क़यामते सुग़रा

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क़यामते सुग़रा कैटिगिरी: इमाम मेहदी (अ)

क़यामते सुग़रा

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

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क़यामते सुग़रा

क़यामते सुग़रा

हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

प्रारम्भिक शब्द

संसार के बुद्धजीवी इस बात से सहमत हैं कि मानव शर पर में बुद्धि पथ परदर्शक तथा निर्देशक है , जो पग-पग पर मनुष्यों का गथ परदर्शन करती है और बुरी बातों पर अंकुश लगीती है। वास्तव में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणी के स्तर पर उठाने वाली तथा मनुष्य व पशु में भैद इंगित करने वाली मात्र वस्तु बुद्धि ही है।

इसी कारण सृष्टि के रचियता को अपनी पवित्र वाणी (कुरान) में जगह-जगह बुद्धि से काम लेने , मनन व चिन्तन की ओर ध्यान आकर्षित कराया है। उदाहरणार्थ , नफ़सलुल आयातल्लेक़ौमे-यतफ़कारून चिन्तन व मनन करने वालों के लिये हमने अपनी निशानियाँ सविस्तार वर्णत की है। तात्पर्य यह है कि बुद्धिजीवियों के लिये अल्प कथन में भी विस्तार निहित है। क्योंकि अन्धा अनुसरण करने वाले एंव बुद्धि से काम न करने वाले व्यक्ति मनुष्य के रुप में पशु हैं बल्कि इससे भी अधिक गिरे हुए व तुच्छ हैं , क्योंकि वह भूले हुऐ हैं।

उलायक कलअनाम बलहुम अज़ल्ले उलायेका हुम्मुल ग़ाफ़ेलून

भूले हुए , खोये हुए लोग वास्तव में पशु हैं बल्कि उनसे भी निम्न। यद्यपि विस्तृत ब्रहमाण्ड की तुलना में मानव ज्ञान अत्यंत सीमित व अल्प है , स्वंय ज्ञानदाता का कथन है कि मा ऊतीत मिनल इल्मे इल्ला क़लीला (हमने तुम्हें बहुत थोड़ा ज्ञान प्रदान किया है)। इसलिये त्रुटिपूर्ण व अल्प ज्ञान पर गर्व प्रकट करके उसे ईश्वरीय सिद्धान्तों पर वरीयता देना अत्यन्त नादानी व मूर्खता है तथा भगवान की निशानियों व ईश्वरीय मर्म , प्राकृतिक नियमों तथा धार्मिक ग्रन्थों का सूक्ष्म बृद्धि व समझ के कारण उनका बोध न होने पर न्करना तथा उसे झुठला देना बड़ी अज्ञानता तथा भैल के अतिरिक्त और कुछ नहीं , क्योंकि यह बात सिद्ध है कि किसी वस्तु-विषय का समझ में न आना उसके न होने का प्रमाण नहीं बन सकती है।

ऐसी स्थिति में कोई विषय यदि पूर्ण रूप से प्राकृतिक ग्रन्थों , नियमों , भगवान के आदेशों तथा नबी की हदीसों के अनुरुप सिद्ध हो जाये तो वह किसी व्यक्ति के कथन कि यह बात हमारी समझ से परे है , कदापि असत्य नहीं हो सकता न कि मात्र झूठी परिकल्पनांए तथा मूर्खतापूर्ण पक्षपात उसके असत्यता के कारण मान लिये जाये। प्रत्यक बृद्धिजीवी इस बात को स्वीकार करता है नीरीक्षण व विश्वास की तुलना में अनुमान व कल्पना का कोई स्थान नही है अपितु कुछ अनुमान व परिकल्पनाऐं तो पाप बन जाते हैं। सर्वप्रथम अनुमान करने वाला इबलीस आज तक निन्दनीय है तथा सर्वथा रहेगा।

कल्पना व अनुमान की तुलना में ज्ञान वास्तविक है जिसका केन्द्र व उद्वगम ईश्वर है। जिसकी वाणी इसलाम के अनुयायियों के पास कुरान के रुप में उपलब्ध है तथा उसमें जो कुछ है वह सत्य ही सत्य है। हर वस्तु की व्याख्या उसमें विस्तार से उपलब्ध है परन्तु प्रत्येक व्यक्ति के लिये नही वरन् मात्र उनके लिये जिन पर कुरान उतारा गया ओर वह महानुभाव हजुरे सरवरे कायनात पैग़म्बरे अकरम हज़रत मो 0 मुस्तफ़ा (स 0) और उनके पश्चात कुरान के मर्म के ज्ञाता रासेख़ूना फिल्म इल्म (ज्ञान में डूबे हूऐ) हैं , जिन के ज्ञान एंव विश्वास में परिवर्तन व परिवर्धन नही होता। अतः ऐसे ज्ञानी , वेदाँती , व दाशर्निक जिनके विचार नित्य बदलते रहते हैं। वे रकसूख़ून फिल इल्म नहीं हो सकते बल्कि मात्र वह पैग़म्बर के उत्तराधिकारी हो सकते है। जिन्होनें इस सृष्टि के किसी ज्ञानी से शिक्षा नहीं ग्रहण की बल्कि वह पैगम्बर के ज्ञान के द्वार हैं। जिनका परियच स्वंय हुजूर ने इस प्रकार से करकया है इना मदीनतुल ईल्म व इलीयुन बाहबुहा (मैं ज्ञान का नगर हूँ और इली उसका द्वार) अपके पश्यात् अन्य औलिया की पहयान भी यही रहेगी कि इस संसार में किसी से शिक्षा न प्राप्त की हो बल्कि उनका ज्ञान दैवीय हो , ग्रहण किया हुआ न हो। वह स्वयं ज्ञान ग्रहण हैतू किसी व्यक्ति , बिना आयु के अन्तर के किसी के ऋणी न हो वरन संसार उनके ज्ञान का ऋणी हो। उनका ज्ञान सीमित न हो बल्कि असीमित हो।

ऐसी स्थिति में यदि किसी विशेष शीर्ष् हैतु कुरान में सूक्ष्म संकेत उपलब्ध हो और पैग़म्बर तथा उनके औलिया उनकी व्याख्या कर रहे हों तो मुसलमान होने के नाते हमारा कर्तव्य है कि हम विश्वास के साथ उसका समर्थन करें तथा समझ न पाने के आधार पर उसे नकारने से अपने को बचायें ताकि इस्लामी परिधि से बहिष्कृत न हो जायें। ऐसे ही विषयों में से एक विषय प्रलय है जिस पर विश्वास मुसलमानों के मूल सिद्धान्तों में सम्मिलित है परन्तु प्रलय और उससे पूर्व के कुछ लक्षण निर्धारित है जिनका उल्लेख कुरान तथा पैगम्बर की हदीसों में उपलब्ध है। इन लक्षणों में से एक मुख्य और अनिवार्य लक्षण हज़रत इमाम मेहदी का प्रकट होना एवं उठ ख़डा होना भी है। जिससे समस्त मुस्लिम समुदाय सहमत है क्योंकि इसके विषय में आयते, हदीसे तथा धर्म गुरुओं एवं धर्म दार्शनिकों के कथन उपलब्ध है। ऐसी दशा में यदि कोई मूर्ख निजी स्वार्थ हैतु इमाम मेहदी के प्रकट होने तथा उठ खड़ा होने को नकारे तो वह सिवा भटका हुआ और मूर्ख होने के और कौन हो सकता है।

हज़रत इमाम मेहदी के अस्तित्व के सम्बन्ध में कोई भेद मुसलमानों में नही है बल्कि जुज़यात (आंशिकतः) में कुछ भेद हैं और वह यह कि शिया इमामिया आपके अस्तित्व के समर्थ् मे है तथा आपको जीवित एंव लुप्त जानते है। हज़रत ईसा व इलयास तथा खिज्र के समान परन्तु कुछ सुन्नी महानुभाव इस बात को मानते है कि अभी पैदा नही हुऐ बल्कि पैदा होंगे तथा प्रकट होने के समय आपकी आयु 40 वर्ष होगी। इस प्रकार 40 वर्ष के समय की सृष्टि के यह महानुभाव भी समर्थक हैं। इसके अतरिक्त बधुआ सुन्नी पारखीगण इस विषय में शियों से सहमति रखते हैं।

ऐसी दशा में किसी बेढ़ंगे एंव रास्ता भूले व्यक्ति का आपके अस्तित्व से मुकरना स्वंय उसके काफ़िर होने का प्रमाण है। इसलिये की पैग़म्बर का कथन है कि इमाम मेहदी के अस्तित्व को नकारने वाले काफ़िर है। यदि थोड़ा सा चिन्तन कर लिया जाये तो आपके अस्तित्व का सबसे ब़डा प्रमाण झूठे लोगों का मेहदियत का दावा है।

इसलिये कि नक़ल यर्थाथ मूल की ही बनायी जाती है यदि मूल का पता ही न हो तो नक़ल की आवश्यकता ही क्या है क्योंकि आपके सम्बन्ध में सम्पूर्ण लक्षण एंव निशानियाँ , जाति एंव वंश , रूपरेखा पुरातन काल से पुस्तकों में इंगित है जो झूठों की वास्तविक्ता अतिशीघ्र वस्त्रविहीन हो जाती है।

हाँ ऐसे लोगों से वह बे-पढ़े लोग जल्द धोखा खा जातें हैं। जिनको न इमाम की विशेषताओं का ज्ञान है और न ही वह आपके प्रकट होने के लक्षणों से अवगत हैं। न ही उन्हें इमाम के गुणों का बोध है यद्यपि प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है कि वह इन बातों को जानता हो और विशेष रूप से वर्तमान समय में जबकि नीचता एंव भ्रांति समस्त संसार पर अपना अधिकार जमा चुकी है और शैतान देखने में अपने उद्देश्य की सफ़लता पर अत्यधिक चैतन्य है मैनें मात्र ज्ञान विचार को दृष्टिगत रखते हुए कि आज के भौतिक युग में जबकि धर्म से विरोध एक फ़ैशन बल गया है और इसलाम विरोधी अन्धकार की घटाऐं सारे संसार को अपने घेरे में ले जुकी हैश समय तीव्रता से विनाश निकट पहुँच रहा है। साथ ही वह समस्त लक्षण जिन की जानकारी पूर्व में दी जा चूकी है शीघ्र वास्तविकता में परिवर्तित होने के निकट हो गये हैं। और ईश्वर ने चाहा तो वह जिसके आने की सब प्रतीक्षा में है साक्षात् रूप में प्रकट होगी इसलिए आवश्यक है कि अपने अध्यनानुसार उन लक्षणों व संकेतों को एक स्थान पर एकत्रित कर दिया जाये जिससे उनका संज्ञान परिचय सुगमता से हो सके और यदि यह पुनीत कार्य भगवान तथा इमाम की ओर से स्वीकार हो गया तो मेरे लिये वह आख़ेरत (परलोक) की पूंजी बन जायेगा। मात्र इसी ध्येय से यह संक्षिप्त पुस्तक पाठकों को समर्पित है विश्वास है कि इन लक्षणों में पूर्ण होने वाले प्रत्येक लक्षण अध्ययनकर्ताओं के ईमान व विश्वास में बढोत्तरी का कारण होंगे तथा मोक्ष प्राप्ति का स्रोत बन जायेंगे।

यद्यपि लगभग 11 वर्ष पूर्व इस विषय पर मैंने प्रथम पुस्तक आसारे क़यामत ज़हूरे हुज्जत तथा दूसरी बार इरफाने इमामत संकलित की। इस्लामी भाइयों ने शीघ्रता से क्रय करके अपनी मान्यता व इस्लाम दोस्ती का परिचय दिया था मगर कालान्तर में ऐसे लक्षण जो उन पुस्तकों में इंगित थे पूर्ण हो गये जब्कि उस समय उनके विषय में सोचा भी नहीं गया था और उसी प्रकार बहुधा ऐसे लक्षण जो उन पुस्तकों के लिखते समय मेरे अध्ययन से परे थे , शेष रह गये थे। मगर इस थोड़े समय में संसार में तीव्रता से परिवर्तन हुआ , यदि आप तनिक चिन्तन करे तो आभास होगा कि बीते दस वर्षों में भूमण्डल में जो परिवर्तन दृष्टिगोचर हुऐ उसका उदाहरण संसार का इतिहास प्रस्तुत करने में अक्षम है।

इसीलिये अब प्रत्येक व्यक्ति यह आभास करने पर विवश है कि ईश्वरीय वचन अवश्य पूर्ण होंगे और कदाचित अब समय तेज़ी से निकट आ रहा है इस परिपेक्ष में देश के अनेक भागों से मेरी पूर्व पुस्तकों की माँग होने लगी परन्तु खेद है कि अब मेरे पास वह पुस्तक शेष नहीं रही। पुनः उनके मुद्रण हैतु मित्रों का आग्रह बढ़ता गया अव्तोगत्वा इसे धार्मिक उत्तरदायित्व समझ कर विवश हो गया। मगर मैनें यह उचित समझा कि एक नची पुस्तक संकलित कर ली जाय जिसमें पूर्व पुस्तकों के आवश्यक उदाहरण के अतरिक्त मात्र प्रकट होने के लक्षण उल्लेखित थे अन्यथा इमाम के विशेष परिचय और अन्य आवश्यक शीर्षकों हैतु हमारी पूर्व पुस्तके पर्याप्त है।

मेरा अक़ीदा है कि एकाग्रचित होकर सत्य मन से आने वाले की प्रतीक्षा की जाये और पहले ही से सद ज्ञान की राह तै कर ली जाये तो फिर यह प्रतिक्षा काल आराधना ही आराधना होगा। चूँकि मेरी वर्तमान पुस्तक ज्ञान बढोत्तरी तथा तीव्र प्रतीक्षा का कारण होगी इसलिये मुझे विश्वास है कि ये तुच्छ संकलन कर्ता तथा पाठ्यकगण इस आराधना में उभयनिष्ट हो जायेंगे।

चूँकि हज़रत इमाम (अ 0) उस समय तक प्रकट न होंगे जब तक कि इस भूमण्डल पर अत्यधिक उथल-पुथल न हो जाये और बुद्धि को आशचर्यचकित कर देने वाली परिस्थितियाँ न विध्यमान हो जाये जिसकी आच कल्पना भी असम्भव है। इसलिये मैंने इस पुस्तक का नाम क़यासते सुग़रा (लघु प्रलय) रखा है क्योंकि आप का प्रकट होना वास्तव में क़यामते कुबरा (महाप्रलय) का पूर्वरूप है , जैसा कि इसके अध्ययन से विदित होगा।

मैं परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ कि वह जगस्वामी मुझे तथा आप सब को पुण्य कार्य सम्पन्न करने की प्रेरणा दे और इस योग्य बना दे कि हम इमामे के निम्नकोटि के सेवकों में सम्मिलित हो सकें और प्रलच काल में ईश्वर के सम्मुख सच्चे मुसलमान बनकर उपस्थित हो सकें। या अल्लाहों या रहमाने या रहीमों या मक़ललेबल कुलूब सब्बित क़लवी अला दीन काऐ आमीना (है परमेश्वर है दयालू , है दयावान है ह्रदय परिवर्तित करने वाले , हमारे ह्रदय को धर्म पथ पर रख भगवान ऐसा करे।

मैं उन व्यक्तियों का सह्रदय आभारी हूँ जिन्होने किसी भी रुप से इस पुस्तक के विषय में मेरी सहायती की।

इमाम की आवश्यकता

ज्ञान और कुरान के आधार पर कुल इसलाम धर्म मानने वाले तथा दूसरे धर्मों के अनुयायीयों ने इब्लीस (शैतान) के अस्तित्व को माना है। कुरान में बहुधा स्थानों पर शैतान का उल्लेख है। जिसमें इंगित है कि शैतान मानव का शत्रु है तथा खुल्लम-खुल्ला पथ-भ्रष्ट करने वाला है। तथा शैतान ने स्वंय ईश्वर के सम्मुख यह घोषणा की कि मै सिवा तेरे आज्ञाकारी जनों के सभी को बहकाऊगा और सत्य मार्ग से विचलित कर दूँगा। तदानुसार वह मनुष्य की धमनियों में रक्त की तरह प्रवाहित होकर प्रत्येक व्यक्ति को बहकाता रहता है तथा नीचता , घृणा और पथभ्राँति उसकी कार्य सिद्धी है।

मगर यह भी वास्तविकता है कि शैतान को पैदा करने वाला भी ईश्वर है और उसी ने उसे निर्धारित समय तक की छूट दी है। इसलिये बुद्धि अनुसार यह आवश्यक है कि जब तक संसार में पथ भ्रमित करने वाले का अस्तित्व है तब तक संसार में पथ परदर्शक का भी अस्तित्व होना चाहिए। अन्यथा मनुष्य अपनी प्राकृतिक रचनात्मक त्रुटियों के फलस्वरूप दुष्टता और पाप करने पर विविश समझा जायेगा। ईश्वर का शैतान को छूट देना और प्राणियों को बिना किसी पथ परदर्शक के रखना प्राणी जाती के साथ अन्याय के समान होगा तथा जब मनुष्य प्रकृति अनुसार पाप और कुकर्म पर विवश समझ लिया जायेगा तो फिर पुरस्कार , दण्ड , स्वर्ग-नरक यह शब्द निअर्थक हो जायेंगे।

इसीलिये भगवान ने सृष्टि को आदि से कदापि से कदापि बिना पथ-परदर्शक नहीं रखा। इस प्रकार मो 0 साहब (स 0) के विषय में कहा गया कि ऐ पैग़म्बर आप (पुण्य पर) अच्छी सूचना देने वाले (पाप से) डराने वाले हैं और हर जाति (क़ौम) में एक पथप्रदर्शक है। तथापि पथ परदर्शन का प्रबन्ध सदैव ईश्वर की तरफ से है सर्वदा रहेंगा। स्पष्ट है कि जो मनुष्य स्वंय मार्ग ढूँढता हो वह कदापि मार्गदर्शक नहं हो सकता मार्गदर्शक वही हो सकता है जिसे स्वंय पर मार्ग का ज्ञान हो जिसके चरित्र पर पापों की छाया भी न हो और वह केवल मासूम ही हो सकती है , पथ भ्रष्ट और पापी कदापि मार्गदर्शन नही कर सकते क्योंकि ओ ख़ेश्तन गुमअस्त किरा रहबरी कुनद (वह तो स्वंय मार्ग भूला है वह क्या मार्गदर्शन करेगा) इस प्रकार यह बात स्पष्ट है कि मार्गदर्शक वही होगा जो प्राकृतिक रूप से जन्म जन्मान्तर से शिक्षित ज्ञानी और सदमार्गो का जानने वाला होगा और जो सदमार्ग का होता है उसी को महदी कहते हैं तथा से मेहदी के अस्तित्व से बौद्धिक रुप से कोई काल किसी समय ख़ाली नहीं रह सकता। इसी प्रकार मानव उत्पत्ति के प्रारम्भ से यह प्रथा प्रचलित है बल्कि प्रथम मनुष्य ने मार्गदर्शक के रुप में पृथ्वी को सुशोभित किया तथा आदम से लेकर अन्तिम नबी तक नबूवत के मार्गदर्शन की श्रंखला निरन्तर चलती रही। जिसमें हर नबी का पाक रहित जीवन मार्गदर्शन की आवश्यकती पूरी करता रहा। इसलिये नबैवत के समापन पर जबकि संसार विद्मान है और उसे प्रलय तक रहना है तो आवश्यक है कि ऐसी दोष रहित श्रंखला बनी रहे परन्तु संसार को तो विदित है कि ऐसा मौसम व्यक्ति नबी के बाद , उनके मुख्य परिवारजनों में से ही होगे। जिनका अस्तित्व तय और सिद्ध है। रसूल के परिवारजनों में जो इमाम हज़रत हुज्जत इब्ने असकरी (अ 0) का अस्तित्व है तथा वह दृष्टि से ओझल है वह शिक्षा दीक्षा की प्रक्रिया को लुप्त होकर उसी प्रकार पूर्ण कर रहे है जिस प्रकार शैतान छिप कर पथ भ्रष्ट करने तथा बहकाने में कार्यरत है।

पैगम्बर साहब की हदीस

प्रसिद्ध हदीसे सक़लैन जो रसूल ने अन्तिम हज यात्रा के अवसर पर कही। लग-भग पूर्ण इसलाम के मानने वाले सहमत हैं कि हजूर अपने बाद के हैदायत (मार्गदर्शन) के प्रबन्ध को स्पष्ट करते हुऐ कु कि ऐ मुसलमानों मैं अपने बाद तुम्हारे मध्य दो भारी वस्तुएं तुम्हारी देख रेख शिक्षा दीक्षा हैतु छोड़े जा रहा हूँ , जिनमें एक कुरान (ईश्वर की पुस्तक) तथा दूसरी मेरे अहलेबैत (घरवाले)। तुम इन दोनों से अपना सम्बन्ध जोड़े रहोगे तो कभी भटकोगे नहीं तथा यह एक दूसरे से अलग नहीं होंगे यहाँ तक कि कौतर के तट पर पहुँय जायें। इस हदीस से बात स्पष्ट है कि रसूल के बाद मुसलमानों के लिये अनुसरणीय रसूल के परिवार जह एंव अनुकरणीय दैवीय पुस्तक कुरान है और इनसे बिना सम्बद्ध हुऐ मोक्ष प्राप्ति संभव नहीं है। इसी लिये इन दोनों का अस्तित्व प्रलय काल तक रहना अनिवार्य है। देखने में दैवीय पुस्तक अर्थात कुरान तो मुसलमानों के पास उपलब्ध है परन्तु रसूल के परिवारजनों में से कोई व्यक्ति स्पष्टता प्रतीत नहीं होता परन्तु कथन उस महान व्यक्तित्व का है जिसकी ओर झूठ व अस्त्य की शंका भी नहीं हो सकती बल्कि कुरान के अनुसार उसका कथन भगवान का कथन है , अतः धर्म व ज्ञान की दृष्टि से मानना पड़ेगा रसूल अल्लाह के परिवारजनों में से किसी भी व्यक्ति का होना अनिवार्य है तथा उस समय तक आवश्यक है जब तक कुरान संसार में है और रसूल के परिवारजनों में ऐसा ही व्यक्ति मार्गदर्शक होगी तथा और कोई मार्गदर्शक (हादी) हो नही सकता जब तक मेहदी न हो इसलिये आज जो कोई ऐसे इमाम को नकारे जो रसूल के परिवारजनों में से ही हो , तो फिर उसे धार्मिक दैवीय पुस्तक कुराल के अस्तित्व को भी नकारना पडेगा क्योंकि हजूर का कथन है कि यह दोनों कदापि पृथक नहीं हो सकते बल्कि साथ ही साथ रहेगे अतः स्पष्ट है कि जब कुरान उपलब्ध है को परिवारजनों में से कोई न कोई ऐसा अस्तित्व अवश्य है जो कुरान के साथ हो रसूल अल्लाह के परिवारजन उनके सहित चौदह मासूम हैं जिनमें रसूल की पुत्री के अतरिक्त बारह इमाम सम्मिलित हैं उनमें से वर्तमान समय तक ग्यारह इमाम हज़रत अली से हज़रत इमाम मेहदी शेष है जिनका अस्तित्व भगवान की पुस्तक के साथ शेष है। उन्ही के कारण कुरान का अस्तित्व भी सुरक्षित है उनका दृष्टिगोचर न होने का प्रमाण नहीं हो सकता। इसलिये समस्त मुसलान विश्वास रखते है कि इमाम मेहदी रसूल ही के परिवारजनों में से हैं तथा निश्चित समय पर प्रकट होंगे उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता।

टिप्पणीः

कथित हदीस की पुष्टि इतनी पुस्तकों में उपलब्ध है कि मुझे इस सम्बन्ध में लिखने की कुछ आवश्यकता नहीं। साधारण मुसलमानों की पुस्तकों का अवलोकन किया जा सकती है , इसके अतरिक्त अन्य अनेकों हदीसें व आयतें प्रयोग स्वरुप इस विषय में उपलब्ध हैं। इस पुस्तक का संक्षेपण सविस्तार उल्लेख करने में बाधक है। अध्ययन में रुचि लेने वाले एंव सत्य आकाँक्षी , सिरात आसूवी फ़िल एहवाले मेहदी तथा किफायुत तालिब , मो 0 इब्ने शाफेऱ का अध्ययन कर सकते हैं। उदाहरण स्वरुप केवल दो हदीसें प्रस्तुत हैं।

इब्ने अब्बास – अनस जाबिर – इब्ने माजा – अहमद बिन हम्बल आदि ने उल्लेख किया है कि रसूल अल्लाह का कथन है कि यदि संसार के जीवन में मात्र एक दिन शेष हो तो भी ईश्वर मेरे अहलैमेत (परिवार जनों) में से एक को बाक़ी रखेगा जो पृथ्वी को न्याय से उसी प्रकार परिपूर्ण करेगा जिस तरह वह अत्याचार व अन्याय से भरी हुई है।

टिप्पणीः- इस हदीस पर समस्त मुस्लिम समाज सहमत है।

बुख़ारी शरीफ़ व सही मुस्लिम एंव अन्य पुस्तकों में है कि हजूर का कथन है कि यकुना बादि असना अशर अमीरन कुल्लहुम मिन कुरैश तथा कुछ संस्करणों में मिन बनी हाशिम है अर्थात मेरे बाद बारह अमीर होंगे जिनमें के समस्त कुरैश से होंगे फिर विशेष रुप से कहा वह बनी हाशिम में से होंगे।

यह हदीस बुख़ारी में तीन प्रकार , सही मुस्लिम में नौ प्रकार , अबुदऊद में 3 प्रकार , तिरमिज़ी में एक प्रकार से उल्लेखित है। इसलिये ज्ञात होता है कि पैग़म्बर ने ई बार इस हदीस का वर्णन किया है , उसमें कहीं पर शब्द , कुरैश कहा है तथा किसी स्थान पर विशेष रुप से बनी हाशिम के शब्द का प्रयोग किया है परन्तु बारह की संख्या हर स्थान पर है अब यह पूर्णतया स्पष्ट है कि यह बारह अमपर-ख़लीफ़ा हाकिम या इमाम रसूल के परिवार जनो के अतरिक्त अन्य नही हो सकते क्योंकि न किसी दूसरी कड़ी का कोई ख़लीफ़ा व अमीर ऐसा आज उपलब्ध है जसका अस्तित्व कुरान के साथ माना जाये और न ही कोई अमीर या हाकिम कड़ी बारह पर समाप्त होती है। अब सहाब – ए – रसूल (रसूल के मित्रों की सूची) जो ख़लीफ़ा कहलाये वह बारह न थे , न बनी उम्मैया के शासको से संख्या पूरी होती है और न ही बनी अब्बास के राजाओं से। अतः सत्य मात्र यही है कि इन बारह अमीरों का तात्पर्य केवल बनी हाशिम तथा रसैल के अहलेबैत (परिवारजनों) ही से है तथा रसैल के परिवार जनों में से बारह इमाम ही हो सकते हैं जिनके प्रथम हज़रत अली (अ 0) अन्तिम इमाम मेहदी (अ 0) जिनका अस्तित्व है। भगवान तथा रसूल के प्रतिनिधी है जिनके कारण अब तक रसैल के धर्म अस्तित्व है तथा प्रलय को भी उन्हीं की प्रतीक्षा है।

संसार के अन्य धर्म एंव इमाम मेहदी अल्लैहिसलाम क् अस्तित्व

अनेक पुस्तकों अध्ययन से ज्ञात होता है कि लगभग संसार के समस्त धर्म एंव ज्ञानी इस बात पर सहमत है कि अन्तम समय में एक ऐसा विलक्षण अस्तित्व अव्श्य प्रकट होगा जो सासार से अन्याय व अत्याचार को समाप्त करके न्याय सम्पन्न बना दे तथा संसार के बिगड़े समाज और आचरण को सुधारे। हाँ इस अस्तित्व का नाम हर एक धर्म व साज में पृथक बताया है। इस प्रकार फ़ाजिल बरुजरदी में नूरूल अनवार नामी पुस्तक जो ईरान से प्रकाशित हुई है , में विस्तार पूर्वक लिखा है कि आप के पृथक-पृथक नाम पर धर्म और समाज में भिन्न भिन्न लिये जाते रहे हैं तथा समस्त काफ़िरों की पुस्तकों एंव तौरेत़ जुबूऱ इंजील व कुरान में अलग-अलग आपका उल्लेख है , जिसकी प्रति (नकल) सिरातु-सन्मुवी फ़िल अहवाल-मेहदी नामक पुस्तक में भी प्रस्तुत की है। किन्तु आपके प्रसिद्ध नाम , मेहदी , मुन्तज़िर , साहैबुल अम्र , हुज्जत , बुरहान आदि है। इब्राहीमी ग्रन्थों में आपका नाम साहिमुल अस्र , ज़बूर में क़ायम , तौरेत में ओक़ील मो , एंव इन्जील में महमेज़ है , ज़रतुश्ती पुस्तकों में ख़ुसरो और कुछ आसमानी पुस्तकों में कल्मतुल हक़ लिखा है। पुस्तक हज़ार नामा हिन्द में लन्दयतार कहा गया है। ब्रह्मणों के वेद में मन्सूबे के नाम से पुकारा गया है। ऊरफ़ा और सूफिया में आपका नाम कुतुब प्रसिद्ध है। गौस आपकी विशेष उपाधि है तथा जंगली अरब बद्दू आपको अबू सालेह के नाम से स्मरण करते है और आप इसी नाम से अधिक प्रसिद्ध है किन्तु यह निश्चित है कि नाम की भिन्नता से व्यक्तित्व में कोई अन्तर नहीं हो सकता।

आप का जन्मः-

बहुधा सुन्नी आलिमों एंव समस्त शिया आलिमों का विस्तार सहित कथन है कि आपके पूज्य पिता इमाम हसन असकरी , इब्ने मो 0, इब्ने अली , इब्ने मुसा , इब्ने जाफ़र , इब्ने मो 0, इब्ने अली , इब्ने हुसैन (अ 0) हैं और इब्ने शाज़ाँ के सन्दर्भ से स्वंय इमाम हसन असकरी का कथन है कि वलीये ख़ुदा हुज्जते इलाही व इमामे वक़्त मेरे बाद मेरा बेटा है जो पन्द्रहवी शाबान 255 हि 0, जुमे के दिन सूर्योदय के समय सामर्रा में ख़तना किया हुआ पैदु हुआ जिसके लिये गैबत (लुप्ति) है। गैबते कुबरा (दीर्घ लुप्ति) के पश्चात् वह प्रकट होगा तथा पृथ्वी को न्याय उसी प्रकार भर देगा जिस प्रकार वह अत्याचार व अन्याय से परिपूर्ण होगी।

टिप्पणीः-

विस्तार हैतु इरफानुल इमामत नामक हमारी पुस्तक का अवलोकन करें।

हुलियाः-

जारूद का बाकिरूल उलूम के सन्दर्भ से कथन है कि अमीरूल मोमनीन हज़रत अली (अ 0) ने मिम्बर से बताया है कि एक ब्लक मेरी सन्तान से अन्तिम समय में उठ खड़ा होगा जिसका रंघ सफ़ेदी लिये लाली युक्त पेठ तथा जाँघे चौड़ी भुजाओं की हडिडयां बड़ी तथा माँस से भरी और पीठ पर दो तिल , एक त्वचा के रंग का दैसरा पैग़म्बर साहब के तिल के समान , उनके दो नाम है एक स्पष्ट और एक अस्पष्ट जो अस्पष्ट है वह अहमद और जो स्पष्ट है वी मीम , है मीम , दाल।

अन्य पुस्तकों के अध्ययन तथा इमामों के कथनानुसार आपके आकार प्रकार का विस्तार निम्नवत है। जिस का स्मरण रखना हर प्रतीक्षक मुसलमान के लिये आवश्यक है।

सर गोलाकार , बाल सुन्दर , कन्धों तक लटके हुऐ सर के बीच में माँग़ मुख़ड़ा तेजस्वी श्वेत ललाट चौड़े व चमकदार , दाढी काली घनी , नाक पतली लम्बी , आँखें सुरमई प्रकाश मान किन्तु ऊपर को निली हुई नहीं , बल्कि नीचे की ओर दबी हुई भाँहें चौड़ी तथा धनुष समान दोनों भवों के मध्य कुछ उभार , दाँत खुले हुऐ चमकदार , गालों पर माँस कम तथा एक पर काला तिल मुखडे और सर पर कोई चिन्ह नहीं , विसाल भुजाऐ भरी हुई , दोनो वक्षों के मध्य विशालता , कद सामान्य न लम्बा न छोटा , शरीर भरा हुआ , दाहिनी जाँघ पर तिल , घटने नीचे तक झुके हुऐ हथेलियों पर माँस , लाली तीव्र श्वेत रंग , आचरण व व्यवहार रसूले ख़ुदा के अनूरूप।

ग़ैबत (लुप्तिता) समस्त इतिहासकारों का मत है कि 8वीं रबी अव्वल सन् 260 हि 0 के इमाम हसन असकरी शहीद हुऐ अतः नवीं रबी अव्वल 260 हि 0 से आप स्पष्ट रुप से दैवीय खिलाफ़त की गद्दी पर विराजमान हुए। इसीलिये संसार के शिया प्रत्येक वर्ष इस तिथि को प्रशंसा का प्रदर्शन करते हैं। इसी दिन आपकी ग़ैबते सुगरा (लघु प्रलय) प्रारम्भ होती है और सत्य कथनों के अनुसार 389 हि 0 से आपकी ग़ैबते सुगरा के काल में आप के चार मुख्य विश्वसनीय व्यक्ति थे जो हववामे अरबा (चार उत्तराधिकारी) के नाम से प्रसिद्ध है। जिनमें प्रथम उसमान इब्ने सईद , दिव्तीय अबूजाफ़र बिन उसमान , तृतीय अबुल क़ासिमुल हुसैन बिन रौह तथा चतुर्थ अबुल हसन अली इब्ने मोहम्मद समरी थे। इन सब की समाधिया इराक़ की भूमि पर आज भी लोगों की अध्यात्मिकता का आकर्षण है। आप के चतुर्थ नायब मो 0 समरी के विषय में अबी मो 0 हसन इब्ने मकतब का कथन है कि मै बग़दाद में आपके चौथे नायब के समक्ष उपस्थित था तो देखा कि वह इमाम का लेख जो (तौक़ीय) के नाम से प्रसिद्ध है लोगों को दिखा रहे हैं उसके शब्द यह थे

अनुवाद , ऐ अली इब्ने मोहम्मद समरी ईश्वर तेरे भाईयों को तेरे दुख में अधिक पुण्य प्रदान करे क्योंकि तू छज् दिन में मरने वाला है अतः तैयार हो जा और किसी अन्य को अब वसीयत न कर कि वह तेरा उत्तराधिकारी हो क्योंकि ग़ैबते ताम्मा कुबरा (पूर्ण दीर्घ लुप्ति) का समय आ गया अब मैं प्रकट नहीं हूँगा। भगवान की आज्ञा के बाद तथा एक बड़े लम्बे समय के पश्चात ऐसा होगा जबकि लोगों के ह्रदय कठोर हो जायेंगे और पृथ्वी अत्चाचार से परिपूर्ण हो जायेगी। निकट भविष्य में कुछ व्यक्ति मेरे देखने का दावा करेंगे तो जो सुफ़यानी और आकाश की चीख़ से पूर्व मेरे देखने का करे वह झूठा द फसादी है , वलाहौल वलाकूवत इल्ला बिल्लाहै ईश्वर के सिवा कोई शक्तिशाली नही

आवश्यक टिप्पणीः-

चूँकि इस पुस्तक मे अति संक्षेपण को दुष्टिगत रखा गया है अतः विस्तृत शीषर्क उदाहरणार्थ ,ग़ैबत का फलसफ़ा स्थान , काल , लाभ , लम्बी आयु , मार्गदर्शन के कार्य , एंव अन्य विस्तृत बिन्दुओं के लिये अन्य पुस्तकों को देखा जा सकती है। इन सभी शीर्षकों को हमने आसारे क़यामत एंव इरफ़ने इमामत नामक अपनी पुस्तको में एकत्र कर दिया है।

मनन एंव चिन्तन हैतु आमंत्रण

(दावते फिक्र व तअक्कुल)

आवश्यक बातेः-

अब इस तथय को पृथ्वीवासियों में से कोई बुद्धिजीवी नकार हहीं सकती कि बीते समय के कुछ वर्षों में भूमण्डल में जो घटनाए परिस्थितियां एंव उथल-पुथल दृष्टिगाचर हुऐ हैं विशेष रुप से मानव की भौतिक उन्नति चिस चरम सीमा तक गयी है सम्भवता उसका उदाहरण संसार के विगत इतिहास में मिलना कठिन है , सभ्यता संस्कृति समाजिक व व्यवहारिक देखने योग्य परिवर्तन सैक़ड़ों आश्चर्यजनक मामलात तथा विश्व स्तर के रकजनैतिक परिवर्तनों ने अब जो रुपधार लिया है इन सब ते यह सिद्ध हो चुका है कि वास्तव में समय तीर्वता से परिवर्तनशीब है। नित्य समाचार पत्रों के अध्ययन एंव आकाश वाणी से विश्व सूचनाएँ समाचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है पापों के अधिक्य ने अब जो रुप धार लिया है वह सोच से परे है और अत्यंत खेदजनक है। अपराध की स्थिति ने जो रुख़ अपनाया वह अत्यंत ही आश्चर्यजनक है , कि अब अपराध ने कलात्मक रुप धारण कर लिया है। तथा प्रशासन उसका संरक्षण करते हैं। आज पाप और अपराध का बोध समाप्त हो गया है। पाप , पाप नहीं रहा बल्कि प्रत्येक आने वाला दिन बीते हुए से अधिक बुरा आता है ऐसे आतंक युत समय में क्या मुसलमान के रुप में हमारा यह कर्तव्य नहीं कि हम अपने मार्गदर्शकों और पूर्वजों के कथनों पर मनन एंव चिंतन करें जिन्होनें लगभग 1350 वर्ष पूर्व अपने शब्दों में इस समय का चित्रण करते हुए इस संसार के परिणाम से सचेत किया हो और सदाचारी बनकर जीने का निर्देश दिया है ईश्वर के लिये न्याय की दृष्टि से सोचिये कि क्या हमारे ईमान में बढ़ोत्तरी के लिये यह बात पर्याप्त नही कि पैग़म्बर साहब व अन्य मासूम इमामों ने जिलको विशेष ज्ञान भगवान से प्राप्त हुआ था उन्होने जो कुछ कहा था वह आच अक्षरशः ठीक नहीं सिद्ध हो रीक है और क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं कि ईश्वर वाणी रुपी कथन जो कुछ भविष्य के लिये कहा है वह शब्दतः ठीक एंव उचित होगा।

यदि हम पक्षपात से ऊपर उठकर सोचें कि जिनमहापुरूषों ने हमें भविष्य सम्बन्धी समाचार दिये हैं यद्पि देखने में वह हमारी तरह के मनुष्य थे वरन् भगवान ने उन्हे विशेष ज्ञान प्रदान किया था जिसके कारण उनकी दृष्टि प्रलय तक होने वाली घटनाओं को लेख रही थी तो यह कोई आश्चर्य की बीत नहीं और किसी को यदि अपनी संकिचित दृष्टिकोण तथा अन्धविश्वास के कारण आश्यर्य हो तो उसके लिये यह पर्याप्त है कि जो लक्षण उन महानुभाव ने बताचें हैं पूर्व काल से पुस्तकों में उनका उल्लेख है और एक लम्बा समय पीत जाने पर भी आच ठीक-ठाक पूर्ण रूप से विदित हो रहे हैं तथा जो शेष है वह भी ईश्वर ने चाहा तो होकर रहेगा। यदि हमे उनसे कितनी ही घृणा क्यों न हो इन लक्षणों का पूर्ण होना स्वंय उन मुहानुभवों के सत्यवादी होने का प्रमाण है और जब उनका कथन सत्य ही सत्य है तो अवश्य ही वह हमसे उत्तम एंव श्रेष्ठ हैं और भगवान की ओर से विशेष ज्ञान लेकर आये थे अन्यथा हमारी दशा तो यह है कि हमको अपने एक दिन बाद का ज्ञान नहीं कि क्या होगा दिन तो दैर एक पल का भी पता नहीं कि क्या कुछ होने वाला है। यह कहकर किसी बात की उपेक्षा करना तो बड़ा सरल है कि यह बातें एक विशेष प्रकार के विश्वास रखने वाले व्यक्तियों की ओर से लिखी जाती है या कुछ हदीसें वर्ग विशेष के सिद्धान्तनुसार उल्लेखित है , किन्तु मुझे खेद है कि ऐसे लोगों पर कि यदि वह निर्मल मन व ह्रदय से और श्रद्धापूर्ण मन से पक्षपात से परे हकर तनिक देखें कि इस वर्ग के पथ पर दर्शक कितने उत्तम व श्रेष्ठ थे तथा उनका ज्ञान कितना वृहत था जिन्होनें अपने ज्ञान से एक-एक बात से हमें अवगत करा दिया तथा अन्धकार के परदे फाड़ दिये। अब यदि चह कहा जाये कि इन वर्णित कथनों का प्रमाण क्या है इस सम्बन्ध में मैं संक्षेप उत्तर यह दूँगा कि आप प्रमाण न ढूँढे वरन् यह देखें कि उन्होने तेरह सौ वर्ष पूर्व जो कहा था वह आज हो रहा है या नहीं यदि आज वह सब कुछ हो रहा है तो यह स्वंय इस बात का प्रमाण है कि यह उन्ही का कथन है सम्भव है कि क्षणिक समय हैतु या आस्था की तीव्रता के कारण यह बात इस समय स्वीकार्य न हो किन्तु हर आने वाला लक्षण जो इस पुस्तक में इंगित है वह भगवान ने चाहा तो पूर्ण होने पर विवश कर देगा तथा उनके उत्तम व श्रेष्ठ होने एंव अद्भुत ज्ञानी होने का विश्वास करा देगा। इर प्रकार तर्क समाप्ति की श्रेणयाँ इमामे मेहदी के प्रकट होने के पूर्व ही सम्पनन हो चुकी होगीं। यदि इतनी स्पष्ट व प्रज्वलित संकेतों को भी कोई अस्वीकार कर दे और प्रकाश प्राप्त करने का प्रयास न करे तथा स्वयं को अन्धकार का बंदी बनाये रखे तो फिर सादी के कथनानुसार

गर नबीनद बरोजे शीर – ए – चश्म

आफताब रा चे गुनाह

यदि कोई दिन के प्रकाश को देख न पाय तो सूर्य के प्रकाश का क्या दोष वास्तव में इन लक्षणों के उल्लेख करने का मात्र यह ध्यये था कि प्रत्येक मुसलमान ऐसे आतंक युक्त समय में अपने को पापों से बचाये रखते हुऐ पवित्र जीवन व्यतीत करने का प्रयास करे ताकि प्रलय के दिन भगवान एंव रसूल के सम्मुख लज्जित न होना पड़े किन्तु खेद है कि हमने सब कुछ बिसार के धर्म ज्ञानियों से इतना बेगाने हो गये कि मानों हमारा उनसे दैर का भी सम्बन्ध नहीं , इसी कर्म का फल पिछले थोडे दिनों में संसार ने लेख लिया कि वह भाग जहाँ से इसलाम को उन्नति प्राप्त हुई थी , जहाँ इस्लाम के नूर की किरनें फैली थीं वहीं क्षेत्र अपने दुराचारों के कारण इतना अपमानित हो गया कि मुट्ठी भर यहूदियों ने वहाँ के बसने वाले नाम मात्र मुसलमानों के ह्रदच में नासूर का कार्य करेगा। एक सम्मानित मुसलमान के लिये बैतुल मक़दस (मुसलमानों का प्रथम किब्ला) और इसराईल की मिली जुली कल्पना ह्रदय और मन के लिऐ दुःखद सिद्ध होती रहेगी। जब तक कि बैतुल मुक़द्दस पर मुसलमानों का पुनः अधिपत्य नहीं होता जो अवश्य होकर रहोगा। इसलिए कि यह सूचना दी जा चुकी है कि इमाम मेहदी बैतुल मुक़दस में नमाज़ पढेंगे और वहाँ ठहरेगें।

किन्तु प्रश्न तो यह है कि मुसलमान अपने समय के इमाम को गहचानने की ओर ध्यान क्यों नहीं देता जबकि कुरान तथा हदीसों में उनका उल्लेख है क्या मुसलमानों को पैग़म्बर की इस हदीस का स्मरण नहीं कि जो मनुष्य अपने काल के इमाम को पहचाने बिना मृत्यु को प्राप्त हुआ तो वह कुफ़्र और अपमान की मृत्यु मरा। अर्थात दिखावटी रुप में मुसलमान होते हुए काफ़िर मरा। अब अगर इस हदीस के सत्य होने का प्रमाण माँगा जाये तो तहस्त्रों प्रमाण के अतरिक्त इस हदीस का कुरान से सम्बन्धित होना इसके सत्य होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। कुरान का स्पष्ट कथन है कि हम प्रलय में हर मनुष्य को उसके इमाम के साथ बुलायेंगे , से ज्ञात होता है कि हर काल के लिये कुरान और हदीस के अनुसार इमाम का अस्तित्व आवश्यक है तथा पिछले व्यक्तव्य से स्पष्ट हो चुका है कि इस युग के इमाम हज़रत मेहदी (अ 0) के अतिरिक्त कोई अन्य नहीं , इस पर अधिकतर मुसलमान सहमत हैं। फिर मुसलमान उनके परिचय ते क्यों अनभिज्ञ हैं , कहीं ऐसा न हो कि वह प्रकट हो जायें और हम ज्ञान के अभाव के कारण उन्हें पहचान न सके तथा ऐसी दशा में हम यदि संसार से उठे तो मुसलमान होने के स्थान पर काफिर उठें और दोनों लोकों में घाटे में रहे। मुसलमानों का इमाम से अनिभज्ञ होने तथा उनकी अज्ञानता का निष्कर्ष है कि दुनिया के विभिन्न कोने से इमाम मेहदी बनने की सूचनाऐ सुनी जाती हैं तथा विभिन्न रंग रुप में झूठे व्यक्ति इमाम मेहदी बनने का प्रयास कर रहे हैं और मैं उल्लेख कर चुका हूँ कि झूठों का बनना ही किसी मूल मेहदी के होने का प्रमाण है। कहीं क़ादयान से मिर्ज़ा गुलाम अहमद का नाम लिया जा रहा है तो कहीं वाबी व बहायी बों दावा कर रहे हैं कि वह तो ईरान में जन्म बे चुके तथा समाप्त भी हो गये। लेकिन इन सब का झूठ इससे स्पष्ट हो जाता है कि मूल इमाम के आने के जो लक्षण पुस्तकों में जो उल्लेखित हो चुके हैं उनमें से अभी अनेकों शेष हैं जैसे कि इस पुस्तक में मैनें लिखी है तथा लक्षणों को एकत्र किया है। अतः उक्त समय से पूर्ण जितने भी बनने वाले बनते रहेंगे वह झूठे होंगे।

किन्तु सत्य असत्य के समझने तथा सज्चे झूठे को पहचानने हैतु प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है कि वह सन्देह से ऊपर उठ कर विश्वास एंव श्रद्धा पूर्वक अपने युगके इमाम की विशेषीतांए , परिस्तिथियाँ , उनका हुलिया , उनके प्रकट होने के लक्षणों का जानकारी प्राप्त करके उनकी प्रतीक्षा करें तथा अपने को कुफ़्र की मौत से बचा बे। मैनें इस संक्षेप पुस्तक अत्यंत प्रयास किया है कि प्रकट होने के विशेष लक्षण एकत्र कर दिये जायें ताकि कुरान हदीस - - पैग़म्बर के आदेशों का पालन हो सके और हमारे ज्ञान की जिज्ञासा व प्रतीक्षा में बढोत्तरी का कारण बन जाये तथा निष्कर्ष में संकलन का उद्देश्य प्राप्त हो जाये।