मनाज़िले आख़ेरत

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मनाज़िले आख़ेरत कैटिगिरी: क़यामत

मनाज़िले आख़ेरत

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

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मनाज़िले आख़ेरत

मनाज़िले आख़ेरत

हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

उक़बए दोम

मौत के वक़्त हक़ से उदूल

यानी मरते वक़्त हक़ से बातिल की तरफ़ पलट जाना और यह उस तरह है कि शैतान मरने वाले के पास हाज़िर होकर उसे वसवसए शैतानियत में मुबतिला करके शुकूक व शुबहात में डालता है। यहां तक कि वह उसे ईमान से ख़ारिज़ कर देता है , इसीलिए शैतान से पनाह मांगने के लिए दुआएं मंकूल हैं। जनाब फ़ख़रूल महक़क़ीन (र 0 अ 0) इरशाद फ़रमाते हैं कि जो शख़्स इससे महुफूज़ रहना चाहे उसे चाहिए कि ईमान और उसूले ख़मसा को दलायले क़तैया के साथ ज़ेहन में हाज़िर करे और खुलूसे दिल के यह वसवसए शैतानियां का रद साबित हो औऱ अक़ाएदे हक़क़ा के विद्र के बाद यह दुआ पढ़े-

“ अल्लाहुम्मा या अरहमर राहिमीन इन्नी क़द अवदातुका यक़ीनी हाज़ा व दीनी व अन्ता मुसतौदीन व क़द आमरतना बेहिफ़ज़िल वदाएई फ़रुद्ददोहू अलय्या वक़्ता हूज़ूरे मौत। ”

फ़ख़रुल मोहक़्क़ीन के इरशाद के मुताबिक़ मशहूर दोआए अदीला के मानी को समझ कर हुजूरे क़ल्ब के साथ पढ़ना मौत के वक़्त हक़ से उदूल के ख़तरे से सलामती के ख़्वाहिश मन्द के लिए मुफ़ीद है। शेख़ तूसी (र 0 अ 0) ने मोहम्मद बिन सुलेमान दलेमी से रिवायत की है कि मैंने इमाम जाफरे सादिक (अ 0 स 0) की ख़िदमत में अर्ज़ किया कि आपके पैरोकार शिया कहते हैं कि ईमान कीदो क़िस्में हैं।

अव्वल- ईमान मुस्तकिर व साबित।

दोम- जो बतौर अमानत सुपुर्द किया गया है और ज़ायल भी हो सकता है।

आप मुझे ऐसी दुआ तालीम फ़रमाएं कि जब भी मैं उसको पढ़ूं मेरा ईमान कामिल हो जाए और ज़ायल न हो , फिर आपने फ़रमाया इस दुआ को हर वाजिब नमाज़ के बाद पढ़ा करो।

“ रज़ीतो बिल्लाहे रब्बों व बेमोहम्मदिन सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही नबीय्यन व बिल इस्लामे दीनन व बिन कुर्आने किताबन वबिल कआबते क़िबलतन व बेआलेइन वलेयव्वा इमामन व बिल मोहम्मदिन वल बिन अलीइन बल हुज्जते बिल सलवातुल्लाहे अलैहिम अइम्मतन अल्लाहुम्मा इन्नी रज़ीतो बेहिम आइम्मतिन फ़अरज़िनी लहुम इन्नका अला कुल्ले शयइन क़दीर। ”

आसानी ए मौत के आमाल

( इन चीज़ों के बाब में जो इस सख़्त अक़बा में मुफ़ीद हैं।)

नमाज़ का पाबन्दिए वक़्त के साथ अदा करना। एक हदीस में है कि क़ायनात के मशरिक़ व मग़रिब में कोई भी साहबे ख़ाना ऐसा नीहं कि मलकुल मौत पांचों नमाज़ों के अवक़ात में उन्हें पाबन्दिए वक़्त के साथ नमाज़ पढ़ने का आदी है तो मलकुल मौत उसे शहादतैन की तलक़ीन करता है और इब्लीस को उससे दूर भगाता है।

मनकूल (कथन) है कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) ने एक शख़्स को लिखा कि अगर तू चाहता है कि तेरा ख़ात्मा आमाले सालेह के साथ हो और तेरी रुह ऐसी हालत में कब्ज़ की जाय की तू अफ़ज़ल आमाल की हामिल हो तो अल्लाह ताला के हुकूक़ को बुजुर्ग व बरतर समझ न कि तू उसकी अता कर्दा नेअमतों को उसकी नाफ़रमानी में सर्फ़ करे और उसके हिल्म (शमा) से नाजाएज़ फ़ायदा उठाकर मग़रुर हो जाय। हर उस शख़्स को इज़्ज़त की निगाह से देख जिसको तू हमारे ज़िक्र में मशगूल पाये या वह हमारी मुहब्बत का दावा करे। इसमें तेरे लिये कोई ऐब नहीं कि तू उसे इज़्ज़त की निगाह से देखे ख़्वाह वह उसमें सच्चा हो या झूठा , इसमें तुझे तेरी सिदक़ नियत तुझे नफ़ा देगी और झूठ का नुकसान पहुंचेगा।

ख़ात्मा बिलख़ैर औऱ बदबख़्ती को नेक बख़्ती में तब्दील करने के लिए सहीफए कामिला की ग्यारहवीं दुआएं तमजीद ( “ या मनज़िकरह शऱूफज्जाकरीन ” ) का पढ़ना मुफ़ीद है और काफ़ी में मज़कूर दुआए तमजीद का पढ़ना मुफ़ीद है।

जीक़ाद के यकशम्बा (इतवार) वारिद शुदा नमाज़ को इस ज़िक्र शरीफ़ के साथ पढ़ना ज़्यादा मुफ़ीद है।

“ रब्बना ला तुज़िग़ कुलूबना बादा इज़ हदैतना व हबलना मिल्लदुनका रहमह इन्नका अनतल बहाब। ”

तसबीहे जनाबे सैय्यदा का पाबन्दी के साथ पढ़ना। अक़ीक़ की अंगूठी पहनना , खुसुसन (विशेषकर) सुर्ख़ अक़ीक़ की अगर उस पर मोहम्मद नबी अल्लाह व अलीयुन वली उल्लाह नक़श (लिखा) हो तो और बेहतर है सूरह “ क़द अफलहाल मोमिनुना ” का हर जुमा को पढ़ना औऱ इस दुआ को नमाज़ सुबह , नमाज़ मग़रिब के बाद सात बार पढ़ना-

“ बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर रहीम लाहौला वला कुव्वता इल्ल बिल्लाहिल अलीइल अज़ीम। ”

22 रजब की शब (रात) को आठ रकत नमाज़ इस तरीक़े से पढ़े कि हर रकत में “ अलहम्दो ” एक बार औऱ कुल या अय्योहल काफ़ेरुना ” सात बार पढ़े और ख़्तम होने के बाद दस बार दरुद शरीफ़ और दस बार अस्तग़फार पढ़े।

सैयद बिने ताऊस ने रसूले अकरम से रवायत की है कि जो शख़्स 6 शाबान को चार रकत नमाज़ इस तरह पढ़े कि हर रकत में सूरए हम्द एक बार और सूरए तौहीद पचास बार पढ़े तो हक़ ताला उसकी रुह (आत्मा) को बड़ी नर्मी के साथ क़ब्ज़ करेगा उसकी कब़् कुशादा होगी और वह अपनी क़ब्र से इस तरह उठेगा कि उसका चेहरा चौहदवीं के चांद की तरह रोशन होगा और कलमए शहादत ज़बान पर जारी होगा।

यह नमाज़े बईना नमाज़े हज़रत अमीरूल मोमिनीन (अ 0 स 0) की तरह है , जिसके फज़ाएल बेशुमार हैं। मैं इस जगह चन्द हिकायात का वर्णन करना मुनासिब मौजूँ समझता हूँ।

हिकायते अव्वल

फुज़ैल बिने अयाज़ से जो सुफ़िया में से थे , मनकूल है कि उनका एक फाज़िल (योग्य) शागिर्द था। वह एक बार जब बीमार हुआ , नज़आ के वक़्त उसके सिराहने आकर बैठ गया और सुरए यासीन की तिलावत शुरु की। उस मरने वाले शागिर्द ने कहा फ़िर ऐ उस्ताद इस सूरे को मत पढ़ो। फुज़ैल ने सुकूत एखतेयार किया , फ़िर उसे कलमए तौहीद “ लाइलाहा इल्लल्लाहो ” पढ़ने को कहा , मगर उसने पढ़ने से इन्कार कर दिया और कहा , कि मैं इससे बेज़ार हूँ “ अलअयाज़ बिल्लाहे ” औऱ वह इसी हाल में मर गया। फुज़ैल यह हाल देखकर सख़्त नाराज़ हुआ औऱ अपने घर चला गया और फ़िर बाहर न निकला। फुज़ैल ने उससे पूछा , तू तो मेरे फ़ाज़िल (योग्य) शागिर्दों में से था , तुझे क्या हुआ कि खुदावन्दे तआला ने तुझसे मारिफ़त (परिचय) का ख़ज़ाना छीन लिया और तेरा अंजाम (परिणाम) बुरा हुआ ? उसने जवाब दिया , इसकी तीन वजूहात (कारण) हैं , जो मुझमें थी-

अव्वल (प्रथम)- चुग़लख़ोरी “ हलाकत ” है हर चुग़लख़ोर तानाबाज़ के लिए। ”

दोम (द्वितिय)- हसद करना , “ हसद ईमान को इस तरह खाता है कि जिस तरह आग लकड़ी को (उसूले काफ़ी)। ”

सोम (तृतीय)- नुक़ता चीनी करना।

“ फ़ित्ना क़त्ल से भी ज़्यादा बड़ा है। ” मुझे एक बीमारी थी जिसके लिए डाक्टर ने यह तजवीज किया था कि मैं हर साल एक प्याला शराब पिया करूँ। अगर यह न पिया तो बीमारी नहीं छोड़ेगी , इसलिए मैं डाक्टर की हिदायत के मुताबिक़ शराब पीता रहा , इन्हीं तीन वजूहात की बिना पर जो मुझमें थी मेरा अंजाम (परिणाम) बुरा हुआ और मुझे इस हालत में मौत आ गयी।

मुझे इस हिकायत के सम्बन्ध में इस वाक़िया का वर्णन करना मुनासिब मालूम होता है जो शेख़ कुलैनी (र 0) ने अबू बसीर से रवायत की है। वह कहता है मैं हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) की ख़िदमत में हाज़िर था कि उम्मे ख़ालिद बिने माबदिया ने आप की ख़िदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया कि मेरा इलाज नबीज़ तजवीज़ किया है , जो एक क़िस्म की शराब है औऱ जानती थी कि आप इससे कराहत (घृणा) करते हैं लिहाज़ा मैंने आपसे इस मामले में मालूम करना ज़्यादा अच्छा समझा। आपने फ़रमाया तुझे इसके पीने से किस बात ने रोका। अर्ज़ करने लगीं , क्योंकि मैं दीनी (धार्मिक) मआमलात में आपकी मोक़ल्लिद (अनुयायी) हूँ इस वजह से क़यामत के दिन यह कह सकूं कि जाफ़र बिने मोहम्मद ने मुझे हुक्म दिया था या मना फ़रमाया था , इमाम अलैहिस्सलाम अबू बसीर की तरफ़ मुख़तिब हुए। ऐ अबू मोहम्मद क्या तू इस औरत की बात और मसला की तरफ़ ध्यान नहीं देता। फ़िर उस औरत ने कहा , ख़ुदा की क़सम मैं तुझे इसमें से एक क़तरा (बूंद) भी पीने की इजाज़त नहीं देता ऐसा न हो कि इसके पीने से उस वक़्त पशेमान हो जब तेरी जान यहां तक पहुंचे औऱ गले की तरफ़ इशारा किया औऱ तीन बार कहा , फ़िर उस औरत से कहा कि क्या तू अब समझ गयी कि मैंने क्या कहा ?

दूसरी हिकायत

शेख़ बहाई अतर उल्लाह “ मरक़दए कशकोल ” में ज़िक्र फ़रमाते हैं कि एक शख़्स जो ऐशो-इशरत में पला था , जब मरने के क़रीब हुआ तो उसे कलमए शहादतैन की तलक़ीन की गयी , मगर उसने शहादैन की जगह यह शेर पढ़ा।

“ कहां है वह औरत जो एक दिन मांदी ख़स्ता हालत में जा रही थी कि उसने मुझसे पूछा कि हम्माम मिनजानिब का रस्ता कौन सा है। ”

उसका इस शेर को पढ़ने का कारण यह था कि एक रोज़ एक पाक दामन और ख़ूबसूरत औरत अपने घर से निकली कि वह मशहूर व मारुफ़ हम्माम मिन जानिब की तरफ़ जाय , मगर वह हम्माम का रास्ता भूल गयी और रास्ता चलने की वजह से उसकी हालत बुरी हो रही थी कि एक शख़्स को मकान के दरवाज़े पर देखा। उस औरत ने उस शख़्स से हम्माम मिनजानिब का रास्ता पूछा। उसने अपने घर की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि हम्माम मिन जानिब यही है। वह पाक़ दामन उस मकान को हम्माम समझ कर दाख़िल हुई , उस शख़्स ने फौरन मकान का दरवाज़ा बन्द कर लिया औऱ उससे ज़िना की ख़्वाहिश की। वह बेकस औऱत समझ गयी अब वह इसकी गिरफ़्त से बिना किसी तदबीर के नहीं बच सकती , इसलिए बड़ी मोहब्बत औऱ दिलचस्पी का इज़हार किया और कहा मेरा बदन गंदा और बदसूरत है , मैंने इसी वजह से नहाने का इरादा किया था। अब बेहतर है कि आप मेरे लिए इतर और बेहतरीन खुशबू लाएं , ताकि मैं आपके लिए अपने आप को मोअत्तर करु