तारीख़े इस्लाम भाग 1

तारीख़े इस्लाम  भाग 10%

तारीख़े इस्लाम  भाग 1 लेखक:
कैटिगिरी: इतिहासिक कथाऐ

तारीख़े इस्लाम  भाग 1

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

लेखक: जनाब फरोग़ काज़मी साहब
कैटिगिरी: विज़िट्स: 3741
डाउनलोड: 431

कमेन्टस:

तारीख़े इस्लाम भाग 1
खोज पुस्तको में
  • प्रारंभ
  • पिछला
  • 13 /
  • अगला
  • अंत
  •  
  • डाउनलोड HTML
  • डाउनलोड Word
  • डाउनलोड PDF
  • विज़िट्स: 3741 / डाउनलोड: 431
आकार आकार आकार
तारीख़े इस्लाम  भाग 1

तारीख़े इस्लाम भाग 1

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

हज़रते लूत अ 0

हज़रते लूत , हज़रते इब्राहीम के हक़ीक़ी भतीजे और उन पैग़म्बरों में ते जो ख़नता शुदा पैदा हुए। इराक़ से हिजरत और फिलिस्तीन में क़याम के बाद हज़रते इब्राहीम ने आपको रदुन के नबाही इलाकों में तब्लीग़ पर मामूल किया था। जहां उन्हें एक एसी बदआमाल और सरकश क़ौम से सावेक़ा पड़ा जो नफ़सानी ख़्वाहिशात की तनमील। (लवायता) यानी इग़लामबाज़ी के ज़रिये किया करती थी। मर्दों के अलावा इस क़ौम की औरतें बी अपने नफस की तस्कीन के लिये बाहम चिपटी लड़ाया करती थीं। जिन शहरों में यह क़ौम आबाद ती वह सदूम और सैदूम लुदना और उमरिया के नाम् से मशहुर थे। जनाबे लूद ने उनकी इस्लाह और हिदायत में कोई दक़ीक़ा उठा नहीं रखा। मगर उनकी तालीमात और हिदायात का इस क़ौम की तरफ से जवाब यह मिला कि उन्होंने आपस में यह तय किया कि लूत को संग सार कर दिया जाये। या पिर इन्हें शहर से बाहर निकाल दिया जाये क्योंकि यह पारसायी का दर्स देते हैं और बदफेलियों में हमारे साथ शिरकत नहीं करते।

क़ौमे लूत में लवाता (एग़लाम) की इब्तेदा कब और कैसे हुई

इस ज़ैल में अल्लामा मजलिसी र 0अ 0 ने अपनी किताब हयातुल क़ुलूब जिल्द अव्वल में इमामे बाक़िर अ 0 का एक क़ौल नक़्ल किया है। जिसका खुला 4सा यह है कि इसं शर्मनाक फेल के इरतेकाब से पहले यह क़ौम शराफ़त और नेकियों की तरफ माएल थी और इनकी तमाम खूबियों में एक खूबी यह भी थी कि जब यह किसी काम से कहीं जाते थे तो सारे मर्द एक साथ मिल कर जाते थे। और अपने घरों में अपनी औरतों को तनहा छोड़ जाते थे।शैतान इन्हें गुमराह करने में रात दिन फिक्र में लगा रहता था और नई – नई तरकीबें सोचा करता था। चुनान्चे एक मौक़े पर औरतों की तनहायी से उसने फायदा उठाया और एक खूबसूरत औरत का भेस बदल कर इसने कुछ मस्तूरात को चिपटी के ज़रिये लुत्फ अन्दोज़ होने की तालीम दी। फिर वह उनकी ज़राअतों की तरफ मुतावज्जे हुआ और इन्हें नुक़सान पहुंचाने की ग़रज़ से उसने हरे भरे खेतों और बागों को तहस नहस करना शुरू किया। जब कभी उस क़ौम के अफराद शहर के बाहर जाते तो वह उनकी इमलाक को तबह व बरबाद करता।

यहां तक कि लोग आजिज़ व परेशान हो गये तो उन्होने आपस में यह मशविरा किया कि जो शख़्स हमारे बाग़ों व खेतों को नुक़सान पहुंचाता है उसकी ताक में रहना चाहिए। चुनान्चे वह लोग ताक में लग गये आख़िरकार एक दिन एक इन्तेहायी हसीन न जमील और ख़ुबसूरत लड़के को गिरफ़्तार किया और उससे पूछा कि क्या तू वही है जो हमारे खेतों और बाग़ों को तबाह करता है। उसने इक़रार किया तो सबों की राय इस अम्र पर मुत्तफ़िक़ हुई कि इसे क़त्ल कर दिया जाये। चूंकि शाम ढल चुकी थी और रात अपनी जवानी की तरफ बढ़ रही थी। लिहाज़ा क़त्ल का मामला दूसरे दिन पर रखा गया और उस लड़के को एक शख़्स की निगरानी और सुपुदर्गी में रात भर के लिए दे दिया गया।

वह शख़्स उसको अपने घर ले आया और जिस कमरे में खुद सोता था और उसी में लड़के का इऩ्तेजाम भी कर दिया ताकि वह नजरों से ओझल न होने पाये। जब रात काफी गुज़र चुकी थी और तमाम घर के लोग सो गये तो लड़के ने फ़रियाद शुरु की और कहा कि मेरा बाप हर शब मुझकों अपने पेट पर सुलाता था इसलिए मुझे नींद नहीं आ रही है। उस शख़्स ने कहा यह बात है तो मेरे पेट पर सो जा लड़का उसके पेट लेट गया और रफता रफता इसने कुछ ऐसी हरकतें कीं कि उसने इस शख़्स को अपने साथ बदफेली पर आमादा कर किया और पूरी रात दोनों लवाएता से लुत्फ़अन्दोज़ होते रहे। यह लड़का दरहक़ीक़त शैतान था जो सुबह होने से पहले ही गायब हो गया। सुबह हुई तो वह शख़्स अपनी क़ौम के लोगो से मिला और उसने रात का माजरा और लवाता की लज्जत और कैफ़ियत से इन्हें आगाह किया जिसे उन्होंने बेहद पसन्द किया और इसी दिन से यह फेले क़बीहा इनके शरस्त में दाख़िल हो गया। अल्लामा मजलिसी की इस रवायत से यह बात वाज़ेह भी होती है कि इन्सान पर जब गुमराही और नफ़सानी ख़्वाहिशात का भूत सवार होता है तो वह शैतान को भी नही छोड़ता। बहर हाल रफता रफ़ता नौबत यहां तक आगयी जो मुसाफ़िर इनके शहर की तरफ़ से गुज़र जाता था तो उसे यह ज़ेर कर देते थे और वह अपनी बचाने में कामयाब न होता था।

लवाता के अलावा इस क़ौम के लोगों में जो आदतें नुमायां थी वह यह थी कि ( 1) यह लोग जरुरत स ज्यादा मन्हूस और बख़ली थे। ( 2) गुरूर की बिना पर इस कद्र लम्बा लिबास पहनते थे कि वह चलते वक़्त ज़मीन पर ख़त खैंचता था। ( 3) अज़राहे तकब्बुर अपने पैरहन और क़बा के बटन खुले रखते थे।( 4) महफ़िलों में एक दूसरे के मुंह पर रियाह सादिर करते थे। ( 5) लोगों के सामने एलानिया एग़लामबाज़ी करते थे। ( 6) ग़ुस्ले जनाबत नही करते थे। ( 7) पैशाब करके पानी नही लेते थे। ( 8) पैखाने के बाद आबदसत नही लेते थे। वग़ैरह जनाबे लूत ने मुसलसल तीस बरस तक इस क़ौम को राहे रास्त पर लाने की अनथक कोशिशें की लेकिन आप की तब्लीग़ी कोशिशों का कोई असर न हुआ।

बिलाआखिर मायुस होकर आपने बहालते मजबूरी इस क़ौम पर अज़ाब की ख़ुदा से इल्तेजा की। परवरदिगार ने चार फरिश्तो को अज़ाब के लिए मामुर किया। जिसके सरबराह हज़रते जिबरईल थे। यह चारो फरिश्ते खूबसूरत लड़को की शक्ल मे हज़रते लूत के पास इस वक्त पहुंचे जब वह शहर से बाहर अपने खेतों और बाग़ों की आब पाशी कर रहे थे और शाम हो चुकी थी। जनाबे लूत ने इन्हे हैरत से देखा और पुछा की आप लोग कौन हो और किस मक़सद से यहां आये है। उन्होने कहा कि मुसाफिर है चुंकि शाम हो चुकी है इसलिए आज की रात हम लोग आप के यहां क़याम करना चाहते हैं और आप के मेहमान होना चाहते हैं। जनाबे लूत ने फरमाया की तुम्हारी मेहमानी मुझे मन्ज़ूर है लेकिन इस बात से भी तुम्हें आगाह कर देना चाहता हुँ कि इस शहर के लोग इन्तेहायी सरकश और बद किरदार हैं मेहमान को मायुब समझते हैं और उन्हे लूट लेते हैं और लड़कों और मर्दो से बदफेली किये बग़ैर उन्हे नही छोड़ते मेरी समझ मे नही आता कि किस तरह तुम लोगों को अपना मेहमान बनाऊँ। फरिश्तो ने कहा रात ज्यादा हो गयी है आज तो हम आप ही के मेहमान होंगे।

ग़र्ज़ की जनाबे लूत इन लोगों को अपने घर लें आये और जब घर के अन्दर सब लोग दाखिल हो गये तो जनाबे लूत ने अपनी ज़ोजा को (जो उसी क़ौम की थी) और जिसकी ज़ात से जनाबे लूत को यह खतरा था कि कंही वह इन मेहमानों के आने की ख़बर अपनी क़ौम वालों को न दे दे। अपनी ज़ौजा को अलग बुलाया और उससे कहा कि इन मेहमानों को आने की ख़बर किसी को न होने पाये अगर तूने मेरा कहा माना तो मै तेरी गुज़शिता नाफ़रमानियों को माफ कर दुंगा। उसने कहा बेहतर है। ऐसा ही होगा लेकिन जब हज़रते लूत मुतमईन हो कर मेहमान की मेहमान नवाज़ी की तरफ मुताव्वजे हो गये तो उनकी ज़ौजा ने मेहमानों की आमद की खबर अपनी क़ौम वालों को कर दी। नतीजा यह हुआ की जनाबे लूत का घर चारो तरफ से घेर लिया गया। मुहासेरीन का मुतालेबा था कि मेहमानों को हमारे हवाले कर दिया जाये ताकि हम अपना शौक़ पुरा करें।

जनाबे लूत ने फरमाया कि हमारी पाको पाकीज़ा लड़कियां तुम्हारे लिए काफ़ी है। खुदा के कहर से डरो और मुझे ज़लील (हमारी लड़कियों से मुराद क़ौम की लड़किया हैं क्योकि हर पैग़म्बर अपनी उम्मत के लिए बाप के मसावी होता है।) व रुस्वा न करो लेकिन वह लोग न मानें और जनाबे लूत की कोई बात सुननें के बजाय शिद्दत पर उत्तर आये तो आपने बेबसी के आलम में खुदा की बारगाह में फरियाद की और कहा कि पालने वाले तू देख रहा है कि मेरी क़ौम मेरे उपर कहां तक मुझ पर जुल्म कर रही है। काश मुझे भी कूवत हासिल होती तो मैं भी इन ज़ालिमो को जवाब देता। यह सुन कर जिबरईल ने कहा कि ऐ लूत आपको मालूम होना चाहिए कि आप के साथ खुदा की बहुत बड़ी ताक़त है। फरमाया वह क्यो कर जिबरईल ने कहा मै जिबरईल हुँ और मेरे साथ तीनो लड़के भी जो इस वक्त आप के मेहमान हैं फरिश्ते हैं हम लोग इस कौम पर अज़ाब के लिए आये हैं लूत ने फरमाया कि फिर देर किस बात की है।

जिबरईल ने कहा कि नुज़ूले अज़ाब के लिए सुबह का वक्त मुअय्यन है। उस वक्त का इन्तेज़ार कीजिये। अभी यह बात हो ही रही थी कि यह लोग लूत के घर का दरवाज़ा तोड़ कर घर के अंदर दाखिल हो गये। बस इनका दाखिल होना था कि जिबरईल ने अपने परों को जुम्बिश दी जिसकी हवा से सबके सब अन्धे हो गये। जैसा कि कुरआन ने कहा कि हमने उन्हे अन्धा कर दिया क्यूकिं इन लोगों ने नाजायज़ फेल की ख्वाहिश की थी। बीनायी जाने के बाद वह एक दुसरे पर गिरते पड़ते भागने लगे और तमाम शहर में यह खबर फैल गयी कि लूत ने जिस आज़ाब की खबर दी थी खुदा की तरफ से इसकी इब्तेदा हो चुकी है।

अल्लामा मजलिसी हयातुल कुलूब में रक़म तराजड हैं कि क़ौमे लूत मे एक शख्स काहिन व आलिम भी था जब उसे सारा हाल मालूम हुआ तो उसने कहा कि बेशक यह वही अज़ाब है इससे बचने की सूरत सिर्फ यही है कि तुम लोग हजडरते लूत के घर का मुहासेरा कर लो। ताकि वह यहां से निकल कर जाने न पायें इस लिए कि जब तक वह तुम्हारे तहमियान रहेंगे। खुदा की तरफ से अज़ाब का नुजूल नही होगा। गर्ज़ कि पूरी क़ौम यकजा हुई और सभी ने मिलकर दुबारा हज़रते लूत का घर घेर लिया जब निस्फ शब गुज़री तो जनाबे लूत से जिबरईल ने कहा कि आप अपने घर वालों को यहां से लेकर निकल जाइये। तो हज़रते लूत ने फरमाया मैं किस तरह जाऊं चारों तरफ तो मुहासेरा है।

फिर जिबरईल ने मुहासेरीन और जनाबे लूत के दरमियान नूर का सुतून क़ायम किया और फरमाया कि इसी सुतूने नूर के सहारे आप निकल जाइये। आपको कोई न देख सकेगा। मगर शर्त यह है कि आप मे कोई शख्स पीछे मुड़ कर न देखे। मुखतसर यह कि जनाबे लूत अपने घर वालों के साथ निकले और जिबरईल के बताने के मुताबिक़ एक तरफ रवाना हो गये। अभी थोड़ी ही दूर गये होंगे कि लूत कि बीवी ने जो उनके हमराह थी पीछे मुड़ कर देखा उसका मक़सद दरअसल यह था कि अपनी क़ौम वालों को हज़रते लूत के जाने की इत्तेला कर दें। नागहा उस पर आसमान से एक पत्थर गिरा और वह वहीं ढेर हो गयी।

इसके बाद जब खुदावंदी अज़ाब का मुअय्यन वक्त क़रीब आया तो हज़रते जिबरईल ने अपने साथी फरिश्तों कीमद्द से अपना काम इस तरह शुरु किया कि क़ौमे लूत की आबादी वालें चारों शहरों को ज़मीन की तह से उठा कर इस कद्र बलंद किया कि अहले आसमान को अरबाबे लवायता और उनके जानवरों की आवाज़े सुनाई देने लगीं जो चीख व चिल्ला रहे थे।

फिर जिबरईल ने इन शहरों को इस तरह पलटा दिया कि पूरी क़ौम धरती में समा गयी और आबादी का वुजूद सफए हस्ती से मिट गया जो लोग इस शहरों से बाहर थे उन पर आसमान से पत्थरों की बारिश हुई जिससे वह लोग भी हलाक हो गये। इन वाक़ेयात का ज़िक्र करते करते हुए परवरदिगार ने क़ुरआने मजीद में इरशाद फरमाया है कि हमने क़ौमे लूत की बस्ती के ऊपरी हिस्से को ज़मीन के नीचे का हिस्सा कर दिया। और आसमान से पत्थरों की बारिश की। ( 1) क़ुरानें मजीद बारहवां पारा आयत न 0 7 (2) तारीखें तबरी जिल्द पहली सफह 187 यह वाक्या हज़रते आदम अ 0 के 3422 साल के बाद बयान किया जाता है।

जुलक़रनैन का वाक़ेया

तारीख़ी और पुरानी सराहतों से यह पता चलता है कि रूम के शहंशाह अयास या अब्दुल्ला बिन ज़हाक़ बिन माद का लक़ब जुलक़रनैन और सिकंदर था इस अम्र में उलमा के दरमियान इख़तेलाफ हे कि आप पैग़म्बर थे या नहीं बेशतर का यह कहना है कि आप पैग़म्बर नहीं थे। मगर आप के खुदा परस्त और मुक़र्रेबए बारगाह होने से इन्कार नहीं किया जा सकता।

इसमें शक नहीं कि आप क नेक तीनत नेक ख़सलत और पाकबाज़ इन्सान थे आप का दिल बचपन ही से नूरे इमान से रौशन व मुनव्वर था शायद यही वजह थी कि इबतदा में आपने तबलीग़ का रास्ता अपनाया और अपनी कौम के लोगों को नेकियों और ख़दापरस्ती की तालीम देने लगे चुनान्चे एक दिन कारे हिदयत की अन्जाम देही के दौरान कुछ शरपसन्दों ने आप के दाहिनी तरफ एक ऐसी ज़रब लगायी कि आप जांबहक हो गये और सौ साल एक दूसरी रिवायत के मुताबिक पाँच सौ साल तक मौत की नींद सोया किये इसके बाद मशीयते खुद ने फिर आप के सर पर बाएँ तरफ ज़र्ब लगायी और आप सौ साल तक फिर मिर्दा पड़े रहे यहाँ तक कि खुदा ने आप को फिर जिन्दा किया और सर के ज़ख्म खुर्दा दोनों हिस्सों में सीगों की जड़ की तरह उबार पैदा करके तमाम दुनिया की बादशाही अता कर दी मुवरेख़ीन का कहना है कि चूंकि मौत के बाद प को परवरदिगार ने दोबारा जिन्दा किया इसलिए आप को जुलकरनैन कहा जाता है कुरान-ए-मजीद से इस बात की सराहत भी होती है कि खुदा ने सलतीन की सफ़ में सिर्फ चार अशख़ास को तमाम दुनिया की जमीन पर हुकूमत का हक़ दिया जिनमें नमरूद और बख़्तेनसर दोनों काफ़िर थे और दो मोमिन थे जो हज़रते सुलेमान और सिकन्दर जुलक़रनैन के नामों से मशहूर हुए।

जब ख़ुदा ने सिकन्दर जुलक़रनैन को शिकोह दबदबा और एक़तेदार का मालिक बना दिया और इज़्ज़त , कूवत , हैबत व हुकूमत आता कर दी तो उन्होंने दुनिया का सफर करके अपनी सलतनत की वसअतों का जाय़जा लेने का इरादा किया चुनान्चे वह रुप से निकले और चलते आफताब के गुरुब होने की जगह पर पहुंचे वहां उन्होने देखा कि कायनात को रोशनी देने वाला और नूर बरसाने वाला सूरज सियाह रंग की कीचड़ के एक चश्में मे डूब रहा है। और इस चश्मे के करीब एक क़ौम भी आबाद है अभी यह करिश्मा देख ही रहे थे कि परवरदिगार का इरशाद हुआ ऐ जुलक़रनैन तुम इस क़ौम को सजा दोगे या इनके साथ हुस्ने सुलूक करोगे।

जुलक़रनैन ने कहा पालने वाले हम सरकशों , मुशरिकों और ज़ालिमों को सज़ा देंगे क्योंकि वह तेरी तरफ से भी बरोज़े क़यामत अज़ाब सुलूक करेंगे। चूंकि वह क़यामत में जज़ाते ख़ैर का मुसतहक़ होगा। इस क़ौम के लोगों के बारे में मुवर्रेख़ीन और मुफ़स्सेरीन का कहना है कि यह नास्तिक काफ़िर , क़दावर , सुर्ख़बालों , करंजी आंखो वाले थे। इनका लिबास हैवानों की खाल और ग़िज़ा जानवरो का गोशत था।

इस अजीबो ग़रीब मुक़ाम का मुशाहेदा करने के बाद जुलक़रनैन ने एक दूसरे सिम्त का रुख़ किया और चलते-चलते उस मुक़ाम पर पहुंचे जिस जगह से आफ़ताब निकलता है वहां भी इन्होने एक ऐसी आबादी देखी कि जिनके सरों पर आफ़ताब तुलू हो रहा था और सर छुपाने के लिओ कोई साया नहीं है। इस क़ौम के बारे में मुफ़स्सेरीन व मुअर्रेख़ीन का कहना है कि यह लोग वहशी थे इन्हें घर बनाने का सलीका नहीं था। ना धूप से बचने का कोई ज़रिया था। अलबत्ता जब तेज़ बारिश होती थी तो यह पहाड़ के ग़ारो में पनाह ले लेते थे। औरर घास-फूस इनकी ग़िज़ा थी और यह लोग जानवरो की तरह ज़िन्दगी बसर करते थे। ज़ुलक़रनैन ने यहां से एक तीसरा रास्ता इख़्तेयार किया और चलते-चलते जब एक पहाड़ के दो किनारों के दरमियान से गुज़रे तो वहां देखा कि वहां भई एक क़ौम आबाद है। जिसकी ज़बान अजीबो ग़रीब है। मगर चूंकि इन्हें खुदा ने मुख़तलिफ ज़बानों पर भी क़ुदरत अता की थी। इसलिए उन्होंने इस क़ौम के लोगों से बाचतीच भी की और इनका हाल भी पूछा इन लोगों ने इस बात की शिकायत की कि इस घाटी के पार याजूज-माजूज की क़ौम आबाद है। जो फ़साद बरपा करती है और जब वह हम लोगों पर खुरूज करते हैं तो हमारी ज़राअतों और बाग़ों को तबाह और बरबाद और हमारे सैकड़ों आदमियों को खा जाते है। अगर आप कहें तो हम लोग आप के पास इस ग़र्ज से चन्दा जमा करेंकि आप हमारे और उस क़ौम के दरमियान कोई मुसतहकम दीवार तामीरकर दें। ताकि बवक़्ते खुरूज वह हमारी तरफ न आ सकें।

ज़ुलक़रनैन ने कहा मेरे परवरदिगार ने मुझे खर्च की जो कुदरत दी है वह तुम्हारे चन्दे से कहीं बेहतर है। मुझे तुम्हारा माल नहीं चाहिए। शर्त यह है कि अगर तुम लोग मेरी मदद व मेरी हितायत पर अमल करो तो मैं तुम्हारे और इस क़ौम के दरमियान एक आहनी दीवार (लोहे की) तामीर करके इनकी तबाहकारियों से हमेशा के लिए तुम्हें महफूज़ कर दूं। ग़र्ज़ कि सब लोग जुलक़रनैन की हिदायतों पर अमल करने के लिए तैयार और कमरब़स्ता हो गये।

याजूज और माजूज

यह एक बहुत बड़ी क़ौम है जो जानिबे शिमाल ज़मीन के आख़िरी हिस्से पर पहाड़ों के दरमियान आबाद हैं। याजूज और माजूज इस क़ौम के यूरिसे आला थे। बाज़ रवायतों से पता चलता है कि याजूज और माजूज हज़रते याफ़िस बिन नूह की औलाद से दो गिरोह हैं और इनके जिस्मानी साख़्त की किस्में हैं।

पहली यह कि इनमें कुछ ऐसे लम्बे तडंगे हैं तो इनका क़द ताड़ के दरख़त के बराबर है। दूसरी क़िस्म के लोगो की लम्बायी और चौड़ाई दोनो बराबर है।और तीसरे क़िस्म के लोग जिनके कान बहुत ही बड़े है चुनान्चे वह अपने एक कान से बिछौने और दूसरे कान से ओढ़ने का काम लेते हैं। इनकी तादाद अहद ज़ुलकरनैन में चार लाख थी। याजूज और माजूज की क़ौम में औरतें भी है और मर्द भी इनमें से कोई मर्द इस वक्त तक नही मरता जब तक कि वह एक हज़ार औलादें न करे। यह बरहैना रहते हैं। चलते फिरते जानवरों की तरह जुफती खाते है। और हैवानों की सतह पर ज़िन्दगी बसर करते है। इन्के जिसमों पर रिछ की तरह बाल होते है। जिनसे ऐसी बदबू निकलती है जिसे कोई बर्दाशत नही कर सकता। इनकी आवाज़े इतनी क़रखत और बलन्द हैं कि मीलों के फासले से सुनी जा सकती है। असल ग़िज़ा इनकी मछली है।

चुनांचे जब इनके इलाकों में बारिश होती है तो पानी के साथ साथ मछलियां भी आसमान से बरसती है। और वही इनकी ग़िज़ा बनती है। लेकिन जब बारिश नही होती और इन पर भुख का ग़लबा होता है तो यह निकल पड़ते है और घास , दरखतों की पत्तियां , आदमी , जानवर , हराम हलाल जो इन्हे मिलता हैं सब खा जाते है। जिधर यह हमला करते है उस जगह को तहस नहस और तबाह व बरबाद कर देते है।

दीवार की तामीर

ज़ुलक़रनैन ने पहाड़ी क़ौम के लोगों से कहा कि मैं तुम्हें लोहे और ताम्बे के कानों का पता बताता हूं तुम लोग सबसे पहला काम यह करो कि वहां जाओं और लोहा और ताम्बा इकरट्ठा करो। पूरी क़ौम लोहा और ताबा लाने में लग गयी। इधर ज़ुलक़रनैन ने अपनी हिक्मते अमली से दातों को पिघलाने वाला एक सुफूफ तैयार किया था।जिसकी ख़ासियत यह थी कि जब वह लोहे या तांम्बे पर डाला जाता था तो वह पानी की तरंह पिघल जाता था। मुख़तसर यह कि पहाड़ी क़ौम लोहा और ताम्बा लाती गयी और इस सफुफ की मद्द से बड़ी बड़ी सिलें तैयार होती रहीं।

एक नामालूम मुद्दत में जब यह तमाम तैयारियां मुकम्मल हुई और दीवार की तामीर का काम शुरू हुआ इस करंह की लोहे की तैयार शुदा सिलें तरतीब के साथ एक दूसरे पर जमायी जाने लगीं यह तक कि तीन मील लम्बी एक दीवार बुलन्द हुई फिर ज़लक़रनैन ने इन्हें हुक्म दिया कि अब तुम लोग इस दीवार के चारों तरफ लकड़िया कजमा करो। पूरी क़ौम लकड़िया जमा करने में मसरूफ हुई। और बड़े बड़े तनों और दरख़तों को काट काट कर दीवार के चारों तरफ ढेर कर दिये गये। जब लकड़ियों का अम्बार लग गया तो जुलक़रनैन ने कहा कि इसमें आग लगा दो और दूर से इसे धौकते रहो। धौकते धौकते जब वह दीवार सुर्ख़ अंगारा बन गयी तो ज़ुलक़रनैम ने धातु पिघलाने वाले सफ़ूफ़ की मद्द से तांबा पिघला पिघला कर इस दीवार में डाल दिया। यहां तक कि दीवार इस करंह मजबूत और मुसतहकम हो गयी कि न तो याजूज और माजूज की क़ौम उस पर चढ़ सकती थी और न ही इसमें नक़ब के ज़रिये कोई रास्ता बना सकती थी।

दीवार की तकमील पर ज़ुलक़रनैम नै सजदए शुक्मर अदा किया और कहा कि ये मेरे परवरदिगार की नीशानी और मेहरबानी है। क़ुरबे क़यामत जब हुज्जतुल्लाह का जहूर होगा तो खुदा वन्दे आलम इस दीवार को मुनहदिम कर देगा। इसका वायदा सच्चा और अटल है।

अल्लामा मजलिसी अ 0 र 0 का कहना है ज़ुलक़रनैन के साथ दीवार बनाने में खुदा ने एक परिशता मुक़र्रर किया था जिसका नाम रक़ाईल था।

समन्दर की सैर

हयातुल क़ुलूब क़ससे जुलक़रनैन में इमामे जाफरे सादिक़ अ 0स 0 से मरवी है कि जब दुनिया के गोशे पर ज़ुलक़रनैन की हुकूमत मुसल्लम और मुस्तहकम हो गयी तो उनके दिल में समुन्दर की सैर और उसके गहराइयों का हाल मालूम करने का इश्तेयाक़ पैदा हुआ। चुनान्चे उन्होंने शीशे का एक बड़ा तवील व अरीज़ सन्दूक़ बनवाया कताकि इसके अन्दर बैठ कर बाहरी चीजों का मुशाहेदा किया जा सके। जब इस संदूक के अन्दर हवा पानी और खाने वगैरा का सारा इन्तिज़ाम कर लिया गया तो वह इसे अपने कुछ हमराहियों को साथ लेकर समुंदर के किनारे पहुंचे और एक जहाज़ नुमा कशती पर सवार एक तरफ चल पड़े। जब इनकी कशमी समुन्दर के दरमीयान में पहंची तो उन्होंने सन्दूक़ में एक रस्सी बांधी और अपने साथियों से कहा कि मुझे सन्दूक़ में बन्द कर के समुंदर में डाल दो। और मुझे तह की तरफ जाने दो। लेकिन इस बात का ख़याल रहे कि जब मैं पानी के अन्दर से रस्सी को हरकत दूं तो मुझे ऊपर खैंच लेना। गर्ज कि ज़ुलक़रनैन समुंदर गहराइयों में उतरते गये। और समन्दरी अजायबात और इसके मख़्लूक़ात को देखते गये यहां तक कि एक शख़्स ने सन्दूक़ पर हाथ मारा और इसे अपनी तरफ मुतावज्जे करना चाहा और पूछा कि ऐ ज़ुलक़रनैन कहां का इरादा है कहा चाहता हूं कि समन्दर की तह तक पहुंच जाऊं और वहां देखूं कि क्या है। इस शख़्स ने जवाब दिया कि इस वक्त प इस जगह हैं जहां से तूफ़ान के जमाने में हज़रते नूह गुज़रे थे और इनका तीशा कशती से गिर गया था और आज तक इसकी गहरइयों में उतरता चला जा रहा है। और अभी तक तह तक नहीं पहुंचा। लिहाज़ा मेरी बात मानिये तो इस जगह से वापस चले जायें। और अपने को मज़ीद ख़तरे में न डालें। ज़ुलक़रनैन ने इस शख़्स के कहने पर अमल किया और रस्सी को हरकत देकर वापस पलटे और उस मुक़ाम पर आपने एक हद क़ायम कर दी जो सिद्दे सिकन्दरी कहलायी। आज वह जगह बाक़ी है।

नमाज़ी से मुलाक़ात

ज़ुलकरनैन समुंदर की सैर से लुत्फ अन्दोज़ होने के बाद वापस पलट रहे ते कि रास्तें में इन्होंने देखा कि एक शख़्स नमाज़ में मसरूफ है और उसने इन्हें देख कर भी कोई तवज्जो न की तो वह ठहर गये। और जब वह शख़्स नमाज़ से फारिग हो चुका तो वह उनके क़रीब गये और कहा कि तुमने मुझे देखकर बी मेरी तरफ तवज्जे नहीं की जानते हो मैं कौन हूं इसने कहा जानता हूं लेकिन मैं इस वक़्त उसकी मुनाजात में मसरूफ था। जिसकी बादशाही तेरी बादशाही पर ग़ालिब , जिसकी हुकूमत तेरी हुकूमत से बाला। मुझे ख़ौफ था कि मैं अगर तेरी तरफ मुतावज्जे हुआ तो वह कहीं नाराज न हो जाये। ज़ुलक़रनैन ने महसूस किया कि यह कोई ख़ुदा परस्त शख़्स है। लिहाज़ा उन्होने कहा कि क्या तुम इस बात पर राज़ी हो कि मेरे साथ चलो ताकि मैं तुम्हें हुकूमत शरीक करूं और उमूरे ममलेकत में तुम्से मद्द हासिल करूँ।

इस शख्स ने जवाब दिया कि मैं चार शर्तों पर तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूं। अव्वल यह कि तुम मुझे ऐसी नेअमत अता करो जो कबी जवाल पज़ीर न हो , दूसरे यहकि मुजे ऐसी सेहत दो जिसमें बीमारी का ख़तरा न हो , तीसरे यह कि मुझे ऐसी जवानी बख़शों जिसमें बुढ़ापा न हो और चोथी श्रत यह है कि मुझे ऐसी ज़ीन्दगी देने का वादा करो जिसमें मौत न हो। ज़ुलक़रनैन हैरत ज़दा रह गये और उसने जवाब में कहा कि मख़लूक़ात में कौन ऐसा है जो इन चीजों पर क़ादिर है। इस शख़्स ने कहा तो पिर मुझे उसी के साथ रहने दो जो इन तमाम चीजों पर कुदरत रखता है।र ऐ ज़ुलक़रनैन तुम बी इसके क़बज़ए कुदरत में हो। ज़ुलक़रनैन ने इस खुदा परस्त की गुफतुगू से इबरत हासिल की और आगे बढ़ गये।

ज़ुलक़रनैन से चन्द सवालात

अल्लामा मजलिसी अपनी किताब हयातुल कुलूब में लिखते हैं कि जुलक़रनैन का गुज़र एक ऐसे शख़्स के पास से हुआ जो आलिम था। उसने आपसे चन्द सवालात किया। उसने कहा ऐ जुलक़रनैन आप मुझे इस बात से आगाह फरमाइये कि वह दो चीज़ें कौन सी हैं जो अपनी किलक़त के बात से अब तक उसी हालत पर काय़म हैं। वह दो चीज़े कौन सी हैं जो बाते अज़तक़लीक़ अब तक रवां दवां हैं। वह दो चीज़ें से भी मुझे मुत्तेला फ़रमाइये जो एक दूसरे पर बराबर आती रहती हैं। और उन दो चीजों से बी आगाह कीजिए जो एक दूसरे की दुश्मन हैं। जुलक़रनैन ने कहा वह दो चीज़ें जो किलक़त के बाद से अपनी हालत में बरक़रार हैं वह ज़मीन व आसमान हैं। वह दो चीज़ें जो अब तक रवां दवां हैं वह आफ़ताब और महताब हैं। इसी तरंह वह दो चीज़ें जो एक दूसरे के बाद जुहूर होती हैं वह दिन और रात हैं। वह दो चीज़ें जो एक दूसरे की दुश्मन हैं इन्सानकी जिंन्दगी और मौत है। यह जवाबात सुनकर उस आलिम ने कहा बेसक तुम इस क़ाबिल हो कि खुदा तुम पर अपनी नेअमतों और नवाज़िशों को जारी रखे।

मुर्दों की खोपड़ियां

अल्लामा मजलिसी रक़मतराज़हैं कि इसी सफर के दौरान जुलक़रनैन का गुज़र एक ऐसे शख्स के पास से बी हुआ जो मुर्दों की खौपड़ियां जमा किये हुए उन्हें उलट पुलट कर देख रहा है। जुलक़रनैन ने उससे दरियाफ़त किया कि तुम इन खोपड़ियोंम में क्या देख रहे हो उसने जवाब दिया कि मैं जानना चाहता हूं कि इनमें कौन अमीरथा और कौन ग़रीब। मगर मुझे कुछ पता नहीं चलता। ज़ुलक़रनैन समझ गये कि यह शख़्स मुझे इबरत का दर्स दे रहा है और इसका मतलब सिर्फ मेरी तन्बीह है। चुनान्चे वह आगे बड़ गये।

आबे हयात की तलाश

क़ौमे याजूज और माजूज की रोक के लिये आहिनी दीवार की तामीर के मौक़े पर रक़ाएल नामी जिस फरिशते को खुदा ने मासूर किया था ज़ुलक़रनैन की उससे दोस्ती हो गयी थी। चुनान्चे वह फरिशता कभी कभी अपने परवरदिगार से इजाज़त लेकर जुलक़रनैन के पास आया करता था और मुख़लिफ़ मौजूआत पर दोनों में गुफतुगू हुआ करती थी। एक दिन ज़ुलक़रनैन ने उससे कहा ऐ रक़ाएल काश मैं इतने दिनों तक ज़िन्दा रहता कि मैं अपने परवरदिगार की इबादत का हक़ अदा कर सकता। क्या इसकी कोई सूरत मुम्किन है। रक़ाएल ने जवाब दिया कि हां। परवरदिगार ने ज़मीन से एक चश्मा पैदा किया है जिसका नाम आबे हयात है। उसके पानी में यह तासीर है कि जो शख़्स उसे पी लेता है उसे मौत नहीं आती।जब तक अपनी मौत के लिए खुदा से इस्तेदुआ न करे।जुलक़रनैन ने पूछा कि क्या तुम बता सकते हो कि वह चश्मा कहा है। रक़ाएल ने कहा कि बस मै इतना जानता हूं कि इसी ज़मीन के किसी मुक़ाम पर बहरे जुल्मात है और वह चश्मा इसी में है। मगर वहां तक पहुंचना नामुम्किन अम्र है। रक़ाएल की ज़बानी यह ख़बर सुनकर ज़ुलक़रनैन को फ़िक्र लाहक़ हुई कि किस तरंह बहरे जुल्मात का पता लगाया जाए और किस तरंह इस चश्मे तक पहुंचा जाये। चुनान्चे उन्होंने तमाम दुनिया के उलेमा व फ़ोक़हा और औसिया और औलिया को जमा किया जो आसमानी किताबों के माहिर और आसारे पैग़म्बरी को देखे हुए थे। उनसे दरियाफ़त किया सभीं ने अपनी लाइल्मी का इज़हार किया। इस बज़्म में जनाबे ख़िज़ भी तशरीफ फ़रमा थे उन्होने बताया कि वह जुल्मात और वह चश्मा मशरिक़ में है। मैने इसका हाल हज़रते आदम के सहीफे मे पढ़ा है। जनाबे ख़िज की इस निशानदेही से ज़ुलकरनैन के हौसलों पर जवानी आ गयी।

चुनान्चे उन्होंने तमाम उलमा व फोक़हा , होकमा को अपने हमराह लिया और काफ़ी साज़ो सामा नीज़ लशकर के साथ जनाबे खिज़ की रहनुमायी में आबे हयात की तलाश मे निकल खड़े हुए।और बारह साल तक मुसलसल सफर की सउबतें बरदाश्त करने के बाद बिला आख़िर उस बहरे जुल्मा तक पहुंच गये जिसका जिक्र रक़ाइल ने किया था। जुलक़रनैन ने अपने लशकर को जुल्मात के किनारे ठहराया और उसमें से छह हज़ार अहले दानिश व अहले कमाल को मुनतख़ब करके उनसे फ़रमाया कि मै इस ज़ोलमात में दाख़िल होकर इसे तय करना चहाता हूं तुम्हारी क्या राय है। अकसरीयत ने मुखालेफत की और कहा कि यह इरादा तर्क कर दीजिए। ज़ुलकरैन ने कहा मै जो इरादा कर चुका हूँ वह अपनी जगह अटल है ख्वाह कि मै ज़िन्दा रहू या हलाक़ हो जाउं। उलमा व होकमा ने भी समझाया मगर जब ज़ुलकरनैन किसी की बात मानने पर तैयार न हुए तो लौगो ने कहा कि आप को इख्तेयार है मगर इस सफर में हम आप से माफी के ख्वास्तगार हैं।

इसके बाद जुलक़रनैन ने ख़िज्र से पुछा कि क्या जोलमात के सफर में आप मेरी रहबरी फरमायेगें। जनाबे खिज्र ने जब अपनी रज़ा मंदी का इज़हार फरमाय़ा तो जुलकरनैन ने इन्हे दो हज़ार का एक दस्ता फ़राहम किया और इस पर इन्हे सरदार मुकर्रर कर के और खुद भी चार हज़ार जांबाज़ों का दस्ता अपने साथ भी लिया। बाक़ी लशकर को यह हुक्म दिया कि वह इसी मक़ाम पर रहे और मेरी वापसी का इन्तज़ार करे। अगर बारह साल की मुद्दत ग़ुज़र जाने पर में वापस पलट कर न आउं तो तमाम लशकरियों को यह इखतेयार होगा कि जहां चाहे चलें जायें। गर्ज़ कि बाकरा घोडियों पर सवार छः हज़ार का यह अज़ीम क़ाफेला जोलमाल में अपनी मंज़िल की तरफ रवाना हुआ। सबसे पहले हज़रते खिज्र दाखिल हुए उनके पीछें ज़ुलकरनैन और उनका लशकर। सफर का तरीक़ा यह था कि जनाबे खिज्र रवाना होते थे ज़ुलक़रनैन उसी मंजिल पर क़याम करते जाते थे।

अल्लामा मजलिसी का कहना है कि जुलकरनैन को यह भी पता बताया गया था कि यहां आबे हयात का चश्मा वाक़ये है वहा मिनजुमला उनके 356 चश्में और भी है जो आबे हयात की तासीर नही रखते इसलिए वह अपने साथ नमक आलूदा खुश्क मछलियां भी लाये थे। और उन्होने ज़ोलमात में दाखिल होने से पहले 360 मछलियां जनाबे खिज्र अ 0 को दी थी। ताकि ऐसा हंगाम आये तो वह 356 आदमियों में एक एक मछली तक़सीम करें और एक एक आदमी को एक एक चश्में पर इस हिदायत के साथ मुकर्रर कर दें कि अगर वह अपनी मछली को इस चश्में में जिस पर वह मुक़र्रर थें गोता दे। अगर वह मछली ज़िन्दा होकर चलनें लगे तो वह समझ लेंगे कि आबे हयात का चश्मा यही हैं। फिर इसकी ख़बर मुझे भी कर दीजिये। चुनांचे जनाबे खिज्र जब इस मुकाम पर पहुचें जहां 360 चश्में थे। तो उन्होने जुलक़रनैन की हिदायत के मुताबिक अपने असहाब में से एक एक मछली 356 आदमियों में तक़सीम कर के एक मछली अपनें पास रख ली। फिर आपने इन आदमियों को अलग अलग चश्मों पर भेजा और एक चश्में पर खुद भी गये इत्तेफाक़ से जिस चश्में की जानिब जनाबे खिज्र गये वही चश्मा आबे हयात का था।

जैसे ही आपने उस नमक आलूदा मुर्दा मछली को पानी में डाला वह जिन्दा हो गयी और पानी पर चलनें लगी. फिर आपने उसी पानी से गुस्ल किया और कपड़े धोये और उसे जी भर कर पिया। इसके बाद आप अपने असहाब के साथ ज़ुलकरनैन के पास आये और इनसे सारा माजरा बयान किया और खडुशकडबरी दी। लेकिन जब ज़ुलकरनैन को साथ लेकर चश्में के मुक़ाम पर फिर वापस आये तो लाख इस चश्में को तलाश करने की कोशिश की गयी लेकिन वह न मिल सका। यहां तक कि यह लोग इस मक़ाम से आगे बढ़ गये और बहरे जुलमात से आगे बढ़ कर रोशनी के समन्दर में पहुच गये। यह आफताब या महताब की रोशनी न थी। बल्कि उसे अनवारे इलाही की तजल्ली से ताबीर किया जाये तो ज्यादा मुनासिब होगा। इस जगह की ज़मीन सुर्ख थी और इसके संगरेज़े मरवारीद के थे। इस मक़ाम पर ज़ुलकरनैन ने एक आलीशान महल को देखा जो चमक दमक के साथ अपनी खामोशी को दास्तान दोहरा रहा था।

जुलकरनैन ने जनाबे खिज्र की निगरानी में अपने लशकर को महल के बाहर ठहराया और खुद तनो तनहा उसमें दाखिल हो गये। जंहा सिर्फ वीरानी नज़र आयी फिर उन्होने देखा कि एक तरफ बालायी हिस्से पर जानें के लिए एक ज़ीना था आप बेधड़क इस ज़ीने से उपर पहुंचे तो वहां इन्हें एक इन्तेहायी खूबसूरत शख्स नज़र आया जिसकी शक्ल व सूरत इंसान की शक्ल व सूरत सें मुशाबेह थी। वह शख्स सफेद लिबास में महफुस अपने मुहं पर हाथ रखे आसमान की तरफ कुछ देख रहा था। ज़ुलकरनैन की आहट पर वह चौंका और उनसे पुछा कि तुम कौन हो कहा मैं ज़ुलक़रनैन क्या इनती अज़ीम और कुशादा दुनिया जिसे छोड़ कर तुम यहां आये हो काफी न थी। फिर इसनें एक पत्थर का टुकड़ा उठा कर ज़ुलकरनैन की तरफ फेंका और कहा कि इसे ले जाओ और इसको और पत्थरों के साथ वजन करो तुम्हें इससे अजीबो ग़रीब सबक मिलेगा।

ज़ुलकरनैन ने वह पतथर का टुकडा उठा लिया और वापस पलटे। फिर आपने अपने असहाब से सारा वाक्या बयान किया और पत्थर दिखाया और हुक्म दिया कि इस पत्थर के वजन की हकीकत से आगाह किया जाये। इस पत्थर का वजन किया गया जिस चीज़ से भी वह तोला जाता था वजन में ज़्यादा ठहरता था। यहां तक कि एक हज़ार पत्थर इसके बराबर तराज़ू में ऱखें गये फिर भी वह वजन में ज्यादा ही रहा। जनाबे खिज्र भी यह करिश्मा देख रहे थे। उनसे ज़ुलकरनैन ने कहा कि क्यों इस पत्थर का वजन ज्यादा ठहरता है। हज़रते खिज्र ने जवाब दिया कि यह मामला अभी हल हो जाता है। इस पत्थर को एक बार फिर वजन किया जाये। चुनांचे जैसे ही वह पत्थर तराजू के एक पल्ले मे रखा गया जनाबे खिज्र ने इस पर एक मुठ्ठी खाक़ डाल दी और कहा कि अब इसको वजन किया जाये। ग़र्ज़ कि इस पत्थर के मुक़ाबले में जब एक पत्थर रख कर तराजू उठायी गयी तो उसका वजन कम ठहरा।

हांलाकि खाक़ डालने से उसे बढ़ जाना चाहिए था। फिर वह पत्थर हर शय के मुक़ाबले में कम ही ठहरता चला गया। तो ज़ुलकरनैन ने पुछा ऐ खिज़्र आखिर इसमें राज़ क्या है तो जनाबे खिज़्र ने फरमाया ऐ ज़ुलकरनैन जिसने आपको यह पत्थर दिया है वह फरिश्ता था और इसने इस पत्थर के इस मामुली टुकड़ों को आप की मिसाल क़रार दिया है कि ख़ुदा ने तमाम दुनिया की बदशाही आप को अता कर दी है फिर भी आप की हिरस व हवस में इज़ाफा होता जा रहा है। एक दिन आपकी यह हिरसों हवस खुद बखुद खत्म हो जाएगी। यह सुनकर ज़ुलकरनैन पर रिक़्कत तारी हो गयी उन्होने कहा की ऐ ख़िज्र तुम सच कहते हो यह पत्थर मेरे लिए दरसे इबरत है। अब मैं अपनी ज़िन्दगी सिर्फ इबादते खुदा में गुज़ारुगां। इसके बाद ज़ुलकरनैन और उनके लशकरी बहरे जुलमात मे दाखिल होकर वापस पलटे और जब वापसी पर भी आबे हयात का चश्मा जुलक़रनैन को न मिला तो इस पर उन्होनें खिज़्र से कहा कि यह मेरी क़िस्मत है कि खुदा ने मुझको इससे महरुम रखा।

अल्लामा मजलिसी तहरीर फरमाते है कि आबे हयात की जुस्तजू के बाद वापसी पर ज़ुलक़रनैन ने दुमतहुल जिनदल के एक मक़ाम पर सुकूनत इखतेयार कर ली। और 500 बरस की उम्र में वहीं इन्तेक़ाल फरमाया।