़रते मेंहदी आखिरउज़्ज़मा जूहुर फरमायेगें तो हज़रते ईसा भी आसमानें चहारूम से ज़मीन पर तशरीफ लायेंगे। उनकी इमामत की तस्दीक़ करेंगे और उन्ही की इमामत में नमाज़ पढ़ेगे।

इमामे फ़ख़रुद्दीन राज़ी अपनी तफसील में लिखते हैं कि जिस वक्त इमामें मेंहदी का जुहूर होगा हज़रते ईसा अर्शे चहररुम से ज़मीन पर तशरीफ लायेगें। तो उस वक्त उनकी हैसियत एक उम्मती से ज़्यादा न होगी।

हिन्दुस्तान से पैग़म्बरों का ताअलुक़

रिश्ते आज़ल से क़ायम है यह सिर्फ जिस्मानी नही है। बल्कि रुहानी भी होते है। इनका ज़हूर चाहे जब बई हो यह उसूल सिर्फ इन्फेरादी रिश्तों का नही बल्कि क़ौम और गिरोहों का भी है। सिर्फ इन्सानी रिश्तों के लिए नहीं बल्कि हैवानी , नबाताती और जमादाती रिश्तें काभई यही उसूल है कि वह भी अज़ली है। यह एक अलग तफ़सीली मौजू है जिसके साइंटिफिक सबूत हैं हमें फिलहाल यह देखना है कि ज़मानए क़दीम में रसूले अकरम स 0 अ 0 की जाए विलादत अरब और हिन्तुस्तान के दरमियान के दरमियान क्या रिश्ते थे।

1000 क़ब्ल मसीह यमन की एक क़ौम सब ने हिन्दुस्तान से तिजारती तअल्लुक़ात इस्तेवार किये। बम्बई के क़रीब सुपारा नामी एक गांव से अहदे सुलेमानी में (जिनका ज़माना 650 क़ाफ़ 0 मीम है) फिलिस्तीन से तिजारत शुरू हुई। इसी तरह हिन्दुस्तानी मलमल छींट और रुमाल वग़ैरह अरब में मक़बूल थे.। जिनका ज़िक्र अरबी अशार में मिलता है। खानदाने मोरिया के आन्ध्रा प्रदेश में तमाम क़ुतुबाते आरामी अरबी तर्ज़ में लिखे हुए मिले है। और अशोक के क़ुतुबात भी फराहम हुए हैं।

आब सबल यह पैदा होता है कि आज से पांच हज़ार साल क़ब्ल हिन्दुस्तान में अरबी ज़बान युधिश्टिर के दरबार में क्यों कर राएज हुई। इसका जवाब यह हो सकता है कि आज से पांच हज़ार साल पेशतर इस मुल्क में दीने इस्लाम का दौर दोरा था.।

हिन्तोस्तान की एक और जमाअत भी क़दीम ज़माने से अरब में पायी जाती थी। इसको अरबी बाशिन्दे मेद कहते थे। इसतखरी ने लिखा है कि हुदूदे सिन्ध के तमाम शहरों में कुफ़्फ़ार का मज़हब बौद्ध था। और इनके साथ ही एक क़ौम है जिसे मेद कहा जाता है। जाठ और मेद के बाद हिन्दुस्तान की एक और क़ौम अरब में पायी जाती है वह सबाबजामासबाबचा है। बलाज़री ने फ़ुतुहुल बलादान में और इब्ने ख़ुलदून ने अपनी तारीख़ में बार बार सबाबचा का ज़िक्र किया है। अरब में हिन्दुस्तान की एक और जमाअत ज़मानए कदीम से आबाद थी. जिसे अरब हुमरा , हमर , अहमिर और अहामेरा के लक़ब से याद करते थे। इसी तरह मज़हबी रवाबित और ख़ुसुसन अम्बिया अ 0 की आमद या बेअसत के सिलसिले में हमें मुताअदिद रवायत मिलती है।

अहदे हाज़िर के मुसलमानों में एक आम तसव्वुर यह भी है कि जिन अम्बिया का ज़िक्र कुरआन में है उनका ताल्लुक़ सिर्फ जज़ीरा नुमाए अरब से था। यह दावा करने वाले यह नहीं बताते कि हज़रते आदम हज़रते नूह , अरब , मिस्र , ईराक , शाम के किन हिस्सों में दावत के लिए मबउस हुए थे। इस सिलसिले में मोहक़्क़ीन हज़रात को जो कुछ मिला है हम मुख़तसर पेश कर रहे है।

हज़रते आदम अ 0 और हिन्दुस्तान

यह एक दिलचस्प बात है कि श्रीलंका में कोहेसरान दीप पर एक बड़े पांव का निशान मोजूद है। जिसे बहूत से मज़ाहिब के पैरों मुक़दस मानते है। मुसलमान और ईसाइ इसे हज़रते आदम के पांव का निशान मानते है। बौद्ध मज़हब के पैरब गौतम बुध के पांव का निशान कहते है। और हिन्दू इसे शिव जी के पैर का निशान मानते है। यह अजीबो ग़रीब रवायत बिल्कुल बेबुनियाद भी नही है। इसकी क़ड़ीयां हमें अरबों की तारीख़ में मिलती है।

अहले अरब का यह दावा है कि हिन्दुस्तान से इसका तअल्लुक सिर्फ चन्द हज़ार बरसों का नही है। बल्कि अज़ली तौर पर यह मुल्क इनका पिदरी वतन है। हदीसों और तफ़सीरों मं जहाँ हज़रते आदम के वाक़ेयात है। मुताअदिद रवायतों से भी ज़ाहिर होता है कि हज़रते आदम जब आसमान की जन्नत से निकाले गये तो हिन्दुस्तान की आरज़ी जन्नत पर उतारे गये। श्रीलंका में उन्होने पहला क़दम रखा जिसका निशान इसके एक पहाड़ पर मौजूद है। इब्ने जज़ीर इब्ने अबी हातम ने लिखा है कि हिन्दुस्तान की सरज़मीन का नाम जिसमें आदम उतरे वजना है। क्या यह कहा जा सकता है कि यह वजना दखिना या दखिना या दकखिन है जो जुनूबी हिन्दुस्तान के हिस्से का मशहूर नाम है।

अब एक सबूत तफ़सीर की किताबों से मुलाहेज़ा फ़रमायें। इब्ने अब्बास ने फ़रमाया है कि आदम का तनूर हिन्द में था। यह वाज़ेह रहे कि कुरआन , इंजील और तौरेत से मुफ़स्सेरीन को यह रौशनी अभी तक नही मिल सकी कि आदम दुनिया के किस खित्ते में उतारे गये।

मुन्दरजा बाला रवायात से श्रीलंका में पांव के निशान से यह इशारात मिले है कि हज़रते आदम अ 0 की बेअसत इस सरज़मीन में हो सकती है. हालांकि यह रवायत ज़ईफ़ क़रार दी जाती है। लेकिन यह बात ज़रुर क़बिले गौर है कि दुनिया के किसी और खित्ते के बारे में ऐसा दावा होने की रवायत भी हमें नही मिलती।

हज़रते नूह अ 0 और हिन्दुस्तान

कुरआन से यह हमें मालूम होता है कि तूफाने नूह अ 0 के बाद हज़रते नू की कश्ती कोहे जूदी पर ठहरी जो ईराक़ के इलाके करदिस्तान में है। और बाइबिल से पता चलता है कि कोहे अरारत पर इनकी कश्ती रुकी थी जूदी कोहे अरारात की एक चोटी है। लेकिन आज तक मोफ़स्सेरीन ने यह नही बताया कि कश्ती के रुकने के बाद हज़रते नूह के तब्लीग़ी मराकिज़ दुनिया के कौन कौन से इलाके रहे और यह भी नही पता चल सका कि तूफाने नूह से पहले हज़रते नूह छः सौ साल तक कहां रहें। तौरेत से तो सिर्फ तना मालूम होता है कि हज़रते नूह और उनके साथी बाबुल में इकट्ठा हुए और वहां से पूरी दुनियां में फैले।

इसलिए इसका नाम बाबुल है क्योकि खुदा वन्दे आलम ने वहां पर तमाम अहले ज़मी की ज़बानों को ग़लत खिल्त मिल्त कर दिया था। और वहां से इन (हज़रते नूह और इनके साथियों) के ख़ुदा ने तमाम रुए ज़मीन पर फैलाया तौरेत किताबे पैदाइश 11,9।

क़ुरआन यह कहता है कि तनूर से पानी उबलना शुरू हुआ था और यहां से तूफान की इब्तेदा हुई थी। (तरज़ूमा)

यहां तक कि जब हमारा हुक्म आ पहुंचा और तन्दुर से पानी उबलना शुरू हुआ तो हमने कहा कि इस (कश्ती) में हर किस्म के जोड़ो में से दो दो को चढा तो (सुरए हूद 40)। लफज़े तन्दूर अरबी ज़बान का लफज़ नही है। फ़ारसी में इसका माना रोटी पकायी जाने बाले तनूर के है। बैश्तर मुफ़स्सेरीन ने इस लफ़्ज़ को इन्ही मानों मे इस्तेमाल किया है। और कुछने तनूर से मूराद सतह ज़मीन भी लिया है। यानी ज़मीन की सतह से पानी उबलना शुरू हुआ लफ़ज़े तनूर से पहले कुआन में अलिफ और लाभ इस्तेमाल हुआ है। जिसका मतलब है कि कोई मखसुस तनूर इस सिलसिले में उलमाए कराम की तशरीह लिखी देखी और अगर यह कहा जाये कि अलिफ और लाम तन्दूर में हैं तो इसका जवाब यह है कि यह बइद नहीं कि नूह को वह तन्दुर मालूम हो। हसन बसरी का यह बयान है कि वह तन्दूर पत्थर का था। हज़रते हव्वा इस पर रोंटिया पकाती थी। फिर वह हज़रते नूह के पास आ गया था। और उऩसे कह दिया गया था कि देखो तन्दूर से जब पानी उबल रहा हो तो अपने साथियों को लेकर कश्ती पर सवार हो जाना। लफ़्जें तन्दूर पर बहूत से अक़वाल इकठ्ठा करते हुए अल्लामा शोक़कानी ने लिखा है कि आठवां कौल हो कि वह एक मुक़ाम है। जो हिन्द में है (तफसीरे फतहुल ग़दीर जिल्द 2 सफ़ा 474)। यह बात दिल चस्पी से खाली नही कि रेलवे टाईम टेबल में तनूर नाम का एक मक़ाम केरेला में है और नक़्शे में केरला के मुल्लापुरम ज़िले में समुन्दर के साहिल पर तनूर नाम का एक मकाम वाक़ये है। यह हिन्दुस्तान के मग़रीबी साहिल पर है। जो बहराए अरब के ज़रिए अरब से जुदा होता है। रवायत की रोशनी में क्या यह क्यास किया जा सकता है कि यह वही मक़ाम है जहां से सैलाब नूह के शुरू होने का ज़िक्र कुरआन ने किया है. इससे दुसरे तमाम अक़वाल की ततबीक़ भी हो जाती है। यानी साहिले समन्दर पर तनूर नामी जो मक़ाम है वहां सतहे ज़मीन से पानी उबलना शूरू हुआ था। और यहीं मक़ाम हज़रते आदम का तनूर कहलाया। इससे यह साबित होता है कि हज़रते नूह तूफान से क़ल्ब हिन्दुस्तान में थे। बरसों की तहक़ीक के बाद गुजरात के एक माहिर क़ानूनदा एम ज़मा खोखरा ने यह इनकेशाफ किया है कि आदमे सानी खाके मुजरात में महवे इस्तेराहत हैं। इनके दावे की बुनियाद 240 फिट लम्बा एक मजार है जो गुजरात के इस तारीख़ी शहर से 25 मील दूर मौज़ा बड़ीला शरीफ के नवाह में सदियों से मरजए ख़लाएक़ है। गांव से तक़रीबन एक फरलांग जुनूब में घनी झाड़ियों और छायादार तरख्तों से घिरी स कब्र के बारे में आम तासीर यह है कि हज़रते नूह के बेटे या पोते कबीत का मदफन है। लेकिन एम ज़मा खोखरे ने इल्में कश फुल कुबूर के उलमा की रवायतों से यह साबित किया है कि यह क़बीत नही बल्कि खुद हज़रते नूह हैं। बहुत से उलमाए कश फुल कुबूर और बुजुर्गान के हवाले ताइद में बयान करने के बाद लिखते हैं।

बड़ीला शरीफ एक सरहदी गांव है और गुज़रात से पांच मील दूर जानिबे शिमाल और मशरिक़ क़स्बए टाएंड़ा के नज़दीक वाक़े है। यहां से झम्ब का इलाका शुरू हो जाता है और दरियाए चुनाब व तबई इसके क़रीब ही बहते है। तक़सीम से क़ल्ब हिन्दू , इस मज़ार को मनो मेहरिस्त के नाम से पुकारते थे , मनुमेह रिस्त संस्कृत का लफ़्ज़ है जिसके माना कश्ती वाला है। इबरानी लफ्ज़े नूह से भी यह माना अख़ज़ किया जाते है। संस्क़त की क़दीम किताबो में दर्ज है। कि आदम का एक बेटा पंख पखेरु मे समेट कर एक कश्ती में बुलाता है। तूफाने नूह का ज़िक्र आर्याओं की मज़हबी किलाबों में भी आया है और इस हवाले से यह भी साबित होता है कि अवाएल ही में नूह की औलाद बरसगीर हिन्द तक फैली हुई थी। आइनए गुजरात मे दर्ज है गुजरात के बाशिन्दे हज़रते नूह के बेटे हाम की औलाद हैं और हामियों ने कश्मीर के नवाह में बड़ी बड़ी इमारतें तामीर करायी। इमतेदादे ज़माने से हाम की कब्र के आसार मिट चुके है। लेकिन शहरो और मज़रात की सूरत में इनकी आमद के निशानात यहां के वसीव अरीज़ इलाको में फैले हुए है। बढ़ेला शरीफ के नवाह में मिट्टी के बड़े बड़े तौंदे और टीले इस अम्र के गवाह हैं कि कभी यहां औलादे आदम की आलीशान बस्तियां होंगी।

याक़ूते हमूवी ने लिखा है कि बुकीर बिन यखतिन बिन हाम बिन नूह की औलाद में हिन्द और सिंध नामी दो भाई थे जिनके नाम से यह दोनो मुल्क मशहूर है। इन तूफाने नूह से क़ल्ब और बाद में भी हज़रते नूह का तअल्लुक़ हिन्दुस्तान से था।

हज़रते मूसा और दीगर अम्बिया

ऐ ऐन किगहम की आसारे क़दीमा रिपोर्ट के ज़ैल में यह पता चलता है कि अयोध्या में दो पर्वतों के दरमियान मुसलमानों का क मज़हबी मकाम है जो मशरिक़ से मग़रिब तक चौसठ फिट है और इसकी चौड़ाई 47 फिट है इनमें दै मज़ार हैं जिन्हे हज़रते शीश और हज़रते अय्यूब से मनसूब किया जाता है।

एम 0 ज़मा खोखरा जिनका ज़िक्र हम क़ौमी जंग रामपुर के हवाले से करर चुके है के बारे में अखबार मज़ीद लिखता है कि (मुस्लिम इंण्डिया ऊर्दु अप्रैल सन 1988 सफा 15)एम 0 ज़मा खोखरा ने मज़ारे नूह या फ़रज़न्दे नूह के मरक़द के अलावा वसी अरीज़ कबीरों की निशानदेही की है इनके बक़ौल मोज़ा चौगानी मे तानूग़ किनआनी थे। और वह हज़रते युसुफ के बेटे थे आइनये गुजरात में दर्ज है कि क़ाज़ी सुल्तान महमूद ने इल्मे कशफुल कुबूर के ज़रिये गुजरात के आस पास मुताअदिद मज़ारात की निशानदेही की है इनका दावा है कि यह तमाम क़बरे इन तमाम अम्बियाए बनी इस्राइल की है जो औलादे मूसा व इमरान में से थे। क़दीम तारीख़ी हवालों से यह अन्दाज़ा होता है कि गुजरात इल्म व फ़ज़्ल के एतेबार से ख़ित्तए यूनान ही नही बल्कि रुहानियत की निस्बत से पैग़म्बरों का मदफ़न भी है। रवाल शरीफ के मक़ाम पर एक मज़ार है जिसकी लम्बाई आम क़ब्रो से कई फिट ज्यादा है।

इसके बारे में यह कहा जाता है कि यहां आदम के बेटे शीश की औलाद में से एक बुजुर्ग दफन है. पसीर नगर में हमसेयालान की एक तुरबत है. बखते नस्र के हमले के दौरान अपने बेटे समेत क़ैद हुए थे। और बाबूल में असीरी के सत्रह बरस गुज़रने के बाद हिन्दुस्तान चले आये थे। इनके जददे अमजद हज़रते हारुन हैं। क़स्बा टाण्ड़ा में एक इस्राइली सरदार नक़ीब खुशी की क़ब्र है। दिरियाये तवई के किनारे सुल्तान क़ैनूस और फ़नानूस की क़ब्रें है।

यह दोनो हज़रते इब्राहीम के बेटे अफ़रासीम की औलादों में बयान किए जाते है। सुल्तान शनयाउस के बारे में यह मसहूर है कि वह हज़रते दाउद के फ़रज़न्द है। एक नौ गज़ी कब्र मौज़ए रंगड़ा में भी है इन सदियों और क़रनो में क़बरों ने गर अपने तक़ददुस व एहतेराम को बरक़रार रखा है तो सके बारे में यब कहा जा सकता है कि यह पैग़म्बरों के मोअजेज़ात हैं (रोज़ नामा क़ौमी जंग रामपुर 13 मार्च 1988) हज़रते मूसा के बारे में हिन्दुस्तान की जैन क़ौम के रवायात में यह मिलता है कि वह हिन्दुस्तान आये थे। (वव्वाबो आवमो बिस्सवाब)

हज़रते ईसा और हिन्दुस्तान

हज़रते ईसा के हिन्दुस्तान की आमद के बारे में कश्मीर और लद्दाख में बहूत सी रवायतें मशहूर है। रुसी और अंग्रेज़ी मोहक़्क़ेकीन ने भी इसका ज़िक्र किया है। फिलहाल हम हिन्दी ज़बान के मशहूर रिसाले कादिम्बनी मार्च 1976 में छपे आचार्य रजनीश के एक मौजू ईसा की नामालूम जिन्दगी से कुछ एखतेबासात नक़ल कर रहे है जो हिन्दी के बजाये मेरी अपनी ज़बान में है। हिन्दुस्तान में यह यक़ीन करने के कई सुबूत है। कि हज़रते ईसा कश्मीर मे एक बुद्ध मठ में ठहरे रहे। कश्मीर में कहानियां मशहूर है कि ईसा वहां थे। मुराक़ेबे में ग़र्क थे। फिर वह यरुशलम में ज़ाहिर हुए। इस वक्त वह 30 साल के थे।

एक फ्रांसीसी मुसन्निफ अपनी किताब जन्नत का सांप में कहता है कि कोई जानता कि तीस साल में उन्होने क्या किया और कहां कहां रहे। एक रवायत के मुताबिक़ वह काएशर में रहे। रुसी सैयाह नकोलस , फीरोविच जो 1888 के आस पास हिन्दुस्तान आया था लद्दाख गया वहां वह बिमार पड़ गया और मशहूर हन्मेस गुफ़ा में रहा अपने गुफ़ा मे क़याम के दौरान इसने मुताअदिद बुद्ध ग्रथों को पढ़ा।

इसने ग्रंथो मे ईसा उनकी तालीमात और उनके लद्दाख के सफर वग़ैरह के बारे में काफी बयान पाया बाद में उसने एक किताब शायां की उसमें उसनें ईसा के लद्दाख और मशरिक़ के दुसरे मुमालिक के सफर से मुताअल्लिक़ बयानों का ज़िक्र किया है। इनमें बयान यब किया कगया है कि लद्दाख में हज़रते ईसा ऊँचे पहाड़ों के दरों से बर्फीले रास्तों को पार करते हुए पहले गाम कश्मीर पहुंचे वह वहां काफी अरसे तक अपनी भेड़ बकरियों की देखभाल करते रहे।

इसी हिन्दी रिसाले कादमब्नी के सतम्बर 1978 के शुमार में शान्ति कुंज हरिद्धार का एक मज़मून तिब्बती लामा की कुबत में ईसा के उनवान से छापा है। इसके एक़तेबासात भी मुलाहेज़ा फरमाये।

यह तीस साल हज़रते ईसा ने कहां और किस तरह गुज़ारे। यह जानने के लिए आलिमों ने काफी रिसर्च की है। रिसर्च स्कालरों में सबसे आगे रुसी आलिम नूर विच है जिन्होने मुसलसल चालीस साल तक सफर करके रिसर्च की और अपने नताएज 1898 में ईसा की नामालूम ज़िन्दगी नामी किताब की शक्ल में शायां कराया नकोलिस नुरविच अपनी तहक़ीकाती सफर के दौरान तिब्बत भी गये और उन्होने तिब्बत के हमूस बौद्ध विहार में ताड़ के पत्तों पर लिखा हुआ एक क़दीमी ग्रंथ देखा नूरविच ने इस बौद्ध विहार में गुज़ारे अरसे का बयान इस तरह लिखा है कि मै जब एक गुफ़ा मे गया तो वहां के लामा ने एक ऐसे पैग़म्बर के बारे में बताया जिसे वह बुद्ध का ही एक रुप मानता था।

लामा ने उस पैग़म्बर का नाम ईसा बताया है। और कहा हम लोग इस नाम को बड़ी इज़्ज़त के साथ ज़बान पर लाते है। इनके बारे में हमें ज़्यादा मालूम नही लेकिन बडे लामा के पास एक क़दीमी ग्रंथ बहूत कुछ लिखा है। किसी तरह नूरविच ने वह क़दीमी ग्रंथ देखने और उसकी तस्वीर उतारने में कामयाबी हासिल कर ली। इस ग्रंथ मे चौदह बाब है और दो सौ चवालिस श्लोक है।

इसमें ईसा के बारे में यह है कि ह़ज़रते ईसा ज्ञान हासिल करने की ग़र्ज़ के हिन्दुस्तान आये। इन दिनों यरुशलम के क़ाफिले तिजारत के लिए यहां आया करते थे। चुनान्चे वह भी एक क़ाफिले के साथ सिन्ध होते हुए हिन्तुस्तान मे वारिद हुए। ईसा सभी इन्सानो से मोहब्बत किया करते थे और उन्हे भी वैश्य और शूद्र सभी प्यार करते थे। उन दिनों वह जंगनाथपुरी में ठहरे हुए थे।

वहां से पुजारियों को जब पता चला कि ईसा शूद्रों से भी मिलते है तो वह उनसे नाराज़ रहने लग। ईस को पुजारियों की नाराज़गी का पता चला तो वह राज गृह चले गये। छह साल वहां रहे और इसके बाद नेपाल होते हुए तिब्बत पहुंचे। और सोलह साल तक इसी तरह सफर करते हुए ईरान के रास्ते से अपने वतन लौट गये।

भविष्य पर उन्क प्रसंग 3 अध्याय 22 के 21 ता 23 श्लोक तक हिमालय पर ईसा से शकादीश की मुलाक़ात का बयान इस तरह मिलता है कि एक बार शिकादीश हिमालय से आगे होन्टर गये। वहां उन्होने एक सफेद पोश गोरे रंग के सन्त को पहाड़ो पर घुमते देखा। शिकादीश ने इनसे तअर्रुफ चाहा तो सुन्नत ने कहा कि ईसा मेरा नाम है। मैंने कुआरी मां के पेट से जन्म लिया है और मैं गैरे मुल्क़ से आया हुँ। मुझे मसीह कहा जाता है।

मज़कूरा तमाम वाक़ेयात रवायतों के एतेबार से ज़ईफ़ से ज़ईफ हो या कुछ हों मगर इनसे यह बात पाये सबूत को पहुंचती है कि हिन्दुस्तान से पैग़म्बरों का गहरा और मुसलसल तअल्लुक रहा है।

हज़रते आदम से ईसा तक मशहूरों मारुफ अम्बियाए किराम के जो ज़रुरी हालात मैने तहरीर किये है। उनके बारे में यह विज़ाहत कर देना चाहता हुँ कि वह ज़्यादा तर तारीख अबुलफिदा , हयातुल कुलूब , तारीखे तिबरी और तारीखे कामि वग़ैरा मे माखुज़ है।

ज़ाहिर है कि उन अम्बिया के दौर की इत्मिनान बख्श तहक़ीक़ इस दौर के किसी महिक्कि के लिए एक बड़ा ही दुश्वार ग़ुज़ार मरहला है क्योकि उनके दौर की लिखी हुई कोई तारीख कहीं मौजूद नहीं अलबत्ता हिन्दूओं की क़दीम तरीन किताबों मे वेदों के श्लोकों के बारे में भी कुछ रौशनी मिलती है मगर वह ऐसी नहीं है कि उसकी बुनियाद पर हालात ओ वाकिआत की कोई इमारत खड़ी हो सके।

तारीख के तदवीनी सिलसिले के अव्वलीन दौर में मुहक़्कीन ओ मुवर्रखीन ने मुखतलीफ ज़राए ओ क़राएन से अम्बिया के दौर की तजदीद में अपनी कोशिशें सर्फ की लेकिन उनमें उनहें कहां तक कामयाबी मिली है। अल्लाह बहतर जानता है।

अम्बियाए किराम से मुताअल्लिक़ जो हदीसें या रिवायतें पैगम्बरे इस्लाम या आइम्मा अतहार की ज़बानी मज़कूर हुई है कि उनमें उलमा मुहक्केक़ीन और मुफस्सेरीन के माबैन एकतेलाफ नज़र आता है , उनके रावियों पर भी एतबार व एतमाद नही किया जा सकता है। इसलिए जो हालात व वाकेयात मैने कलम बद किये हैं उनमें अगर किसी जगह कोई शुबहा , एतराज़ या तनाकुस हो तो नज़र अंदाज़ करना चाहिए क्योकि जब कुद रसूले अकरम स 0 की विलादत की तारीख़ आज तक मुसलमानों के दरमियान तय नही हो सकी तो हज़रते आदम अ 0 हज़रत इब्राहीम , हज़रते नूह , हज़रते मूसा अ 0 या हज़रते ईसा अ 0 की सही तारीखों का तअय्युन क्योकर हो सकता है।

कुरान मजीद में उन अम्बियाए किराम के इजमाली तज़किरे मौजूद है मगर उनकी विलादत वफात मदफन या उनके ज़माने के बारे में किसी किस्म का कोई ताअय्युन नही किया गया चुनान्चे जिस अन्दाज़ से इस आसमानी किताब में उनके मकारिम इख्लाक़ सिफाते हसना हयाते ज़किया खिदमाते जलीला और इग़राज़े ख़िलकत ओ बेसत के हालात ओ वाकिआत मज़कूर है उसी तरह मैने भी उनका लिहाज़ रखा और उसी उसूल के तहत उनके हालात ओ वाकिआत ज़ेरे कलम आये है।

यह बात क़ाबिले तवज्जो है कि अम्बियाए किराम के हालत ओ वाकिआत बई उन्ही रावियो और मुवर्रिख़ों के ज़रिए हम तक पहुंचे हैं जो ज़माने के मुतअल्लिक भी अजीब ओ गरीब और मज़हका खेज़ ऐसी रिवायतें बयान करते रहे है। जिनकी वजह से इस्लाम का विकार गैर मुस्लिमों के हाथों पहले भी मज़रुह हुआ है और अब भी हो रहा है। मसलन तिबरी की यह रिवायत है किः-

बाज़ लोगों का कहना है कि दुनिया कुल सात हज़ार बरस की है और इब्ने अब्बास से मरवी है कि दुनिया , आकिरत के हफ़तो में से एक हफ्ता है जिसकी मेयाद सिर्फ सात हजार बरस की है नीज़ इस मेयाद में छः हज़ार कुछ सौ बरस गुज़र चुके हैं और कई सौ बरस ग़ुज़र चुके हैं और कई सौ बरस बाक़ी है। और बाज़ लोगों ने कहा है कि ज़माने का मजमूआ सिर्फ छः हज़ार बरस पर मुशतमिल है इसमें छः हज़ार कई सौ बरस गुज़र चुके है।

इसके बाद अल्लामा तिबरी अपनी तहक़ीक़ लिकते है किः- इन दोनों में सही क़ौल अज़रुए हदीस ए पैग़म्बर ,इब्ने अब्बास का है जो उन्होने कहा कि दुनिया ओ आखिरत के हफ्तों मे से एक हफ्ता है जिसकी मीआद सात बरस की है। बस मालूम हुआ कि नबी के इस इसशाद के वक़त तक छः हज़ार की है। बस मालूम हुआ कि नबी के इस इरशाद के वक्त तक छः हज़ार पाँच सौ बरस गुज़र चुके है और तकरीबन पाँच सौ बरस ग़ुज़र चुके है औ तक़रीबन पाँच सौ बरस बाक़ी हैं। (तिबरी जिल्द अव्वल सफा 5 ता 6)

इन दोनों रिवायतों और तिबरी की तहक़ीक़ का ग़लत होना आफताब की तरह रौशन ओ मुनव्वर है इस वक़्त दुनिया के फ़ना होने की मुददत सिर्फ पाँच सौ बरस मान ली गयी और मुस्लमानों ने उसे तसलीम भी कर लिया क्योकि इन रिवायतों के रावी अकाबिरीन सहाबा थे। ज़ाहिर है कि इस वाकिए को चौदह सौ बरस गुज़र चुके है। मगर दुनिया फ़ना नही हुई बल्कि अपनी जगह बरक़रार है।

इन्ही रावियों ने रसूल उल्लाह स 0 अ 0 से खुदा के रहने की जगह भी तज़वीज़ करा दी। चुनान्चे यह तिबरी फरमाते है कि एक शख्स ने यह सवाल किया आंहज़रत से कि या रसूल उल्लाह स 0 अ 0 यह तो बताईये कि दुनिया को ख़ल्क़ करने से पहले खुदा कंहा रहता था। फरमाया एक सियाह अब्र में जिस के नीचे भी हवा थी और ऊपर भी हवा थी फिर खुदा ने अर्श पानी पर पैदा किया (तिबरी जिल्द सफा 16)

यही तिबरी रक़मतराज़ है कि आसमान , ज़मीन और तमाम दरिया एक हैकल में है , हैकल कुर्सी में है। और खुदा के दोनों पांव उस कुर्सी पर है। और वह कुर्सी को उठाये हुए है। जिसकी वजह से कुर्सी कि हालत ऐसी हो गयी है कि वह खुदा के पांव में फटी हुई जूती की तरह मालूम होती है। (तिबरी जिल्द 1 सफा 16)

इसी तरह बहुत से मोअर्रेखीन व मोहक़्क़ीन ने अपनी अपनी किताबों में बेसरों पैर की अजीब अजीब मज़हका खेज़ हदीसें और रिवायतें बयान की है। जिनमें बुखारी सरे फेहरिस्त है। इन मज़मूम रिवायतों और हदीसों से यक़ीऩन इस्लाम क पाको पाकीज़ा तसव्वर पर ग़ैर मुस्लिमों की तरफ से तहक़ीरों इस्तेहाज़ा की ज़रबें पड़ती हैं और मुस्लिम मुआशेरा उसे ख़ामोशी से बर्दाश्त भी करता है।

मौजूदा तरक़्क़ी पजीर दौर में तक़रीबन हर तालीम याफता इन्सान के नज़रियात साइंस की जदीद तहक़ीक़ से वाबस्ता और हम आहंग है। इसलिए वह इन खुराफाती रिवायतों पर यकीन और भरोसा नही करता क्योकि तहक़ीकात ओ इन्केशापात से इस किस्म की रिवायते बिल्कुल ग़लत और मोहमल साबित होती है। मस्लन तिबरी ने अपनी तारीख मं दुनियां की मुददत सिर्फ सात हज़ार साल बतायी है जबकि इल्मेतब्कातुल अर्ज़ के माहेरीन की तहक़ीकात से पता चलता है कि 20 करोड़ साल पहले भी दुनिया थी और ज़मीन के तमाम खुश्की वाले हिस्से एक दुसरे से पैवस्त और जुड़े हुए थे। जिन्के चारो तरफ समुन्द्र था। चुनान्चे एक मशरूरो मुमताज़ सांइस दां रोनाल्ड़ शेलर अपने एक तहक़ीक़ी मक़ाले (ब उनवान ज़मीन के बर्रे आज़म बह रहे है।) में लिखता है कि दुनियां की चार अरब साठ करोड़ साला दुनिया की तारीख़ में समुन्द्र एक रिकार्ड बाज़े कि तरह फैलते और सिकुड़ते रहे है। और बर्रे आज़म तूफानी समन्दर में एक पुराने जहाज़ की तरह मुताहर्रिक रहे है।

यक़ीनन इस मोअम्मे के कुछ हिस्से अभी ग़ायब है। और तमाम तफसीलात पर सांइसदां अभी मुत्तफिक़ नही हो पाये लेकिन एक उमुमी ख़ाके पर सांइस दोनो की अकसरियत इस हैसियत से इत्तेफाक़ कर चुकी है कि अब सिर्फ एक नज़रिया नही रहा। बल्कि उसे सांइटिफिक सच्चाई तस्लीम कर लिया गया है। (मज़मुआ रीडर्स ड़ाइजेस्ट शुमार माह जुलाई सन 1971 ई 0)

उसके बाद रोनाल्ड शेलर फिर लिखता है।

यह तमाम बर्रे आज़म एक ज़बर्रदस्त ताक़त के ज़रिये जिसका मर्कज़ नामालूम है। मुखतलिफ सिम्तो में बह रहे है और उन्की रफतार एक सेमी 0 से 15 सेमी 0 सलाना है। जो कि इल्में तबक़ातुल अर्ज़ की रु से एक ज़बरदस्त रफतार है।

मसलन साईंस दानों को यह मालूम हुआ कि बहरे उकयानूस की चौड़ाई बढ़ रही है। योरप और शिमाली अमरीका एक दूसरे से ढाई सेमी 0 के हिसाब से साल ब साल दूर होते जा रहे है। समुन्दर के फ़र्श की हरकत का हिसाब लगाने के बाद सांईस दां यह मालूम कर सके हैं कि ख़ुश्की के तमाम बर्रेआज़म पहले किसी शक्ल में एक दूसरे से जुडे थे। सबसे पहले एक ज़बर्दस्त मशरिक़ो मग़रिब , दरार पैदा हुई जिसकी वजह से अफ्रीका और जुनूबी अमरीका जुदा हुए , अंटार्टिका और आस्ट्रेलिया अलाहिदा हुए और हिन्दुस्तान ढाई सेमी 0 सलाना के हिसाब से खिसकना शुरू हुआ। और बीस करोड़ साल से ज़मीन ने मौजूदा शक्ल इख़तेयार कर ली।

तिबरी के रावियों ने खुदा के बारे में जो जिस्मानी तसव्वुर पेश किया है या दुनिया के बारे में जो मुददत मुअय्यन की है इन दोनों को रोनाल्ड शेलर की सांइसी तहक़ीक़ ग़लत क़रार देती है।

खुदा के लिए उस अज़ीम सांईसदानों का कहना है कि वह एक ज़बर्दस्त ताक़त है जिसका मर्कज़ नामालूम है और दुनिया के बारे में उनका ख़याल है कि बीस करोड़ साल से इसी तरहं क़ायम है। और इसके साथ ही अमीरल मोअमेनीन हज़रत अली अ 0 के इस क़ौल की भी सिदाक़त समझ में आ जाती है कि खुदा ने मेरे भाई मुहम्मद के नूर को क लाख चौबीस हज़ार साल क़ल्ब अपने नूर से ख़ल्क़ किया।

एक तहक़ीक़ी ज़ेहन रखने वाला इन्सान इस ग़ौरो फिक्र के बाद यह नतीजा अख़ज़ करने पर मज़बूर है कि अव्वलीन दौर के मोअर्रेखीन के यहां भी बहुत सी ऐसी रिवायत पायी जाती हैं जिनकी सिरे से कोई हक़ीक़त नही है।

तारीख और ज़मानें के अलावा जो हालात और वाक़ियात मैंने इस किताब के गुज़िशता सफहात मं मरकूम किये है वह तक़रीबन सही है। क्योंकि उनका ज़िक्र कुरआने मजीद में मौजूद है। और मोअतबर रिवायात से भी उनकी तहक़ीक़ हर ज़ाविये से हो चुकी है। मसलन हज़रते आदम के दो फ़रज़न्दों में से एक का दुसरे को क़त्ल कर देना , हज़रते नूह के ज़माने में तुफान का आना , हज़रते इब्राहिम का आग में ड़ाला जाना , खुदा की राह में हज़रते इस्माइल का ज़बह होने पर आमादा होना और हज़रते यूसुफ़ का किस्सा वग़ैरह।

इन तमाम अम्बिया व मुरसलीन के हालात से यह भी वाज़ेह है कि हर नबी ने अपने बाद के लिये अपना खलीफा और जानशीन अपनी ज़िन्दगी में खुद मुक़र्रर किया है। इस मसले को उम्मत पर नहीं छोडा। फिर भला हज़रते रसूले खुदा स 0 अ 0 अपने बाद इस अहम मसले को उम्मत के रहमो करम पर क्यों कर छोड़ते।

यह भी वाज़ेह है कि तमाम अम्बियाये कराम इस दुनिया में सिर्फ बनी नौ इन्सान की हिदायत के लिए आये थे , मुल्क गीरी , बादशाहत , लश्कर कशी , खुंरेज़ी , तलवार , के ज़ोर पर अपना कलमा पढ़वाने या ज़बर्दस्ती लोगों को अपने दींन का पाबन्द बनाने के लिए नही आये थे। वह खुदा के इताअत गुज़ार बंदे थे।

अहले आलम को अमनो आश्ती का पैग़ाम देना , तमददुनों मोआशेरत का दर्स देना और लोगों को आखेरत का तलबगार बनाना उनका काम था और उनके खोलफा और औसिया भी उन्ही की पैरवी करते रहे। इसी तरह पैग़म्बरे इस्लाम के बाद जो लोग उनके किरदार व सीरत का मुकम्मल नमूना बने वही सच्चे जानशीन और ख़लीफा हैं न कि वह हज़रात जो ज़बर्दस्ती मस्नदे खिलाफत पर क़ाबिज़ हुए।

14.12.2017