मनाज़िले आख़ेरत

मनाज़िले आख़ेरत0%

मनाज़िले आख़ेरत कैटिगिरी: क़यामत

मनाज़िले आख़ेरत

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

कैटिगिरी: विज़िट्स: 2214
डाउनलोड: 307

कमेन्टस:

मनाज़िले आख़ेरत
खोज पुस्तको में
  • प्रारंभ
  • पिछला
  • 16 /
  • अगला
  • अंत
  •  
  • डाउनलोड HTML
  • डाउनलोड Word
  • डाउनलोड PDF
  • विज़िट्स: 2214 / डाउनलोड: 307
आकार आकार आकार
मनाज़िले आख़ेरत

मनाज़िले आख़ेरत

हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

बरज़ख़ वालों के लिए मुफ़ीद (लाभदायक) आमाल

कुतुब रावन्दी ने लब लबाब से नक्ल किया है कि एक ख़बर मैं हे कि माह रमज़ान की हर शबे जमा को मुर्दे अपने घरों के दरवाज़ों पर आकर फ़रियाद करते हैं और रोते हैं कि ऐ मेरे अहलो अयाल! ऐ मेरे रिश्तेदारों! मुझ़ पर ऐसी चीज़ों के ज़रिए मेहरबानी करो जिसके ज़रिए ख़ुदा तुम पर रहमत करे। हमें अपने दिल में जगह दो और भुलाने की कोशिश न करो। हम पर और हमारी बेक़सी पर रहम करो , यह सही है कि हम इस क़ैद में बड़ी सख़्ती , तंगी , आहोज़ारी और गमीं में मुबतिला हैं हम पर रहम करो और हमारे लिए दुआ और सदक़ा में बख़ल (कंजूसी) न करो , शायद ख़ुदा हम पर रहम करे , इससे पहले कि तुम भी हम जैसे हो जाओ , हाय अफसोस कभी हम भी तु्म्हारी तरह ताक़तवर हुआ करते थे। ऐ खुदा के बन्दों! हमारी बातें सुनों। और इन्हें मत भुलाओ। इसमें शक नहीं कि यह अज़ीम सरमाया , जिस पर तुम क़ाबिज़ हो , कभी हमारे तसर्रुफ में था। हमने उसको राहे खुदा में सर्फ़ न किया और लोगों का हक़ ग़सब करते रहे , जो हमारे बवाल की वजह बना और दूसरों के लिए फ़ायदेमन्द। हम पर एक दरहम नग़दी या रोटी या किसी चीड़ के टुकड़े से मेहरबानी करो। हम फ़रियाद करते हैं कि जल्दी ही तुम अपने नफूस पर गिरिया करोगे औऱ उस वक़्त का गिरिया कुछ फ़ायदा न देगा , जैसा कि हम रोये , मगर बे फ़ायदा। इसलिए हम जैसा होने से पहले कोशिश करो।

जामा अल अख़बार में मनकूल (उद्धृत) है कि एक सहाबी ने हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) से नक़ल किया कि आप ने फ़रमाया अपने मुर्दों को हदिया पहुँचाओ। मैंने पूछा मुर्दों के लिए हदिया क्या है ? आपने फ़रमाया सदक़ा औऱ दुआ और फ़रमाया मोमिन की रूहें हर जुमा को आसमाने दुनियां से अपने मकानों के सामने आकर फ़रियाद करती हैं और हर एक गिरिया ज़ारी करते हुए कहता है , ऐ मेरे घऱ वालों! ऐ मेरे बच्चों! ऐ मेरे वालदैन! ऐ मेरे रिश्तेदारों! ख़ुदा तुम पर रहमत करे , मुझ पर मेहरबानी करो , जो कुछ हमारे हाथ में था , उसका हिसाब व अज़ाब हम पर है और नफ़ा ग़ैरों के लिए। हर एक अपने अज़ीज़ों से फ़रियाद करता है कि मुझ पर एक दरहम या एक रोटी या कपड़े के ज़रिए मेहरबानी करो ताकि ख़ुदा तुम्हें बेहश्त का लिबास अता करे। बस रसूले ख़ुदा (स 0 अ 0) रो पड़े और हम भी रोने लगे। आं हज़रत (स 0 अ 0) में ज़्यादा रोने की वजह से ताक़त न रही। फ़िर फ़रमाया॰ यह तु्म्हारे दीनी भाई हैं। ऐशो इश्रत की ज़िन्दगी के बाद मिट्टी के ढेर तले दबे पड़े हैं। वह अपने नफूस पर अज़ाब व हलाकत की वजह से निदा (आवाज़) करते हैं और कहते हैं , काश! हम अपनी पूंजी अताअते ख़ुदा और उसकी रज़ामन्दी में ख़र्च करते तो आज तुम्हारे मोहताज न होते। आज हसरत व पशेमानी के साथ हम फ़रियाद कर रहे हैं कि जल्दी अपने मुर्दों को सदक़ा पहुँचाओ। इसी किताब में आं हज़रत (स 0 अ 0) से मर्वी है कि जो सदक़ा भी मय्यत के लिए दिया जाता है , उसे फ़रिश्ता एक नूरानी तबक़ में , जिसकी रोशनी सातों आसमानों को मुनव्वर करती है , लेकर उसकी क़ब्र के किनारे खड़े होकर अवाज़ देता है , अस्सलाम अलैकुम या अहलल कबूरे , ये हदिया तुम्हारे अहले ख़ाना ने तुम्हारी तरफ़ भेजा है। मय्यत उसको लेकर अपनी क़ब्र में दाख़िल करता है , और उसके ज़रिए उसकी क़ब्र फ़राक़ हो जाती है। आप (स 0 अ 0) ने फ़रमाया जो शख़्स सदक़ा के ज़रिए अपने मुर्दों पर मेहरबानी करता है , उसके लिए अल्लाहतआला के नज़दीक औहद पहाड़ के बराबर अज्र (सवाब) है और रोज़े क़यामत वह अर्श के साया में होगा , जबकि इसके अलावा और कोई साया न होगा और इस सदक़ा के ज़रिए ज़िन्दा और मुर्दा दोनों नजात हासिल करते हैं।

अल्लामा मजलिसी ज़ाद अलमआद में तहरीर फ़रमाते हैं कि अपने मुर्दों को फ़रामोश न करो , क्योंकि उन के हाथ आमाले रालेह से कोताह हैं और वह अपनी औलाद भाईयों और रिश्तेदारों की तरपञ से उम्मीदवार होते हैं और उनके एहसान के मुन्तज़र (प्रतिक्शारत) होते हैं। विशेषतया नमाज़े शब की दुआ करते वक़्त वाल्दैन के लिए दूसरों से ज़्यादा दुआ करो और उनके लिए अमाले सालेह बजा लाओ। एक ख़बर में है कि कुछ ऐसी औलाद भी हैं , जिनो वाल्दैन ने ज़िन्दगी मे तो आक़ (त्याग) कर दिया था , लेकिन उनकी वफ़ात के बाद अपने वाल्दैन के लिए आमाले सालेह करने की वजह से नेक हो जाते हैं। वाल्दैन और रिश्तेदारों के लिए बेहतरीन नेकी यह है कि उनका कर्ज़ अदा करो और उनके हकूके अल्लाह से आज़ाद कराये। हज और बाक़ी तमाम इबादत जो उनसे ज़िन्दगी में फ़ौत हुए थे , तबरअन या बतौर इजारा अदा करने की कोशिश करे।

एक हदीसे मोतबरा में मनकूल है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) हर शब को अपनी औलाद और हर दिन को अपने वाल्दैन के लिए दो रक़त नमाज़ पढ़ा करते थे , पहली रकत में सूरए हम्द के बाद इन्ना अनज़लनाह और दूसरी रकत में इनना आतैना कल कौसर और बसन्दे सहीह इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से मलकूल है कि कभी-कभी मय्यत तंगी और सख़्ती में मुबतिला होती है और हक़ तआला उसे वुसअत अता करता है और उसकी तंगी को दूर करता है और उसे कहा जाता है कि जो ख़ुसी तुझे दी गयी है यह उस नमाज़ के बदले में है , जो तेर फ़लां (अमुक) मोमिन भाई ने तेरे लिए पढ़ी है। रावी ने पूछा क्या दो रकत में दो मुर्दों को शरीक किया जा सकता है ? आपने फ़रमाया हां। मय्यत इस दुआ व अस्तग़फार से खुश होता है जो उसके पास पहुंचती है और फ़रमाया , मय्यत के लिए नमाज़ , रोज़ा , हज और सदक़ा और बाक़ी तमाम आमाले सालेह और उनका सवाब जो मय्यत के लिए किए जाते हैं उसकी क़ब्र में दाख़िल होते हैं और दोनों के नामए आमाल में दर्ज होते हैं। एक और हदीस में फ़रमााय कि जो शख़्स मय्यत के लिए आमाले सालेह बजा लाता है तो हक़ ताला उसे दुगना करता है और मय्यत उससे फ़ायदा उठाती है।

मर्वी है जब कोई शख़्स मय्यत के लिए सदक़ा देता है तो हक़ तआला जिबरईल को हुकम देता है कि सत्तर हज़ार फ़रिश्तों को साथ लेकर इश क़ब्र पर जाओ। उनमें से हर एक फ़रिश्ता न्यामते खुदावन्दी से पुर (भरा हुआ) एक-एक तबक़ा उठा कर आता है और कहता है , ऐ वली अल्लाह तुम पर सलाम हो यह फ़लां (अमुक) मोमिन ने तेरी तरफ़ हदिया भेजा है , जिसकी वजह से उसकी क़ब्र मुनव्वर (प्रकाशित) हो जाती है और हक़ तआला उसे हज़ार शहर बेहश्त में अता फ़रमाता है और हुराने जन्नत से उसका अक़्द करता है और उसे हज़ार हुल्ले अता फ़रमाता है और उसकी एक हज़ार हाजात पूरी करता है।

मैं इस जगह कुछ सच्चे ख़्वाबों का ज़िक्र ज़रुरी समझता हूं ऐसा न हो कि तुम इन को शैतानी ख़्वाब या अफ़साना समझ कर तवज्जोह के क़ाबिल न समझो , बल्कि उन पर ग़ौर व फ़िक्र करो , क्योंकि उन पर ग़ौर करने से होश उड़ जाते हैं और नींद हराम हो जाती है।

फ़साना हा हमा ख़्वाब आवर्द फ़साना मन!

ज़हीशम ख़्वाब रबा या फ़साना अजबी अस्त!

“ तमाम अफ़साने ख़्वाब आवर होते हैं , लेकिन मेरी कहानी ऐसी अजीब है , जिसके सुनने से नींद उचाट हो जाती है। ”

हिकायत

मेरे उस्ताद सिक़ातुल इस्लाम अल्लामा नूरी इत्तरउल्लाह मरक़दह दारुल इसलाम में नक़ल फ़रमाते हैं कि मुझसे अल्लामा सैयद अली बिने फ़क़ीह नबील सैयद हसन अल हुसैनी अल असफ़हानी (र 0) ने ब्यान किया , उन्होंने फ़रमाया जब मेरे वालिद ने वफ़ात पायी , मैं उस वक़्त नजफ़े अशरफ़ में मुक़ीम था और इल्म हासिल करने में मशगूल था। मरहूम के काम मेरे भाइयों के ज़िम्मे थे , जिन की तफ़सील का मुझे इल्म न था। जब इन बुर्जुगवार के इन्तिक़ाल को सात महीने गुज़र गए तो मेरी वालिदा का भी इन्तिक़ाल हो गया। मरहूमा को नजफ़ लाकर दफ़न किया गया। एख दिन मैंने ख़्वाब में देखा जैसे मैं एक कमरा में बैठा हूं अचानक मेरे वालिद मरहूम तशरीफ़ लाए हैं , ताज़ीम की ख़ातिर उठा और उन्हें सलाम किया और वह मजलिस के दरमियान बैठ गए और मेरे सवालात पर तवज्जोह फ़रमायी , मुझे उस वक़्त मालूम हुआ कि वह मुर्दा है। मैंने उनसे मालूम किया क्या आप असफ़हान में फ़ौत हुए थे। मैं आपकों यहां कैसे देख रहा हूँ। आप ने फ़रमाया हां लेकिन मुझे वफ़ात के बाद नजफ़ अशरफ़ में जगह दी गयी है , अब मेरा मकान नजफ़ में है , मैंने पूछा क्या मेरी वालिदा मरहूमा भी आपके पास हैं , उन्होंने फ़रमाया नहीं। मैं उनके नफ़ीमें जवाब देने से खौ़फ़ज़दा हुआ , फिर उन्होंने फरमाया , वह भी नजफ़ में है , लेकिन उनका मकान और है। उस वक़्त मैं समझ गया कि मेरे वालिद आलिम थे और आलिम का मुक़ाम जाहिल के मुक़ाम से बलन्द होता है फ़िर मैंने उनके हालात के बारे में पूछा तो उन्होंने फ़रमाया मैं सख़्ती और मुसीबत में रहा हूं। अलहम्दो लिल्लाह अब मेरा हाल अच्छा है , और उस तंगी और सख़्ती से नजात मिल गयी है। मैंने तअज्जुब से पूछा , क्या आप भी तंगी और सख़्ती में रहे। फ़रमाया हां। हाजी रज़ा मशहूर नालबन्द , जो आक़ा बाबा के लड़के थे का मेरे ज़िम्मे कुछ हिसाब था , उसी के मुतालिबे से मेरा बुरा हाल हुआ। मैं सख्त मुताअजुब हुआ और इसी ताअज्जुब और ख़ौफ़ ने मुझे बेदार कर दिया। मैंने अपने भाई को इस अजीबो-ग़रीब ख्वाब से आगाह किया जो मरहूम का वसी था और उससे दरख़्वास्त की कि वह मुझे तहरीर करे कि क्या हाजी रज़ा मज़कूर का वालिद मरहूम से कुछ मुतालिबा था या नहीं। मेरे भाई ने मुझे तहरीर किया कि मैंने क़र्ज़ख़्वाहों के तमाम रजिस्टरों में तलाश किया , मगर आदमी का नाम नहीं मिला। मैंने दोबारा तहरीर किया कि उस आदमी से पूछो। मेरे भाई ने फ़िर जवाब तहरीर किया कि मैंने उससे पूछा था , उसने कहा कि मुझको उन से अट्ठारह तूमान लेने थे , जिनका सिवाय खुदा के मेरा और कोई गवाह न था। मरहूम की वफ़ात के बाद मैंने तुम से पूछा कि क्या मेरा नाम भी क़र्ज़ख्वाहों में है , तुमने कहा नहीं। मैने सोचा अगर मैं क़र्ज़ तलब करुं , तो मेरे पास साबित करने के लिए कोई तर्क और दलील नही है और मुझे मरहूम पर भरोसा था कि वह अपने रजि़स्टर में दर्ज कर लेंगे मैं समझ गया कि उनसे तसाहुल हो गया और वह भूल गए। बस मैंने वसूलीए क़र्ज़ से मायूस होकर इजहार न किया। जब मैंने आप का पूरा ख़्वाब उनसे ब्यान किया और उन का क़र्ज़ चुकाने की ख़्वाहिश की तो उन्होंने जवाब दिया कि हम उनको बरीउज़्ज़िमा कर चुके हैं , जबकि आपने मुझे क़र्ज़ से लाइल्मी का इज़हार किया था।

हिकायत

सकतुल इस्लाम नूरी नूरउल्ला मरक़दह हाजी मुल्ला अबुल हसन माज़न्दरानी से दारुल इस्लाम में नक़ल करते हैं कि मुल्ला जाफ़र इब्ने आलिम सालेह मुहम्मद हुसैन तबरसानी जो तेलक नामी बस्ती के रहने वाले थे , मेरी उनसे दोस्ती थी जब विकट ताउन का रोग फ़ैला , जिसने तमाम इलाक़ा को अपनी लपेट में ले लिया तो इत्तेफाक़ ऐसे हुआ कि लोगों की एक बहुत बड़ी संख्या फ़ौत हो गयी , जिन्होंने आपको वसी बनाया था और उनकी वसीयत के मुताबिक उनके माल को जमा कर लिया था , लेकिन वह अमवाल अभी अपने मसरफ़ पर ख़र्च न हुए थे कि वह भी ताऊन से हलाक हो गए और वह अमवाल बरबाद हो गए औऱ सही मसरफ़ पर ख़र्च न हुए। जब अल्लाहतआला के फ़ज़लोकरम से मैं हज़रत अबू अब्दुल्लाह अल हुसैन की क़ब्र की ज़ियारत से मुर्शरफ़ हुआ तो करबलाए मोअल्ला में मैंने एक रात ख़्वाब में देखा कि एख आदमी की गर्दन में जंज़ीर है , जिससे आग के शोले निकल रहे हैं और जिसको दोनों तरफ़ से दो आदमी पकड़े हुए हैं , ज़ंजीर वाले आदमी की ज़बान इतनी लम्बी हो चुकी है कि उसके सीने तक लटक आयी है , जब उसने मुझे देखा तो वह मेरे नज़दीक आया। मैंने देखा तो वह मेरा दोस्त मुल्ला जाफ़र था। मैंने उसके हाल पर आश्चर्य किया , उसने मेरे साथ बात करना चाही और फ़रियाद करना चाही इन दो लोगों ने ज़ंजीर को खींचा और पीछे हटा लिया। मैंने इसके हाल को तीन बार देखा और डर के मारे चीख़ निकली और जाग गया। मेरी इस चीख़ को सुनकर मेरे नज़दीक सोया हुआ एक आलिम भी जाग पड़ा। मैंने ख़्वाब के वाक़िया को उसके सामने ब्यान किया और इत्तेफ़ाकन वह वक़्त कि जब मैं जगा सहेन और हरम शरीफ़ के दरवाज़े खुलने का वक़्त था। मैंने अपने दोस्त से कहा कि बेहतर है कि हरम शरीफ़ में जाकर ज़ियारत करें और मुल्ला जाफ़र के लिए इस्तेग़फार करें। शायद अल्लाहतआला उस पर रहम करे अगर यह ख़्वाब रुयाए सादिक़ा में से है , फ़िर हम हरम शरीफ़ में दाख़िल हुए और अपने इरादे के मुताबिक़ अमल किया और उसे तक़रीबन बीस साल गुज़र चुके। मगर मुल्ला जाफ़र के बारे में कुछ ख़बर नही है , और मेरा शक यह है कि उस पर यह अज़ाब लोगों के अमवाल की तक़सीर की वजह से है। अल्लाहतआला ने मुझे अपने फज़लो करम से ख़ानए काबा की ज़ियारत और हज से फ़ारिग़ किया और मैं मदीना की तरफ़ वापस हुआ और मुझे इसी दौरान इस क़द्र रज़ा (रोग) हुआ कि मै चलने फ़िरने से मजबूर हो गया। मैंने अपने साथियों से इलतिजा किया कि मुझे गुस्ल दे कर लिबास तबदील करें और कंधों का सहारा देकर रसूले अकरम (स 0 अ 0) के रौज़ए मुबारका में ले जाएं। मेरे मरने से पहले मेरे दोस्तों ने मेरे कहने के मुताबिक़़ अमल किया जब मैं रोज़ए मुतहर में दाख़िल हुआ तो बेहोश हो गया। मेरे साथी मुझे छोड़कर अपने कामों में लग गए और जब मुझे होश आया तो मुझे कंधों पर उठाकर ज़रीह मुक़द्दस के पास ले गये। मैंने ज़ियारत की , फ़िर वह मुझे रौज़ा के अक़ब (पीछे) जनाबे सैय्यदा के मकान तक ले गए जो जनाबे सैय्यदा की ज़ियारतगाह है। मैं वहां बैठ गया औऱ ज़ियारत करने के बाद अपनी शिफ़ा के लिए दुआ की औऱ जनाबे सैय्यदा से मुख़ातिब होकर अर्ज़ की कि हम तक ऐसी रवायत पहुंची है , जिन से ज़ाहिर होता है कि आपको अपने फ़रज़न्द हज़रत इमाम हुसैन (अ 0 स 0) से ज़्यादा मुहब्बत है और मैं उनकी क़ब्र का मुजाविर हूं आप उनके वास्ते से ख़ुदा तआला से मेरे लिए शिफ़ाअत तलब करें फ़िर रसूले अकरम (स 0 अ 0) की ओर मुतवज्जेह हुआ और अपने हाजात तलब की और अपने तमाम मुर्दा दोस्तों के लिए आं हज़रत से शिफ़ाअत की इलतिजा की और हर एक का नाम लेकर दुआ की। यहां तक कि मुल्ला जाफ़र के नाम तक पहुंचा , उस वक़्त मुछे पुराना ख़्वाब याद आया। मैं बेहाल हो गया और मैंने ग़िडग़िडा कर उसके लिए मग़फ़िरत और शफ़ाअत की दुआ मांगी औऱ अर्ज़ किया कि मैंने मुल्ला जाफ़र को अबसे बीस साल पहले बुरे हाल में देखा था , मैं अपने ख़्वाब के सच्चा औऱ शैतानी होने के बारे में कुछ नहीं समझता। बहरहाल जहां तक मुमकिन था मैंने खुजू व ख़ुशू (विनय एंव नम्रता) के साथ उसके हक़ में बख़शिश की दुआ की। मैंने अपनी बीमारी में कमी महसूस की। उठा और बग़ैर दोस्तों के सहारे के मुक़ाम पर आया और मेरा मर्ज़ (रोग) जनाबे सैय्यदा की बरकत से दूर हो गया।

जब हम मदीना से चले तो ओहद के मुक़ाम पर ठहरने का इरादा किया। जब हम वहां पहुंचे तो वहाम पर शोहदाए ओहद की ज़ियारत की। वहां पर ख़्वाब में मैंने अपने दोस्त मुल्ला जाफ़र को देखा वह सफ़ेद लिबास में मलबूस सिर पर मोअत्तर (सुगंधित) दसतार सजाए हाथ में असा लिए मेरी तरफ़ बढ़े मुझे सलाम किया और कहा , “ मरहबा बाला ख़ोवतह वल सिदाक़ता ” दोस्त को दोस्त के साथ ऐसी ही अच्छा सुलूक करना चाहिए , जैसा तुमने मेरे साथ किया है। मैं उस वक़्त बड़ी तंगी और मुसीबत में था। तू अभी रौज़ए मुतहर से बाहर नहीं निकला था कि उन्होंने मुझे रिहा कर दिया। अभी दो या तीन रोज़ हुए कि मुझे हम्माम में भेजकर कसाफ़त (गन्दगी) को दूर किया और रसूले अकरम (स 0 अ 0) ने मेरे लिए यह लिबास भेजा और यह एबा जनाबे सैय्यदा ने अता फ़रमायी और अब बहम्दिल्लाह मेरा हाल बेहतर है और अब तेरी पेशवायी को अया हूं ताकि बशारत दूं। अब खुश हो कि तू तन्दुरुस्त होकर अपने ख़ानदान की तरफ़ जा रहा है और वह तमाम सलामती से है , इसी तरह अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए मैं खुश व खुर्रम बेदार (जगा) हुआ।

शेख़ मरहूम फ़रमाते है कि अक़्लमन्द शख़्स के लिए बेहतर है कि वह इस ख़्वाब के हक़ायक़ में गौ़र व फ़िक़्र करे , क्योंकि यह उन चीज़ों में से है जो दिल की स्याही और आंखों की धूल को साफ़ कर देती है।

हिकायत

दारुस्सलाम में है , शेख अजल जनाब हाजी मुल्ला अली अपने वालिद माजिद जनाब हाजी मिर्ज़ा ख़लसील तेहरानी से नक़्ल करते हैं कि उन्होंने फ़रमाया कि मैं करबलाए मोअल्ला में था और मेरी वालिदा तेहरान में। मैंने एक रात ख़्वाब में देखा कि मेरी वालिदा ने मेरे पास आकर कहा बेटा! मैं मर चुकी हूं और मुझे तेरे पास लाया जा रहा है और मेरी नाक तोड़ दी गयी है। मैं डर कर ख़्वाब से जगा। इस वाक़्या के चन्द रोज़ बाद मुझे अपने भाई की तरफ़ से वालिदा की वफ़ात का ख़त मिला और उसमें तहरीर था कि आपकी वालिदा का जनाज़ा आपके पास भेज दिया है , जब जनाज़े वाले पहुंचे तो उन्होंने फ़रमाया कि तुम्हारी वालिदा का जनाज़ा कारवां सराय में ज़ूअल कफ़ल के नज़दीक छोड़ा है , क्योंकि हमारा अन्दाज़ था कि तुम नजफ़ अशरफ़ में होंगे। मैं ख़्वाब की सच्चाई को समझ गया , लेकिन मैं मरहूमा के इस बात पर हैरान था कि मेरी नाक तोड़ दी गयी है मैंने कफ़न को चेहरे से हटा कर देखा तो नाक टूटी हुई थीष मैंने उनसे इसकी वजह मालूम किया तो उन्होंने कहा कि हम इसके अलावा कोई वजह नहीं जानते कि हमने कारवां सराय में मरहूमा का जनाज़ा दूसरे जनाज़ों के आगे रख दिया , हम एक दूसरे से झगड़ पड़े। आपस के मार-पीट में जनाज़ा ज़मीन पर गिर पड़ा शायद उसी वक़्त मरहूमा को यह नुक़सान औऱ तकलीफ़ पहुंची। मैं अपनी वालिदा के जनाज़े को हज़रत अबुल फ़ज़लिल अब्बास (अ 0 स 0) के हरम में लाया और उनकी क़ब्र के बिलमुक़ाबिल रख दिया और आँ जनाब से मुख़ातिब होकर अर्ज़ किया कि ऐ अबुल फज़लिल अब्बास (अ 0 स 0) मेरी वालिदा नमाज़ रोज़ा को अच्छी तरह अदा करती थीं। अब आपके पास मौजूद हैं इनका अज़ाब और तकलीफ़ दूर फ़रमाएं। ऐ मेरे आक़ा! मैं आपके सामने उनकी पचास साला नमाज़ रोज़ा की ज़मानत देता हूं , फिर उनको दफ़न कर दिया औऱ उन के नमाज़ रोज़ा को अदा करना भूल गया।

कुछ अर्से के बाद मैंने ख़्वाब में देखा कि मेरे दरवाज़े के सामने बहुत शोरों गुल हो रहा है। बाहर निकल कर देखा तो मेरी वालिदा को एक दरख़्त के साथ बांधकर कोड़े लगाए जा रहे हैं। मैंने पूछा तुम इन्हें किस गुनाह के बदले में कोड़े लगा रहे हो। उन्होंने कहा हमें अबुल फज़लिल अब्बास (अ 0 स 0) ने इस काम पर मामूर किया है। यहां तक कि फ़लां रक़म अदा करें मैं क़मरे मैं दाख़िल हुआ और जिस क़द्र रक़म उन्होंने मांगी थी , उनको अदा कर दी और अपनी वालिदा को दरख़्त से आज़ाद कराया और मकान पर लाया और उनकी ख़िदमत में मशगूल हो गया। जब आंख खुली तो मैंने रक़म का हिसाब किया तो पता चला कि वह रक़म जो उन्होंने वसूल की थी पचास साल की इबादत के मुताबिक़ थी। मैंने इस रक़म को उठाया और सैय्यद अज़ल आका़ मीरज़ा सैय्यद अली रिज़वान उल्लाहे अलैहे साहबे किताब रियाज़ के पास लाया और अर्ज़ किया। यह रक़म पचास साल की इबादत की है , मेहरबानी करके यह हदिया मेरी वालिदा को पहुँचाएं।

हमारे उस्ताद साहबे दारुस्सलाम ने इस ख़्वाब के बारे में फ़रमाया है कि यह ख़्वाब उमूर और आक़बत के ख़तरात , अहदे खुदावन्दी में सुस्ती के अदम को ज़ाहिर करता है और अपने पसन्दीदा औलिया के मुक़ामात व मरातिब की बलन्दी पर दलालत करता है , जिसमें बसीरत की आंखों के साथ ग़ौरो फ़िक्र करने वाले पर कोई अम्र पोशीदा (छुपा) नहीं रहता।

हिकायत

यही बुजुर्गवार अपने वालिद सालेह से नक़्ल फ़रमाते हैं कि उन्होंने फरमाया कि तेहरान में एक हम्माम का ख़ादिम था , जिसे हम पादो कहा करते थे और वह नमाज़ , रोज़ा अदा नहीं करता था , एख दिन वह एक मेमार के पास गया और उससे कहा कि मेरे लिए एक हम्माम बना दो। मेमार ने कहा तू रक़म कहां से लाया है । पादो ने कहा तुझे इससे क्या गरज़ , तू रकम ले और हम्माम बना दे। इस मेमार ने उसके लिए हम्माम बनाया , जो उसके नाम से मशहूर हुआ और उसका नाम अली तालिब था। मरहूम हाजी मुल्ला ख़लील कहते हैं कि जब मैं नजफ़ अशरफ़ में था मैंने ख़्वाब में अली अली तालिब को वादी अलस्लाम में देखा। मैं हैरान हुआ और उससे पूछा कि तू इस मुक़ाम पर कैसे पहुंचा ज कि तू न नमाज़ पढ़ता था और न ही रोज़ा रखता था। उसने जवाब दिया ऐ फ़लां! जब मैं मरा तो मुझे तौक़ व ज़ंजीर में जकड़ दिया गया ताकि मुझे अज़ाब की तरफ़ ले जाया जाय कि हाजी मुल्ला मोहम्मद किरमान शाही ने ख़ुदा उनको जज़ाए खैर दे। फ़लां आदमी को मेरे लिए हज करने के लिए नायब मुक़र्रर किया और फ़लां को मेरे नमाज़ व रोज़ा का नायब मुक़र्रर किया और फ़लां-फलां को ज़कात और रद्दे मज़ालिम के लिए मुक़र्रर फ़रमाया और अब मेरे ज़िम्मे कोई चीज़ नहीं छोड़ी जो अदा न की हो और मुझे अज़ाब से नुजात दिलायी। खुदावन्द तआला उन्हें जज़ाए ख़ैर दे। मैं डर कर ख़्वाब से बेदार हुआ और हैरान था। कुछ अर्से के बाद एक जमात तेहरान से यहां पहुंची। मैंने उनसे अली तालिब का हाल किया , उन्होंने मुझे ऐसी ही ख़बर दी , जैसा मैने ख़्वाब में देखा था। यहां तक की हज व नमाज़ व रोज़ा के नायबीन के नाम इन नामों के मुताबिक़ थे जो मुझे ख़्वाब में बताए गये थे। अब यह बात छुपी नहीं रही कि यह ख़्वाब उन वारिशुदा अहादीस की तस्दीक़ करता है। जो नमाज़ , रोज़ा , हज औऱ बाक़ी सदक़ात के सवाब के मय्यत तक पहुंचने की दलालत करती हैं , क्योंकि मय्यत कभी तंगी और सख़्ती में मुबतिला होती है। मगर वह इन आमाल की वजह से जिनका सवाब उसे मिलता है। आराम व राहत पाता है , औऱ इस बात की भी तसदीक़ होती है कि कोई मोमिन (धर्मनिष्ठ) अगर मशरिक़ व मग़रिब में किसी जगह भी मेरे उसकी रुह (आत्मा) वादी अस्सलाम नजफ़ अशरफ़ में लायी जाती है और कुछ रवायात (कथन) में है कि यानी मैं उन्हें गिरोह दर गिरोह बातें करते देख रहा हूं। हाजी मुल्ला मोहम्मद किरमान शाही मज़कूर ओलमाए सालेहीन में से थे जो तेहरान में रहते थे।

हिकायत

आरिफ़ कामिल क़ाज़ी सईद कुम्मी (र 0) अरबैनात से नक़ल (उद्धृत) करते हैं कि मुझसे एक सक़्क़ा शख़्स ने ब्यान किया कि शेख़ बहाउद्दीन क़दस सरा एक दिन एक आरिफ़ से जो असफ़हान में एक मक़बरा के पास पनाह गुंजी था मिलने के लिए गया। उस आरिफ़ शख़्स ने कहा , मैंने आज से कुछ दिन पहले एक अजीबो ग़रीब मंजर (दृश्य) देखा औऱ वह यह कि कुछ लोग एख जनाज़ा को लाये और उसे फ़लां जगह दफ़न करके चले गए। थोड़ी देर के बाद ऐसी खुशबू पहुंची की इससे पहले ऐसी ख़ुशकुन खुशबू (सुगन्ध) न सूंघी थी। मैंने हैरान होकर दायें बायें देखा ताकि मालूम कर सकूं यह खुशबू कहां से आ रही है। अचानक मैंने देखा कि एक ख़ूबसूरत नौजवान शाही लिबास पहने क़ब्र की तरफ़ जा रहा है। वहां पहुंचकर क़्बर के क़रीब बैठ गया। मैं उस वाक़या से बहुत हैरान हुआ। मैंने देखा कि वह शख़्स अचानक गायब हो गया। यानी वह क़ब्र में दाख़िल हो गया। इस वाक़या को अभी थोड़ी देर गुज़री थी कि मुझे इतनी गंदी बदबू पहुंची की उससे ज़्यादा बदबू कभी न सूंघी होगी , फिर क्या देखता हूं कि उस नौजवान के पीछे एक कुत्ता जा रहा है। यहां तक क़ब्र पर पहुंचकर दोनों गायब हो गये , मुझे आशचर्य हुआ। मैं अभी हैरानगी में था कि अचानक नौजवान बाहर निकला। उसका हाल बुरा और जिस्म ज़ख्मी था जिस रास्ते से आया था उसी रास्ते से चला गया। मैं भी उसके पीछे चल दिया ताकि मैं उशकी हक़ीक़त हाल से वाक़फ़ियत हासिल करूँ। उसने मुझसे ब्यान किया कि मैं मय्यत के आमाल सालेह हूं और मुझे हुक्म दिया गया है कि मै उसके साथ क़ब्र में रहूं। अचानक यह कुत्ता जिसे तुम आता देख रहे हो , उसके बुरे आमाल थे मैंने चाहा कि उसे क़ब्र से निकाल कर उस का हक्क़े दोस्ती अदा करूँ , मगर उसने दातों से काटकर मेरा गोश्त नोच लिया और मुझे ज़ख़्मीं कर दिया। जैसा तुम देख रहे हो उसने मुझे इस क़ाबिल नहीं छोड़ा कि मैं उसके साथ रह सकूं। मैं बाहर आ गया और उसे छोड़ दिया , ज्यों ही आरिफ़े मकाशफ़ा ने इस हिकायत को शेख़ साहब से ब्यान किया तो शेख़ बहाउद्दीन आमली ने फ़रमाया। ठीक फ़रमाया , हम क़ायल हैं कि आमाल हालात की मुनासबत को ध्यान रखते हुए मिसाली सूरतें एख़्तियार करते हैं।

इस हिकायत की तसदीक़ शेख़ सद्दूक की इस रवायत (कथन) से भी होती है , जिसको उन्होंने अमाली के शुरु में दर्ज फ़रमाया है। इसका ख़ुलासा यह है कि क़ैस बिने आसिम मुकरी बनी तमीम की एक जमात के साथ रसूले अकरम (स 0 अ 0) की ख़िदमत में पहुंचा और आं हज़रत सल्लम से मुफ़ीद नसीहत की ख़्वाहिश की हुज़ूर (स 0 अ 0) ने उन्हें नसीहत करते हुए अपने मोअज़ा में यह भी इरशाद फ़रमाया , ऐ क़ैस जब तू दफ़न होगा , तेरे साथ एक साथी ज़रुर होगा , जो ज़िन्दा होगा और उस वक़्त तू मुर्दा होगा। अगर वह बाइज्ज़त होगा तो उसकी वजह से तू भी इज़्ज़त पायेगा और वह लाइल्म होगा तो तू भी बदबख्त होगा तू उसी के साथ मशहूर होगा और उसी से सवाल होगा। इस साथी को नेक बनाओ , क्योंकि अगर तू सालेह होगा तो तू उससे उन्स व मोहब्बत करेगा और अगर बुरा हुआ तो तू उससे डरता रहेगा और यह तेरे आमाल होंगे। क़ैस ने अर्ज़ किया या हज़रत! मैं चाहता हूं कि इम मोएज़ा को नज़्म किया जाच ताकि हम उस पर फ़क्र कर सकें जो कुछ हमने अरबों से हासिल किया है। हम उसे ज़ख़ीरा कर लें।

आं हज़रत (स 0 अ 0) ने हस्सान बिने साबित शायर को बुलाने के लिए किसी शख़्स को भेजा ताकि वह आकर उसको नज़्म करे! सलसाल बिने वलहमस उस वक़्त हाज़िर था उसने हस्सान बिने साबित के आने से पहले ही नज़्मे बनाते हुए कहा-

सदा सुनायी देगी तू भी उन्हीं मुर्दों में से उठेगा।

शेर नो 0 3 – और सिवाए ऐसे आमाल के जिनके ज़रिए खुदा राज़ी होता है , तुझे और किसी काम में मशगूल नहीं रहना चाहिए।

शेर नो 04- मौत के बाद इन्सान के वही आमाल साथी होते हैं , जो इससे पहले दुनियां में किया करता था।

शेर नं 0 5 – ख़बरदार , इन्सान दुनियाँ में अहलो अयाल (परिवार) के पास मेहमान हैं , जो कुछ दिन रहने के बाद कूच कर जाएगा।

शेख़ सद्दक (र 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत (कथन) करते हैं कि हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) ने फ़रमाया कि हज़रत ईसा बिने मरयम (अ 0 स 0) एक ऐसी क़ब्र के पास से गुज़रे जिस की मय्यत पर अज़ाब हो रहा था , फ़िर एक साल बाद दोबारा हज़रत ईसा (अ 0 स 0) उसी कब्र के पास से गुज़रे तो देखा कि उस मय्यत पर से अज़ाबे क़ब्र उठ चुका था। अर्ज़ किया ऐ परवर दिगार! मैं पिछले साल इसी क़ब्र के पास से गुज़रा था , जबकि इस पर अज़ाब हो रहा था औऱ इससे वह अज़ाब उठ चुकरा था। हज़रत ईसा पर अल्लाह तआला की तरफ़ से वही नाज़िल हुई। ऐ रहुल्लाह! साहबे क़ब्र का एक नेक लड़का था जिसने बालिग़ होकर , गुज़रगार की इस्लाह (सुधार) की , यतीम (अनाथ) को पनाह दी और रहने के लिए जगह दी। इसलिए मैंने उसके लड़के के आमले सालेह (अच्छे कार्य) की वजह से उसके गुनाह बख़्श दिये।