तारीखे इस्लाम भाग 3

तारीखे इस्लाम भाग 30%

तारीखे इस्लाम भाग 3 लेखक:
कैटिगिरी: इतिहासिक कथाऐ

तारीखे इस्लाम भाग 3

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

लेखक: जनाब फरोग़ काज़मी साहब
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तारीखे इस्लाम भाग 3
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तारीखे इस्लाम भाग 3

तारीखे इस्लाम भाग 3

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

हज़रत अबुबकर बिन अबुक़हाफा

तारुफ़

तारीख़ की किताबों से यह पता नहीं चलता कि आकी तारीखे पैदाइश क्या है ? अलबत्ता बाज़ मुवर्रिख़ीन का ख़्याल है कि आप हज़रत रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे वालेही वस्सल्लम से सवा दो बरस या तीन बरस छोटे थे और सन् 583 में पैदा हुए। लेकिन सही बुख़ारी बाबुल हिज़रत की एक रवायत से पता चलता है कि जब रसूले अकरम स 0 मक्के से मदीने के लिये रवाना हुए तो आगे ऊँट पर हज़रत अबुबकर सवाए थे क्योंकि यह बूढ़े थे और उन्हें लोग पहचानते थे।

नाम की वजह तसमिया के बारे में मशहूर मिस्री मुवर्रिख़ मुहम्मद हुसैन हैकल का बयान है कि “ बकर अरबी में जवान ऊँट को कहते हैं। ” चूंकि हज़रत को ऊँटों की परवरिश व परदाख़्त और इलाज व मुआलेजे का शौक़ ज़्यादा था और आप इसी नाम से मशहूर हो गये। ”

जमान-ए-कुफ्र में हज़रत अबुबकर का असली नाम अब्दुल काबा था। इस्लामन लाने के बाद अब्दुल्ला हुआ लेकिन आपकी कुन्नियत ने किसी नाम को उभरने न दिया और सारी दुनिया आपको अबुबकर ही के नाम से जानती है।

हुलियाः-

अब्दुल रहमान बिन हाफ़िज़ अमरुद्दीन ने अपनी किताब “ अबुबकर की सवाहेह उमरी ” में तहरीर किया है कि “ हज़रत अबुबकर का रंग सफेद ज़र्दी माएल था। ” बदन छरहरा , पेशानी बाहर को निलकली हुई और आंखे अन्दर धंसी हुई मालूम होती थी। रुख़सार इस क़दर पिचके थे कि चेहरे की रगें उभरी रहती थी , दाढ़ी हर वक़्त ख़िज़ाब से रंगीन रहती थी और ख़ास बात यह थी कि हाथ की उंगलियो पर बाल नदारद थे।

इब्तेदाई ज़िन्दगीः

हज़रत अबुबकर के बचपन या जवानी के वाक़ियात बहुत कम तारीख़ की किताबों में मिलते हैं और जो वाक़ियात है भी उनसे यह पता नहीं चलता है कि आप की इब्तेदाई ज़िन्दगी के ख़दो ख़ाल क्या थे ? जिस वक़्त आप मुसलमान हुए उस वक़्त आपके वालिद अबुक़हफ़ा ज़िन्दा थे मगर यह पता नहीं चलता कि आप के वालिद पर आपके इस्लाम लाने का क्या असर हुआ और न ये मालूम है कि आपने अपनी ज़िन्दगी में अपने बाप अबुक़हाफ़ से क्या असर कुबूल किया।

वालदैनः-

हज़रत अबुबकर के वालिद का नाम उस्मान बिन आमिर और कुन्नियत अबुक़हाफ़ा थी। वालिदा का नाम सलमा था जो सख़र बिन अमरु की साहबज़ादी और अबुक़हाफा की चचा ज़ाद बहन थीं। फ़तेह मक़्क़ा के बाद सन् 6 हिजरी में उन्होंने इस्लाम कुबूल किया और 67 बरस की उम्र में सन् 14 हिजरी में वफ़ात पाई। इस तरह वह कुल चार साल कुछ माह मुसलमान रहे बाक़ी ज़िन्दगी कुफ़्र के अंधेरों में गुज़री।

हज़रत अबुबकर का मुसलमान होना

हज़रत अबुबकर के मुशर्रफ व इस्लाम होने का मसअला इख़तेलाफ़ी है। बाज़ उलमा का ख़्याल है कि हज़रत अबुबकर पहले शख़्स हैं जो पैग़म्बर स 0 के मबऊस व रिसालत होते ही इस्लाम लाये। बाज़ ने खुश एतक़ादी की बिना पर आप को हज़रत ख़दीजा स 0, हज़रत अली अलै 0 और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा स 0 के बाद चौथे नम्बर पर रखा है और बाज़ का ख्याल है कि जिस वक़्त आप ने इस्लाम कुबूल किया है उस वक़्त पचास से ज़्यादा लोग मुसलमान हो चुके थे।

हज़रत अबुबकर के मुसलमान होने का असल सबब क्या था ? इस ज़ैल में शाह वली उल्लाह मोहद्दिस देहलवी का कहना है कि हज़रत अबुबकर के मुसलमान होनो का सेहरा काहिनों और नुजूमियों के सर है क्योंकि आपने नुजूमियों से सुन रखा था कि इस्लाम अनक़रीब तर्की करके सीरी दुनिया में फैल जायेगा इस लिये आपने इस्लाम इख़्तियार कर लिया।

शाह मोहद्दिस की तहरीर से ये बात वाज़ेह है कि इस्लाम के मुहासिन और उसकी अफ़ादियत के तहत हज़रत अबुबकर ने इस्लाम नहीं कुबूल किया बल्कि अपने मुफ़ाद , हुसूले मक़सद और मुस्तक़बिल को मद्दे नज़र रखते हुए दायरये इस्लाम में दाख़िल हुए थे।

सक़ीफ़ा की कार्रवाईः

पैग़म्बरे इस्लाम सब 0 की वफ़ात के बाद उनकी “ मौत व हयात ” के बारे में हज़रत उमर ने जो हंगामा “ ब-ज़ोरे शमशीर ” बरपा कर रखा था वह हज़रत अबुबकर की अफ़सूँगरी से ख़त्म हो गया मगर उसने अन्सार के ज़ेहनों में एक हलचल पैदा कर दी और उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि तहरीरे वसियत पर हंगामा , जैश उसामा से तख़ल्लुफ़ और मौत ऐसी वाज़ेह हक़ीक़त से इन्कार आख़िर यह सब क्या है ? कहीं ये सब चीज़ें एक ही ज़ंजीर की कड़ियाँ तो नही हैं ? यह मसला इतना पेचिदा न था कि उन्हे किसी नतीजे पर पहुँचने में दुश्वारी होती। उन्होंने बड़ी आसानी से समझ लिया कि यह सारी तदबीरें ख़िलाफ़त के उसके अस्ल मक़सद से हटाने और दूसरी तरफ़ मुन्तकिल करने के लिये की जा रही हैं। चुनांचे उन्होंने हालात की तबदीली और मौक़े की नज़ाकत को नज़र में रखते हुऐ फ़ौरी तौर पर सक़ीफ़ा बनी साएदा में एक इजतेमा किया ताकि अन्सार में से किसी एक के हाथ पर बैयत करके वह मुहाजरीन के इस मनसूबे को नाकाम बना दें। अगर अन्सार को यह यक़ीन होता कि मुहाजरीन हज़रत अली अले 0 के बरसरे इक़तेदार आने में मज़ाहिम नहीं होंगे तो वह न यह बज़में मशावरत क़ायम करते औऱ न इस सिलसिले में जल्दबाजी से काम लेते। उनके दिलों की आवाज़ वही थी जो सक़ीफ़ा में बैयत के हंगामें के मौक़े पर बुलन्द हुई कि “ हज़रत अली अलै 0 के अलावा और किसी की बैयत नहीं करेंगे ”

बाहमीं चशमक औऱ आपसी रंजिश के बावजूद इस इजतेमा में “ ऊस औऱ “ ख़िज़रिज ” दोनों क़बीले शरीक हुए इसलिये कि उन दोनों को मुहाजरीन के एक तबक़ा की बालादस्ती गवारा न थी और न यह लोग मुहाजरीन के इक़तेदार को अपने हुकूक के तहफ़्फुज़की ज़मानत समझते थे।

ख़िज़रिज के लोग इस इजतेमा के इन्तेज़ाम व एहतेमाम में पेश थे और उन्हीं में की एक मुम्ताज़ शख़्सियत साद बिन अबादा सदर मजलिस थे जो नसाज़ी तबा की वजह से रिदा ओढ़े मसनद पर बैठे थे। उन्होंने अपनी तक़रीर में कहा , ऐ गिरोहे अन्सार। तुम्हें दीन में जो सबक़त और फ़ज़ीलत हासिल है वह अरब में किसी को भी हासिल नहीं है। पैग़म्बरे अकरम स 0 दस बरस तक अपनी क़ौम को ख़ुदा परस्ती की दावत देते रहे मगर गिनती के चन्द आदमियों के अलावा कोई उन पर ईमान न लाया और चन्द आदमियों के बस की बात यह नहीं थी कि वह आंहज़रत स 0 की हिफ़ाज़त का ज़िम्मा लेते और दीन की तक़वियत का सामना करते। ख़ुदा ने तुम्हें यह तौफ़ीद दी कि तुम ईमान लाये और पैग़म्बर स 0 के सीना सिपर रहे , मैदान जंग में उतरे और दुश्मनों से लड़े। तुम्हारी ही तलवारों सरे अरब के तरकशों के सर ख़म हुए और तुम्हारे ही ज़ारे बाज़ू से इस्लाम को औज व ऊरुज हासिल हुआ। पैग़म्बर स 0 दुनिया से रुख़सत हो चुके हैं , अब तुम्हारे अलावा मनसबे ख़िलाफ़त पर अपनी गिरफ़्त मजबूत कर लो।

साद बिन अबादा की इस तक़रीर की ताईद सबने की और कहा कि हम आप को मनसबे ख़िलाफ़त पर फ़ाएज़ देखना चाहते हैं। अगर यह मामला तन्हा अन्सार का होता ता बैयत की तक़मील के बात इसका फैसला साद के हक़ में हो चुका होता मगर इसके साथ यह ख़दशा भी लाहक़ था कि अगर मुहाजरीन ने मुख़ालिफत की तो क्या होगा ? चुनांचे इस ज़हनी ख़लिश के नतीजे में यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि अगर मुहाजरीन ने मुख़ालेफत की तो इस मसले को किस तरह सुलझाया जा सकेगा। उस पर कुछ लोगों ने कहा हम में से हो और एक तुम में से। उस पर साद ने कहा कि यह पहली और आख़री कमज़ोरी होगी।

और यह हक़ीक़त है कि अगर अन्सार के अज़ाएम व इरादों से पुख़्तगी होती तो वह यह सोचते ही क्यों कि इक़तेदार को दो हिस्सों में तक़सीम किया जा सकता है बल्कि वह अपने नज़रियात व ख़्यालात को अगली जामा पहना देते और मुहाजरीन की मज़ाहमत से पहले बैयत कर चुके होते मगर उन्होंने एहसासे कमतरी में मुबतिला होकर मौक़ा हाथ से खो दिया।

इस इजतेमा में अगर चे “ ऊस ” के अफ़राद भी शरीक थे मगर उनकी शिरकत महज़ इस गरज़ से थी कि वह दूसरों के यह तअस्सुर न दें कि अन्सार में बाहमी इत्तेहाद व यकजहती नहीं है वरना दिल से उन्हें ख़िज़रिज का इक़तेदार हरगिज़ गवारा न था क्योंकि यह दोनों हरीफ़ व मुतहारिब ख़ानदान थे और इस्लाम में दाख़िल होने से कुछ अरसे पहले उनके दरमियान एक ख़ंरेज जंग भी हो चुकी थी जंग बास के नाम से मौसूम है। अगर चे इस्लाम ने काफ़ी हद तक उनकी बाहमीं कदूरतों को ख़त्म कर दिया था मगर इसे इन्सान की कमज़ोरी कहिये या इन्सानी फ़ितरत का ख़ासा कि वह एक दूसरे को हरीफ़ व मद्दे मुक़ाबिल ही की नज़रों से देखते रहे और एक का इम्तेयाज़ दूसरे को खटकता रहा। चुनांचे इस मौक़े पर भी ऊस के दो आदमियों ने मुख़बरी की और हज़रत उमर को ख़ुफ़िया तौर पर इस इजतेमा की इत्तेला दे दी जिस पर हज़रत उमर बहुत सटपटाये और अपने दो हमनवाओं के साथ इस इजतेमा को दरहम बरहम करने पर आमदा हो गये। इब्ने असीर का कहना है कि हज़रत उमर ने हज़रत अबुबकर को ख़बर दी और वह दोनों अबू उबैदा को साथ लेकर सक़ीफ़ा की तरफ़ तेज़ी से चल पड़े। (तारीख़ कामिल जिल्द 2 सफ़ा 222)

जब यह तीनों आदमी हांपते कांपते सक़ीफ़ा बनी साएदा में अचानक वारिद हुए तो अन्सार उन्हें देखकर हैरत ज़दा रह गये और राज़ के अफ़शा हो जाने से उन्हें अपनी कामयाबी मशकूक नज़र आने लगी । इधर ऊस को भी मौक़ा सिल गया कि वह उन मुहाजेरीन का सहारा ले कर अपने हरीफ क़बीला के मनसूबे को नाकाम बनायें। हज़रत उमर ने आते ही मजमें पर एक निगाह डाली और साद बिन उबैद को चादर में लिपटे हुए देख कर पूछा कि यह कौन है ? बताया गया कि यह साद बिन उबैदा हैं जो सदर मजलिस औऱ ख़िलाफ़त के उम्मीदवार हैं। हज़रत उमर की तेवरियां बदलीं और उन्होनें मजमें को मुख़ातिब करके कुछ कहना चाहा मगर अबुबकर ने इस ख़्याल से कि उनकी वजह से कहीं मामला बिग़़ न जाये उन्हें रोक दिया , खुद ख़ड़े हो गये और तक़रीर करते हुए कहा कि ख़ुदा ने पैग़म्बर स 0 को उस वक़त भेजा जब हर तरफ़ बुतों की पूजा हो रही थी , आप बुत परस्ती को ख़त्म करने और ख़ुदा परस्ती का पैग़ाम देने के लिये उठ खड़े हुए मगर अहले अरब ने अपना आबाई मज़हब छोड़ना गवारा न किया। ख़ुदा ने मुहाजेरान अव्वालीन को ईमान व तसदीक़ रिसालत के लिये मुनतख़ब किया। उन्होंने ईमान लाने के बाद अपने क़बीला वालों की ईज़ा रसानियों पर सब्र व ज़ब्त से काम लिया और तादाद में कम होने के बावजूद हरासां न हुए। उन्होंने रुए ज़मीन पर सबसे पहले अल्लाह की परसतिश और सबसे पहले अल्लाह के रसूल अ 0 पर ईमान लाये। यही लोग रसूल अल्लाह स 0 के कुन्बे के अफ़राद और उनके वली व दोस्त हैं , लेहाज़ा उनसे बढ़ कर नज़ा करेगा वह ज़ालिम क़रार पायेगा। ऐ गिरोहे अन्सार! तुम्हारी दीनी फज़ीलत और इस्लामी सबक़त भी नाक़ाबिल इनकार है। अल्लाह ने तुम्हें इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम स 0 का हामी व मददगार बनाया और तुम्हारे शहर को दारुल हिज़रत क़रार दिया। हमारे नज़दीक मुहाजेरीन अव्वालीन के बाद तुम्हारा मर्तबा सबसे बुलन्द तर है , लेहाज़ा हम अमीर होंगे और तुम वज़ीर होंगे और कोई मामला तुम्हारे मशविरे के बग़ैर तय नहीं पायेगा।

हज़रत अबुबकर का यह ख़ुतबा उनकी मामला फ़हमीं और सियासी तदब्बुर का आईनादार है। यह सिर्फ़ मुदब्बराना सूझ बूझ का नतीजा था कि उन्होंने हज़रत उमर को इफ़तेताहा तक़रीर से मना कर दिया ताकि उनकी ज़बान से कोई ऐसा जुमला न निकल जाये जिससे अन्सार के जज़बात भड़क उठें और फिर उन्हें अपने ढ़र्रे पर लगाना मुश्किल हो जाये। अबुबकर की मसलहत अंग्रेज़ निगाहें देख रही थीं कि यह मौक़ा सख़्ती बरतने का नहीं है बल्कि नर्मी और हिक्मत अमली से काम निकालने का है। चुनांचे उन्होंने अपने नपे तुले अल्फ़ाज़ से अन्सार को मुतासिर करके उनका जोश कम किया। उन्हीं मुहाजिरीन का मुशीर क़रार दिया और विज़ारत की पेश कश से उनकी दिल जोई की। इस ख़ुतबे की नुमाया ख़ुसूसियत यह है कि फ़रीक़ मुख़ालिफ़ होते हुऐ भी अबुबकर ने अपने को इस इजतेमा में एक फ़रीक़ की हैसियत से पेश नहीं किया बल्कि वह अन्दाज़ इख़्तियार किया जो एक सालिस और ग़ैर जानिबदार शख़्स का होता है। और एक मुबस्सिर की तरह दोनों गिरोहों के मर्तबा व मुक़ाम का जाएज़ा लिया ताकि शऊरी या लाशऊरी तौर पर मुहाजेरीन व अन्सार का सवाल पैदा न हो जाये। अगर मुहाजेरीन व अन्सार का सवाल उठ खड़ा होता तो फिर ख़ुदा जाने हालात क्या रुख़ इख़्तियार करते। मुम्किन था कि क़ौमी व क़बाएली असबियत जो अरब की घुट्टी में पड़ी हुई थी उभर आती और हर गिरोह इक़तेदार को अपनाने की कोशिश करता , ख़ाना जंगी तक नौबत पहुंचती और कामयाबी मशकूक हो कर रह जाती। इस सिलसिले में मज़ीद एहतियात यह बरती कि अन्सार के मुक़ाबिले में आम मुहाजेरीन को लाने के बजाये मुहाजेरीन के एक ख़ास तबक़ा को जो अव्वलीन कहलाता था , पेश किया ताकि अन्सार को यह तअस्सुर दिया जा सके कि यहां क़ौमी व क़बाएली तक़ाबुल नहीं है बल्कि अवल्लियत व अफ़ज़लिल्यत के लिहाज़ से शख़्सी जाएज़ा है और फिर इस तअस्सुर को मुश्तहकाम करने के लिये जहाँ मुहाजेरीन अव्वलीन के औसाफ गिनवाये वहां अन्सार के औसाफ़ गिनवानें में भी फ़िराख़ दिली से काम लिया। यूं तो मुहाजेरीन के और भी औसाफ़ गिनवाये जा सकते थे मगर उन्होंने सिर्फ उन्हीं औसाफ़ का ज़िक्र किया जो नाक़ाबिल तरदीद थे।

अन्सार में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे यह एतराफ़ न हो कि मुहाजेरीन अव्वालीन में एक गिरोह इसलाम के मामले में अन्सार पर सबक़त रखता है और उनका क़बीला भी वही है जो हज़रत रसूले ख़ुदा स 0 का था कि उसकी तरदीद में आवाज़े बुलन्द हो जातीं और इसके नतीजे में इस्तेहक़ाक़ ख़िलाफत मुतासिर होता। अलबत्ता इस सिलसिले में यह कहा जा सकता था कि मुहाजेरीन की सबक़त भी तसलीम और पैग़म्बर स 00 का हम क़बीला होना भी गवारा मगर इससे इस्तेहाक़ ख़िलाफ़त का सुबूत किस शरयी दलील की रु से फ़राहम होता है और अगर यही इस्तेहक़ाक़ ख़िलाफ़त की दलील है तो क्या हज़रत अली अलै 0 मुहाजेरीन अव्वालीन में साबिक़ औऱ क़राबत के लिहाज़ से सबसे क़रीब तर नहीं हैं ? फिर उनके होते हुए किसी और का इस्तेहाक़ क्यों ? इस एतराज़ को अन्सार के हक़ विज़ारत का एलान करके दबा दिया गया इस तरह कि अगर अन्सार इस दलील को मुस्तरिद करके मुहाजेरीन के इस्तेहक़ाक़े ख़िलाफ़त पर मोतरिज़ होते तो इस दलील को भी मुस्तरीद करना पड़ता जो उनके इस्तेक़ाक़ विज़ारत के हक़ में थी। इस विज़ारत की पेश कश ने यह वसवसा भी अन्सार के दिलों से दूर कर दिया कि उनके हक़ूक़ पर कोई सख़्ती व ज़ियादती होगी। इसलिये कि विज़ारत जो तकमिलय ख़िलाफ़त पर कोई सख़्ती व ज़ियादती होगी। इसलिये कि विज़ारत जो तकमिलय ख़िलाफ़त है उनके हक़ूक़ के तहफ़्फुज़ की ज़मानत है। यह दूसरी बात है कि विज़ारत का कोई ओहदा न हज़रत अबुबकर के दौर में क़ायम हो सका और न हज़रत उमर के तवील दौर में। और जब ओहदा ही नहीं है तो ओहदा पर तक़रुरी का क्या सवाल ? अलबत्ता हज़रत उस्मान के दौर में विज़ारत के ओहदे के मसावी कातिब का ओहदा था मगर अमवी के होते हुए एक अन्सारी को यह एज़ाज़ कैसे मिल सकता था।

हज़रत अबुबकर की तक़रुरी से अफ़राद “ ऊस ” ने जो अपने हरीफ़ क़बीला “ ख़िज़ारिज ” की इमारत पर ख़ुश न थे , अच्छा असर लिया और सर झुकाये खामोश बैठे रहे लेकिन “ ख़िज़रिज ” ख़ामोश न रहे। उनके नुमाइन्दा हबाब बिन मनज़िर ख़ड़े हो गये और उन्होंने कहा की ऐ गिरोह अन्सार! तुम अपने मौख़ूफ पर मज़बूती से जमे रहो। यह लोग तुम्हारे ज़ेरे साया आबाद हैं , किसी में यह हिम्मत व जराएत नहीं हो सकती कि वह तुम्हारी राय की ख़िलाफ़वर्ज़ी कर सके। तुम्हारे पास इज़्ज़त , सरुत , ताक़त और शुजाअत सब कुछ है। न तुम तादाद में उनसे कम हो और न तजरुबे व जंगी महारत में यह तुम्हारे मुक़ाबिला कर सकते हैं। रसूलउल्लाह स 0 तुम्हारे शहर में आबाद हुए , तुम्हारी वजह से हरसरे आम अल्लाह की इबादत हुई , तुम्हारी तलवारों से क़बाएले अरब सरनगूं हुए , तुम्हारी वजह से इस्लाम का बोल बाला हुआ। तुम मनसबे ख़िलाफ़त के ग़ल्त दावेदार नहीं हो। अगर यह लोग तुम्हारा हक़ तसलीम नहीं करते तो फिर एक अमीर हमारा होगा और एक उनका होगा।

हबाब बिन मनज़िर के यह कहने पर बजाये इसके कि अन्सार के मक़सूल को कुछ तक़वियत हासिल होती फ़रीके सानी को उसकी तरदीद करके अपने मौकूफ़ को मज़बूत करने का मौका मिल गया। चुनानचे हजज़रत उमर ने फ़ौरन उसकी तरदीद करते हुए कहा , यह कहां हो सकता है कि एक वक़्त में दो हुक्मरां। खुदा की क़सम अरब इस पर क़तई रज़ामन्द न होंगे कि तुम्हें बरसरे इक़तेदार लायें जब कि नबी तुम में से नहीं हैं। लेकिन अरब को इससे इन्कार नहीं हो सकता कि हाकिम व वली अमर इस घराने से मुन्तख़ब हो जिस घराने में नबूवत है। लेहाज़ा जो पैग़म्बर स 0 की सल्तनत व इमारत के मामले में हम से टकरायेगा वह तबाह व बर्बाद होगा।

हज़रत उमर ने अपनी तक़रीर ख़त्म की तो हबाब फिर खड़े हुए और अन्सार से मुख़ातिब होकर पुर जोश लहज़े में कहा कि इसकी बातों पर ध्यान न धरो , तुम अपने मौकूफ़ पर क़ायम रहो , यह लोग ख़िलाफ़त में तुम्हारा हिस्सा रखना ही नहीं चाहते। लेहाज़ा अगर यह तुम्हारा मुतालिबा तसलीम न करें तो उन्हें अपने शहर से निकाल बाहर करो और जिसे चाहते हो उसे अमीर मुन्तख़ब कर लो। ख़ुदा की कसम तुम इनसे ज़्यादा ख़िलाफ़त के हक़दार हो क्योंकि तुम्हारी तलवारों से दीन फैला और लोग इस्लाम की तरफ़ झुके। अब अगर किसी ने मेरी बात की तरदीद की तो मैं अपनी तलवार से उसकी नाक काट लूंगा।

उस मुक़ाम पर ज़रुरत थी कि हबाब दौरे जाहेलियत की असबियत का मुज़ाहेरा करने के बजाये इस्लामी फ़ज़ा में बातचीत करते और तशद्दुद आमेज़ लहजा इख़्तियार करने के बजाये नर्म ग़ुफ़्तगारी इख़्तियार करते। चुनांचे को अपना हमनुवा बनाने में कामयाब न हो सके। अबुअबीदा जो मौक़ा व महल की नज़ाकत को समझ रहे थे ख़डे हो गये और उन्होंने अन्सार के दीनी जज़बात को झिंझोड़ते हुए कहा , ऐ गिरोहे अन्सार! तुमने हमारी नुसरत की , हमें अपने यहां पनाह दी , अब अपना तौर व तरीका न बदलो और साबका रोश पर बरक़रार रहो।

इस नर्म गुफ़्तारी का नतीजा यह हुआ कि ख़िज़रिज के लोग भी ढ़ीले पड़ गये और बशीर बिन साद ख़िज़रिजी ने हवा का रुख़ देखकर कहा कि ऐ गिरोहे अन्सार! अगर चे यह फज़ीलत हासिल है कि हमने मुशरेकीन से जेहाद किये और इस्लाम कुबूल करने में सबक़त हासिल की मगर हमारे पेशे नज़र सिर्फ़ अल्लाह की ख़ुशनूदी और उसके रसूल स 0 की इताअत थी। यह मुनासिब नहीं है कि हम दीन को दुनयावी सर बुलन्दी का ज़रिया बनायें और हुकूमत व इक़तेदार की तमन्ना करें। दीन तो अल्लाह की दी हुई एक नेमत है। पैग़म्बर स 0 कुरैश में से थे लेहाज़ा उनका क़बीला उनकी नियाबत का ज़्यादा हक़दार है। तुम लोग अल्लाह से डरो और ख़्वाह-म-ख़्वाह उनसे न उलझो। बशीर का यह कहना था कि अन्सार की यकजहती दरहम बहरम हो गयी , लोगों का रुख़ बदलने लगा , जो लोग इस तहरीक को लेकर उठे थे वही इसको कुचलने पर आमदा नज़र आने लगे। मुहाजेरीन को मौक़ा मिला कि वह इस अफ़रा तफ़री से फ़ाएदा उठायें चुनांचे अबुबकर खड़े हो गये और कहने लगे कि यह उमर है। और यह अबुउबैदा हैं। इन दोनों में से किसी एक की बैयत कर लो। उस पर हज़रत उमर ने कहा , आपका हक हम दोनों से ज़्यादा है , हाथ बढ़ाइये , हम आपकी बैयत करेंगे। हज़रत अबुबकर ने बग़ैर किसी तरद्दुद और तवक़्कुफ के अपना हाथ इस तरह आगे बढ़ा दिया कि गोया मामला तय शुदा हो मगर हज़रत उमर अभी बैयत करने न पाये थे कि बशीर बिन साद ने बढ़ कर अबुबकर के बढ़े हुए हाथ पर हाथ रख दिया और बैयत कर ली। फिर हज़रत उमर और अबु उबैदा ने बैयत की और इसके बाद ख़िज़रिज के लोग आगे बढ़े और उन्होंने बैयत की।

“ ऊस ” के नक़ीब असीद बिन हजीर ने ख़िज़ारिज को बैयत के लिये बढ़ते देखा तो अपने क़बीले वालों से उन्होंने कहा , खुदा की कसम! अगर ख़िज़रिज़ एक दफ़ा तुम पर हुक्मरां हो गये तो उन्हें हमेशा के लिये तुम पर फ़ज़ीलत व बरतरी हासिल हो जायेगी और वह तुम्हें इस इमारत में से कभी कोई हिस्सा नहीं देंगे लेहाज़ा उठो और अबुबकर की बैयत कर लो।

इस बैयत के हंगामें में हबाब बिन मनज़िर तलवार ले कर खड़े हो गये मगर उनके हाथ से तलवार छीन कर उन्हें बे दस्तो बा कर दिया गया। साद बिन आबाद पैरों तले रौंद दिये गये। हज़रत उमर की बन आई थी उनका जो नर्म लहजा शुरु में था अब सियासी ख़तरा टल जाने के बाद इसकी ज़रुरत नहीं रही , चुनानचे नर्म गुफ़्तारी ने सख़्तगीरी इख़्तियार की और साद बिन अबादा से तलख़ कलामी , हाथा पाई और दाढ़ी नोचने व नुचवाने की नौबत आ पहुंची। साद ने कहा यह मुनाफ़िक है जिस पर उमर ने कहा कि इसे क़त्ल कर दो , यह फ़ितना परदाज़ है।

साद बिन उबैदा जो अन्सार की जलीलुल कदर शख़्सियत और “ ख़िजरिज ” के रास व रईस थे , उनका जुर्म क्या था कि उन्हें गर्दन ज़दनी के क़ाबिल समझा गया और फितना परदाज़ करार दिया गया। अगर वह ख़िलाफ़त के उम्मीदवार थे तो दूसरे भी तशकीले ख़िलाफ़त ही के लिये आये थे। अगर हज़रत अबुबकर व हज़रत उमर का नज़रिया यह था कि पैग़म्बर स 0 की तजहीज़ व तकफ़ीन से पहले ख़िलाफत का तसफ़िया ज़रुरी है ताकि मुम्लिकात के नज़म व नसख़ में ख़लल न पड़े तो अन्सार का इजतेमा भी तो इसी ग़ैर आईनी व ग़ैर इस्लामी इजतेमा के ज़रिये ख़लीफ़ का इन्तेख़ाब किया था। और हज़रत उमर तो इसे हंगामी हालात की पैदावार समझते थे। चुनांचे वह कहा करते थे किः

“ अबूबकर की बैयत बै सोचे समझे नागहानी तौर पर हो गयी। आईन्दा अगर कोई ऐसा करे तो उसे क़त्ल कर दो ” ।

अल्लामा जमख़शरी का बयान है किः-

“ हज़रत अबुबकर ने ख़िलाफ़त का तौक़ इस तरह अपने गले में डाला जिस तरह छीना झपटी करके दूसरों के हाथ से कोई चीज़ छीनली जाती है या झपट्टा मार कर (चील की तरह) पंजों से उचक ली जाती है। ”

बावजूद यह कि हज़रत उमर इत तरीक़े कार के एक तरह से बानी थे मगर यह तरीक़ा हमेशा उनकी निगाहों में खटकता रहा और वह उसके दोहराने पर क़त्ल की सज़ा भी तज़बीज़ कर गये। क्या उनके नज़दीक यह तरीक़ेदार शरयी हुदूद के अन्दर न था ? अगर शरयी हुदूद के अन्दर और ज़ाबतए इस्लामी के मुताबिक था तो इसे दोहराने और उस पर अमल पैरा होने की सूरत में क़त्ल की सज़ा क्यों ? अगर शरयी हुदूद के बाहर था तो इस ग़लत और ग़ैर शरयी तरीक़कार से जो इन्तेख़ाब अमल में आया या इस इन्तेख़ाब पर जो इन्तेख़ाब हुआ वह क्यों कर सही क़रार पायेगा।

तशद्दुद आमेज़ बैयत

ख़िलाफ़त की मुहिम जब सर हो चुकी , हज़रत अबुबकर ख़लीफ़ा बन चुके और हज़रत उमर ख़लीफ़ा बना चुके तो यह लोग एक मुख़तसर सी जमाअत के साथ सक़ीफ़ा बनी साएदा से मस्जिदे नबवी की तरफ इस तरह रवाना हुए कि रास्ते में जो शख़्स भी नज़र आता था उसे पकड़ कर उसके हाथ अबुबकर के हाथों से मस करते और उससे बैयत लेते। बरार बिन आज़िब का बयान है कि यह लोग जिस किसी के पास से गुज़रते थे उसे खींच कर अबुबकर के सामने लाते और बैयत के लिये उसका हाथ पकड़कर उनके हाथों से मस करते ख़्वाह वह चाहे या न चाहे।

जब लोग मस्जिद नबवी में वारिद हुए तो कुछ हाशिये बरदारों को इधर उधर दौड़ाया गाय और उनसे कहा गया कि वह लोगों को पकड़ पकड़ कर बैयत के लिये ले आयें। चुनानचे कुछ लोग जमा किये गये और मस्जिद में जहां पास ही एक हुजरे में सरकारे दो आलम स 0 को गुस्ल व कफ़न दिया जा रहा था , तक़बीरों की गूंज , मैं बैयत का सिलसिला शुरु हो गया। बिलाज़री रक़मतराजड हैं कि “ हज़रत अबूबकर को मस्जिद में लाया गाया और लोगों ने उनकी बैयत की। अब्बास और अली अ 0 ने हुजरे से तकबीरों की आवाज़ें सुनीं वह अभी रसूलउल्लाह स 0 के गुस्ल से फ़ारिग़ न हुए थे ” ।

यह दुनिया की बेवफ़ाई और सर्द महरी की इन्तेहाई इबरत अंगेज़ मुरक़्का था कि एक तरफ़ सरकारे दो आलम स 0 की मय्यत रखी थी , रंज व ग़म से निढ़ाल आपके अज़ीज़ व अक़ारिब तजहीज़ व तकफ़ीन में मसरुफ़ थे और दूसरी तरफ़ इस ग़म अंगेज़ माहौल से बे नियाज़ हुक्मरां तबका़ तकबीर के नारों की गूंज में लोगों से बैयत ले रहा था। न किसी की आंख में आंसू थे न किसी के चेहरे पर मलाल के आसार। ऐसा लगता था जैसे कुछ हुआ ही न हो।

इस से इक़तेदार परस्तों के साथ अवाम की ज़ेहनियत का भी अन्दाज़ा होता है कि इक़तेदार की कूवत उन्हें कितनी जल्दी महसूस व मुतासिर करती है कि अज़ीम से अज़ीम हादसे के असरात भी मुज़महिल हो जाते हैं और वह फ़ौरन अपने आपको हुकूमत की ख़ुशनूदी व रज़ा जूई से वाबस्ता कर देते हैं। ऐसी सूरत में ये तवक़्को की ख़ुशनूदी व रज़ा जूई से वाबस्ता कर देते हैं। ऐसी सूरत में ये तवक़्को नहीं की जा सकती कि वह यह सोचने कि या इन्तेख़ाब क्यों और कैसे हुआ ? राये आम्मा के इसतेसवाब से हुआ या अरबाब हल व अक़द की सवाबे दीद का नतीजा था। अगर इस्तेसवाब राय से हुआ तो उन्हें इज़हारे राये कामौक़ा ही कब दिया गया और अगर यह अहले हल व अक़द का फ़ैसला है तो क्या मुहाजेरीन में तीन ही आदमी अहले हल व अक़द थे ? क्या हज़रत अली अलै 0? अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब ? सलमाने फ़ारसी , अबूज़र ग़फ़्फ़ारी , मिक़दाद , अम्मार यासिर , ज़ुबैर बिन अवाम और ख़ालिद बिन सईद ऐसे अमाएदीन व अकाबरीने मिल्लत और बनी हाशिम उनमें शामिल किये जाने के क़ाबिल न थे ? गर्ज़ आलम यह था कि लोग बे सोचे समझे हवा के रुख़ पर उड़ रहे थे वक़्त के सेलाब में बह रहे थे। अगर किसी ने नफ़रत व बेज़ारी का इज़हार किया या किसी क़िस्म की सदाये एहतेजाज बुलन्द की तो उसे डरा धमका कर या लालच दे कर ख़ामोश कर दिया गया और जिन लोगों की पुश्त पर ताक़त द कूवत थी उन्हें वक़्ती तौर पर नज़र अन्दाज़ कर दिया गया। चुनानचे सईद बिन उबैदा से फ़िलहाल बैयत का मुतालिबा ख़िलाफ़े मसलहत समझा गया और जब हज़रत उस्मान , अब्दुर रहमान बिन औफः सईद बिन अबी विकास , बनी उमय्या और बनी ज़हरा की तरफ़ से बैयत और ताईद हासिल हो गयी और हूकूमत में कुछ इस्तेहकाम पैदा हो चला तो उन्हें भी बैयत का पैग़ाम भेजा गया जिसके जवाब में सईद बिन उबैदा ने कहाः

“ ख़ुदा की कसम! मैं उस वक़्त तक बैयत नहीं करुंगा जब तक तीरों से अपना तरकश ख़ाली न करुं और अपने क़ौम व क़बीले के लोगों को लेकर तुम से जंग न कर लूं ”

हज़रत अबुबकर यह जवाब सुन कर ख़ामोश हो गये मगर हज़रत उमर ने बर फ़रोख़्त होते हुए कहा कि हम इससे बैयत लिये बग़ैर नहीं रहेंगे। उस पर बशीर बिन सईद ने कहा कि अगर सईद बिन उबैदा ने बैयत से इन्कार कर दिया है तो वह क़त्ल होना गवारा करेंगे मगर बैयत नही्ं करेंगे ओर अगर वह क़त्ल किये गये तो उनका ख़ानदान भी क़त्ल होगा और उनका ख़ानदान उस वक़्त तक क़त्ल न होगा जब तक क़बीला ख़िरुज क़त्ल न हो जाये और क़बीला ख़िज़रिज का क़त्ल होना उस वक़्त तक नामुम्किन है जब तक क़बीला ऊस ज़िन्दा है। दूर अन्देशी और मसलहत बीनी का तक़ज़ा यह है कि उन्हें उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया जाये चुनानचे सईद बिन उबैदा हज़रत अबूबकर के दौर में मदीने में ही रहे मगर उन्होंने न हुक्मरां जमात से कोई ताल्लुक रखक न उनके साथ नमाज़ों में शरीक हुए , न उनके साथ हज किया और न ही उनकी किसी मजलिस में शरीक हुए। मगर जब हज़रत उमर का दौर आया तो उन्होंने एक दफ़ा सईद को रास्ते में देख कर कहा कि क्या तुम वही ? सईद ने कहा , हां मैं वहीं हूं और मेरा मौक़फ़ भी वही है मैं तुमसे अब भी इतना ही बेजार हूं जितना कि पहले था। हज़रत उमर ने कहा , फिर मदीना छोड़ कर चले क्यों नहीं जाते।

साद ख़तरा तो महसूस ही कर रहे थे हज़रत उमर के तेवरों को देख कर समझ गये कि किसी वक़्त भी उन्हें मौत के घाट उतार जा सकता है। चुनानचे वह मदीना छोड़ कर शाम चले गये और चन्द दिनों के बाद हूरान में किसी के तीरों का निशाना बन गये। इब्ने अबदरबा का कहना है किः

“ हज़रत उमर ने एक शख़्स को शाम रवाना किया और उससे कहा कि वह सईद से बैयत का मुतालिबा करे। अगर वह इन्कार करें तो उन्हें क़त्ल कर दे। वह शख़्स शाम पहुंचा और मुक़ाम हूरान में एक चार दीवारी के अन्दर सईद से मिला और उनसे बैयत का मुतालिबा किया। उन्होंने कहा , मैं हरगिज़ हरगिज़ बैयत नहीं करूँगा। इस पर उसने तीर मार कर उन्हें क़त्ल कर दिया। ”

यह शख्स मुहम्मद बिन मुस्लिमा या मुग़ीरा बिन शेबा बताया जाता है मगर मशहूर यह कर दिया गया कि सईद को किसी जिनने तीर मार कर हलाक कर दिया और उनके मरने पर एक शेर इस मफडहूम का पढ़ा कि हमने सरदारे ख़िज़रिज सईद बिन अबादा को क़त्ल कर दिया और इस पर तीर चलाया जो इसके दिल में पेवस्त हो गया।

हज़रत अबुबकर के दौर में सईद बिन उबैदा को न बैयत पर कोई मजबूर कर सका और न इस सिलसिले में उन पर कोई सख़्ती कर सका लेकिन उन कारेप्रदाज़ाने ख़िलाफ़त ने हज़रत अली अलै 0 से जल्द अज जल्द बैयत हासिल करने की कार्रवाई शुरु कर दी। चुनानचे आप दुनिया की नैरंगी और ज़माने के इन्क़लाब से उफसुरदा ख़ातिर होकर घर में बैठे ही थे कि हुकूमत की तरफ़ से बैयत का मुतालिबा हुआ। आपने और आपके साथ उन तमाम अफ़राद ने जो उस वक़्त घर के अन्दर मौजूद थे बैयत से इन्कार कर दिया। इस पर हज़रत उमर इस क़दर बरहम हुए कि वह आग और लड़कियां लेकर अमीरुल मोमेनीन अलै 0 का घर जलाने पहुँच गये और पैग़म्बरे अकमर स 0 की सोगवार बेटी फ़ातेमा जहरा सल 0 से यह मुतालिबा किया कि अली अल 0 को बाहर निकालों वरना हम इस घर में आग लगा कर सबको ज़िन्दा जला देंगे। बिन्ते रसूल स 0 जब इस हंगामे से बाख़बर हुई तो दरवाज़े के कऱीब आयी और फ़रमाया कि ऐ उमर! आख़िर क्या चाहते हो ? क्या हम सोगवारों क गर में भी चैन से बैठने न दोगे। कहा , ख़ुदा की क़सम अगर अली अलै 0 अबुबकर की बैयत नहीं करेंगे तो हम इस घर मे आग लगा देंगे। आपने फ़रमाया अबुल हसन के अलावा इस घर में रसूल स 0 की बेटी और उनके दोनों नवासे हसन अलै 0 और हुसैन अलै 0 भी हैं। कहा , हुआ करें। उमर के इस जवाब पर मासूमा-बे-इख़्तियार रो पड़ीं और फ़रमाया ऐ पदरे बुजूर्गवार! आपके दुनिया से रुख़सत होते ही हम पर कैसे कैसे ज़ुल्म ढ़ाये जा रहे हैं और आपकी उम्मत के लोग हमसे किस तरह फिर गये हैं। लेकिन हज़रत उमर पर मासूमा स 0 की इस आहो ज़ारी का कोई असर न हुआ और उन्होंने वही किया जो उन्हें नहीं करना चाहिये था। रसूल स 0 की बेटी के घर में आग लगा दी गयी और शोले बुलन्द होना शुरु हुए। हज़रत उमर के साथ जो लोग आये थे उनसे भी वह तशद्दुद देखो न गया। चुनानचे कुछ आग बुझाने में मसरुफ़ हुए और कुछ हज़रत उमर पर लानत मलामत करने लगे। मगर वह कब मानने वाले थे। उन्होंने जलते हुए दरवाज़े पर ऐसी लात मारी कि वह दुख़्तरे रसूल स 0 पर गिरा जिससे आपका पहलू शिकस्ता हुआ और मोहसिन की शिकमे मादर में शहादत वाक़े हो गयी।

ज़बीर बिन अवाम भी इस घर में मौजूद थे अगर चे वह हज़रत अबुबकर के दामाद थे लेकिन उन्होंने जब ये हाल देखा तो तलवार ले कर मुक़ाबिला के लिये बाहर निकल आये मगर सलमा बिन अशीम ने तलवार उनके हाथ से छीन ली और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। तबरी का बयान है कि “ ज़बीर ने तलवार खींच ली और बाहर निकल आये मगर ठोकर खाई और तलवार हाथ से छूट गयी। लोग उन पर टूट पड़े ओर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। ”

हज़रत उमर और उनके हमराही हज़रत अली को भी घर से निकाल कर बैअत के लिये हज़रत अबूबकर के पास ले आये। आपने बैअत के मुतालबे पर इहतिजाज करते हुए फ़रमायाः

“ मैं तुम्हारी बैअत हरगिज़ नहीं करुँगा , तुम्हें खुद मेरी बैअत करना चाहिए क्योंकि मैं तुमसे ज़्यादा ख़िलाफ़त का हक़दार हूँ। तुमने खिलाफ़त हासिल करने के लिये अन्सार के मुक़ाबले में यह दलील दी की तुम को नबी से क़राबत है और अब तुम जबरन अहलेबैत से ख़िलाफ़त छीनना चाहते हो। जिस दलील से तुमने अनसार के मुक़ाबले में अपना हक़ साबित किया है इसी दलील से मैं अपना हक़ तुम्हारे में साबित करता हूँ। ”

“ अगर तुम ईमान लाये हो तो इन्साफ़ करो वरना तुम उम्र से वाकिफ़ होकर जुल्म के मुरतकिब हुए हो ”

हज़रत अबूबक्र ख़ामोश बैठे रहे मगर हज़रत उमर ने कहा , जब कि तुम बैअत नहीं करोगे तुम्हें छोड़ा नहीं जायेगा। इस बात से ख़ैबर शिकन की पेशानी पर बल पड़े फ़रमाया , ऐर पिसरे ख़त्ताब! ख़ुदा की क़सम बैअत तो अलग रही मैं तेरी बातों पर ध्यान भी नहीं दूँगा। फिर आपने रसबस्ता राज़ को बेनक़ाब करते हुए फ़रमायाः

“ ख़िलाफ़त का दूध निकाला लो उसमें तुम्हारा भी बराबर की हिस्सा है। ख़ुदा की कसम तुम आज अबूबक्र की ख़िलाफ़त पर इसलिये जान दे रहे हो कि कल वह यही ख़िलाफ़त तुम्हें दे जाये ”

अमीरुलमोमिनीन अ 0 हज़रत अली के इन्कारे बैअत पर ईज़ा रसानी और इहानत का कोई पहलू उठा नहीं रखा गया। घर में आग लगायी गयी , गले में रस्सी डाली गयी और क़त्ल की धमकियाँ भी दी गयी। यह ऐसा तशद्दुद आमेंज तर्ज़े अमल था कि मुआविया बिने अबू सुफ़यान अबूबक्र के फ़रज़न्द मोहम्मद पर तन्ज़ किये बगै़र न रह सका और उसने उन्हें एक ख़त के जवाब में तहरीर कियाः

“ जिन लोगों ने सबसे पहले अली अ 0 का हक छीना और ख़िलाफ़त के सिलसिले में उनकी मुख़ालिफ़त पर साज़-बाज़ की वह तुम्हारे बाप अबूपक्र और उमर थे। उन्होंने अली अ 0 से बैअत का मुतालबा किया और जब जवाब इन्कार की सूरत में मिला तो दोनों मिलकर उन पर मसाएब ओ आलाम के पहाड़ तोड़ने का तहय्या कर लिया। ” इस बैअत के लिये शुद्दुद का जो सिलसिला रवा गया वह सरासर ग़ैर आएनी ओ गैर इस्लामी और नाजाएज़ था। दुनिया के किसी कानून में उसकी इजाज़त नहीं है कि किसी को अपनी राय बदलने पर मजबूर किया जाये और जब्र ओ तशदुदद के जरीए बैअत हासिल की जाये। अगर वह यह देखते कि हज़रत अली अ 0 पैगम्बरे इस्लाम के ज़माने से किसी जमाअत के कयाम की तैयारी कर रहे हैं और अब जो जमाअत के तआवुन से मुतवाज़ी हुकूमत क़ायम करके उनके इक़तिदार को ख़तरे ड़ालना चाहते हैं या शोरुशो हंगामा करके अमन ओ आमा को तबाह करना चाहते हैं तो इस तशद्दुद का भी सियासी जवाज़ हो सकता था और जब ऐसी सूरत ही न थी और न टकराव के कोई आसार थे तो फिर बैअत पर इतना इसरार क्यों ? मुमकिन है कि इसमें यह मसलहत कार फ़रमा रही हो कि इसी तरह बैअत लेकर अपने मौकिफ़ और तरीक़े कार के हक़ बजानिब होने का सबूत मुहय्या करें तो इस तरह की जबरी बैअत को बैअत नहीं कहा जा सकता-हज़रत अ 0 का इन्कार उसूल के तहत था। अगर तशद्दुद आख़िरी हद तक भी पहुँच जाता तो यह मुमकिन न था कि वह चमहूरियत के नाम पर क़ायम की हुई ग़लत हुकूमत की बैअत करके एक ऐसे उसूल को तसलीम कर लेते जिसकी कोई शरई सनद ही न थी। चुनाँचि आपने मुकम्मल सब्र ओ ज़ब्त के साथ मसाएब ओ आलाम का सामना किया। जुमहूरी ख़िलाफ़त को मना और न जुमहूर के उस इन्तिख़ाब को तसलीम किया।