मनाज़िले आख़ेरत

मनाज़िले आख़ेरत0%

मनाज़िले आख़ेरत कैटिगिरी: क़यामत

मनाज़िले आख़ेरत

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

कैटिगिरी: विज़िट्स: 31540
डाउनलोड: 1575

कमेन्टस:

मनाज़िले आख़ेरत
खोज पुस्तको में
  • प्रारंभ
  • पिछला
  • 16 /
  • अगला
  • अंत
  •  
  • डाउनलोड HTML
  • डाउनलोड Word
  • डाउनलोड PDF
  • विज़िट्स: 31540 / डाउनलोड: 1575
आकार आकार आकार
मनाज़िले आख़ेरत

मनाज़िले आख़ेरत

हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

जन्नत के चराग़

सूरए दहर में इरशादे कुदरत है-

जन्नत में जन्नतियों को आफ़ताब (सूरज) की गर्मी और जाड़े का सर्दी न होगी। वहां पर मौसम में मोतदिल होगा। उन्हे आफ़ताब और माहताब की रौशनी की ज़रुरत नहीं होगी , बल्कि जन्नत में हर एक के लिए उसके आमाले सालेह और ईमान का नूर काफ़ी होगा।

जैसा कि रवायत में गुज़रा है कि हूराने जन्नत का नूर आफ़ताब के नूर पर ग़ालिब होगा और यह चलते-फिरते चिराग होंगे। जन्नती मकानों पर जो मोती , मूंगे , याकूत व मरजान व ज़बरजद ज़र्मरुद जड़े हुए हैं , वह मुख़्तलिफ़ रंगों की रोशनी से अजीब समा पैदा किए होंगे। फ़र्श , बर्तन और लिबास मुख़तलिफ़ रंगों में ज़ियापाशियां कर रहे होंगे और यह नूरानी क़न्दीलें जन्नत को बक़या नूर बना रही होंगी।

अब्दुल्ला इब्ने अब्बास से रवायत है कि जन्नती एक दिन मामूल से ज़्यादा रोशनी पाएंगे। अर्ज़ करेंगे कि परवरदिगार! तेरा वादा था कि जन्नत में सूरज की रौशनी और सख़्त सर्दी न लगेगी। आज क्या हो गया ? कहीं सूरज तो नहीं निकल गया। आवाज़ आएगी यह सूरज नहीं है , बल्कि सैय्यदुल औसिया यानी अलीए मुर्तज़ा और सय्यदह फ़ात्मा ज़हरा (अ 0स 0) आपस में लताफ़त की बातें करते हुए हंसते हैं और यह रौशनी उनके दन्दाने नूरानी का असर है , जो जन्नत की रौशनी पर ग़ालिब आ गया।

जन्नती नग़मात

यह दुनियावी तरह-तरह की न्यामतें और लज़्ज़तें जन्नती लज़्ज़तों का मामूली हिस्सा भी नहीं है। वहां हक़ीक़त और असल मौजूद होगी। सदए कामिल और खुशकुन नग़मात जन्नत में होंगे। अगर जन्नती नग़मात की आवाज़ अहले दुनिया के कानों तक पहुंच जाए तो उनके सुनने से पहले हलाक हो जाएं।

चूनांचे लहने दाऊदी में परवरदिगारे आलम से यह असर अता किया था कि जब वह हज़रत दाऊद (अ 0स 0) इस लहेन में ज़बूर की तिलावत फ़रमाते थे , तो हैवान आपके इर्द-गिर्द मदहोश हो जाते थे और जब यह आवाज़ इन्सानों के कानों में पड़ती तो गिर पड़ते और बाज़ हलाक हो जाते।

हज़रत अमीरूल मोमनीन (अ 0स 0) नहजूल बलागा में हालाते अम्बिया के तहत एक ख़ुतबे में इरशाद फ़रमाते हैं , कि हज़रत दाऊद (अ 0स 0) जन्नत में लोगों को अपने लहेन से लुत्फ़ अन्दोज़ फ़रमाएंगे और अहले जन्नत के क़ारी होंगे। इस जुमले से पता चलता है कि वह जन्नतियों को जन्नत के नग़मात से लुत्फ़ अन्दोज़ फ़रमाएंगे और जन्नती उनको सुनने की ताक़त भी रखते होंगे।

तफ़सीर मजमउल ब्यान में रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) से मर्वी है कि जन्नत के नग़मों में से बेहतरीन नग़मा वह होगा , जो हूराने जन्नत अपने शौहरों के लिए पढ़ेंगी और वह आवाज़ ऐसी होगी जो जिन्नों , इन्सानों ने न सुनी होगी। मगर आलाते मौसिक़ी के साथ यह नग़मात न गाए जाएंगे। एक रवायत (कथन) में है कि बेहश्ती परिन्दे मुख़तलिफ़ नग़मात गाते होंगे।

हज़रत सादिक़ आले मोहम्मद (अ 0स 0) से पूछा गया , कि जन्नत में ग़िना व सुरुर होगा जतो आपने इरशाद फ़रमाया कि जन्नत में एक दरख़्त है। ख़ुदा वन्दे आलम के हुक्म से हवा उसे हरकत देगी और उससे ऐसी सुरीली आवाज़ पैदा होगी कि किसी इन्सान ने इतना उम्दा साज़ और नग़मा न सुना होगा और यह उस शख़्स को नसीब होगा , जिस शख़्स ने दुनीयाँ में ख़ौफ़े खुदा की वजह से ग़िना की तरफ़ कान न धरे होंगे।

जन्नत की न्यामतें और लज़्ज़तें

जन्नत में तरह-तरह की न्यामतें होंगी इरशादे कुदरत है-

“ तुम अगर खुदा की न्यामतों को शुमार करना चाहो तो उसका अहसार व अहाता नहीं कर सकते। ”

जिन तक हमारी अक़लों की रसाई नामुमकिन हैं। हक़ायक़ और मारफ़े इलाहिया की ख़्वाहिश पूरी होगी।

तफ़सीरे साफ़ी में “ वअक़बल मअज़ुहुम अला बअज़िन यतासाअलून ” के ज़िम्न में तहरीर है कि जन्नती एक दूसरे के साथ मारिफ़े इलाहिया के बारे में मुज़ाकिरा करेंगे।

इसके अलावा जन्नती लोग जिनके वाल्दैन , औलाद और दोस्त दुनिया से बेईमान रुख़सत होंगे और जन्नत में दाख़िल होने की सलाहियत रखते होंगे , उनकी शिआअत करेंगे और उनको अफने पहलू मे लाएंगे और यह मोमिन के इकराम व एहतराम की ख़ातिर होगा। कुर्आन मजीद में है।

“ हमेशा रहने के बाग़ जिनमें वह आप जाएंगे और उनके बाप , दादा और उनकी बीवियां और उनकी औलाद में से जो लोग नेकूकार हैं ,” और जिस वक़्त जन्नती जन्नत में चले जाएंगे तो एक हज़ार फ़रिश्ते जो ख़ल्लाक़े आलम की तरफ़ से मोमनीन की ज़ियारत और मुबारकबादी के िलए मामूर हैं आएंगे और मोमिन के महल जिसके हज़ार दरवाज़े हैं हर दरवाज़े से एक-एक फ़रिश्ता दाखि़ल होकर उसे सलाम करेगा और मुबारकबादी देगा। कुर्आन पाक मे इसी तरफ़ इशारा किया गया है-

“ और फ़रिश्ते तुम्हारे पास हर दरवाज़े से आएंगे (और कहेंगे) तुम पर सलामती हो। ”

इससे बढ़कर मोमनीन के साथ परवरदिगारे आलम का मुकालमा है , जिसके बारे में कुछ रवायत (कथन) मिलती है , लेकिन यहां पर सिर्फ़ सूरए यासीन की इस आयत “ सलामुन क़ौलन मिररबबिर रहीम ” को काफ़ी समझता हूँ। “ मेहरबान परवरदिगार की तरफ़ से सलामती का पैग़ाम। ”

तफ़सीर मिनहज में जाबिर इब्ने अब्दुल्ला ने रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) से रवायत की है कि आपने फ़रमाया , कि जब जन्नती जन्नत की न्यामतों में ग़र्क़ होंगे तो उन पर एक नूर साते होगा और उससे आवाज़ आयगी अस्सलामो अलैकुम या अहल्ल जन्नते , इस जगह यह कहा जा सकता है कि दुनियाँ में जो कुछ बरगुज़दी पैग़म्बरों को हासिल था कि वह परवरदिगारे आलम से हम कलाम होते थे , मेराज वग़ैरा , आख़िरत में वह जन्नतियों को नसीब होगा।

इसके अलावा मोहम्मद व आले मोहम्मद अलैहिस्सलाम की जन्नत में हमसायगी कुछ कम न्यामत नहीं है , चूनांचे रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) ने इरशाद फ़रमाया , ऐ अली (अ 0स 0)। तेरे शिया जन्नत में नूरानी मिम्बरों पर बैठे होंगे। उनके चेहरे (चौहदवीं के चांद की तरह) सफ़ेद होंगे वह जन्नत मे हमारे हमसाये (पड़ोसी) होंगे।

और जन्नत में हमेशगी और न्यामात का ख़लूद जैसा कि ज़िक्र हो चुका है , सबसे बुजुर्ग न्यामत हे। जन्नत मे मोमनीन एक दूसरे के सामने भाईयों की तरह जन्नती तख़्तों पर बैठे होंगे।

(आमने सामने तख़्तों पर बैठे होंगे) , औऱ एक दूसरे की दावतें उड़ाते होंगे , जैसा कि रवायत में मौजूद है।

मर्वी है कि हर रोज़ जन्नत मे उलुल अज़्म अम्बिया में से एक मोमिन की मुलाक़ात , व ज़ियारत के लिए हाज़िर होगा और उस रोज़ तमाम लोग उस बुजुर्गवार के मेहमान होंगे और जुमेरात को ख़ातिमुल अम्बिया के मेहमान होंगे और बेरोज़े जुमा बमुक़ाम कुर्ब हज़रत अहदीयत जल्ला व ओला मेहमान नवाज़ी की जाएगी। (मआद)।

सहबाने ख़ौफ़े ख़ुदा के क़िस्से

(1) एक फ़ासिक़ नौजवान का किस्सा

शेख़ कुलैनी (र 0) बसन्दे मोअतबर हज़रत अली (अ 0स 0) बिने हुसैन (अ 0स 0) से रवायत करते हैं कि एक शख़्स अपने अहलो अयाल (परिवार) के साथ किश्ती (नाव) में सवार हुआ और तक़दीरे इलाही से किश्ती टूट गयी। तमाम सवार गर्क़ (डूब) हो गए , मगर उस शख़्स की बीवी एक तख़्त पर बैठी समुद्र के दूर उफ़तादा जज़ीरा मे पहुंच गयी और उस जज़ीरा के अन्दर एक रहज़न (डाकू) मर्दे फ़ासिक़ रहता था , जिसने किसी क़िस्म का फिस्क़ो फुजूर (अपराध) न छोड़ा था जब उसने उस औरत को देखा तो पूछा कि क्या तू इन्सान है या जिन ? उस औरत ने कहा मैं इन्सान हूँ। इसके अलावा उसने उस औरत से और कोई बात न की और उसके साथ लिपट कर मुजामियत करने का इरादा किया। जब वह इस अम्ले क़बीह की तरफफ़ मुत्तवजेह हुआ तो उस फ़ासिक़ ने औरत को मुज़तरिब और कांपते देखा। उस फ़सिक़ ने पूछा तू कि़स वजह से मुज़तरिब है। उसने आसमान की तरफ़ इशारा करते हुए कहा , अल्लाहतआला के ख़ौफ़ से उसने कहा , क्या तूने आज तक कभी यह काम किया है ? उस औरत ने कहा , खुदा की क़सम ज़िना हरगिज़ नहीं किया। उस फ़ासिक़ ने कहा , जबकि तूने आज तक कोई बुरा काम नहीं किया , तो फ़िर किस वजह से खुदा से डरती है। हालांकि मैं तुझे इस काम पर मजबूर कर रहा हूं तू खुद अपनी रज़ामन्दी से नहीं कर रही , इसके बावजूद इस क़द्र ख़ौफ़ज़दा है। इसलिए मैं तुझसे ज़्यादा खुदा से डरने का हक़दार हूं क्योंकि मैंने इससे पहले भी बहुत से गुनाह (पाप) किए हैं। बस वह फ़ासिक़ इस काम से बाज़ रहा और उस औरत से कोई बात किए बग़ैर घर की तरफ़ रवाना हुआ और दिल में किए हुए गुनाहों पर नादिम (शर्मिन्दा) और तौबा (प्रायश्चित) करने का इरादा कर लिया। रास्ते में उसकी मुलाक़ात एक राहिब से हो गयी और वह दोनों एक दूसरे के रफ़ीक़ बन गए। जब वह थोड़ी राह चल चुके तो सूरज की गर्मी बढ़ने लगी। राहिब ने उस जवान से कहा , गर्मी ज़्यादा बढ़ गयी है तू दुआ कर की खुदावन्द तआला बादल को फेजे और वह हम पर साया कर दे। जवान ने कहा मैंने कोई नेकी और अच्छा काम नहीं किया , जिसकी बिना पर ख़ुदावन्द तआला से हाजत तलब करने की हिम्मत करुँ। राहिब ने कहा मैं दुआ करता हूं तुम आमीन कहना।

बस उन्होंने ऐसा ही किया। थोड़ी देर बाद एक बादल आकर उनके सिर पर साया फ़िगन हुआ और वह उसके साये में चलने लगा। जब वह काफ़ी रास्ता तै कर चुका तो उनके रास्ते अलग हो गए। जवान अपने रास्ते पर और राहिब अपने रास्ते पर चलने लगा औऱ बादल का साया जवान के साथ हो लिया और साहिब धूप में रह गया। राहिब ने जवान से कहा तू मुझसे बेहतर है क्योंकि तेरी दुआ मुस्तजाब हुई और मेरी दुआ मुस्तजाब न हुई। बताओ वह कौन-सा नेक काम तूने किया है कि जिसकी बदौलत तू इस करामत का मुस्तहक़ हुआ। जवान ने अपने क़िस्से को नक़ल किया। तब राहिब ने कहा चूंकि तूने ख़ौफ़ ख़ुदा की वजह से तर्क़े गुनाह का मुस्म्म इरादा कर लिया। इसलिए अल्लाहतआला ने तेरे पिछले गुनाह माफ़ कर दिए तू कोशिश कर कि इसके बाद भी नेक रहे।

(2) बहलोल नब्बाश का क़िस्सा

शेख़ सद्दूक (र 0) रवायत करते हैं कि एक दिन मआज़ दिने जबल (र 0) रोते हुए हुजूरे अकरम (स.अ.व.व. ) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और सलाम किया। आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने सलाम का जवाब दिया और पूछा ऐ मआज़! तेरे रोने का सबब क्या है ? उसने अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह (स.अ.व.व. )! दरवाज़े पर एक ख़ूबसूरत नौजवान खड़ा इस तरह रो रहा है , जैसे कोई औरत अपने नौजवान बेटे की मय्यत पर रोती है। वह आपकी ख़िदमत में हाजि़र होने की इजाज़त चाहता है। आं हज़रत ने फ़रमाया उसे अन्दर बुला लाओ , बस मआज़ गया और नौजवान को अ