मनाज़िले आख़ेरत

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मनाज़िले आख़ेरत कैटिगिरी: क़यामत

मनाज़िले आख़ेरत

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

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मनाज़िले आख़ेरत

मनाज़िले आख़ेरत

हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

फ़स्ल हफ़तुम (सात)

मीज़ाने आमाल

हर तबक़ए फ़िक्र ने अपने-अपने ख़्याल के मुताबिक़ मिज़ाने आमाल के बारे में क़यास आराई की है। कुछ कहते हैं कि नामए आमाल का वज़न किया जाएगा। कुछ आमाल की सूरते जिस्मिया के वज़न के क़ायल हैं और तीसरा क़ौल यह है कि आमाले हसनेा को एक ख़ूबसूरत शक्ल में लाया जाएगा औऱ बुरे आमाल को बदसूरत शक्ल में। अल्लामा रहमतुल्ला जज़ायरी अनवारे नामानियां में फ़रमाते हैं कि अख़बार मुस्तफ़ीज़ा बल्कि शुरू से जो अम्र सराहतन साबित होता है , वह यह है कि आमाल मुजस्सम हो जायेंगे और खुद ही आमाल क़यामत के रोज़ वज़न किए जायेंगे। (अहसनुल फ़वायद)

कुछ रवायात में अधिकतम वज़न की जो हद (सीमा) यह की गयी है , जिसके मुताबिक़ आमाल को तौला जाएगा। वह अम्बिया और औसिया के आमाल हैं। चुनांचे एक जगह ज़ियारत में है अस्सलाम अला मिज़ानिल आमाल और हज़रत अली (अ 0 स 0) को मीज़ाने हक़ कहा गया है अव्वलीन व आख़रीन की नमाज़ का मीज़ान (तराज़ू) हज़रत अली की नमाज़ है। हज़रत जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) आले मोहम्मद (स 0 अ 0) से मर्वी है कि आपने फ़रमाया-

“ वह मीज़ान जिस पर मख़लूक़ात की इबादात व अफ़आल तौले जायेंगे वह अम्बिया व औसिया औऱ आले मोहम्मद (स 0 अ 0) हैं। ”

क़यामत के दिन देखा जायेगा कि उनकी नमाज़ हज़रत अली (अ 0 स 0) की नमाज़ के मुशाबेह है , वह खुशू और खूज़ू औऱ सिफ़ाते कमालिया जो हज़रत अली (अ 0 स 0) की नमाज़ में पाये जाते हैं हमारी नमाज़ में भी मौजूद हैं या नहीं। हमारी सख़ावत , शजाअत , रहमों करम , इन्साफ़ उनके अफ़आल (कार्य) से मिलते-जुलते हैं या नहीं। हमारे कार्य उनके कार्य के मुख़ालिफ़ हों , कि मीज़ाने हक़ अली से फ़िरकर उनके दुश्मनों ,, माविया व यज़ीद के किरदार (चरित्र) को अपना लें या अपने आपको उन रास्ते पर चलाएं , जिन्होंने फ़िदके जनाबे सैय्यदा को ग़सब किया (मआद)।

ख़ल्लाक़े आलम सूरए आराफ़ में फ़रमाते हैं-

“ क़यामत के दिन आमाल का तौला जाना बरहक़ है , जिसकी नेकियों का पलड़ा भीरा होगा , वही लोग , फ़लाह पाने वाले होंगे और जिसकी नेकियों का पलड़ा हल्का होगा यह वही लोग होंगे जिन्होंने हमारी आयत पर जुल्म करते हुए अपने आपको ख़सारे में डाल दिया। ”

और सूरए क़ारआ में फ़रमायाः-

“ शुरू अल्लाह , रहमान व रहीम के नाम से। खड़खड़ा डालने वाली क्या है ? ख़ड़ख़़डा डालने वाली , और तुझे क्या इल्म की खड़ाखड़ा डालने वाली क्या है ? जिस दिन लोग बिखरे हुए पत्तिगों की तरह हो जाएंगे और पहाड़ धुनी हुई रंगीन रुई की तरह हो जाएंगे। बस वह शख़्स जिसकी नेकियां वज़नी होंगी। वह पसंदीदा जि़न्दगी गुज़ारेगा और जिसकी नेकियों का वज़न का मोक जाएगा , उनका ठिकाना , हावया होगा और तुझे क्या इल्म की हावया क्या है ? वह भड़कती हुई आग है। ”

मीज़ाने आमाल को वज़नी करने के लिए मोहम्मद व आले मोहम्मद (स 0 अ 0) पर सलवात और हुस्ने ख़ल्क़ से बेहतर कोई अमल नहीं है। मैं इस मुक़ाम पर सलवात की फ़ज़ीलत में चंद रवायात नक़ल करता हूं। तीन रवायात मय हिकायात हुस्न खुल्क़ लिखकर अपनी किताब की फ़ज़ीलत देता हूं।

1- अव्वल (पहला)- शेख़ कुलैनी (र 0) बसनद मोतबर रवायत (कथन) करते हैं कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) या इमाम मोहम्मद बाक़र (अ 0 स 0) ने फ़रमाया कि मीज़ाने आमाल मोहम्मद व आले मोहम्मद (अ 0 स 0) पर सलवात से बढ़कर कोई चीज़ वज़नी नहीं। एक शख़्स के आमाल का वज़न किया जाएगा , जब वह हल्के नज़र आएंगे तो सलवात लाकर रखा जाएगा तो मीज़ान वज़नी हो जाएगी।

2- दोम (दूसरा)- रसूले अकरम (स 0 अ 0) से मर्वी है कि क़यामत के दिन मीज़ाने आमाल के वक़्त मैं मौजून हूंगा। जिस शख़्स का बुराइयों का पलड़ा भारी होगा। मैं उस वक़्त उसकी सलवात को जो उसने मुझ पर पढ़ी होगी , लाऊँगा , यहां तक की नेकियों का पलड़ा वज़नी हो जाएगा।

3- सोम (तीसरा)- शेख़ सद्दूक (र 0) हज़रत इमाम रज़ा (अ 0 स 0) ने नक़ल फ़रमाते हैं कि आपने फ़रमाया जो शख़्स अपने गुनाहों को मिटाने की ताक़त न रखता हो , उसे चाहिए कि वह मोहम्मद व आले मोहम्मद (स 0 अ 0) पर बहुत ज़्यादा दुरूद व सलवात पढ़ा करे , ताकि उसके गुनाह (पाप) ख़त्म हो जाएं।

4- चहारुम (चार)- दावाते रावन्दी से मनक़ूल (उद्धृत) है कि रूसले अकरम (स 0 अ 0) ने फ़रमाया जो शख़्स हर शबो रोज़ तीन-तीन बार मेरी हुज्जत और शौक़ के सबब मुझ पर सलवात पढ़े तो अल्लाह तआला पर यह हक़ हो जाता है कि वह उस शख़्स के दिन औऱ रात के गुनाहों को बख़्श दे।

5- पंजुम (पांच)- आं हज़रत (स 0 अ 0) से मर्वी है कि आपने फ़रमाया कि मैंने अपने चचा हमज़ा बिने अब्दुल मुतलिब औऱ अपने चचाज़ाद भाई जाफ़र बिने अबी तालिब (अ 0 स 0) का ख़्वाब में देखा कि उनके सामने सदर (बेर) का एक तबक़ पड़ा है। थोड़ी देर खाने के बाद वह बेर अंगूरों में तब्दील हो गये , जब थोड़ी देर खा चुके तो वह अंगूर आला किस्म के खजूर बन गए। वह लोग उनको खाते रहे। फिर मैंने उनके क़रीब पहुंचकर मालूम किया। मेरे मां बाप आप पर कुर्बान हों। वह कौन-सा अमल आपने किया है , जो सब आमाल से बेहतर है और जिसकी वजह से आपको यह नेआमतें मिली। उन्होंने अर्ज़ किया कि हमारे मां-बाप आप पर कुर्बान हों। वह अफ़ज़ल आमाल आप पर सलावत और हाजियों को पानी पिलाना औऱ मोहब्बते अली (अ 0 स 0) बिने अबी तालिब है।

6- शश्शुम (छः)- आं हज़रत (स 0 अ 0) से मर्वी है कि जिस शख़्स ने मुझ पर किताब में तहरीर करके सलवात भेजी तो जब तक इस किताब में मेरा नाम मौजूद रहेगा उस वक़्त तक फ़रिश्ते उसके लिए इस्तेग़फ़ार करते रहेंगे।

7- हफ़तुम (सात)- शेख़ कुलैनी (र 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि आपने फ़रमाया कि जब भी पैग़म्बर का ज़िक्र ख़ैर हो तो तुम्हें आप (स 0 अ 0) पर सलवात पढ़ना चाहिए। इस तरह जो शख़्स एक बार आं हज़रत पर सलवात पढ़ेगा , अल्लाह तआला फ़रिश्तों की हज़ार सफों में उस पर हजार बार सलवात भेजता है अल्लाह तआला और मलायका की सलवात की वजह से तमाम मख़लूक़ात उस पर सलवात भेजेगी। बस जो शख़्स इस तरफ़ रग़बत नहीं करता वह जाहिल और मग़रूर है और खुदा व रसूल और उसके अहलेबैत ऐसे शख़्स से बेज़ार हैं।

मआनी अल अख़बार में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से आया “ इन्नल्लाह वमलायकतहू युसल्लूना अलन्नबीय ” के मानी में रवायत की गयी है। उन्होंने फ़रमाया। अल्लाह तआला की तरफ़ से सलवात का मतलब रहमत है औऱ मलायका की तरफ़ से तज़किया (बचाव) है और लोगों की तरफ़ से दुआ है। इसी किताब मे है कि रावी ने कहा कि हम मोहम्मद (स.अ.व.व. ) व आले मोहम्मद पर कैसे सलवात भेजे तो फ़रमाया तुम कहोः-

“ सलवातुल्लाह व सलवातो मलाएकतिही वअन्बेयाएही व रुसुलिही व जमिअ ख़लक़िही अला मोहम्मदिन व आले मोहम्मदिन वस्सलामो अलैहि व अलैहिम वरहमतुल्लाहे व बरकातोह। ”

रावी कहता है मैंने पूछा कि जो शख़्स यह सलवात रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) पर भेजे उसके लिए कितना सवाब है। आपने फ़रमाया वह गुनाहों (पापों) से इस तरह पाक हो जाता है जैसै कि वह अभी मां के पेट से पैदु हुआ हो।

8- हश्तुम (आठ)- शेख़ अबुल फतूह राज़ी हज़रत रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) से रवायत करते हैं , आपने फ़रमाया कि शबे मैराज जब मैं आसमान पर पुहंचा तो वहां पर मैंने एक फ़रिश्ता देखा , जिसके हज़ार हाथ और हर हाथ की हज़ार उंगलियां थीं और वह अपनी उंगलियों पर किसी चीज़ का हिसाब कर रहा था मैने जिबरईल से पूछा कि यह फ़रिश्ता कौन है ? और किस चीज़ का हिसाब कर रहा है ? जिबरईल ने कहा कि यह फ़रिश्ता क़तराते बारिश को शुमार करने पर मामूर है ताकि मालूम करे कि आसमान से ज़मीन पर कितने क़तरात (बूंदे) गिरे हैं। मैंने उससे पूचा क्या तू जानता है कि जब से अल्लाह तआला ने ज़मीन को पैदा किया है अब तक कितने क़तरे (बूंदे) आसमान से ज़मीन पर गुरे हैं तो उसने कहा कि ऐ रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) मुझे उस ख़ुदा की क़मस जिसने आपको हक़ के साथ मख़लूक की तरफ मबऊस फ़रमाया है। मैं आसमान से ज़मीन पर नाज़िल होने वाले तमाम क़तराते बारिश की तफ़सील भी जानता हूं कितने क़तरात (बूंदे) जंगलों में और कितने आबादी में , कितने बागों में , कितने क़तरात शोरे ज़मीन पर औऱ कितने क़ब्रिस्तान में गिरे हैं। हज़रत (स 0 अ 0) ने फ़रमाया मुझे इसके हिसाब में कुव्वते याद्दाश्त पर हैरानी हुई तो उस फ़रिश्ते ने कहा या रसूल अल्लाह! (स.अ.व.व. ) इस कुव्वते याद्दाश्त और हाथों और इन उंगलियों के बावजूद एक चीज़ का शुमार (गिनती) मेरी ताक़त और कुव्वत से बाहर है। मैंने पूछा वह कौन-सा हिसाब है। उसने कहा कि आप की उम्मत के लोग जब एक जगह इकट्ठे बैठकर आपका नाम लेते हैं और फ़िर आप पर सलवात भेजते हैं तो उनकी इस सलवात का सवाब मेरी ताक़त और शुमार से बाहर होता है।

9- नहुम (नौ)- शेख़ कुलैनी (र 0) रवायत करते हैं कि जो शख़्स इस सलवात “ अल्लाहु्म्मा सल्लेअला मोहम्मदिव वआले मोहम्मदेनिल अवसियाअल मरज़ीयीन बेअफ़ज़ले सलवातिका वबारिक अलैहिम बेअफज़ले बरकातिका वबस्सलामो अलैहे व अलैहिम वरहमतुल्लाहे वबरकातोह ” की हर जुमा की अस्र के वक़्त सात बार पढ़े तो अल्लाह तआला हर बन्दे की तादाद के मुताबिक़ नेकियां जारी करता है और उसके उस रोज़ के आमाल कुबूल फ़रमाता है और यह भी वारिद है कि इस क़द्र सवाब होगा , जिस क़द्र तमाम लोगों की आंखों में नूर होगा।

10- दहुम (दस)- मर्वी है कि जो शख़्स नमाज़े सुबह औऱ नमाज़े ज़ुहर के बाद “ अल्लाहुम्मा सल्लेअला मोहम्मदिन वआले मोहम्मदिन व अज्जिल फ़राजहुम ” ।

पढ़े। वह उस वक़्त तक न मरेगा , जब तक वह ज़माना (अ 0 स 0) को न देख ले।

रवायाते हुस्ने ख़ुल्क

पहली रवायत (कथन)

अनस बिने मालिक से मनकूल (उद्धृत) है कि एक दफ़ा मैं रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) की ख़िदमत में मौजूद था और आं हज़रत के जिस्म पर बुरदी (यमनी चादर) थी जिसके किनारे ग़लीज़ और फ़टे हुए थे। अचानक एक आराबी ने आकर आपकी चादर को इस क़द्र सख़्त खींचा कि उस चादर के किनारे ने आपकी चादर पर सख़्त असर किया और कहने लगा , ऐ मोहम्मद (स.अ.व.व. )! इन दोनों ऊँटों को इस माल से लाद दो , क्योंकि यह माल माले ख़ुदा है न कि तेरे बाप का। आं हज़रत सल्लम ने इसके जवाब में ख़ामोशी इख़्तियार की औऱ आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया कि यह माल माले ख़ुदा का है और मैं खुदा का बन्दा हूं। फ़िर फ़रमाया कि ऐ आराबी क्या में तुझसे क़सास (बदला) न ले लूं। आराबी ने इन्कार किया। आं हज़रत ने फ़रमाया क्यों ? उस बद्दू ने अर्ज़ किया। या हज़रत बुराई का बदला बुराई से लेना आपका शेवा (चरित्र) नहीं है आं हज़रत ने मुस्कुरा कर हुक्म दिया , इसके एक ऊँट पर जौ और दूसरे पर खजूरें लाद दो औऱ इस पर रहम फ़रमाया।

मैंने इस मुक़ाम पर इश रवायत (कथन) को केवल मिसाल के तौर पर और तबरुकन ज़िक्र किया। न कि आं हज़रत और आइमए हुदा का हुस्ने ख़लक़ ब्यान करना मक़सूद था , क्योंकि ख़ल्लाक़े आलम ने जिस हस्ती को कुर्आन पाक में ख़ुल्के अज़ीम के लक़ब (पद) से याद फ़रमाया हो , और उल्माए फ़रीक़ैन आप की सीरत और स्वभाव आदि के मुत्तालिक़ बड़ी-बड़ी किताबें ल