क़यामे इमाम हुसैन (अ.स.) ग़ैर मुस्लिम बुध्दिजीवियों की नज़र में

क़यामे इमाम हुसैन (अ.स.) ग़ैर मुस्लिम बुध्दिजीवियों की नज़र में0%

क़यामे इमाम हुसैन (अ.स.) ग़ैर मुस्लिम बुध्दिजीवियों की नज़र में कैटिगिरी: इमाम हुसैन (अ)

क़यामे इमाम हुसैन (अ.स.) ग़ैर मुस्लिम बुध्दिजीवियों की नज़र में

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

कैटिगिरी: विज़िट्स: 5064
डाउनलोड: 1210

क़यामे इमाम हुसैन (अ.स.) ग़ैर मुस्लिम बुध्दिजीवियों की नज़र में
खोज पुस्तको में
  • प्रारंभ
  • पिछला
  • 8 /
  • अगला
  • अंत
  •  
  • डाउनलोड HTML
  • डाउनलोड Word
  • डाउनलोड PDF
  • विज़िट्स: 5064 / डाउनलोड: 1210
आकार आकार आकार
क़यामे इमाम हुसैन (अ.स.) ग़ैर मुस्लिम बुध्दिजीवियों की नज़र में

क़यामे इमाम हुसैन (अ.स.) ग़ैर मुस्लिम बुध्दिजीवियों की नज़र में

हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.


क़यामे इमाम हुसैन (अ.स.)

ग़ैर मुस्लिम बुध्दिजीवियों की नज़र में

हिन्दी तरजुमा

सैय्यद अब्बास इरशाद नक़वी

अर्ज़े नाशिर

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने 61हिजरी में जो क़ुर्बानी बारगाहे ख़ुदा में पेश की थी वह कोई हादसा नहीं था बल्कि एक मोजिज़ा थी।

हादिसे और मौत में फ़र्क़ है ,हादिसा कुछ दिन या कुछ साल गुज़रने के बाद अपना असर खोने लगता है और फिर सदियाँ गुज़रने के बाद दिलो दिमाग़ से ग़ायब हो जाता है मगर मौजिज़ा साल या सदियों से मुतास्सिर नहीं होता बल्कि हर साल और हर सदी में अपनी आबो ताब को क़ायम रखते हुये दिलो दिमाग़ को रौशन रखता है।

वाक़या-ए-करबला एक मौजिज़ा है और इसके मौजिज़ा होने का एक यही सबूत काफ़ी है कि जैसे-जैसे वक़्त गुज़रता जा रहा है इस वाक़िये की अहमियत और इसके असरात दिलो दिमाग़ को और रौशन करते जा रहे हैं।

इमाम हुसैन (अ 0)ने चूंकि मुख़्तलिफ़ क़ौम और कबायल के लोगों के साथ मैदाने करबला में इस्लाम और आलमे इन्सानियत को बचाने के लिये क़ुर्बानी दी थी यही वजह है कि आज भी हर क़ौम और क़बीले के लोग करबला के इस मोजिज़े से मुतास्सिर होते रहते हैं।

आप के सामने जिस किताब को पेश किया जा रहा है वह इसी बात का सबूत है कि किस तरह से हिन्दू ,सिक्ख ,ईसाई और दूसरे ग़ैर मुस्लिमीन ने इस मोजिज़ा-ए-शहादते इमाम हुसैन (अ 0)को महसूस किया और अपने ख़्यालात का इज़हार करते हुए इमामे आली मक़ाम को ख़िराजे अक़ीदत पेश किया।

इस किताब को उर्दू में शाया किया जा चुका है लेकिन चूंकि आज की नौजवान नस्ल हिन्दी ज़बान को आसानी से समझती है इसलिये इस किताब का हिन्दी तर्जुमा "इमाम हुसैन (अ 0)ग़ैर मुस्लिमों की नज़र में" अब आप की ख़िदमत में पेश है।