तारीख़े इस्लाम भाग 1

तारीख़े इस्लाम  भाग 10%

तारीख़े इस्लाम  भाग 1 लेखक:
कैटिगिरी: इतिहासिक कथाऐ

तारीख़े इस्लाम  भाग 1

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

लेखक: जनाब फरोग़ काज़मी साहब
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तारीख़े इस्लाम भाग 1
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तारीख़े इस्लाम  भाग 1

तारीख़े इस्लाम भाग 1

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

हालाते हज़रते इब्राहीम अ 0

नसब- हज़रत इब्राहीम बिन नाहूर बिन सारूग़ बिन अरग़वा बिन फ़ालिग़ बिन आबिर बिन शलिख़ बिन क़िनान बिन अरफशद बिन साम बिन नूह अ 0

विलादत – हज़रते नूह से 2040 साल बादनमरूद बिन क़ेनआन के दौरे हुकूमत में आप कूफ़े (इराक) के नवाह में कोसारिया नामी गांव के एक ग़ार में मुतावल्लद हुए। आपकी जाए विलादत के बारे में बाज़ मोअर्रेख़ीन ने बाबुल और बाज़ ने एहवाज़ भी तहरीर किया है। लेकिन मेरी तहक़ीक़ के मुताबिक़ कूफ़ा ज्यादा दुरूस्त है। ग़ार में प की विलादत का वाक़ेया यूं बयान किया जाता है कि आपव का बुत साज़यो बुत परस्त चचा जिसका नाम (आज़र) था। नमरूद के दरबार में साही ज्योतिषि के मंसूब पर फाएज़ था और मुस्तक़बिल में आने वाले हालात के बारे में पेशिनगोइयां किया करता था। एक दिन उसने अपने इल्मे नजूम के ज़रिये नमरूद को यह ख़बर दी कि तेरी हुकूमत में ऐसा बच्चा पैदा होने वाला है जो तेरी बिसात उलट कर तेरी तबाही और हलाकत का सबब बनेगा।

नमरूद चूंकि आज़र की बात पर यक़ीन व भरोसा करता था इसलिए इसने अपनी हुकूमत में हर तरफ मनादी करा दी कि आज की तारीख से कोई मर्द अपनी रत के साथ मुक़ारेबत नहीं करेगा। जो औरत हामिला हो उसका हमल फौरी तौर पर गिरा दिया जाये। और जो बच्चा पैदा हो उसी क़त्ल कर दिया जाये। इस नमरूदी फरमान पर सख़्ती से अमल हुआ और हज़ारो मर्द व रतों को मुक़ारेबत के जुर्म में कैद कर लिया और हर नवज़इदा मासूम बच्चा मौत के घाट उतार दिया गया।

इसी ज़माने में मादरे इब्राहीम बी हामेला थीं मगर खुदा की कुदरत से इनका हमल ज़ाहिर न हुआ। यहां तक कि जब हज़रते इब्राहीम अ 0 की विलादत का वक्त करीब आया आप पर वज़ये हमल के आसार मुरत्तब हुए और दर्दे जेह में मुब्तेला हुईं। तो आप ने घर से बाहर निकल कर पहाड़ के एक ग़ार में पनाह ली और वहीं हज़रते इब्राहीम अ 0 पैदा हुए। विलादत के बात इस ख़ौफ से कि बच्चा कहीं क़त्ल न कर दिया जाये। दूसरे दिन हज़रत इब्राहिम अ 0 की वालिदा ने इन्हें खुदा के हवाले किया और ग़ार का दहाना एक पत्थर से बन्द करके पने घर वापस आ गयी।

हज़रते इब्राहीम अ 0 के सामने यह पहली इम्तेहानी मंज़िल थी जब आप ग़ार की तन्हायी में अपनी मां की आग़ोशे तरवियत और दूध से महरूम हो गये। लेकिन चूंकि नबूवत का ताज प के सर पर रखा जाने वाला था। इसलिए कुदरत ने अपने इन्तेज़ामें कास से आपके दाहिने हाथ के अंगूठे से एक दूध का चश्मा जारी किया जिससे आप सिकम सेर होने लगे। इस दूध में कूवते नमूं इस क़द्र ज़्यादा थी कि बच्चा एक माह में जितना बढ़ता है. हज़रते इब्राहीम एक दिन में इतना ही बढ़ते थे। ममता से मजबूर होकर कभी- 2 आप की वालेदा भी लोगोंम की नज़रें बचा कर ग़ार में तशरीफ ले जातीं और अपने बच्चे को दूध पिला कर नीज़ प्यार वग़ैरा कर के वापस चली आती थीं। सवा साल के अरसे में ही हज़रते इब्राहीम इस क़ाबिल हो गये थे कि वह अच्छी तरंह गुफतगू करने लगे थे।

एक दिन हज़रते इब्राहीम अ 0 ने अपनी वाल्दा से फरमाया कि ऐ मादरे गिरामी आप मुधे यहां से गर ले चलिए ताकि देखूं कि इस दुनिया के हालात क्या हैं। आप की वालेदा ने कहा ऐ बेटा अभी इसका मौक़ा नहीं हा अगर ऩमरूद को ख़बर हो गयी तो वह तुम्हें क़त्ल करवा देगा। रफता रफता ग़ार में रहते रहते हज़रते इब्राहीम को 13 साल की मुद्दत गुज़र गयी। एक दिन फिल आप ने पलमाया कि ऐ मादरे गिरामी आप मुधे गर ले चलिये। आपने फरमाया कि ऐबेटा अच्छा मैं तेरे चचा आजटर के खयालात मालूल कर लूं और इससे इजाज़त ले लूं तो तुझे ले चलूं। चूंकि वह नमरूद का ख़ास आदमी है।

कहीं तेरे बारे में कुछ कह न दे यह कह कर वाल्दए इब्राहीम रुख़सत हो गयीं और जब वह थोड़ी दूर निकल गयीं तो हज़रते इब्राहीम भी इनके पीछे पीछे चल पड़े और अपने घर गये। जब आज़र की नज़र हज़रते इब्राहीम पर पड़ी तो हैरत अंगेज़ हुआ और उसने मादरे इब्राहीम से पूछा कि यह कौन है फरमाया कि यह मेरा बेटा है जो तेरह साल क़ब्ल नमरूद के ख़ौफ से फलां ग़ार में पैदा हुआ था। और मैंने आज तक इसे लोगों की नज़रों से पोशीदा रखां। इस पर आज़र सख़त बरहम हुआ और कहा कि अगर नमरूद को इसकी ख़बर हो गयी तो वह इसे ज़िन्दा नहीं छोड़ेगा। फिलहाल तुम यह वादा करो कि अपनी ज़बान बन्द रखोगे।

रवायतों से पता चलता है कि आज़र ने जनाबे इब्राहीम की वालदा से अपवी ज़बान बन्द रखने का वादा तो कर लिया लेकिन अक्सर उसके दिल में यह खयाल पैदा होता कि वह नमरूद को उसकी ख़बल दे दे। लेकिन जब हज़रते इब्राहीम का चेहरा इसकी नज़रों के सामने आता तो इसके दिल में आप की तरफ से मोहब्बत जोस मारती और वह अपना ख़याल तर्क कर देता था। अल्लामा मजलिसी अलैहिर्रहमा अपवी किताब हयातुल कूलूब में तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे हसन अ 0 का यह क़ौल नक्ल किया है कि हज़रते इब्राहीम इन्तेहायी ख़ूबसूरत और हसीन और जमील थे। ख़ूबसूरती का यह आलम ता जिसकी नज़र आप पर पड़ती थी उसके दिल में आप की मोहब्बत पैदा हो जाती थी।

हज़रत रसूल ख़ुदा स 0 अ 0 का क़ौल है कि हज़रते इब्राहींम शक्ल व सूरत में मुझसे बहुत मुशाबेह ते। रवायतों से यह भी पता चलता है कि हज़रते इब्राहीम ख़ूबसूरती में हजरते यूसुफ़ के हुस्न के बराबर थे।

आज़र की हक़ीक़त

बाज़ मोअर्रेख़नी यह न समझ सकेकि आज़र दरअस्ल इब्राहीम का बाप था या चाचा। चुनांचे इस ज़ैल में उलमाए तफ़ासीर और सियर तारीख़ ने बड़ी-बड़ी बहसें की हैं और आख़िर कार यह नतीजा बरामद किया है कि आज़र दर हक़ीक़त इब्राहीम का चचा ही था। जैसा कि अल्लमा अब्दुल अली ने शरए मुस्लिम में तहरीर फरमाया है कि आज़र के बारे में सही क़ौल यह है कि वह हज़रते इब्राहीम का चचा था। आप के वालिद तारीख़ थे। क्योंकि अरब का दस्तूर था कि जो चचा अपने भतीजे की परवरिश करता था वह उसका बाप कहलाता था।

इसी उसूल के तहत खुदा ने भी कुरआने मजीद में फरमाया है कि इज़ क़ाला इब्राहीमा लेअबी (जब जनाबे इब्राहीम ने अपने अब से कहा) यहां तहक़ीक़ के खिलाफ अगर कोई यह बात कहता है कि कि खुदा ने इब्राहिम के बाप को बुत परस्त कहा है तो हमारा जबाव यह है कि बाप का लफज़ चचा के लिए भी इस्तेमाल होता है। जैसे कि हज़रते याकूब के फरज़न्दो ने इब्राहीम , हज़रते इस्माइल , हज़रते याकूब़ के माबूद की इबादत करते हैं। इसमें हज़रते याकूब़ के फरज़न्दो ने हज़रते इस्माई को खभी हज़रते याकूब का बाप कहा है। हालांकि यह मालूम है कि हज़रते इस्माइल आप के बाप न थे बल्कि आप के चचा थे। यह भी एहतेमाल है कि हज़रते इब्राहीम के बुतपरस्त बुजुर्ग का तज़केरा है इससे मुराद आप का नाना हो। क्यूंकि अरबी ज़बान में नाना को भी बाप कहते हैं। नमरुद के दरबार से वाबस्ता होने के बावजूद आज़र अपने पेशे के लिहाज़ से सनमसाज़ व बुततराश था। चुनान्चे वह बुत बनाया करता था। और अपने बेटोंको दिया करता था कि वह इन्हें बाज़ार में ले जाकर फ़रोख़त करें। एक दिन हज़रते इब्राहीम को भी कुछ बुत दिये और इनसे भी कहा कि इन्हें ले जाओ और बाज़ार में फरोख़त करो। हज़रते इब्राहीम ने इन बुतों की की गर्दनों में रस्सी बांधी और इन्हें घसीटते हुए बाज़ार में ले गये और वहां पुकार पुकार कर कहने लगे कि ऐ भाइयों मैं ऐसी चीज़ बेचने लाया हूं जो किसी को भी फायदा नहीं पहुंचा सकती। और न ही इससे किसी को कोई नुक़सान का अन्देशा है। फिर आप इन बुतों को पानी के क़रीब ले जाते थे और इनसे कहते थे कि तुम्हें प्यास लगी होगी लो पानी पी लो कभी कहते कि ऐ बुतों कुछ बातें करो बुतों के साथ हज़रते इब्राहीम का यह बरताव देख कर तमाम बाज़ारी लोग शशदर रह गये। जब आज़र को इस तौहीन का हाल मालूम हुआ तो वह भी आपे से बाहर हो गया और इसने हज़रते इब्राहीम को घर में क़ैद करके इन पर घर से निकलने पर पाबन्दी आयद कर दी।

तारीख़े इस्लाम का आग़ाज़

इस्लाम जो अल्लाह का पसन्दीदा दीन और कुरआनी आयात का मजमुआ है हमेशां से था और हमेशा रहेगा। तमाम अम्बियाए मुरसलीन की तब्लीग़ी कोशिशें सिर्फ और सिर्फ इस्लाम के लिए थीं। चुनान्चे जो हज़रते आदम पैग़ाम लाये वह भी इस्लाम था। और जो शीस इद्रीस और नूह जिस अम्र की तब्लीग की वह भी इस्लाम था।

इसी तरंह जितने अम्बियाए मुरसलीन मबऊस हे वह सब इसनलाम ही के मुबल्लिग़ थे। इस लेगाज़ से आदम नूह और तमाम अम्बिया के सरगुज़ार हयात सब इस्लाम की तारीख़ का जुज़ है। मगर हज़रते इब्राहीम से पहले इस्लाम इस्लाही तौर पर इस्लाम के नाम से मौसूम न था। कुरआने मजीद से पता चलता है कि लफज़े इस्लाम का आग़ाज हज़रते इब्राहीम के वक्त से हुआ। आप ही ने इस दीने इलाही के पौरों का नाम सबसे पहले मुस्लिम रखा। जैसा कि इरशाद हुआ है (इवीसवाकुम उसमुस्लेमीनी मिनक़ब्ले) और सबसे पहले इस लक़ब से मौसूम होने लावे हज़ते इब्राहीम और इनके फ़रज़ंद इस्मीइल ते जिन्होंने अपनी नश्ल में इनके बाक़ी रहने की दुआ भी की। जैसा कि कुरआने मजीद का बयान है कि (परवरदिगार) हमें आपनी बारगाह में मुस्लिम कराह दे और हमारी नस्ल में भी एक उम्मत क़रार दे जो तेरी बारगाह में मुस्लिम हो। इससे काफ ज़ाहिर है कि औलादे इब्राहीम जो लोग नस्ले इस्माइल से हैं वह इस्लाम ही के पैरो समझे जायेंगे।

चूंकि इनके बुजुर्गो का दीन यही था। जिसकी बक़ा के लिए इन्होंने बक़ा के लिए उन्होंने दुआ फरमायी। मेरे नज़दीक नस्ले इस्हाक़ का सिलसिला बी ख्वाह वह ईसाई पर मबनी हो या मूसा पर उसूली तौर पर इस्लाम ही से मुन्सलिक है। यह और बात है कि इनकी शरियतें मखसूस थी जिनकी वजब से इनके पैरो बाद में यहूदी और नस्रानी के नाम से मैसूम हुए। मगर यह शरीयते बनी इस्राइल से मुख़तस थीं औलादे इब्राहीम व इस्माइल के क़तई नहीं थीं। औलादे इस्माइल के लिए सिर्फ दीने इब्राहीम था जो क़ानून और शरीअत के एतेबार से इस्लाम कहलाता था और ब नस्से कुरआन यहूदियत और नसरानियत के मुक़ाबले में था जैसा कि कुरआनि से वाज़ेह है कि इब्राहीम न यहूदी ते न ईसाई बल्कि वह दीने इलाही के पैरो और मुसलमान थे। वह मुशरिकों में से नहीं थे।

हज़रते इब्राहीम ही वह पहले शख़्स हैं जिन्होंने अपने अमल के ज़रिये मेहमान नवाज़ी का दर्स दिया ख़तने का हुकम जारी किया। मूछों और नाखूनों को तरशवाया मिसव़ाक की , बालों को कंघी से संवारा , पानी से नाक और मुंह साफ करना बताया , नवाज़ पढ़ने का कग्म दिया और इसका तरीक़ा बताया। सजदे मुअय्यन किये और पानी से इस्तिनजे का तरीक़ा राएज किया। कुछ मोअर्रेख़ीन ने लिखा है कि आप ने तीशे से अपना ख़तना खुद किया। इस रवायत से मुझै इत्तेफ़ाक नहीं है क्यूंकि इमाम और पैगम्बर ख़तना शुदा नाफ बुरीदा पैदा होता है। हज़रते इब्राहीम को खुदा ने पहले नबी फिर रसूल बनाया इसेक बाद इमामत के मन्सब पर फाएज़ किया।

जिससे यह मालूम होता है कि खुदा की नज़र में इमामत का मन्सब तमाम मनासिब से लन्द है। और शायद यही वजब थी कि जनाबे इब्राहीम ने अपनी नस्ल में इमामत की दुआ भी की थी।

हज़रते इब्राहीम के तबलीग़ी कारनामे

हज़रते इब्राहीम अ 0 के दोर मेंम मुशरेकीन के दरमियान तीन तरहं के शिर्क राएज थे।

1. चांद , सितारों और सूरज की परस्तिश

2. इसनाम परस्ती

3. इन्सान परस्ती

आप ने इन तीनों बातें के खिलाफ खुल कर एहतेजाज किया और बड़े ही हकीमाना अंदाज़ में इन्हें तस्लीम करने से इन्कार किया। चुनान्चे जब रात की तारीकी छायी और सितारा नज़र आया तो प ने फरमाया कि यहब मेरा परवरदिगार है और जब वह ग़ुरूब हो गया तो कहा मैं कुरूब हो जाने वाली चीज़ को पसन्द नहीं करता। फिर चांद को चमकते हुए देखा तो फरमैया कि क्या यह मेरा ख़ुदा है ? जब वह भी कुरुब हो गया तो बोले कि आगर मेरा हक़ीक़ी ख़ुदा मेरी हिदायत न करता तो मैं बी गुमराहों की तरंह होता और जब सूरज निकला तो फरमाया कि यह तो सबसे बड़ा है क्या यह मेरा ख़दा हो सकता है। जब वह भी गुरुब हो गया तो कहा कि ऐ मेरी क़ौम वालों जिन जिन चीज़ों का तुम खुदा समझते हो में इन सब चीजों से बेज़ार हूं यह हरगिज़ ख़ुदा नहीं हो सकते। मेरा खुदा तो बस वही है जो ज़मीनो आसमान का पैदा करने वाला है और मैं मुशरेकीन में से नहीं हूं।

हज़रते इब्राहीम का इन चीजों का खुदा कहना बतौर इस्तेक़हाम और इनकारी के था और क्यूंकि मुशरेकीन में इस वक्त लोग चांद , सूरत और सितारों की खुदायी के कांयल थे और आप काहिन को माकूल करना और दलील के जरिये खुदाये यकता की ख़ुदाई साबित करना मन्जूर था इसलिए यह तक़रीर फरमाई रर यह समझा दिया कि इन चीज़ों में हुदूस व इमकान की अलामत पायी जाती है। क्यूंकि तगय्यूर व हरकत सिर्फ मुमकिन के लिये है लिहाज़ा इनके लिए एक ऐसे ख़ालिक़ की जरूरत है जिसमें किसी क़िस्म का तगय्यूर न पाया जाता हो। और वह न किसी तरंह मजबूर हो जैसे चांद तारे वगैरह और न ही इसकी हुकूमत महदूद हो जैसे नमरूद वग़ैरह। यह खयाल न करना चाहिए कि माज़अल्लाह हज़रते इब्राहीम पहले मुशरिक थे लबकि आपने मुशरेकीन को अक़वाल और नज़रियात को महज़ फ़र्ज करके फिर इसे ग़लत साबित किया।

दूसरी तरंह का शिर्क इस्लाम परस्ती की शक्ल में राएज था। यानी बुतों की परस्तिश और इबादत की जाती थी। यह वह वाज़ेह शिर्क है जिसके मुर्तकिब गिरोह का इस्तेलाही नाम मुशरेकीन हुआ। और यह शिर्क लोगों के दरमियान आज भी कायम है। और इसके खिलाफ जनाबे इब्राहीम ने अपने ही घर से जेहाद शुरु किया।

क्यूंकि आप का चचा (जिसे आप खुद भी बाप कहते थे) और कुरआने मजीद बी बाप ही के लफज़ से याद करता है। बुतपरस्ती का बहुत बड़ा अलमबरदार था। हज़रते इब्राहीम ने आज़र को पहले नर्म लहजे में समझाया कि आप ऐसी चीजों की इबादत क्यों करते हैं। जो न सुन सकती हैं न देखती हैं और न आपको कोई फायदा पहुंचा सकती हैं। यह सिलसिला काफी दिनों तक जारी रहा। और जब आज़र पर इब्राहीम के समझानवे बुझाने का कोई असर न हुआ तो आपका लहजा बदला। और अंदाज़े गुफतुगू में तलखी पैदा हुई।

चुनान्चे आपने फरमाया तुम कुछ बुतों को अपना खुदा बनाये हुए हो। मैं तुम्हें और तुम्हारी क़ौम को खुली हुई गुमराही में देखता हूं जब इस गुफतुगू का भी आज़र पर कोई असर न हुआ तो आपने पूरी क़ौम के दिल में अमली चोट लगाने का एक मन्सूबा जेहन में मुरत्तब किया और इस की तकमील के लिए वह मौक़ा निकाला जब तमाम मुशरेकीन अपनी ईदगाह में कोई मुशरेकाना रस्म अदा करने जा रहे थे। आज़र ने इब्राहीम को भी ले जाना चाहा। मगर आप ने अपनी अलालत का उज्र कर के जाने से इन्कार कर दिया। (इसी का नाम तक़य्या है) और जब सब लोग चले गये तो आपने खाना और थोड़ा खाना और तीशा अपने साथ लेकर मरकज़ी बुत खाने में दाखिल हुए। जहां कसीर तादाद में बुत रके हुए थे।

चुनान्चे आप एक-एक बुत के सामने जाते और इससे कहते कि खाना खाओं और मुझसे बाते करो। जब वह कोई जवाब न देता तो उसका सर और पांव तीशे से काट देते थे। रफता रफता आप ने तमाम बुतों का यही हाल कर दिया और जो सबप से बड़ा बुत था उसेक गले में तीशा लटका कर अपने घर वापस चले आये। जब ईदगाह से रस्म की अदायगीके बाद लोग अपने अपने घर लौटो और बुतों की शिकस्ता हालत देखी तो पूरी क़ौम में कोहराम बरपा हो गया। कुछ लोगों ने कहा कि यह इब्राहीम नाम का एक नौजवान रहता है जो हमारे बुतों को बुरा भला कहता है। यह हरकत इसी की हो सकती है।

ग़र्ज कि कुछ लोगो ने हज़रते इब्राहीम को पकड़ लिया और नमरुद के पास ले गये इससे सा माजरा बयान किया। और कहा कि यह आज़र का भतीजा है इसी ने हमारे बुतों को तोड़ा है। नमरुद ने आज़र को तलब किया और कहा कि तुमनें हमें धोखा दिया जो इसको हमसे पोशीदा रखा कि अब यह जवान हो गया है। आज़र ने कहा कि यह काम दरअस्ल इसकी मां का है जो यह कहती थी कि मैं नमरुद को जवाब दे लूंगी। नमरुद मे जनाबे इब्राहीम की मां को बुलवाया और उनसे पूछा कि तुमने हमसे इस बच्चे को क्यो छुपाया। जबकि बच्चा पैदा होने पर मेरा हुक्म इसकी गर्दनज़दनी का था।

मादरे इब्राहीम ने फरमाया कि ऐ नमरुद मैंने इस बच्चे को इसलिए छुपाया कि लोगों के मासूम बच्चे कत्ल होने से बच जायें जैसा कि तुझे बताया गया है कि तेरी हुकूमत में एक ऐसा बच्चा पैदा होगा जो तेरी तबाही और बरबादी का बाएस होगा। अगर यही वह बच्चा है तो हलाक कर दिया जायेगा। और बाक़ी बच्चे बच जायेंगे। और अगर वह यह नहीं है तो मेरा बच्चा बच जायेगा। यह दलील नमरुद पर कारगर हुई और मादरे इब्राहीम से मज़ीद बाज़ पुरसी के बजाये वह फिर जनाबे इब्राहीम से मुखातिब हुआ और इनसे दरियाफत किया कि क्या तूने हमारे ख़ुदाओं के साथ यह सुलूक किया है कि वब पारा-पारा हो गये। जनाबे इब्राहीम ने फरमाया कि मैं ऐसा क्यों करने लगा। मेरा खयाल है कि यह काम इस बड़े बुत का है जिसकी गर्दन में तीशा लटका हुआ पाया गया है। अगर वह बोलता हो तो खुद पूछ लो। नमरुद इस जवाब पर महबूत रह गया क्योकि यह लतीफ पैराया मैं इसके खुदाओं की आजज़ी और बेबसी की इज़हार था। जो जनाबे इब्राहीम ने कहा इन्सान परस्ती के ज़ैल में नमरुद अपने को खुदा कहलवाता था।

चुनान्चे हज़रते इब्राहीम ने इसके इस गुरुर को भी तोड़ा जब इसने आपसे सवाल किया कि तुम अपना परवरदिगार किसे समझते हो। जवाब दिया कि मेरा परवरदिगार वह है जो जिलाता भी है और मारता भी है। नमरुद ने कहा मैं भी मारता और जिलाता हूं इस तरंह कि किसी बेगुनाह की जान ले ली और एक ऐसे शख़्स की जान बख़्श दी जिसके लिए मौत की सज़ा का हुक्म हो चुका था। हज़रते इब्राहीम ने कहा कि मेरा परवरदिगार सूरज को मशरिक़ से निकालता है। तुम अगर खुदाई का दावा करते हो तो मग़रिब से निकाल दो। वह काफ़िर इब्राहीम की यह बात सुनकर दंग रह गया और खामोशी के अलावा इससे कोई जवाब न बन पड़ा मगर इसके नतीजे में उसका ग़ैज़ और ग़ज़ब जनाबे इब्राहीम के खिलाफ़ बहुत बढ़ गया और उसने लोगों के मशविरे के बाद यह तय किया कि जनाबे इब्राहीम को जिन्दा आग में जला दिया जाये।

हज़रते इब्राहीम क़ैद कर लिये गये और उन्हें आग में जलाने का इन्तेज़ाम किया जाने लगा। पूरी क़ौम ने मिलकर एक माह तक लकड़ियां जमा कीं और फिर उसमें आग देकर मुशतइल किया गया यहां तक कि शोले बलंद होकर आसमान से बातें करने लगे। रवायतों में आग की कैफियत यह बतायी गयी थी कि उसके एतेराफ में तीन मील तक के परिंदे परवाज़ नही कर सकते थे। नमरुद ने अपने लिए एक बहुत ही ऊंचा मुक़ाम तामीर करवाया था ताकि वह वहां से बैठकर हज़रते इब्राहीम का तमाशा देख सके।

अब मसला हज़रते इब्राहीम को भड़कती हुई आग में डालने का था। लिहाजा उसके लिए मिनजनीक़ तैयार किया गया और जनाबे इब्राहीम को ज़ंजीरों में जकड़ कर इस मिनजनीक में बैठाया गया फिर आग में फेंक दिया गया। लिखा है कि जिस वक़्त हज़रते इब्राहीम आग की तरफ चले तो आसमान करवटें लेने लगा और ज़मीन के सीने से एक आवाज़ बलंद हुई कि ऐ परवरदिगार तेरी इस दुनिया में हज़रते इब्राहीम के अलावा तेरी इबादत करने वाला फिलहाल दूसरा कोई नहीं है। क्या तू राजी है कि इन्हें आग में जला दिया जाये। लेकिन हिकमते इलाही ख़ामोश रही और अब तक इसकी कुदरते कामला किसी भी मंज़िल में कुदरते इलाही मज़ाहिम हो जाती तो ज़ालिमों के जुल्म की आख़िरी हद सामने न आती और न ही साबिर के सब्र का पता चलता। फिर ज़ालिमो को यह कहने का मौक़ा फराहम हो जाता कि हज़रते इब्राहीम को जलाने का मक़सूद ही न था हम तो फक़त धमका रहे थे।

लेकिन हज़रते इब्राहीम जब मिनजनीक़ से जुदा हो गये तो इनका इखतेयार की मंज़िल ख़त्म हो गयी। अब अगर ज़ालिम खुद बी चाहता कि हज़रते इब्राहीम आग से बच जायें तो यह खुद भी उसके बस की बात थी। यानि जूल्म की हद तमाम हो चुकी थी। मलाएका ने जब हज़रते इब्राहीम को हवा के दोश पर आग की तरफ बढ़ते हुएअ देखा तो वह भी बेचैन हो गये। और बारगाहे इलाही में यह अर्ज़ करने कि ए परवरदिगार तेरा ख़लील आग में जलाया जा रहा है। तू खामोश क्यों है जवाब मिला कि अगर वह मुझसे मद्द् तलब करेगा तो मैं ज़रुर करूंगा। जिबरईल से सब् न हुआ और कहा कि ऐ परवरदिगार अगर तेरी इजाज़त हो तो मैं तेरे ख़लील की मद्द करने के लिए जाऊं। हुक्म हुआ कि अगरप मेरा ख़लील तुम्हारी मद्द क़ुबूल करे तो ज़रूर जाओ। हज़रते इब्राहीम भड़कती हुई आग से मुत्तसिल होने ही वाले थे कि जिबरईल हाज़िर हुए। उन्होंने कहा या ख़लील अल्लाह क्या आप को मुझसे कोई हाजत तो है मगर तुमसे नहीं और जिससे हाजत है उससे कुछ कहने की जरूरत नहीं आयी और आग को हुक्म हुआ “ यानारोकूनी बरदंव व सलमान अला इब्राहीम ö ऐ आग इब्राहीम के लिए सलामती के साथ बुरूदत अख़तियार कर इस हुक्म के साथ ही आग की फितरत बदली और वह सर्द होना शुरू हुई और इस हद तक सर्द हुई कि हज़रते इब्राहीम के दांत बजनवे लगे फिर वह एतेदाल पर आयी तो वह भड़कते हुए शोले गुलज़ार बने और दहकते हुए अंगारे लाला बन गये।

यहां तक कि इस करिशमें कुदरत को देखकर नमरूद भी बेअख़तियार होकर चीख उठा कि खुदा हो तो ऐसा जैसा कि इब्राहीम का खुदा है। होना तो यह चाहिए था कि रइस मुशाहिदये कुद 0रत के बाद पूरी क़ौम ईमान ले आती। मगर इन बदबखतों के कुर्फ्रो एनाद में कोई कमी नहीं आयी बस मुख़तसर से लोगों ने नमरूद से छिपकर (तक़य्या करके) ईमान कुबूल किया। नमरूद अपनी इस शिकस्त परल मुंह दिखऱाने के क़ाबिल नहीं रह गया था। इसलिये उसने हज़रते इब्राहीम के मामलात में कुछ दिनों तक खामोशी इखतेयार की। जिसके नतीजे में हज़रते इब्राहीम एलानिया तौर पर तबलीग़ के मैदान पर उतर आये ताकि इस क़ौम पर ख़ुदा की तरफ से कोई अज़ाब नाज़िल होने से पहले वह हुज्जत तमाम कर लें। इस वक्त हज़रते इब्राहीम की उम्र 16 साल की थी (तबरी)।

नमरूद का इबरत नाक अंजाम

नमरूद अपनी शिकस्त व नीकामी पर एक साल तक खामोश रहा मगर जब उसने देखा कि हज़रते इब्राहीम अपने मौक़िफ पर अड़े हुए हैं और कारे तबलीग़ तेज़ी से जारी है तब वह बदबख़त जुनून में गिरफतार होकर हज़रते इब्राहीम के खुदा से जंग पर आमादा हो गया। उसने आप को पिर तलब किया और कहा (कुरआने मजीद पारा 17 आयत 5) ऐ इब्राहीम मैं तुम्हारे खुदा से जंग करना चाहता हूं क्या वह मुझसे मुक़ाबले के लिये तैयार है।

हज़रते इब्राहीम ने फरमाया कि क्या तू मेरे कुदा से अपनी शिकस्त का इंतेक़ाम लेना चाहता है। पिर हज़रते इब्राहीम ने बारगाहे इलाही में अर्ज की ऐ खुदा नमरूद तुझसे जंग का ख़वाहिशमंद है। इसे क्या जवाब दूं हुक्म हा कि कहा दो नमरूद अपना लशकर जमा करे। नमरूद ने छः माह में लशकर इकट्ठा किया और जब तमाम तैयारियां मुकम्मल हो गयीं तो वह तीरो कमानों नैज़ों और तलवारों से लैस लशकर लेकर एक मैदान मैं डट गया और हज़रते इब्राहीम को बुलवा कर कहा कि अपने खुदा से कहो कि अपना लशकर लेकर आये।

इज़रते इब्राहीम ने कहा घबराता क्यों है हलाकत के ले मेरा परवरदिगार का लशकर जरूर आयेगा। नागहा मग़रिब की सिम्त से एक घटा उठी जो तेज़ी से नमरूद के लशकर पर मुहीत हुई। लोगों ने देखा तो पता चला कि एक काली घटा सियाह रंग के मच्छरों की एक अजीम फोज है जो अज़ाब की शक्ल में नाज़िल हुई है। नमरूद के सिपाही घबराहट और बौखलाहट में इधर उधर भागने लगे। मगर उन्हें मफ़र कहा एक – एक सिपाही से लाखों की तादाद में मच्छर लिपट गये और उनका खून चुस – चूस कर सब को कैफरे किरदार तक पहंचा दिया। एक मच्छर बाद में आया था इसे खुदा ने नमरूद पर मुसल्लत किया था। जो उसकी नाक के रास्ते से दिमाग में घुस गया चुनान्चे जब वह काटता था तो नमरूद चीख़ने लगता था। और उसे एसी सख़्त अज़ीयत होती थी कि जब तक इसके सर पर जूताकारी नहीं होती थी उसको चैन नहीं आता था। यह सिलसिला 40 साल तक जारी रहा। और रोज़आना जूते खाते खाते अखिरकार वह उसी अजाब में मर गया।

जिलावतनी और हिजरत

हज़रते इब्राहीम कै मुक़बले में नमरूद की यह दूसरी शिकस्त थी जिस पर बराफरोख़ता होकर उसने आपको अपने मुल्क से जिलावतन कर दिया फरमान जिलावतनी के बाद जदनाबे इब्राहीम ने हिजरत का फैसला किया। और अपनी बीवी सारा जो (बक़ौले तबरी) आपके चचा हारान बाज़ मोअर्रेखीन के मुताबिक़ अपकी खाला की साहबजटादी थीं के लिए एक संदूक बनवाया ताकि वह इसमें बैठकर सफर कर सकें फिर आपने अपना सरमाया (पूंजी) और तमाम माल व असबाब (जिसमें ऊंटों , भेड़ों और बकरियों का ग़ल्ला भी शामिल था) लिया और अपने भतीजे हज़रते लूत के साथ ईराक से शाम की तरफ रवाना हो गये। यह तीनों अफराद इस्लाम के पहले मुहाजिर हैं। यह क़ाफ़िया ईरान में कुछ रोज़ मुक़ीम रहा। वहां रोज़ाना शब को ज़लज़ला आता था। जब पहली रात जनाबे इब्राहीम ने इस मक़ाम पर क़याम किया तो यह मुक़ाम ज़लज़ले से महफूज़ रहा। वहां के लोगों ने कहा कि क्या सबब है कि जो आज रात खहर में ज़लज़ला नहीं आया। ज़रूर कोई बुजुर्ग शख़्स हमारे शहर में आया है। दूसरी रात फिर खैरियत से गुजरी। अब लोग आप की तलाश में निकले और जब मुलाक़ात हुई तो लोगों ने कहा कि आप अब इसी शहर में बूद व बाश इख़तेयार करें हम आप की खिदमत करेंगे क्योंकि आपही के क़दमों की बरकत से हमें जलज़ालें से निजात मिली है। आप ने फरमाया कि तुम्हारे इलाके में फिलहाल ठहरने का की इरादा नहीं है। मगर खुदा से यह दुआ करूंगा कि वह आइंदा भी तुम्हारे शहर को जलज़लो से महफूज़ रखे। फिर आप ने वहां दो चार दिन कयाम किया फिर आप मिस्र के ले रवाना हो गये। उस वक़्त मिस्र पर तूलीसनामी फिरऔन की हूकूमत थी। और वह इन्तेहायी नफसपरस्त और इन्तेहायी बदकार था।

जब इसे हज़रते इब्राहीम के आने की ख़बर मालूम हुई और उसके हाशिये बरादरों ने यहं भी बताया कि उनके साथ एक इन्तेहायी हसीन व जमील औरत भी है तो उसने दोनों को अपन दरबार में तलब किया और जनाबे सारा की तरफ इशारा करके हज़रत इब्राहीम से पूछा कि यह ख़ातून तुम्हारी कौन हैं आप ने फरमाया कि यह मेरी बहन हैं। यह एक हक़ीक़तआमेज़ तकंय्या था जिस पर आप ने अमल किया और आप का जवाब इसलिए दुरूस्त था कि जनाबे सारा आप की बीवी होने के अलावा आप की चचाज़ाद बहन भी थीं। तूलीश ने जब जनाबे सारा के हुस्नो जमाल को देखा तो इस पर शैतानी नफ़स का ग़लबा हुआ। चुनान्चे इसने बेइखतेयार होकर अपना हाथ आप की तरफ बढ़ाने का इरादा किया ही था कि कुदरते इलाही ने उसे मफ़लूज (लुंजा) कर दिया।

यह करिशमा देखकर तूलीश का सारा भूत चश्मेज़दन में उतर गया। और वह अपनी इस बेहूदा हरकत पर नादिम हुआ आख़िरकार उसने तौबा की और जनाबे इब्राहीम ने दुआ फरमायी तो उसका हाथ ठीक हो गया। इस वाक्ये के बाद उसको जनाबे सारा की अज़मत का एहसास हुआ। और उसने आप की बड़ी क़द्र और बहन का मरतबा दिया इसके साथ ही ख़िदमत के लिए एक कनीज़ बतौर तोहफ़ा पेश की जिसका नाम हाजरा था। नीज़ काफी नज़राना वग़ैरह देकर इन्हें अपने यहां से रुख़सत किया। यह लोग वहां से शाम की तरफ रवाना हुए और चंद मुक़ामात की रद्दोबदल के बाद हज़रते इब्राहीम जनाबे सारा के साथ फिलिस्तीन में मुक़ीम हुए और हज़रते लूत को उरदुन के नवाही इलाकों में बग़रज़े तबलीग़ भेज दिया यह है इस्लाम के वह इब्तेदायी नुकूश जो मसाएब व आलाम गुरबत और जिला वतनी को अपना सरमायए इफतेखार बनाये हुए थे। इसलिए तो पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया कि इस्लाम का आग़ाज़ ही गुरबत और जिलावतनी से है।

हज़रते इस्माईल कि विलादत और हिजरत

जनाबे हाजरा के लिए परवरदिगार ने यह शरफ मख़सूस कर दिया था कि हज़रते इस्माइल की विलादत उनके बत्न से हो। इसलिए जनाबे इब्राहीम को शाम में रहते हुए एक अरसा गुज़र गया। मगर आप का दामन आरजुए औलाद से अब तक खाली था उम्र ज्यादा हो जाने की वजह से जनाबे सारा भी औलाद की तरफ से मायूस हो चुकीं थीं। चुनान्चे हज़रते सारा ने हज़रते इब्राहीम से कहा कि आप मेरी कनीज़ हाजरा से जो अभी जवान हैं अक़दकर लें शायद इन्हीं के बत्न से खुदा आपको कोई औलाद अता करदे। जो आप की जानाशीन हो।

हज़रते इब्राहीम ने जनाबे सारा की तजवीज़ पर अमल करते हुए जनाबे हाजरा से अक़द फरमाया और इज़जवादी ताअल्लुक़ात क़ायम किये। जिसके नतीजे में हज़रते इस्माइल मुताविल्लद हुए इस वक्त हज़रते इब्राहीम की उम्र 86 साल की हो चुकी थी। हज़रते इस्माइल की विलादत के बाद अद्ल के दायरे में रह कर हज़रते इब्राहीम की मज़ीद और ख़ुसूसी तवज्जे का हज़रत हाजरा की तरफ मबजूल हो जाना और हज़रते हाजरा की तरफ से जनाबे सारा के दिल में रश्क़ व हसद का पैदा हो जाना एक फितरती अमल था जिसका इज़हार इस शक्ल में हुआ कि जनाबे सारा मुसतकिल मख़जून व मग़मूम रहने लगीं और इन्हें यह एहसास परेशान करने लगा कि ख़ुदा ने हाजरा के बदन से इब्राहीम को बेटा अता किया और मेरी गोद खाली रखा।

एक दिन हज़रते इब्राहीम ने जनाबे सारा से हुज़न व मलामत का सबब दरियाफ़त किया तो आपने फरमाया कि कुछ नहीं। बस मैं यह चहाती हूं कि आप हज़रते हाजरा और हज़रते इस्माईल को मुझसे अलाहदा कर दें और कहीं दूर ले जाकर इनके क़याम का इंतेज़ाम करदें। हजरते इब्रहीम जनाबे सारा की मोहब्बत इताअत फरमा बरदियों और कुरबानियों की वजह से इन्हें बहुत चाहते थे क्योंकि वह एक बेहद इताअत गुज़ार और फरमा बरदार बीवी थीं इसके अलावा आप के सर पर इनके एहसानात भी बहुत ज़्यादा थे। शादी के बाद इन्होने अपनी तमाम दौलत और ज़ायदाद हज़रते इब्राहीम को हिबा कर दी थी। मगर इन तमाम बातों के बावजुद मिजाज़े इब्राहीम को मुक्कदस परेशानी पर मागवारी की शिकन उभर आयी और चेहरे पर कबीदा खातिरी के आसार मुरत्तब हो गए। मगर मशीयते इलाही से इस परदे में अज़ीम उम्मत के लिये एक अज़ीम मरकज़ की तशकील व तामील का मुरक्क़ा देख रही थी।

इसीलिए परवदिगार का हुक्म हुआ कि ऐ इब्राहीम सारा की जो ख़्वाहिश है उस पर अमल करो इस हुक्में इलाही के सामने हज़रते इब्रहिम के लिए इसके अलावा कोई चारएकार न था कि वह इसकी तामील फौरी तौरफ् करें चुनान्चे उन्होंने शीरख़्वार इस्माइल को गोद में उठाया और जनाबे सारा को साथ लिया और अपने माबूद पर भरोसा करके घर से निकल खड़े हुए। कहां अर्जे फिलस्तीन कहां सरज़मीने मक्का मगर जिस रहनुमाए मुतलक़ ने जनाबे सारा की ख़्वाहिश पर अमल करने का हुक्म दिया था। उसी की रहनुमाई में आप ने अपना सफर तमाम करके एक ऐसे बेआबोगेयाह मैदान को मंज़िल क़रार दिया जहां न कोई दरख़त था न कोई चश्मा ता न कोई सबज़ा न ग़िजा की फराहमी का की ज़रिया था न वहां पानी की सबील की कोई सूरत।

मुख़तसर यह कि जहां कुछ न था वहां आप ने खुदा की ज़ात पर भरोसा रखने वाली अपनी पाक बाज बीवी और मासूम फरज़ंद इस्माइल को छोड़ा। एक मशक पानी और कुछ खाने का सामान दिया और आसमान की तरफ हाथ बुलंद करके यह दुआ फरमायी कि पालने वाले तेरा खलील अपनी जुर्रियत को तेरे घर के ज़ेरे साया छोड़ कर जा रहा है। लोगों के दिलों को इनकी तरफ मोड़ दे और इनकी हिफाजत फरमा। इसके बाद आप शाम की तरफ वापस पलट गये और कभी इनकी खबर गीरी के लिए आते जाते रहे। इमामे जाफ़रे सादिक़ अ 0 का इरशाद है कि जब आप फिलस्तीन से मक्कए मोअज़्जा का इरादा करते थे तो खुदा वंदे आलम के हुक्म से ज़मीन सिमट जाती थी और आप आनेवाहिद में मककए मोअज़्ज़मा पहुंच जाते थे। दुसरे या तीसरे दिन हज़रते इब्राहीम का दिया हुआ एक मश्क़ पानी जनाबे हाजरा के पास ख़त्म हो गया और हज़रते इस्मिल पर प्यास का ग़लबा हुआ तो आप पानी की तलाश में निकलीं और सफा व मरवा के दरमियान सात चक्कर लगाये जिसकी यादगार मनासिब हज में हमेशां के लिए क़ायम है।

सातवें चक्कर के बाद जनाबे हाजरा थक गयीं और पानी न मिला तो मायूस होकर अपने फरजंद इस्माइल के पास वापस आयीं और कुदरते इलाही का यह हैरत अंगेज़ करिशमा देख कि बच्चे के पैरों तले साफ और शफ़फ़ाफ़ व शीरीं पानी का एक चश्मा उबल रहा है। यही वह चश्मा है जो बाद में आबे ज़मज़म कहलाया। ख़ुश्क ज़मीन से पानी का बरामद होना था कि चारों तरफ से तायरों का झुरमुट अपनी अपनी प्यास बुझाने के लिए वहां जमा हो गया और इन्हीं तायरों की रइनुमाई से इन्सानों का गुज़र भी वहां हुआ और रफता रफता सर जमीने मक्का आबाद होने लगी। दर हक़ीक़त यही दुनिया - ए - इस्लाम के मरकज़े अक़ीदत का संगे लस संगे बुनियाद था जिसकी तारीख़ में भूख प्यास , बेसरो सामानी , संगे बूनियाद था। जिसकी तारीख़ मे भूख प्यास , बेसरो सामानी ,संगे बुनियाद था। जिसकी तारीख में भूख प्यास गूरबत सब ही चीजें नुमाया तौर पर नज़र आती हैं।

हज़रते इसहाक़ की विलादत

जनाबे सारा की उम्र 60 साल की हुई तो जिबरईल ने उन्हें यह खुशखबरी सुनाई कि खुदावन्दे आलम आप को एक फरज़न्द अता करने वाला है यह सुनकर जनाबे सारा को सख़्त हैरत हुई और आपने जिबरईल से फरमाया कि अब मैं बूढ़ी हो चुकी हूं और औलाद पैदा करने की तमाम सलाहियतें दम तोड़ चुकी हैं। किसी फरज़ंद का अब क्या सवाल है। जिबरील ने कहा यह कादिरे मुतलक़ का हुक्म और अम्रे इलाही है इसीलिए यक़ीनन ऐसा ही होगा। जिब्रईल की इस यक़ीन दहानी के चन्द दिनों के बाद मसलहते एज़दी ने करवट ली और जनाबे साराह को हैज़ जारी हुआम मुद्दत खत्म हुई तो आप हामला हुई और जनाबे इस्हाक़ 10 माह 3 दिन शिकमे मादर में रहकर दुनिया में तशरीफ़ लाये। इमामे जाफरे सादिक़ अ 0 ने फरमाया है कि सारा से पहले दुखतराने अम्बिया हैज़ से मुस्तसना थीं। क्योंकि हैज़ उकूबत में दाखिल है हज़रते इस्हाक़ अपने वालिद हज़रते इब्राहीम से इस क़द्र मुशाबेह थे कि बाप और बेटे के दरमियान इम्तेयाज़ मुश्किल था। इसलिए खुदा ने हज़रते इब्राहीम के दाढ़ी के बालों को सफेद कर दिया ताकि दोनों में फर्क़ पैदा हो जाये।

हज़रते इस्माईल की कुरबानी

हज़रते इब्राहीम की तरफ से खुदा की बारगाह में पेश की जाने वाली तमाम कुरबानियों में हज़रते इसमाइल की कुरबानी वह अहम व अज़ीम कुरबानी है जिसका ज़िक्र खुसूसियत के साथ क़ुरआने मजीद में मौजूद है। और जिसका इजमाल यह है कि हज़रते इब्राहीम ने ख़्वाब में देखा कि वह अपने बेटे को ज़िबह कर रहे हैं। यह हुक्मे इलाही क्योंकि ख़्वाब की हालत में मौसम हुआ था। और इसकी सूरते वही इल्हाम या ग़बी आवाज़ की न ती। इसलिए जनाबें इब्राहीम ने उस दिन कोई क़दम नहीं उठाया।दूसरी रात फिर यही ख़वाब देखा और वह दिन भी तरद्दुद और कश्माकश मैं गुज़र गया। तीसरी रात को बैनहू फिर वही ख्वाब देखा तो आपने महसूस किया कि हुक्म की तामील ज़रूरी है। आपने अपने बेटे इस्माइल से फरमाया ऐ बेटा मैं बराबर यह ख़्वाब देख रहा हूं कि मैं अपने हाथों से तुम्हें ज़िब्ह कर रहा हूं। तो बेटे ने भी फरमाया कि बाबाजान जो आपको हुक्म हो रहा है उस पर आप अमल कीजिये इन्शाअल्लाह आप मुझे साबेरीन में पायेंगे।

जब जनाबे इब्रहीम ने अपने फरजोद का यह अज़्म और इरादा देखा तो बीबी हाजरा के पास आये और उनसे फ़रमाया कि मुझे एक छुरी और रस्सी देदो। बीबी हाजरा ने मतलूबा चीजें फराहम कर दीं। और यह दोनों बाप बेटे घर से निकल खड़े हो गये। एक मख़सूस मक़ाम पर पहुंच कर हज़रते इब्राहीम ने अपनी क़बा ज़मीन पर बिछाई और जनाबे इस्माईल को उनकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ हाथ पैर बांध कर पेशानी के बल पर लिटा दिया। इसके बाद आपने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली ताकि बेटे के ज़िबह होने और तड़पने का मंज़र न देख सकें पिर आपने इस्माइल की पुश्ते गर्दन पर छुरी रखकर उसे पूरी कूपत से चलाना ही चाहा था कि हुक्में इलाही सो जिबरईन ने छुरी पलट दी दूसरी बार फिर यही हुआ क्योंकि निगाहे कुदरत जनाबे इस्माइल की नस्ल में एक बड़ी कुरबनी का मुरक़क़ा देख रही थी और इब्राहीम के ख़्वाब की ताबीर इसी कुरबानी अज़ीम में मस्तूर थी। इसलिए हूक्म की तामील के साथ – साथ हज़रते इस्माइल को बचाना भी मक़सूद था। चुनान्चे तीसरी मरतबा हज़रते इब्राहीम ने जब छुरी फेरी तो हज़रते इस्माइल बचाने गये और इनकी जगह दुमबा जबह हो गया।

हज़रते इब्राहीम ने आंखों से पट्टी हटायी तो यह देखकर हैरान हो गये कि हज़रते इस्माइल सजदए शुक्र में और इनकी जगह मजबूह दुम्बा पड़ा हुआ है। आपदम ब खुद खड़े थे कि निदा आयी ऐ इब्राहीम तुमने अपना ख्वाब सच कर दिखाया। हम नेकी करने वालों को जज़ाए ख़ैर देते हैं (कुरआने मजीद सूरए सफ़ात आयत 108) और हमने इस कुरबानी का फिदया ज़बहे अज़ीम यानी एक बड़ी कुरबनी को क़रार दिया जो इस्माइल की नस्ल में मुज़मर है और ऐ इब्राहीम हमने तुम्हारे दरजात बुलन्द करके तुम्हें इमाम बना दिया। इब्राहीम ने अर्ज की परवरदिगार क्या यह मंसब मेरी लाद को बी अता होगा इरशाद हुआ कि हां मगर जो ज़ालिम होंगे वह इस मंसब से महरुम रहेंगे।

जब जनाबे हाजरा को अपने बेटे की कुरबानी का हाल मालूम हुआ और उन्होंने इस्माइल की गर्दन पर छुरी का निशान देखा तो वह बेहद ग़मग़ीन हुई और इनके दिल में यह ख़्याल पैदा हा कि अगर दुम्बा न आता तो मेरा बच्चा इस्माइल ज़बहा हो जाता चुनान्चे वह इस ग़म में बीमार हुई और फिर इस दुनिया से रेहलत कर गयीं।

अहले किताब यहूदी व नसारा इस म्र के दावेदार हैं कि हज़रते इब्राहीम ने अपने ख़्वाब की बिना पर जो कुरबानी अल्लाह की बारगाह में पेश की वह हज़रते इस्माइल की न थी बल्कि हज़रते इस्हाक़ की थी। मगर कुरआन और बाईबिल के सायाक़ओ सबाक़ से इस बात की वज़ाहत होती है कि वह हज़रते इस्माइल ही थे। दराएत भी इसकी ताइद में है इसले कि अगर यह वाक़ेया जनाबे इस्हाक़ से मुताल्लिक़ होता तो उसकी यादगार बनी इस्राइल में नज़र आती। क्योंकि हज़रते इस्हाक़ बनी इस्रइल के मूरिसे आला थे। मगर इनकी मज़हबी रवायात में किसी क़िस्म की कोई यादगार इस वाक़ये से मुताल्लिक नहीं मिलती। बरख़िलाफ इसके कि औलादे इस्माइल में इस वाक़ये अज़ीम की यादगार क़ायम है जो आज तक ईदुलअज़हा और मनासिके हज के मौक़े पर कुरबानी की शक्ल में मनायी जाती है।

उमर इब्ने अब्दुल अज़ीज ने अपने दौर में यहूदी आलिम से यह दरियाफ़त किया कि हरज़ते इब्राहीम ने हज़रते इस्माइल की क़ुरबानी पेश की यी हज़रते इस्हाक की उसने कहा कि अहले किताब (यहूदो व नसास) के उलमा क इस बात का यकीन है कि ज़बहीउल्लाह हज़रते इस्माइल हैं मगर रश्क व हसद की बिना पर वह लोग यह चाहते थे कि यह फ़ज़ीलत इनके जद के लिये साबित न हो और तुम्हारे जद के लिये साबित न हो (हयातुल कुलूब जिल्द 1 सफा 280)

खानए काबा की तामीर

जब हज़रते इस्माइल ने सिने बुलूग़ की मन्जिलों में क़दम रखा को परवदिगार ने हज़रते इब्राहीम को हुक्म दिया कि तुम और इस्माइल मिल कर ख़ानए काबा की तामीर करो।

ख़ानाए काबा की तामीर दरहक़ीक़त मुसलमानों और दीने इस्लाम के एक मुक़द्दर मरकज़ की तामीर थी जो तमाम आलमीन के लिए सरमायए निजात नीज़ बनस्से कुरआन अल्लाह का घर है। ग़र्ज़ दोनों बाप बेटे इस तामीर में मसरुफ हुए। हज़रते इब्राहीम मेमारी कर रहे थे और हज़रते तामी में मसरुफ हुए। हज़रते इस्माइल मज़दूर का काम अंजाम दे रहे थे। हालांकि क़बीलए जुरहम के लोग मक्के में कसरत से आबाद हो चुके थे और मज़दूरों की कमी न थी मगर शायद खालिक़ को यही मन्जूर था कि उसका घर हज़रते इब्राहीम और हज़रते इस्माइल के मुताबिक हाथों से बने यही वह मौक़ा था कि जब हज़रते इब्राहीम इस्माइल की मदद से ख़ानए काबा की दीवारें ऊंची करते जाते थे और अपने ज़ुर्रियत के लिए इस्माइलपर बरक़रार रहने की दुआ करते जाते थे जिसका ज़िक्र इब्तेदा में हो चुका है।जब खानए काबा की तामीर मुकम्मल हो गयी तो जनाबे इब्राहीम को हुक्म हुआ कि अब तुम हज का ऐलान करदो चुनान्चे आपने ऐलान फ़रमाया और लोगों को हज्जे बैतुल्लाह की दावत दी। इस दावत मे कुछ ऐसी तासीर थी कि तमाम अरब में ख़वाह वह मोमिन हों या काफ़िर ससे मुताअस्सिर हुए बग़ैर न रह सका यहां तक कि जब हुजूरे खत्मी मरतबत स 0 मबऊस ब रेसालत हुए तो उसी वक़्त अरब का मआशेरा नमाज़ रोज़ा , ज़कात ,और दीगर दीनी फराएजी की अदायगी से बेगाना था। मगर हज की रस्म उस वक्त बी कायम थी।

हज़रते इब्राहीम की रेहलत

हज़रते इब्राहीम उलुलअज़म पैग़म्बर थे और आप का लक़ब ख़लीलुल्लाह था और खुदा की बाहगाह में आप का यह मरतबा था कि हज़रत रसूलउल्लाह स 0 को आप की शरीयत को कायम रखने का हुक्म हुआ। 175 साल की उम्र में जब आपने इस दुनिया से रेहलत की और कुदसे जलील में दफन किये गये।

हज़रते इस्माइल और इस्हाक़ का मुख़तसर तअर्रुफ

हज़रते इस्माइल

हज़रते इस्माइल हज़रते इब्राहीम की दुआ से मुतावल्लिद हुए आप अपने वालिदे बुजुर्गवाल की शरीयत पर गामज़न थे और इसी की तब्लीग़ करते ते आप का तब्लीग़ी दायरए कार तमाम हेजाज़ यमन और बैरूत तक फेला हुआ था आपनै अपनी शादी क़बीलए जुरहम में रमला नामी एक दोशीज़ा से की थी जिसके बत्न से ख़ुदा ने आप को बारह बेटे अता किये जो सब के सब सरदारी के ओहदे पर फाएज़ थे। इन औलादों की औलादों इस कसरत से हुई कि ज़मीने मक्का सुकूनत के मामले में इनके लिए तंग हो गयी और बहालते मजबूरी इन्हें दूसरे शहरों में आबाद होना पड़ा। अरब की तारीख़ , अरबों को तीन हिस्सों में तक़सीम करती है। पहला हिस्सा जो यमन की नस्ल योरा बिन कहतान से था अरबे आलेबा कहलाया इसमें क़बाएले आद व समूद तसम व जदलीस और जुरहुम ऊला थे। इनका कुफ्र व ऐलान जब हद से ज़्यादा बढ़ गया तो यह अज़ाबै इलाही का शिकार हुए। इसलिए इनको क़बाएले वाएदा (नेस्त व नाबूद शुदा क़बीला) कहा जाता है कि दूसरा हिस्सा अरबे मुताअर्रबा कहलाया यह वह थे जो अरबे आरेबा से अज़दवाजी रिशतों कै साथ मुन्सलिक हुए इऔर फिर इनि औलादों में अरबी ज़बान में नशोनुमां पायी चाहे ज़मज़म के नमूदार होने पर क़बीलए जुरहम जो सरज़मीने मक्का पर कर आबाद हुआ इन्हीं क़बाएल में था और इन्हें जुरहमें सानीया कहा जाता है।

जनाबे इस्माईल ने इसी क़बीले में नशोनुमा पायी। इसीलिए इब्तेदा ही से प की ज़बान अरबी थी। फिर आप ने इसी क़बीले में शादी भी की इसलिए आपनकी औलादों की भी मादरी ज़बान अरबी हुई। यह क़ौम तीसरें हिस्से पर मुश्तमिल थीं जो अरबे मुस्तअर्रबा कहलाया अपब का मुस्तक़बिल प वेक़ार दुनिया में क़यामत तक के लिए इसी अपने मुस्तहर्रबा से वाबस्ता हुआ। अरबे आरेबा पहले ही फ़ना हो चुके थे।

अरबे मुस्तहर्रबहा की नस्लें मुम्किन हों कि सहरायी क़बाएल में हों। मगर तारीख़ मेंम उनका कोई नामों निशान नहीं मिलता। अलबत्ता तमाम आलम में जो अरब के इज़्ज़त व इफतेख़ार के अलम बरदार हैं वह आले इस्माइल ही हैं। जो दुनिया भर में फैले हुए हैं। यह ख़ुदा का वह लवादा है जो उसने इब्राहीम् से नस्ले इस्माइल के बारे में किया था कि मैं उनकी नस्ल में बरकत दूंगा और इनमें बारह सरदार क़रार दूंगा इस वायदे का ज़िक्र तौरैत में सफरे तकरीन बाब 17 में भी है हज़रते इस्माइल के बोटों मैं कीदार की नस्ल बहुत फली पूली और हिजाज़ में आबाद हुई यही पैग़म्बर इस्लाम के मूरिसे आला हैं। जनाबे इस्माइल का आबाद होना ख़ानए काबा ज़मज़म का बरामद होना मक्कए मोअज्ज़मा का आबाद होना ख़ानए काबा की तामीर होना मनासीके हज का जारी होना 10 ज़िल्हिज्जा को तमाम दुनिया के मुसलमानों मैं रस्में कुरबानी का क़ायम होना वग़ैरह शामिल है आप ने अपने वालिदे बुजुर्गवार की मौजूदगी में 133 साल की उम्र में इन्तेक़ाल फरमाया।

हज़रते इस्हाक़

हज़रते इस्हाक़ हज़रते ब्राहीम की पहली बीबी जनाबे सारा से स वक्त पैदा हे जब उनकी उम्र 70 साल की हो चुकी थी। क़ुरआने मजीद में आप से मुताअल्लिक़ की सा वाक़या नहीं मिलता जिसे तारीख़े इस्लाम का जुज़ क़रार दिया जाये। अलबत्ता तौरैत में कुछ वाक़ेयात मज़कूर हैं जो हर ऐतेबार से नाक़बिले कुबूल हैं। आपके वालिद हज़रते इब्राहीम ने शाम में आपके अपना जानशीन मुक़र्रर किया था तबरी का कहना है कि जब हज़रते इस्माइल की रेहलत का ज़माना क़रीब आया तो उन्होंने भी आप ही को अपना जानशीन क़रार दिया और अपनी बेटी की शादी आप के बेटे ऐस से की इससै वाज़ेह होता है कि इस्माल और इस्हाक़ के दरमियान ताअल्लुक़ात नेहायत खुशगवार थे और दोनों भाई सुकूनत की बिना पर बहुत दूर होने के बावजूद एक दूसरे के दिल के बहुत क़रीब थे।

हज़रते इस्हाक़ की शादी जनाबे इब्राबीम के चचा आज़र की पोती रफक़ा बिनते नाहेरा से ही जिनके बत्न से दो लड़के याकूब , इस्रिल और ऐस पैदा हुए याकूब की औलादें बनी इस्रिल कहलायीं। ऐस सुर्ख रंग के थे इनका एक बेटा रोम नामी पैदा हुआ जिसका रंग ज़र्द था इस वजह से औलाते रोम बनी असग़र कहलायीं चुनांचे जितने रोमी हैं वह सी रोम और इसके भाइयों की औलादें हैं। इस्हाक़ ने बरस की उम्र में रेहलत की और अपने वालिद हज़रते इब्राहीम की कब्र के पास दफ़न किए गए।