मनाज़िले आख़ेरत

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मनाज़िले आख़ेरत कैटिगिरी: क़यामत

मनाज़िले आख़ेरत

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

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मनाज़िले आख़ेरत

मनाज़िले आख़ेरत

हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

पहला हिस्सा

मआद क़यामत

मआद (क़यामत) शब्द से निकला है जिसके मानी (अर्थ) लौटना है , चूंकि रुह (आत्मा) , दोबारा शरीर की और लौटती है , इसलिए इसको मआद (प्रसलय( कहते हैं। मआद उसूले दीन (धर्म के नियम) में से एक है जिस पर विश्वास (ऐतेक़ाद) करना हर मुसलमान के लिए ज़रुरी है , क्योंकि हर मनुष्य मरने के बाद दोबारा ज़िन्दा होगा और उसे अपने आमाल (कृत्यों) का फल मिलेगा।

मआद (क़यामत) का मसला जिसकी शुरुआत मौत और इसके बाद क़ब्र , बरज़ख़ (मरने के बाद से क़यामत तक का ज़माना) , क़यामते कुबरा (प्रलय) और आख़िर में जन्नत (स्वर्ग) या जहन्नम (नरक) हैं। मआद का हवासे ख़मसा ज़ाहिरा (देखने सुनने , सूंघने , चखने और छूने की पांच शक्तियां) के द्वार खोज करना असम्भव है और मआद (क़यामत) बुद्धि के तर्कों से सिद्ध है।

मरने के बाद क्या होगा ? सरकारे दो आलम ने वही (ईश्वरीय संदेश) के द्वारा इसकी ख़बर दी है। हर इन्सान का अपना मुक़ाम और आलम औऱ उसकी तलाश इस आलम और मुक़ाम की सीमाओं से आगे नहीं जाता। मिसाल के तौर पर वह बच्चा जो अपनी माँ के पेट की दुनियां और आलम में आबाद है , उसके लिए मुश्किल है कि वह पेट के बाहर आलमे बुजुर्ग के बे पायां फ़िज़ां और मौजूदात की खोज कर सके। इसी तरह असीर तबीयत व मादहे आलमे बातिर यानी मलकूत को नहीं समझ सकता , जब तक कि इस दुनियां से छुटकारा हासिल न करे। मरने के बाद आलम की खुसूसियात उस शख़्स के लिए जो इस आलम में आबाद है , ग़ैब (परोक्श) के हुक्म में है और उसकी मारिफ़त (परिचय) के लिए हुजूरे अकरम (स 0 अ 0) की अख़बार की तसदीक के सिवा कोई चारा नहीं। बस अगर कोई शख़्स यह कहे कि मेरी अक़ल से दूर है कि मरने के बाद क्या होगा तो उसकी बात बिल्कुल विश्वास के योग्य न होगी , क्योंकि उस आलम की खुसुसियात का अक़ल के साथ कोई सम्बन्ध (रब्त) नहीं है और जो कुछ हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स 0 अ 0) ने फ़रमाया है हमें उसका यक़ीने कामिल होना चाहिए , क्योंकि वह तमाम मासूम (पाक) हैं और महले नज़ूले वहीए परवरदिगार हैं।

क्या मुर्दा हर्फ़ करता है ?

यह शक जिन्होंने ज़ाहिर किया है , उनका ख़्याल है कि मुर्दा जमादात (जड़ वस्तुओं) की तरह है जैसे सूखी लकड़ी , फ़िर कब्र में सवाल व जवाब किससे होगा ?

जवाब- यह शक कम इल्मी , बेख़बरी और आख़िरत पर ईमान बिल ग़ैब न होने की दलील है। बोलना फ़क़त ज़बान का नतीजा है , अरवाह में नुत्फ़ और जुमबिश नहीं है। हैवान के अज़ा हरकत हैं। रुह जुमबिश नहीं करती। स्पष्ट उदाहरण है। आप नींद की हालत में ख़्वाब के वक़्त बातें करते हैं। मगर ज़बान औऱ होंठ हरकत नहीं करते। अगर कोई शख्स जाग रहा हो तो उसकी आवाज़ को नहीं सुनता , हालांकि वह जागने पर कहता है कि मैं अभी ख़्वाब में फलां के साथ बातें कर रहा था , इसी तरह दूर-दराज़ के मुल्कों की सैर भी कर लेता है मगर जिस्म बिस्तर पर मौजूद और महफूज़ रहता है।

ख़्वाब देखने का सबब

हज़रत मुसा बिने जाफ़र (अ 0 स 0) इरशाद फ़रमाते हैं कि दुनियां के शुरुआत में इन्सान नींद की हालत में ख़्वाब नहीं देखते थे , मगर बाद में इस दुनियां के बनाने वाले ने नींद की हालत में ख़्वाब दिखाने शुरु किए और उस की वजह यह है कि इस दुनिया के रचने वाले ने उस समय के लोगों की हिदायत के लिए एक पैग़म्बर को भेजा और उसने अपनी क़ौम को अताअत और अल्लाह की अबादत की दावत दी , मगर उन्होंने कहा अगर हम तेरे ख़ुदा की अबादत करें तो उसका बदला क्या देगा ? हालाकि तेरे पास हसमे ज़्यादा कोई चीज़ नहीं है तो उस पैग़म्बर ने इरशाद फ़रमाया कि अगर तुमने ख़ुदा की अताअत की तो तुम्हारा इनाम बेहश्त (स्वर्ग) होगी। अगर किनारा किया और मेरी बात को न सुना तो सजा़ जहन्नुम (नरक) होगी। उन्होंने पूछा दोज़ख़ और बेश्त क्या चीज़ है ? उस पैगम्बर ने दोज़ख़ और बेहश्त के अवसाफ़ (विशेषतायें) उनके सामने ब्यान किए और तशरीह (विवेचना) की। उन्होंने पूछा कि यह बेहश्त हमें कब मिलेगी। पैग़म्बर ने इरशाद फ़रमाया जब तुम मर जाओगे। कहने लगे हम देखते हैं कि हमारे मुर्दे बोसीदा होकर ख़ाक में मिल जाते हैं उनके लिए जिन चीज़ों की तूने तौसीफ़ की है , नहीं देखते और पैग़म्बर के इरशाद को झुठलाया। अल्लाह ने उनको ऐसे ख़्वाब दिखाए कि वह ख्वाब में खाते-पीते , चलते-फिरते , गुफ़तगू करते हैं और सुनते हैं , लेकिन जागने के बाद ख़्वाब में देखी हुई चीज़ों के असरात नहीं पाते। बस वह पैग़म्बर की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अपने ख़्वाब उनके सामने बयान किए। पैग़म्बर ने इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह ने तुम पर हुज्जत (तर्क-वितर्क) तमाम कर दी है कि मरने के बाद तु्म्हारी रुह (आत्मा) भी इसी तरह होती है , चाहे बदन मिट्टी में मिल कर मिट्टी हो जाय तुम्हारी रुह (आत्मा) क़यामत तक अज़ाब (यातना) में होगी और अगर नेक होंगे तो बेहश्त में खुदा की नेआमतों से लुत्फ़ उठाएगी। (मआद)-

मंज़िले अव्वल

इस सफ़र की पहली मंजिल मौत है।

मौत- मौत की तारीफ़ के बारे में उल्मा में एख़तलाफ़ है। कुछ मौत को अमरे वजूदी और कुछ अमरे अदमी कहते हैं। तहक़ीक़ शुदा बात है कि मौत अमरे वजूदी है और इस सूरत में इसकी तारीफ़ यह की गयी हैः-

“ मौत एक वजूदी सिफ़त है , जो हयात की ज़िद है। ” कुर्आन मजीद में हैः-

“ बाबरकत है वह ज़ात जिसके क़ब्ज़ए कुदरत में तमाम कायनात की बागड़ोर है , औऱ वह हर चीज़ पर क़ादिर है , जिसने ज़िन्दगी और मौत को इसलिए पैदा किया ताकि आज़माए कि तुममे से किसके आमाल अच्छे हैं। ”

इस आयत (सूत्र) में ज़िन्दगी और मौत की तख़लीफ़ का वर्णन किया। केवल अदम (दुनिया) की तख़लीफ़ नहीं होती अगर मौत अमरे अदमी होती तो लफ़्ज़ ख़ल्क़ कुर्आन में इस्तेमाल न किया जाता।

मौत हक़ीकतन बदन और रुह (आत्मा) के सम्बन्ध का ख़त्म होना है। रुह और बदन के सम्बन्ध को अनगिनत तशबीहात के ज़रिये ज़ाहिर किया गया है। जैसे मल्लाह और कश्ती और मौत ऐसे हैं , जैसे कश्ती को मल्लाह के एख़्तयार से अलग कर दिया जाय। रुह वह चराग़ है जो ज़ुल्मत कदाए बदन को रौशन करती है और तमाम अज़ा व जवारह रौशनी हासिल करते हैं। मौत इस चराग़ का जुदा करना है कि जब इसको जुदा किया जाय तो फिर तारीक हो जाएगा। इसके अतिरिक्त यह ताअल्लुक़ इस तरह नहीं कि रुह बदन में हुलूल करती है या बदन के अन्दर दाख़िल होती है। इसलिए दाख़िल होना या निकलना रुह के लिए ठीक नहीं है , बल्कि सिर्फ़ ताअल्लुक़ रखती है और इसी ताअल्लुक़ का टूट जाना मौत कहलाता है।

हम पर वाजिब है कि हम यह यक़ीन रखें कि मौत ख़ुदा के हुक्म से आती है। वही ज़ात जिसने मां के पेट से लेकर आख़िर दिन तक रुह का बदन से ताअल्लुक़ पैदा किया। वही रुह के बदन के साथ सम्बन्ध को ख़त्म भी करती है। वही हमें मारता है वही जिलाता है जैसे कुर्आन मजीद में हैः-

“ अल्लाह ही नफ़्स को मौत देता है। ”

बाज़ जाहिल लोग इज़राइल को बुरा कहते हैं और दुश्मन समझते हैं कि वह हमारी औलाद को और हमें औलाद से छीनता है औऱ यह नहीं समझते कि वह तो अल्लाह की तरफ़ से इस काम पर मामूर है औऱ वह उसके हुक्म के सिवा कुछ भी नहीं करता।

रुहे (आतमाएँ) कैसे क़ब्ज़ होती हैं ?

अहादीस मेराज के ज़िम्न में रुह के क़ब्ज़ होने की क़ैफ़ियत यह ब्यान की गयी है कि हज़रत इज़राईल के सामने एक तख़्ती मौजूद है जिस पर तमाम नाम तहरीर हैं , जिसकी मौत आ जाती है , उसका नाम तख़्र्ती से साफ़ हो जाता है।

फ़ौरन इज़राईल उसकी रुह क़ब्ज़ कर लेता है। आने वाहिद में यह मुमकिन है कि हज़ारहा इन्सानों के नाम साफ़ हो जांए और इज़राईल जैसा कि एक ही वक़्त में हज़ारों जिराग़ गुल किए जा सकते हैं इसलिए आश्चर्य नहीं करना चाहिए दरहक़ीक़त मारने वाला खुदा है , जैसा कि क़ब्ज़े रुह की निस्बत खुदा की तरफ़ दी गयी है।

“ तुम्हे मौत मलकुल मौत (इज़राईल) देता है , जो कि तुम पर मोवक्किल है। ”

एख और जगह इरशाद फ़रमाया-

“ जिन लोगों की फ़रिश्तों ने रुह कब्ज़ की उस वक़्त वह अपने आप पर जुल्म कर रहे थे। ”

इन्सान को मारने वाले इज़राईल और उसके अवान व अन्सार फ़रिश्ते हैं , ये तीनों दुरुस्त हैं क्योंकि इज़राईल और उसके अवान व अन्सार फरिशते अल्लाह के हुक्म से ही रुह को क़ब्ज़ करते हैं जैसा कि लश्कर बादशाह के हुक्म से दूसरी हुकूमत को फ़तह किया। दर हक़ीक़त फ़तूहात बादशाह की सूझ बूझ और हुकमरानी की वजह से होती है ये तमाम मिसालें हक़ीक़त को समझाने के लिए हैं वरना हक़ीक़त इससे बालातर है , दर हक़ीक़त ज़िन्दा करने वाला और मारने वाला ख़ुदा ही है।

ख़ुदा ने जैसा कि इस दुनिया को दारुल असबाब (परेशानियों का घर) क़रार दिया है , इसी तरह मौत के लिए भी वजह तै कि है , जैसे मरीज़ (रोगी) होना , क़त्ल होना , हादिसा (दुर्घटना) में मरना , गिर कर मरना वग़ैरह। यह तमाम मौत की वजह और बहाने हैं वरना कई लोग ऐसे हैं कि शदीद बीमारियों में मुबतिला होते हें और अच्छे हो जाते हैं , बस बैठे-बैठे मौत हो जाती है। यह वजह अकेले मौत का कारण नहीं अगर उम्र का वक्त पूरा हो गया तो अल्लाह उसकी रुह (आत्मा) क़ब्ज़ कर लेता है।

कुछ लोगों की रुह आसानी के साथ और कुछ की सख़्ती के साथ क़ब्ज़ की जाती है। रवायात (ब्यानों) में मौजूद है कि मरने वाला महसूस करता है , गोया (मानो) की उसके बदन को कैन्ची से काटा जा रहा है या चक्की में पासी जा रहा है और कुछ लोगों को ऐसा महसूस होता है मानों फूल सूंघ रहे हैं।

“ यह वह लोग हैं जिन की रुहें (आत्माए) फ़रिश्ते (देवता) उनसे कहते हैं सलाम अलैकुम , जो नेकियां तुम दुनियां में करते थे , उसके सिले (बदले) में जन्नत में बेख़टके चले जाओ। ”

यह भी समझ लेना ज़रुरी है कि यह भी कोई क़ायदए कुल्लिया (व्यापक नियम) नहीं है कि हर मोमिन (आस्तिक) की जान आसानी के साथ कब्ज की जाती है , बल्कि अक्सर मोमनीन कुछ गुनाहों की वजह से जान सख़्ती से निकलती है , ताकि मोमिन दुनिया में ही गुनाहों की कसाफ़तों (गन्दगी) से पाक (पवित्र) हो जाय। कफ़फारे (प्रायश्चित) के लिए यह सख़्ती अज़ाब (यम यातना) की ज़्यादती और आख़िरत (परलोक) के अज़ाब (यम यातना) का मुकद्दमा होती है।

“ तो जब फिरश्ते उन की जान निकालेंगे उस वक़्त उनके चेहरों और पुश्त पर मारते जायेंगे। ”

कभी कुफ़्फ़ार व फ़ासिक लोगों की जान आसानी से क़ब्ज़ होती है क्यों कि यह लोग अहले अज़ाब (यमयातना योग्य) में से हैं लेकिन अपनी ज़िन्दगी में कुछ अच्छे काम किए जैसे यतीम पर ख़र्च औऱ म