मनाज़िले आख़ेरत

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मनाज़िले आख़ेरत कैटिगिरी: क़यामत

मनाज़िले आख़ेरत

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

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मनाज़िले आख़ेरत

मनाज़िले आख़ेरत

हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

फ़स्ल हश्तुम (आठ)

हिसाब

मोवक़िफ़े हिसाब

उन ख़ौफ़नाक मोवाक़िफ़ में से जिनका ऐतक़ाद (विश्वास) हर मुसलमान के लिए ज़रुरी है , मुक़ामे हिसाब भी है. परवरदिगारे आलम कुर्आन मजीद में इरशाद फ़रमाता है-

“ लोगों के हिसाबे आमाल का वक़्त नज़दीक है , लेकिन वह ग़फ़लत में मदहोश हैं और (इसमें ग़ौरो फ़िक़् और तैयारी से) गुरेज़ कर रहे हैं। ”

दूसरी जगह इरशादे कुदरत हैः-

“ और कितनी बस्ती वालों ने अपने परवरदिगार और रसूलों के हुक्म से सरकशी की , फिर हमने उनका हिसाब बड़ी सख़्ती से लिया और हुमने एक नाशिनासा सा अज़ाब दिया। बस उन्होंने अपने किए का फल चख लिया और उनके कामों का अंजाम नुक़सानदेह हुआ। अल्लाह तआला ने उनके लिए सख़्त अज़ाब तैयार किया। बस ऐ अक़ल वालों , अल्लाह तआला से डरते रहो। ”

हिबास कौन लगे ?

अगरचे कुर्आन और हदीस के उमूमन से यही मुस्तफ़ीद होता है कि हर शख़्स हिसाब खुद खुदावन्द आलम लेगा।

लेकिन बाज़ रवायात से ज़ाहिर होता है कि मलायका कराम इस काम को अंजाम देंगे। कुछ अख़बार व आसार से यह मतलब वाज़े होता है कि अम्बिया का हिसाब खुद खुदावन्द आलम लेगा औऱ अम्बिया अपने औसिया का हिसाब लेंगे और औसिया अपनी उम्मत का हिसाब लेंगे।

“ बेरोज़े क़यामत तमाम लोगों को उनके इमामे ज़माना के साथ बुलाएंगे। ” ( अहसनुल क़वायद)

बहारुल अनवार जिल्द 3 अमाली शेख़ मुफ़ीद (र 0) में बसन्द मुतसिल हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत है कि आपने फ़रमाया-

“ जब रोज़े क़यामत होगा तो इल्लाह तआला हमें अपने शियों का हिसाब लेने के लिए मुक़र्रर फ़रमाएगा। बस हम अपने शियों से हकूक़ अल्लाह के बारे में सवाल करेंगे और अल्लाह तआला उनको माफ़ कर देगा और शियों के ज़िम्मे हमारे जो हुकूक़ होंगे , हम खुद उनको माफ़ कर देंगे फिर आपने यह आयत तिलावत फ़रमायीः-

“ बेशक वह हमारी ही तरफ़ लौटाए जाएंगे , फ़िर बेशक उनका हिसाब हम ही लेंगे। ”

इसी किताब में मासूम से रवायत (कथन) है कि हुकूक अल्लाह और हुकूक़ इमाम अलैहिस्सलाम के बख़्शे जाने के बाद फ़रमाया-

“ ……..यानी जो मज़ालिम और हुकूकुन्नास शियों के ज़िम्मे होंगे , हज़रत रसूले खुदा (अ 0 स 0) हुकूक़ का मतालिबा करने वालों को अदा कर देंगे। ”

परवरदिगारे आलम हमें उम्मते ख़ातमुल अम्बिया अलैहे व आलेहे व सल्लम और शियाने अहलेबैत अलैहिस्सलाम में शुमार करे और हमारा हश्र उन्हीं के साथ हो। (आमीन सुम्मा आमीन)।

शियों के लिए यह खुशखबरी है कि बेरोज़े क़यामत परवर दिगारे आलम हर क़ौम के हिसाब के लिए उसके इमाम को मुक़र्रर फ़रमाएगा और वह उनके आमाल का हिसाब लेगा और हमारा हिसाब हुज्जत इब्नुल हसन इमामे ज़माना (अ 0 स 0) लेंगे , लेकिन जिस वक़्त हमरुसियाह अपने सिरों को झुकाए उनके सामने पेश होंगे और दामन उनकी दोस्ती से पुर होंगे , तो उम्मीद है कि वह हमाऱी शफ़ाअत करेंगे। खुदा का शुक्र है कि हमारा हिसाब उस करीम इब्ने करीम के सुपुर्द होगा , जो खुदा के नज़दीक आला मरातिब का मालिक है। (मआद)

हिसाब किन लोगों का होगा ?

क़यामत (प्रलय) के दिन हिसाब के लिए लोग चार गिरोहों में होंगे। कुछ लोग ऐसे होंगे जो बग़ैर हिसाब के बेहश्त में दाख़िल होंगे और यह मुहब्बाने (अ 0 स 0) से वह लोग होंगे , जिनसे कोई फ़ेले हराम सरज़द न हुआ होगा या वह तौबा के बाद दुनियां से रुख़सत हुए होंगे।

दूसरा गिरोह इसके बर ख़िलाफ़ होगा , जो बग़ैर हिसाब के जहन्नुम में दाख़िल किए जायेंगे और उन्हीं के बारे में यह आयत है-

तर्जुमा- “ कि जो शख़्स दुनियाँ से बेईमान उठेगा , उसका हिसाब नहीं किया जाएगा , और न ही आमालनामा खोला जाएगा शेख़ कुलैनी (र 0) हज़रत इमाम ज़ैनुल आब्दीन अलैहिस्सलाम से रवायत करते हैं कि मुशरिकों के आमाल नीहं तौले जाएंगे , क्योंकि हिसाब और मीज़ान और आमाल के खोले जाने का ताअल्लुक अहले इस्लाम के साथ है। काफ़िर (नास्तिक) और मुशरिक नब्स कुर्आन हमेशा अजाब में रहेंगे।

तीसरा गिरोह उन लोगों का है , जिनको मौक़िफ़े हिसाब में रोक लिया जाएगा। यह वह लोग हैं जिनके गुनाह (पाप) नेकियों पर ग़ालिब होंगे। जब यह रुकावट उनके गुनाहों का कफ़्फ़ारा हो जाएगी तो उनको नजात मिल जाएगी।

चूनांचे रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) ने इब्ने मसूद (र 0) को फ़रमाया कि बाज़ लोग एक सौ साल मौकिफ़े हिसाब में रोके जाएंगे और फ़िर वह जन्नत में जाएंगे।

“ इन्सान एक गुनाह के बदले सौ साल तक रोका जाएगा ” लेकिन गुनाह का वर्णन नहीं कि किस गुनाह के बदले रोका जाएगा , लिहाज़ा मोमनीन को चाहिए कि वह हर गुनाह से दूरी रखे ताकि मौक़िफ़े हिसाब पर रुकावट न हो। (मआद)

शेख़ सद्दूक (र 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि क़यामत के दिन दो अहलेबैत से मुहब्बत करने वालों को रोका जाएगा , उसमें से एक दुनियाँ में मुफ़लिस और फक़ीर और दूसरा दौलतमन्द होगा। वह फ़क़ीर अर्ज़ करेगा , परवर दिगार मुझे किस वजह से रोका गया है। मुझे तेरी इज़्ज़तों जलाल की क़स्म तूने मुझे कोई हुकूमत या सल्तनत न दी थी , जिसमें मैं अदालत या जुल्मों सितम करता और न ही तूने मुझे इस क़द्र माल दिया था कि मैं वाजिब कर्दा हकूक़ को अदा करता या ग़सब करता और तूने मुझे इस क़द्र रोज़ा अता की थी , जिसको तूने मेरे लिए काफ़ी समझा और मैंने उसी पर क़िफ़ायत की। बस अल्लाह तआला का हुकम होगा। ऐ बन्दए मोमिन! तू सच कहता है और उसे दाख़िले बेहश्त किया जाएगा।

दूसरा दौलतमन्द इतनी देर खड़ा रहेगा कि उसके खड़ा रहने से इतना पसीना जारी होगा जिससे चालीस ऊँट सेराब हो सकें , फिर उसको बेहश्त में दाख़िल किया जाएगा। जन्नत में वह फ़क़ीर उससे पूछेगा , तुझे किस चीज़ की वजह से इतनी देर रोके रखा गया। वह कहेगा कई चीज़ों की बराबर तक़सीरात के लम्बे हिसाब ने मुझे रोक रखा , यहां तक की अल्लाह तआला ने अपनी रहमत से निवाज़ा और मुझे माफ़ फ़रमाय औऱ मेरी तौबा को कुबूल फ़रमाया , फिर वह फ़क़ीर से पूछेगा , तू कौन है ? वह जवाब देगा , मैं वही फ़क़ीर हूं जो मैदाने हश्र में तेरे साथ था , फ़िर वह ग़नी कहेगा तुझको जन्नत की न्यामतों में इस क़द्र तब्दील कर दिया है कि मैं उस वक़्त तुझे न पहचान सका। (मतालिब)

चौथा गिरोह उन लोगों का होगा जिनके गुनाह उनकी नेकियों से ज़्यादा होंगे। बस अगर शफ़ाअत औऱ परवर दिगारे आलम की रहमत और फ़ज़लों करम शामिले हाल होगा तो वह नजात हासिल करके जन्नत में चले जायेंगे वरना उनको उस जगह पर अज़ाब में डाल जाएगा , जो ऐसे लोगों के लिए मख़सूस होगा , यहां तक कि गुनाहों से पाक हो जांय और इस अज़ाब से नजात मिल जाय , फिर उनको बेहश्त में भेज दिया जाएगा।

जिस इन्सान के दिल में ज़र्रा भर भी ईमान होगा वह जहन्नुम में बाक़ी न रहेगा , बिल आख़िर जन्नत में दाख़िल होगा। जहन्नुम में सिर्फ़ काफ़िर (नास्तिक) और मआनदीन बाक़ी रह जाएंगे।

अहबात व तकफ़ीर

“ जो लोग काफ़िर (नास्तिक) हैं उनके लिए डगमगाहट है खुदा ने जो चीज़ नाज़िल फ़रमायी है , उन्होंने उसको ना पसन्द किया तो खुदा ने उनके आमाल ज़ाए कर दिए। ”

( स 0 मोहम्मद , 8-9)

दूसरी जगह इरशादे कुदरत है-

“ जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया और अच्छे काम किए और जो (किताब) मोहम्मद पर उनके परवर दिगार की तरफ़ से नाज़िल हुई है , वह बरहक़ है , इस पर ईमान लाए तो ख़ुदा ने उनके पिछले गुनाह उनसे दूर कर दिए और उनकी हालत संवार दी। ”

( सू 0 मोहम्मद- 2)

अहबात

अगर कोई आदमी अपनी शुरी ज़िन्दगी में दायरए इस्लाम में रहकर नेक कामों में मशगूल रहा , मगर मरते वक़्त हक़ से फ़िर गया और कुफ़्र की हालत पर मरा हो तो उसे इस्लाम की हालत में किए हुए आमाल फ़ायदा न देंगे और वह नेकियां बेकार हो जाएंगी।

अगर कोई कहे कि कुर्आन मजीद में है-

“ जो शख़्स ज़र्रा बराबर भी नेकी करेगा , उसका अज्र उसको मिलेगा। ”

इसका जवाब यह है कि कुफ्र पर मरने वाले ने अपने हाथ से ही अपनी नेकियों को बरबाद कर दिया। काफ़िर (नास्तिक) के अज्र को बाक़ी रखना खुदा के लिए मोहाल है कि वह उसको जन्नत में दाख़िल करे , बल्कि उसकी नेकियों की तलाफ़ी दुनियाँ में ही कर दी जाती है , जैसे मौत की आसानी , मरीज़ न होना और माद्दी (मायावी) वसायल के ज़रिए जैसा कि गुज़र चुका है।

और मुमकिन है इन नेकियों की वजह से अज़ाब में तख़फ़ीफ़ हो , जैसा कि हातिमताई और नौशेरवां जो सख़ावत में ज़रबुल मसल है , जहन्नुम में होंगे , मगर आग उनको न जलाएगी , जैसा कि कुर्आन में इरशाद मौजूद है।

और दूसरी जगह इरशाद फ़रमाया-

“ जिन लोगों ने हमारी आयात (सूत्रों) और आख़िरत की मुलाक़ात को झुठलाया उनके तमाम आमाल बरबाद हो गए , उन्हें बस आमाल की सज़ा या जज़ा मिलेगी जो वह करते हैं। ”

( सू 0 आराफ़ , आ 0-147)

इसी तरह बहुत से आयात (सूत्रों) से वाज़ेह (स्पष्ट) है कि कुफ़्र औऱ शिर्क से आमाल बरबाद हो जाते हैं।

इसी तरह दूसरे गुनाह (पाप) भी नेक आमाल को बरबाद कर देते हैं और दरजए कुबूलियत तक नहीं पहुंचते। जैसे वालदैन के नाफ़रमान बेटे के लिए हुज़ूर ने फ़रमाया-

“ ऐ वाल्दैन के ना फ़रमान तेरा जो जी चाहे करता फ़िर , तेरा कोई अमल कुबूल नहीं है , अगर किसी शख़्स के पीछे वालिदा की आहें और बद्दुआएं हों और वह पहाड़ों के बराबर भी आमाल करें तो वह आग मे जलाया जाएगा। इसी तरह तोहमत औऱ हसद जैसा कि हदीस में है- ”

“ हसद (ईर्ष्या) ईमान को इस तरह खाता है जिस तरह आग लकडियों को खाती है। ” ( मआद)।

सक़अतुल इस्लाम कुलैनी (र 0) मोआन अनन अबुबसीर से रवायत (कथन) करते हैं कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) ने फ़रमाया , यानी “ कुफ्र की जड़ें तीन हैं ” – हिर्स , तकब्बुर और हसद (ईर्ष्या)। ” यह जड़ें ज्यूं-ज्यूं मज़बूती इख़्तियार करती जाएंगी , ईमान रुख़सत होता जाएगा और नेक आमाल बरबाद होते जाएंगे और इन्सान दोज़ख़ का ईंधन बन जाएगा , जैसा कि शैतान के तमाम , आमाल तकब्बुर की वजह से बरबाद हो गए और सिर्फ़ आख़िरत तक उम्र ज़्यादा मिली। पूरा वाक़िया कुर्आन मजीद में मौजूद है।

तकफ़ीर

तक़फ़ीर के माने क़फ़्फ़ारा है। यानी उन गुनाहों का महो करना , जो उससे सादिर हुए हैं। ईमान कुफ़्र के साब्क़ा (पूर्व) गुनाहों को मिटा देता है अगर कोई शख़्स शुरु उम्र में काफ़िर (नास्तिक) रहा और फ़िर इस्लाम ले आया तो उसके पहले वाले गुनाह ख़त्म हो जाएंगे और उनका हिसाब न होगा। इसी तरह मुसलमान के गुनाह (पाप) सच्ची तौबा से ख़त्म हो जाते हैं। उन्हीं के बारे में कुर्आन मजीद में आया है।

यानी ख़ल्लाक़े आलम इनके गुनाहों को नेकियों में तब्दील कर देता है।

बहारुल अनवार जिल्द 15 में रवायत (कथन) है कि एक शख़्स हज़रत ख़ातिमुल अम्बिया (स.अ.व.व. ) के पास आया और अर्ज़ किया कि , “ आका मेरा गुनाह (पाप) बहुत बड़ा है , ( वह गुनाह दरगोर किया था) आप मुझे ऐ