मनाज़िले आख़ेरत

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मनाज़िले आख़ेरत कैटिगिरी: क़यामत

मनाज़िले आख़ेरत

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

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मनाज़िले आख़ेरत

मनाज़िले आख़ेरत

हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

फसल शश्शुम (छः)

नामए आमाल

क़यामत की हौलनाक मंज़िलों में से एक मंज़िल नामए आमाल दिए जाने का है , चुनांचे हक़ तआला औसाफ़े क़यामत से फ़रमाते हैं-

“ और जिस वक़्त नामए आमाल खोले जाएंगे ” यह उन चीज़ों में से एक है , जिनका एतेक़ाद (विश्वास) रखना ज़रुरयाते दीन में से है। कुर्आन मजीन में है कि “ किरामन कतिबीन ” आमाल को लिखते हैं और वह जानते हैं जो कुछ तुम करते हो।

एक दूसरी जगह इन दोनों फ़रिश्तों को रक़ीब और अतीद के नाम से याद किया गया है।

इन्सान जो कुछ करता , देखता है , यहां तक कि वह नेकी के इरादे को भी तहरीर करते हैं। रावी ने इमाम अलैहिस्सलाम से पूछा कि वह नेकी की नियत कैसे मालूम करते हैं , ताकि वह तहरीर करें। हज़रत ने इरशाद फ़रमाया। इन्सान जिस वक़्त नेकी का इरादा करता है तो उसके मुंह से ख़शबू बलन्द होती है , जिससे फ़रिश्ता समझ लेता है कि उसने नेकी का इरादा किया है और जब वह बुराई का इरादा करता है तो उसके मुंह से बदबू निकलती है , जिसकी वजह से फ़रिश्ता को तकलीफ़ होती है जिससे वह वाक़िफ़ हो जाता है। इन्सान जब नेकी का इरादा करता है तो उशके नामए आमाल में एक नेकी लिख देते हैं और अगर वह इरादा के मुताबिक काम भी करे तो दस नेकियां लिखी जाती हैं और गुनाह उस वक़्त तक दर्ज नहीं होता जब तक अम्ली तौर पर न किया जाय , जैसे कि इस आयत से ज़ाहिर है।

“ जो शख़्स नेकी करेगा तो उसको उसका दस गुना सबाव अता होगा और जो शख़्स बदी करेगा तो उसकी सज़ा उसको बस इतनी ही दी जाएगी औऱ वह लोग (किसी तरह) सताए न जायेंगे। ”

लुत्फ़े ख़ुदावन्दी यह है कि जब कोई इन्सान गुनाह करता है और अतीद उसे लिखना चाहता है तो रक़ीब उससे कहता है कि उसको मोहलत दो , शायद पशेमान (शर्मिन्दा) होकर तौबा कर ले वह उसको पांच सात घंटे तक दर्ज नहीं करता। अगर तौबा न करे तो वह कहते हैं , यह बन्दा कितना बेहया और उसके नामए आमाल में एक गुनाह लिख देता है।

ज़ाहिर रवायात से पता चलता है कि हर इन्सान के दो आमाल नामे हैं एक वह जिसमें नेकिया दर्ज हैं दूसरा वह जिसमें गुनाह दर्ज हैं औऱ इनमें इन्सान का हर फ़ेल (कार्य) दर्ज होता है यहां तक कि वह फूंक भी जो आग जलाने के लिए निकाला जाता है।

शेख़ सूदूक (र 0) एतेकादिया में नक़ल फ़रमाते हैं , कि एक रोज़ अमीरूल मोमनीन अलैहिस्सलाम एक जगह से गुज़र रहे थे कि कुछ नवजवानों पर नज़र पड़ी जो लग़ोयात में मसरुफ़ थे और हंस रहे थे हज़रत ने फ़रमाया कि तुन अपने नामए आमाल को इन चीज़ों से कयों स्याह (काला) कर रहे हो। उन्होंने अर्ज़ किया अमीरूल मोमनीन (अ 0 स 0) क्या यह बातें भी तहरीर होती हैं आपने फ़रमाया हां। यहां तक कि वह सांस भी लिखा जाता है , जो बाहर निकाला जाता है , उस कांटे का सवाब भी जो रास्ते से हटाया औऱ वह पत्थर और छिलका जो लोगों के आराम के लिए रास्ते से हटाया जाता है यह मामूली अमल (कार्य़) भी बेकार नहीं होते। (मआद)।

आओ मेरे आमालनामा को पढ़ो

वह बच्चा जो मदरसा या स्कूल में फ़्रस्ट आत है , वह इतना खुश होता है कि अपने दोस्तों को आवाज़ देकर कहता है , आओ मेरे कारनामे को देखो कि मैं फ़स्रट (प्रथम) आया हूं। इशी तरह बरोज़े क़यामत मोमिन (धर्मनिष्ठ) अपने नामए आमाल को दांए हाथ में लेकर खुशी से अपने दोस्तों को आवाज़ देगा।

“ आओ मेरे नामए आमाल को पढ़ो। ” मेरा नमाज़ , रोज़ा और दूसरे आमाल कुबूल हो गये। मेरी तरफ़ देखो।

मैं दुनियां मे इस रोज़े हिसाब की मुलाक़ात से फ़िक़्रमंद (चिन्तित) था , आज मेरा हिसाब पूरा हो गया।

पस वह शख़्स खुशबख़्त है और बेहश्त में हमेशा आसूदा ज़िन्दगी में रहेगा।

लेकिन वह बदबख़्त बच्चा जो नाकाम हो जाय , वह गली कूचों में सिर झुकाए बुरे हाल में अपने मकान की तरफ़ रवाना हो जाता है। कभी यह आरज़ू करता है कि काश! मैं मर गया होता और कभी अपने-आपको हौसला देता है कि-

गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में- बस यही हाल इस वक़्त गुनाहगारों का होगा।

काश! मुझे मेरा नामए आमाल न दिया जाता औऱ मैं उसकी वजह से रुसवा (बदनाम) न होता और काश अपने हिसाब से वाक़िफ़ न होता , क्योंकि इसमें सिवाय अज़ाब और हसरत के कुछ भी नहीं करना , वह मौत जिससे मैं दुनिया में डरता था , हमेशा की मौत होती और उसके बाद यह ज़िन्दगी न होती। यह तलख़ी (कडुवाहट) उस मौत की तलख़ी (कडुवाहट) से भी ज़्यादा सख़्त है। और मेरे माल ने जिसको मैंने दुनिया में जमा किया था बेपरवाह न किया। मेरा वह ग़लबा और हुक्मरानी ख़त्म हो गयी और अब मैं ज़लील व रुसवा (बदनाम) हो गया हूँ।

जिस शख़्स को उसका आमाल नामा पुश्त (पीठ) के पीछे से दिया जाएगा (वह इस तरह की दांए हाथ को गर्दन से बांध दिया जाएगा और बायें हाथ को पुश्त के पीछे से करके नामए आमाल पसे पुश्त बायें हाथ में दिया जाएगा) और उससे कहा जाएगा कि पढ़ अपने आमाल को। वह कहेगा कि मैं पुश्त के पीछे से कैसे पढ़ सकता हूं। फिर उसकी गर्दन मरोड़ दी जाएगी या रवायत दीगर (दूसरे कथन के अनुसार) दाढ़ी से उशके सिर को पिछे की तरफ़ कर दिया जाएगा और पढ़ने को कहा जाएगा ।

औऱ वह तमाम गुनाहों की तफ़सील (विवरण) जो किए होंगे पढ़कर “ सबूरन ” की तदा (आवाज़) बलन्द करेगा।

“ वाय हम पर , इस किताब को क्या हो गया कि उसने कोई छोटी बड़ी चीज़ नहीं छोड़ी , जिसको न गिना हो और वह अपने हर अमल को सामने हाजि़र देखेंगे और तेरा रब किसी पर जुल्म नहीं करता। ” ( मआद)

आमालनामों से इन्कार

बाज़ (कुछ) रवायात से यह भी मुस्तफ़ाद होता है कि उस वक़्त कुछ ऐसे लोग भी होंगे जो ऐसे वक़्त में साफ़-साफ़ इंकार कर देंगे और कहेंगे , कि बारे इलाहा जो आमाल व अफ़आल , इस नामा में दर्ज हैं , ये हमारे नहीं है।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से मर्वी है कि उस वक़्त ख़ल्लाके आलम कातबाने आमाल को बतौर गवाह पेश करेगा। उस वक़्त वह कहेंगे कि बारे इलाहा! यह तेरे फ़रिश्ते हैं , तेरे ही हक़ में गवाही दे रहे हैं , वरना यह हक़ीक़त है कि हमने यह काम हरगिज़ नहीं किए और वह अपने दावे पर क़समें खायेंगे , जैसा कि कुर्आन मजीद में है-

“ जिस दिन कि ख़ल्लाक़े आलम उन्हें मबूस फ़रमायेंगा तो (वह आमाल बन्द न करने) पर इसी तरह क़समें खायेंगे जिस तरह तु्म्हारे लिए खाते हैं। ”

जब उनकी बेहयाई इस हद तक बढ़ जाएगी , तो उस वक़्त ख़ल्लाके आलम उनके मुंह पर मुहरें लगा देगा औऱ उनके आज़ा व जवारेह पुकार-पुकार कर गवाही देंगे।

“ आज हम उनके मुंहों पर मुहरें लगा देंगे और जो कारस्तानियां यह लोग (दुनियां में) कर रहे थे , खुद उनके हाथ हमको बता देंगे और उनके पांव गवाही देंगे।

एक दूसरे मुक़ाम पर फ़रमाया-

“ और जिस दिन अल्लाह के दुश्मन जहन्नुम के पास जमा किए जायेंगे , फिर रोके जायेंगे , यहां तक कि जब वह जहन्नुम में पहुंच जायेगे तो उनके काम और आंखे उनकी खालें उन बदआमालियों की गवाही देंगे। ”

और वह अपने आज़ा (अंगो) से कहेंगे-

तुम हम गर क्यों गवाही दे रहे हो ?

हमें उसी क़ादिरे क़य्यूम ने गोया किया , जो हर चीज़ को गोया करता है। उस वक़्त यह लाजवाब हो जाएंगे।

उनका यह इक़रार और इसरार उनकी बहुत बड़ी हिमाक़त (बेवकूफ़ी) की दलील है , वरना अगर वह इक़रार कर लेते तो इसमें शक न था कि रहीम व करीम की रहमतें वासएः उनके शामिले हाल होगी।

अनवारे नामानियां में एक रवायत में है कि जब आमाल तौले जाएंगे और आदमी की बुराईयां ज़्यादा होगी। मलायका को हुक्म होगा इसे जहन्नुम में डाल दें।

जब मलायका उसे लेकर चलेंगे तो वह पीछे मुड़कर देखेगा। इरशादे कुदरत होगा पीछे क्यों देखता है ? अर्ज़ करेगा पालने वाले मुझे तेरे मुत्तालिक़ यह हुस्ने ज़न तो न था कि तू आतश (आग) में झोंक देगा। इरशादे कुदरत होगा। ऐ मेरे मलायका मुझे अपनी इज्ज़त व जलाल की क़स्म। गो (यद्यपि) उसने दुनियां में एक दिन भी हुस्नेज़न क़ायम नहीं किया था , मगर अब दावा करता है , इसे जन्नत में दाख़िल कर दो। (अहसनुल फ़वायद)।

एयाशी हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत (कथऩ) करते हैं कि क़यामत (प्रलय) के दिन हर शख़्स को उसका नामए आमाल पकड़ाया जाएगा और उसे पढ़ने को कहा जाएगा।

बस अल्लाह तआला उसके देखने , बोलने , चलने के सभी अंगो को इकट्ठा करेगा। बस वह शख़्स कहेगा , हाय अफ़सोस! मेरे आमालनामा को क्या हो गया है ? कि उसमें मेरा कोई सग़ीरा , कबीरा (छोटा , बड़ा) गुनाह (पाप) नहीं छोड़ा गया , मगर उसका अहसा कर लिया गया है।

इब्ने क़ौलूया हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करता है कि जो शख़्स रमज़ान के महीने में हज़रत इमाम हुसैन (अ 0 स 0) की क़ब्र की ज़ियारत करे या ज़ियारत के सफ़र (यात्रा) में फ़ौत (मृत्यु) हो जाय तो उसके लिए बेरोज़े क़याम कोई हिसाब किताब न होगा और वह बेख़ौफ़ व ख़तर दाख़िले जन्नत होगा।

अल्लामा मजलिसी तोहफ़ा में दो मोतबर (विश्वसनीय) असनाद (प्रमाण) के हवाले से रवायत (कथन) करते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ 0 स 0) ने फ़रमाया जो शख़्स दूर दराज़ से मेरी क़ब्र की ज़ियारत करेगा हम उसे बरोज़े क़यामत तीन चीज़ों से महफूज़ (सुरक्शित) रखेंगे।

1- उसे क़यामत की हौलनाक़ियों से महफूज़ रखेंगे , जबकि नेकूकार को नामाए आमाल उनके दायें हाथ में दिया जाएगा और बुरे आमाल वालों को बायें हाथ में देगा।

2- पुले सरात के अज़ाब से नजात मिलेगी।

3- मिज़ाने आमाल के वक़्त महफूज़ रहेगा।

हक्क़ुल यक़ीन में लिखा है कि हुसैन बिने सईद किताबे जुहद में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से एक रवायत (कथन) ब्यान करते हैं कि अल्लाह तआला जब किसी मोमिन के हिसाब का इरादा करेगा तो उसके नामए आमाल को उसके दाहिने हाथ में देगा और अल्लाह ताला उसका खुद हिसाब लेगा , ताकि कोई दूसरा शख़्स उसके हिसाब से मुत्तिला (सूचित) न हो अल्लाह तआला अपने मोमिन बन्दे से कहेगा। ऐ मेरे ख़ास बन्दे , क्या तूने फलां (अमुक) काम भी किया था , तो वह मोमिन कहेगा परवर दिगार! मैंने किये हैं पस अल्लाह तआला फ़रमाएगा , मैंने उन गुनाहों (पापों) को तेरी ख़ातिर बख़्श दिया है और उनको नेकियों में तब्दील कर दिया है।

लोग उसको जन्नत में देख कर कहेंगे। सुब्हान अल्लाह यह आदमी कोई गुनाह (पाप) नहीं रखता।

अल्लाहतआला के फ़रमान “ जिस किसी को उसका नामए आमाल उसके दायें हाथ में दिया जाएगा तो वह ख़ुश व ख़ुर्रम अपने अहले ख़ाना के पास जाएगा। ” इसका यह मतलब है। रावी ने पूछा कि या हज़रत जन्नत में उसके घर वाले कौन होंगे , तो इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया बरोज़े क़यामत उसके अहले ख़ाना वही होंगे जो दुनियाँ में थे बशर्ते कि वह मोमिन हों। अगर अल्लाहतआला किसी बुरे शख़्स का हिसाब लेगा तो अल्लाहतआला उसका हिसाब ऐलानियां और औहले महशर के सामने लेगा और उस पर हुज्जत का ख़ात्मा करेगा और उसके नामए आमाल को बायें हाथ में पसे पुश्त देगा और वह हाय हलाकत , हाय हलाकत पुकारता हुआ वासिले जहन्नुम होगा और वह ऐसा शख़्स होगा , जो इस दुनियाए फ़ानी (नश्वर संसार) के अन्दर अपने अहेल ख़ानदान के साथ ऐशो इशरत की ज़िन्दग़ी गुज़ारता था और आख़िरत पर ईमान न रखता था और इसमें इशारा है कि अल्लाहतआला क़यामत के दिन मुनाफ़िकों और काफ़िरों (नास्तिक) के हाथों को पसे गर्दन बांध देगा और वज़ू हाथ धोने की दुआ में इन दोनों हालतों की तरफ़ इशारा किया गया है-

“ ऐ मेरे अल्लाह मेरा नामए आमाल मेरे दायें हाथ में देना। हमेशा जन्नत में जगह देना औऱ मुझसे मेरा हिसाब जल्दी फ़रमाना। ऐ अल्लाह मेरा नामए आमाल मेरे बायें हाथ मे पसे पुश्त न देना और बरोज़े क़यामत मेरी गरदन न लटकाना और मैं आग के शोलों से तेरी पनाह चाहता हूँ। ”

मैं इस मुक़ाम पर सैय्यद बिने ताऊस की रवायत को तर्बरुकन ब्यान करना मुनासिब समझता हूँ और उसका खुलासा (सूक्शम) यह है कि जब रमज़ान का महीना शुरू होता है तो इमाम ज़ैनुल आबदीन (अ 0 स 0) अपने गुलामों (सेवकों) औऱ लौंडियों (सेविकाओं) को उनके जरायम (अपराध) की सज़ा नहीं देते थे , बल्कि उन गुलामों और कनीज़ों के नाम और उस जुर्म की सज़ा को एक रजिस्टर में लिख देते थे , बजाय इसके कि वह उनकी ग़ल्ती की सज़ा उसी वक़्त दें। यहां तक की रमज़ान के महीने की आख़िरी रात को इन मुजरिमों (अपराधियों) को बुलाते , फ़िर वह किताब जिसमें उनके तमाम गुनाह (पाप) दर्ज होते उठा लाते और फ़रमाते क्या तुझे याद है कि फ़लां (अमुक) दिन तूने फ़लां जुर्म किया था और मैंने तुझे रज़ा नहीं दी थी। वह ग़ल्ती का ऐतराफ़ करते हुए अर्ज़ करते , यबना रसूल अल्लाह (स 0 अ 0) सचमुच हमसे यह गल्ती हुई। यहां तक कि हर एक को बुलवाकर ग़ल्तियों की तसदीक़ करवाते फ़िर उनके दरमियान खड़े हो जाते और पुकार कर कहते। तुम अपनी आवाज़ें ऊँची करके कहो , “ ऐ अली बिने हुसैन (अ 0 स 0) तेरे परवर दिगार ने भी इसी तरह तेरे आमाल गिन रखे हैं , जिस तरह तूने आमाल गिन रख़े हैं। ” अलालाहतआला के पास ऐसी की किताब मौजूद है जो खुद बोलती है और अल्लाहतआला तुम्हारा कोई छोटा बड़ा अमल नहीं छोड़ता , जो इसमें तहरीर न हो और इसी तरह जिस तरह तूने हमारे आमाल दर्ज कर रखें हैं तेरे आमाल दर्ज हैं , जिस तरह तू रब से बख़़शीश औऱ चश्म पोशी की उम्मीद रखता है कि वह तुझे माफ़ करदे इसी तू हमारे गुनाहों को माफ़ फ़रमा। ऐ अली (अ 0 स 0) बिने हुसैन तू अपने उस मुक़ाम को देख , जो तुझे बरोज़े क़यामत अपने परवर दिगार के सामने मिलेगा , क्योंकि अल्लाहतआला बड़ा आदिल (इन्साफ़ करने वाला) है और वह किसी पर राई के दाना के बराबर भी जुल्म व सितम नहीं करता। बस तुम हमसे दरगुज़र करो और माफ़ करो ताकि अललाहतआला तुझे क़यामत के दिन माफ़ करे क्योंकी अल्लाह तआला ने ख़ुद कलाम पाक में इरशाद फ़रमाया हैः-

और दरगुज़र और माफ़ कीजिए। क्या तुम पसन्द नहीं करते की अल्लाह ताला तुम्हे माफ़ कर दे और हज़रत अली बिन अलहुसैन गुलामों और कनीज़ों को बराबर ऐसे कलमात के ज़रिए तलक़ीन (उपदेश) फरमाते और उनके गुलाम आप से यही कलमात कहते रहते और उनके दर्मियान खड़े होकर रोते रहते औऱ रो-रो कर अल्लाह ताले से दुआएं मांगते रहते और कहा करते थे। ऐ खुदाया तूने हमें माफ़ कर देने का हुक्म दिया है ऐ अल्लाह हमने उन लोगों के जुल्म व सितम माफ़ कर दिए हैं। ऐ अल्लाह तू भी हमारी ग़ल्तियों को माफ़ फ़रमा। क्योंकि तू बेहतरीन माफ़ करने वाला है। ऐ अल्लाह! तूने हमें सवाली को दरवाज़े से ख़ाली वापस करने से मना फ़रमाया। बस तू हमें अपने दरवाज़े से ख़ाली हाथ वापस न कर! ऐ अल्लाह हम भी सवाली बनकर तेरे दरवाज़े पर आए हैं , और तेरे रहमों करम की उम्मीद रखते हैं। ऐ अल्लाह तू हमें नाउम्मीद और तहीदस्त वापस ना लौटा।

हज़रत इमाम ज़ैनुल आब्दीन (अ 0 स 0) ऐसे ही कलमात कहते हुए अपने गुलामों और कनीज़ों की तरफ मुहं करके फ़रमाते हैं के मैंने सबको माफ़ किया। क्या तुमने भी मेरी ग़ल्तियों को जो मैंने तुम्हारे साथ किए माफ़ कर दिया ? क्योंकि मैं ज़ालिम हाकिम हूँ औऱ खुद एक मेहरबान आदिल , हाकिम का महकूम और रियाया हूं तो गुलाम और कनीज़े अर्ज़ करते , ऐ आक़ा। हमने आपको माफ़ किया लेकिन आपने हम पर कोई जुल्म नहीं किया आप फ़रमाते हैं कि तुम कहो ऐ अल्लाह , तू अली (स 0 अ 0) बिन अल हुसैन को बख़्श दे , जैसा कि उसने हमें माफ़ कर दिया। ऐ अल्लाह तू इन्हें आग से छुटकारा दे , जिस तरह उन्होंने हमें गुलामी की क़ैद से आज़ाद कर दिया है।

बस जब ईदुल फ़ितर का दिन गुज़र जाता तो आप वह तमाम चीज़ें जो उन गुलामों औऱ कनीज़ों के पास होती बख़्श देते औऱ उनको दूसरों से बेनियाज़ कर देते और हर साल माह रमज़ान की आख़िरी शब को कमो बेश बीस गुलामों को आज़ाद फ़रमाते औऱ आप फ़रमाते थे कि अल्लाह माह रमज़ान की हर शब रोज़ा अफ़्तार करने के वक़्त सात लाख आदमियों को जहन्नुम की आग से आज़ाद करता है , जिनमें से हर एक जहन्नुम का सज़ावार और हक़दार होता है , और जब रमज़ान की आख़िरी रात होती है , तो अल्लाह ताला इतने लोगों को अज़ाद फ़रमाता है , जितने तमाम माह रमज़ान में आज़ाद होते हैं और मैं इस बात को बहुत पसन्द करता हूं कि हक़तआला देखे कि मैंने दुनियाँ में इस उम्मीद पर अपने गुलामों को आज़ाद किया था कि अल्लाह तआला मुझे जुहन्नुम की आग से आज़ाद फ़रमाए।

फ़रिश्ते नामए आमाल को रसूले ख़ुदा (स 0 अ 0) औऱ आइम्मए हुदा कि ख़िदमत में ले जाते हैं।

फ़रिश्ते इन्सान के नामए आमाल को रसूले ख़ुदा (स 0 अ 0) की ख़िदमत में पेश करते हैं , इसके बाद आइम्मए ताहरीन की ख़िदमत में सबसे आख़िर हज़रत इमाम ज़माना (अ 0 स 0) के हुज़ूर में हाज़िर होते हैं। इमाम दोनों दफ़्तरों को देखते हैं और अपने नाम लेवाओं के सहीफ़ए गुनाह को देखकर उनके लिए असतग़फ़ार करते हैं और जो ख़ताएं का़बिले इस्लाह हों , उनकी इस्लाह फञरमाते हैं , इसीलिए अपने शियों को फ़रमाते हैं कि जब तुम्हारा सहीफ़ए गुनाह मेरे पास आए तो चाहिए कि वह क़ाबिले इस्लाह हों गुनाहों क गट्ठर होने की वजह से ना क़ाबिले इस्लाह न हों , फ़िर वह आसमान की तरफ़ ले जाते हैं , यही मतलब इश आयत का है।

“ तुम बराबर अमल किए जाओ। तुम्हारे आमाल को ख़ुदा देख रहा है और उसका रसूल भी और कुछ ख़ालिस मोमनीन (आइम्मए ताहरीन) भी देख रहे हैं। ”