खुरूजे मुख्तार

खुरूजे मुख्तार40%

खुरूजे मुख्तार लेखक:
: मौलाना सैय्यद अली हसन अख़तर अमरोहवी
कैटिगिरी: शियो का इतिहास

खुरूजे मुख्तार
  • प्रारंभ
  • पिछला
  • 6 /
  • अगला
  • अंत
  •  
  • डाउनलोड HTML
  • डाउनलोड Word
  • डाउनलोड PDF
  • विज़िट्स: 13399 / डाउनलोड: 4672
आकार आकार आकार
खुरूजे मुख्तार

खुरूजे मुख्तार

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

ख़ुरूजे मुख़्तार

लेखकःसैय्यद मोहम्मद अली अफ़ज़ई

मुतरजिमःमौलाना सैय्यद अली हसन अख़तर अमरोहवी

नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है और इस किताब मे टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो पर काम किया गया है।

Alhassanain.org/hindi

इंतेसाब

उस कलामे रब्बानी के नाम जिस की जिसकी आयत ने यह एलान किया कि-

"जिन लोगों ने ज़ुल्म किया है उन्हें अन्क़रीब मालूम हो जायेगा कि वह लोग

किस जगह लौटाए जाएं गे " (प. 19, आयत 227)

इरशादे रब्बानी

वला तह-सबन्नल लज़ीना क़ोतेलु फ़ी सबी-लिल्लाहे अमवातन. बल अहयाउन इन्दा रब्बे-हिम यर्ज़क़ून. (सूरा आले इमरान आयत 169)

तर्जुमाः- और जो लोग ख़ुदा की राह में शहीद किये गये उन्हें हर्गिज़ मुर्दा न समझना बल्कि वे लोग जीते जागते मौजूद हैं , अपने परवरदिगार के यहाँ से वे रोज़ी पाते हैं

इरशादे इमामत

अगर कोई सियाह ग़ुलाम भी हम अहलेबैत (अ.स) के हक़ में दिफ़ाअ के लिये खड़ा हो जाये और हक़्क़े क़ुरआन व हक़्क़े अहलेबैत (अ.स) ग़ासिबो के पंजे से निकालना चाहे तो हर शख़्स पर ऐसे शख़्स की मदद करना वाजिब है। (इमामे ज़ैनुल आबेदीन (अ.स)

अर्ज़े नाशिर

करबला की जंग में यज़ीद की तरफ़ से जो लोग इमाम हुसैन (अ.स) के क़त्ल में शरीक थे , उनमें से शायद ही कोई बचा हो जिसको मौत से पहले दुनिया ही में सज़ा न मिली हो

कोई क़त्ल किया गया कोई इबरतनाक अज़ाब में मुब्तिला हुआ किसी का चहरा मस्ख़ हो गया किसी के रूख़ पर सियाही दौड़ गई , कोई प्यास से तड़प-तड़प कर मर गया , किसी की ज़बान मुंह से बाहर आ गई , कोई इन्तेहाई भयानक अन्जाम से दो-चार हुआ और कोई तख़्त व ताज से महरूम होकर अपने सियाह आमाल के साथ जहन्नम रसीद हुआ

सिब्ते इब्ने जौज़ी का कहना है के एक बूढ़ा आदमी हज़रत इमाम हुसैन (अ.स) के क़त्ल में शरीक था वह दफ़अ-तन-नाबीना (अंधा) हो गया तो लोगों ने सबब दरयाफ़्त किया- उसने कहा कि मैंने पैग़म्बरे इस्लाम मुहम्मद मुस्तुफ़ा (स 0) को ख़ाब में देखा कि वह आस्तीन चढ़ाये हुए हैं हाथ में तलवार है और आपके सामने चमढ़े का वह फ़र्श है जिस पर किसी को क़त्ल किया जाता है और उस फ़र्श पर क़ातिलाने हुसैन (अ.स) में से दस आदमियों की लाशें ज़िबह की हुई पड़ी हैं उसके बाद आपने मुझे ललकारा और ख़ूने हुसैन (अ.स) की एक सलाई मेंरी आँख़ों में फेर दी , मैं सुबह उठा तो अंधा था

इब्ने जौज़ी ने नक़्ल किया है कि जिस शख़्स ने इमामे हुसैन (अ.स) के सरे मुबारक को अपने घोड़े की गर्दन में लटकाया था उसके बाद उसे देखा गया कि उसका मुँह काला मिस्ल तारकोल हो गया है लोगों ने उससे पूछा के तुम तो अरब के ख़ूबसूरतों में से थे और तुम्हारा रंग सुर्ख़ व सफ़ैद था यह तुम्हे क्या हो गया , उसने कहा की जिस रोज़ से मैंने सरे हुसैन (अ.स) को घोड़े की गर्दन में लटकाया उस दिन से मेरी यह हालत है कि जब मैं सोता हुँ तो दो आदमी मेरे बाज़ू पकड़ कर मुझे दहकती हुई आग के क़रीब ले जाते हैं और उसमें डाल देते हैं जो मुझे झुलसा देती है और फिर वह शख़्स उसी हालत में चन्द रोज़ बाद मर गया

इब्ने जौज़ी ने सद्-दी से यह रवायत बी की है कि उन्होंने एक शख़्स की दावत की और बा वक़्ते तआम यह ज़िक्र छिड़ गया कि इमामे हुसैन (अ.स) के क़त्ल में जो भी शरीक हआ उसको बहुत जल्द दुनिया ही में सज़ा मिल गई उस शख़्स ने तमस्ख़ुराना अन्दाज़ में कहा कि बिल्कुल ग़लत है , मैं ख़ुद हुसैन (अ.स) के क़त्ल में शरीक था और मेरा कुछ नहीं बिगड़ा , वह शख़्स दावत के बाद जब अपने घर गया तो चिराग़ की बत्ती दुरूस्त करते वक़्त उसके कपड़ों में आग लग गई और वह जल भुन कर ख़ाक हो गया।

सद्-दी कहते हैं कि मैंने ख़ुद जब उस शख़्स को देखा तो वह कोयला चुका था।

यह मशहूर रवायत है कि जिस शख़्स ने इमाम को पानी पीने से बाज़ रखने के लिये आपको तीर मारा था उस पर ख़ुदा ने ऐसी प्यास मुसल्लत कर दी थी कि वह जिस क़द्र पानी पीता जाता था उसकी प्यास बढ़ती जाती थी यहाँ तक की पानी पीते पीते उसका पेट फट गया और वह मर गया लेकिन उसकी प्यास न बुझ सकी।

ख़ुद यज़ीद का अन्जाम भी सामने है कि क़त्ले हुसैन (अ.स) के बाद उसे एक लम्हा के लिये भी सुकून व चैन मयस्सर न हुआ तमाम इस्लामी ममालिक में ख़ूने शोहदा का मुतालबा और बग़ावते शुरू हो गयीं उसकी ज़िन्दगी भी दो साल आठ माह और एक रवायत के मुताबिक़ तीन सान से ज़्यादा नहीं रही दुनिया ही में अल्लाह ने उसको ज़लील व रूसवा किया और वह उसी ज़िल्लत के साथ हलाक हुआ।

ग़रज़ के इमामे मज़लूम (अ.स) के क़ातिलों पर अल्लाह की तरफ़ से भी इन्तेक़ामन तरह तरह की आफ़ते अर्ज़ी व समावी और अज़ाब का सिलसिला जारी रहा वाक़ेआ-ए-शहादत के पाँचवे बरस 66 हि 0 में जनाबे मुख़्तार ने क़ातिलाने हुसैन (अ.स) से क़सास लेने का इरादा किया। इस कारे ख़ैर में आम लोगों की अक्सरियत ने उनका साथ दिया और थोड़े ही अर्से में उन्हें यह क़ुव्वत व ताक़त हासिल हो गई कि कूफ़ा और इराक़ उनके ज़ेरे तल्लुत हो गया चुनाँचे इक़्तेदार हासिल करने के बाद उन्होंने एलान कर दिया कि क़ातिलाने हुसैन (अ.स) के सिवा तमाम लोगों को अमान दी जाती है। इस एलान के बाद क़ातिलाने हुसैन (अ.स) की तफ़्तीश शुरू हुई और गिरफ़्तारी के बाद वे मौत के घाट उतारे जाने लगे एक दिन 248 आदमियों को इस लिये क़त्ल किया गया कि वे लोग क़त्ले इमाम में शरीक़ थे।

आम क़ातिलों को जब मुख़्तार ने मौत के घाट उतार दिया तो ख़ास अफ़राद की तलाश और गिरफ़्तारी शुरू हुई अमरौ बिन हज्जाजे ज़ुबैदी भागा मगर गर्मी की शिद्दत और प्यास से बेहोश होकर गिर पड़ा और तहे तेग़ कर दिया गया शिम्र मलऊन को क़त्ल कर के उसकी नजीस लाश कुत्तों के सामने डाल दी गई। अब्दुल्लाह बिन असीरे जहती , मालिक बिन बशीर , जमल बिन मालिक का जब मुहासिरा किया गया तो उन्होंने रहम की दर्ख़ास्त की मुख़्तार ने कहा , ज़ालिमों! तुमने नवासा-ए- रसूल (अ.स) पर न रहम किया तो तुम पर रहम कैसे किया जा सकता है चुनाँचे सब के सब फ़ना के घाट उतारे गये। मालिक बिन बशीर ने इमाम (अ.स) का अमामा लिया था उसके दोनों हाथ और दोनो पाँव काट कर उसे धूप में डाल दिया गया और वह वहीं तड़प- तड़प कर जहन्नम वासिल हो गया।

उसमान बिन खालिद और बशीर बिन शुमीत ने जनाबे मुस्लिम बिन अक़ील (अ.स) के क़त्ल में मुआवेनत की थी , उन्हें क़त्ल कर के जला दिया गया।

उमरे साद मलऊन जब क़त्ल किया गया तो जनाबे मुख़्तार ने उसके लड़के हफ़्स को दरबार में बुलाकर बैठाया और जब उमरे साद का सर दरबार में लाया गया तो मुख़्तार ने हफ़्स से कहा कि तू जानता है कि यह सर किसका है ? उसने कहा , हाँ मगर इसके बाद मुझे भी अपनी ज़िन्दगी अज़ीज़ नहीं है चुनाँचे इन कलमात के साख उसका काम भी तमाम कर दिया गया गया और मुख़्तार ने कहा के उमरे साद का क़त्ल , क़त्ले हुसैन (अ.स) का बदला है और उसके जवान बेटे हफ़्स का क़त्ल अली अकबर (अ.स) के खून का बदला है लेकिन फिर भी बराबरी नहीं हो सकी ख़ुदा की क़सम अगर मैं तीन चौथाई अरबों को क़त्ल कर दूँ तो इमाम हुसैन (अ.स) की उस एक उगँली का बदला नहीं हो सकता जिसे ज़ालिमों ने एक अँगुश्तरी के लिये काट लिया था ।

हकीम बिन तुफ़ैल का बदन तीरों से छलनी कर दिया गया इस लिये की उस मलऊन ने इमाम (अ.स) के सीने पर तीर मारा था।

सनान बिन अनस और हुर्मुला बिन काहिले असदी का इबरतनाक अन्जाम भी तारीख़ ती नज़रों से पोशीदा नहीं है ग़रज़ के जब हम क़ातिलाने हुसैन (अ.स) के इबरतनाक अन्जाम पर नज़र करते हैं तो बेसाख़्ता ज़बान पर यह क़ुर्आनी आयत आती है

"क्रज़ालेकर अज़ाबो वल अज़ाबुल आख़ेरते अकबरो लौ कानू यअ-ला-मून"

"अज़ाब ऐसा ही होता है और आख़ेरत का अज़ाब इससे बड़ा है , काश वे समझ लेते" अहले क़लम व अहलेदानिश ने क़सासे मुख़्तार से मुताल्लिक़ बहुत सी किताबें "मुख़्तार नामा" और दीगर उनवानात से अपने अपने लब-व-लहजे में तहरीर की हैं जो मुकम्मल हालात के साथ तवील व ज़ख़ीम भी हैं ज़रूरत इस अम्र की थी कि ख़ुरूजे मुख़्तार के सिलसिले में कोई इजमाली किताब भी हो जिससे क़ारेइन इस्तेफ़ादा कर सकें।

ज़ेरे नज़र किताब "इन्तेक़ामे ख़ूनी यी खुरूजे मुख़्तार" जो आक़ाई सै. मो. अली अफ़ज़ई के आलेमाना क़लम का नतीजा है और जिसके मुता-रज्जिम मौलाना सै. अली हसन अख़तर अमरोहवी हैं , अब्बास बुक एजेन्सी का सिलसिला-ए-इशाअत की एक कड़ी है।

इस किताब में जनाबे मुख़्तार के इजमाली हालात इन्तेहाई पुर-असर अन्दाज़ में क़लम बन्द किये गये हैं और क़ातिलाने मज़लूमे करबला के इबरतनाक अन्जाम को बड़े सलीक़े से रक़म किया गया है ताकि आवाम जनाबे मुख़्तार के कारनामों से बा-ख़बर हो सके- उम्मीद है के यह किताब हिन्दुस्तानी मुसलमानों में ख़ातिर ख़ाह मक़बूलियत हासिल करेगी।

ख़ाक पाये अहलेबैत

सै. अली अब्बास तबातबाई , अब्बास बुक एजेन्सी दरगाह हज़रत अब्बास (अ.स) लखनऊ

मुख़्तसर गुफ़्तुगू

दरबार-ए-रवायत व अख़बार

मुख़्तार के मुताल्लिक़ मुख़्तलिफ़ मुताज़ाद अख़बार व रवायात नज़र से गुज़रते हैं लिहाज़ा उस ज़माने के हालात को देखना ज़रूरी है कि वे रवायत किस मौक़े और महल पर बयान हुई हैं। तारीख़ गवाह है के अकसर रवायात उस ज़माने की हैं जिनमें तक़य्या ज़रूरी था क्योंकि दीगर औक़ात में आइम्मा-ए-अतहार (अ.स) ने मुख़्तार के इस इक़दाम की मदह फ़रमाई है। इसके बर-अक्स हर ज़माने और हर दौर में ख़ुद-गर्ज़ और ख़ुद-फ़रामोश मोअर्रेख़ो (लेखक) ने हुकूमते वक़्त की चापलूसी और ख़ुशनूदी में ग़लत वाक़ेआत करके आवाम को फ़रेब दिया है। चुनाँचे दौरे उमवी और उसके बाद के ज़माने में ऐसे बहरूपिये ब कसरत (ज़्यादा) नज़र आते हैं जो दीन के भेस में दुनिया कमाते रहे , अबु हुरेरा उसमें पेश-पेश नज़र आते हैं मुख़्तार का यह सियासी और मज़हबी ख़ुरूज था। जिसने हुकूमतें बनी उमय्या को हिला दिया , जिसके बाद हुकूमते उमवी ने झूठी रवायतें माहिरे मोअर्रेख़ीन के ज़रीये मुख़्तार को बदनाम और रूस्वा करने के लिये आइम्मा-ए-दीन के हवाले से लिखवायीं ताकि लोग इस रहबरे मुजाहिद के कारनामों से मुता-नफ़्फ़िर हो जायें लेकिन हक़ीक़त शनास निगाहें उन मसनूई रवायत से हर्गिज़ मुतास्सिर नहीं हो सकी , मसलअन मुख़्तार की मज़म्मत में लिखा गया कि हज़रत सज्जाद (अ.स) ने मुख़्तार के भेजे हुए हदाया क़ुबूल नहीं फ़रमाये और न उन लोगों से मिलना पसन्द फ़रमाया या मसलन हज़रत ने मजमा-ए-आम में मुख़्तार को दरोग़-गो बतलाया और मलऊन कहा वग़ैरा- वग़ैरा।

बयाने हक़ीक़त

हक़ीक़त यह है कि मोमेनीन और मुसलेमीन बल्कि ग़ैरे मुस्लिम के क़ुलूब में भी उस वक़्त ख़ूने शोहदा-ए-कर्बला जोश-ज़न था। और अम्माले हुकूमते उमवी के जासूम मज़ीद इन्क़ेलाब के ख़ौफ़ से हर गली व कूचे में फैले हुए थे। हज़रत ने मुनासिब न समझा के मुख़्तार के कारनामों को सराह कर मोमेनीन को मुदाफ़ेअत पर उभारा जाये। लिहाज़ा तक़य्या ही इख़्तेयार किया जो बहर-हाल मुनासिब था वरना ऐसी मोअतबर रवायत भी मौजूद है कि हज़रत (अ.स) मसरूफ़े गिज़ा थे कि मुख़्तार की जानिब से उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद का सरे नजिस आया , इमाम (अ.स) ने लुक़मा हाथ से रख दिया और दरबारे इब्ने ज़्याद में जब कि वह मशग़ूले ग़िज़ा था अपना जाना याद करके सजदा-ए-शुक्र अदा किया और मजलिस को अग़यार से ख़ाली देख कर फ़रमाया- ख़ुदावन्दा तेरा हज़ार शुक्र की तूने हमारा इन्तेक़ाम दुश्मनाने अहलेबैत से लिया , ख़ुदाया मुख़्तार को जज़ा-ए-ख़ैर अता फ़रमा। उसके बाद हज़रत ने कुछ मेवा मदीने के घरो में तक़सीम फ़रमाया और बनी हाशीम को हुक्म दिया कि आज से सोग बढ़ाया जाये।

असहाबे हज़रते मोहम्मद बाक़िर (अ.स) से रवायत है कि हम हज़रत की ख़िदमत में हाज़िर थे कि एक शख़्स आया आगे बढ़ा और चाहा कि इमाम (अ.स) के हाथों को बोसा दे , इमाम ने हाथ ख़ीच लिये और मना फ़रमाया असल व नसब का सवाल किया उसने अर्ज़ की मौला मैं मुख़्तारे सक़ाफ़ी का फ़रज़न्द हूँ , हज़रत ने उसका हाथ पकड़ कर इस तरह अपनी तरफ़ ख़ींचा जैसे अपनी आग़ोश में बैठाना चाहते हैं यह मेहरबानी और नवाज़िश देखकर फ़रज़न्दे मुख़्तार ने कहाः- मेरे बाप के मुताल्लिक़ लोग ग़लत बयान करते हैं इमाम का क्या ख़याल है , फ़रमाया- मुख़्तार को दरोग़ा-गो कहने वाले ख़ुद दरोग़ा-गो हैं , मेरे पदरे बुज़ुर्गवार ने मुझसे फ़रमाया कि मेरी ज़ौजा का महर उस माल से जो मुख़्तार ने हदियातन भेजा था उसी माल से बनी हाशिम के मकान की मरम्मत हुई उसने हमारे क़ातिलों से इन्तेक़ाम लिया , दुश्मनाने अहलेबैत को क़त्ल किया ख़ुदा उस पर रहमत नाज़िल फ़रमायें। बेहारूल अनवार की रवायत , रवायते बाला की ताईद कर रही है कि इमामे मो. बाक़िर (अ.स) ने फ़रमाया कि मुख़्तार को बुरा न कहो- वह माल जो हदियातन भेजा था हम मर्दों और औरतों के अज़्दवाज में काम आया। उसने क़ातिलाने शौहदा-ए-कर्बला से इन्तेक़ाम लिया।

हासिले रवायात

क्या इन रवायात से जो मुख़्तार के हक़ में हैं यह पता नहीं चलता कि मुख़ालिफ़ रवायात बर-बिनाये तक़य्यामख़सूस मवाक़े पर कही गई हैं

समझ में नहीं आता कि यह दुनिया झूठ पर क्यों तुली हुई है।

इस अवाम् फ़रेबी से क्या फ़ायदा- मक्कारी और इस अय्यारी से क्या हासिल आख़िर इस इस्लाम कुशी से क्या मन्ज़ूर है- यही न कि अवाम को बेख़बर और ग़ाफ़िल रख़ें- हाँ यही मक़सद और सिर्फ़ यही मक़सद है कि दीन को मस्ख़-शुदा सूरत में पेश करके दीनदारी का (ग़ाज़ा) लागाया जाये। क्या ये बेहक़ीक़त और झूठे अख़बार ज़हरीले इश्तेहार का बायस नहीं क्या ये ग़लत रवायत नहीं बतला रहे कि यह सब कुछ क़स्त्रहाय बनी उमय्या के चमकाने और आज़ादी ख़ाह मुजाहिदों के कारनामों को मिटाने के लिये लिखे गयें हैं।

बेशक ये अख़बारात मुख़्तार की मुक़द्दस रूह के इन्क़ेलाबी समरात का निशान दे रहें हैं। बेशक ये रवायते फ़िदाकारिये मुख़्तार ही है जो जब्र व इस्तेबदाद् के सुनहरे क़स्त्रो से नफ़रत दिला कर मुजाहिदाना रूह फ़ूँक रहे हैं।

हमारे उलमा का फ़ैसला

शिया रावी मुख़्तार के बारे में मख़सूस नज़रिया रखते हैं। अल्लामा मजलिसी अलैहिर्रहमा इस बारे में ख़ामोश हैं। फ़रमातें हैं रवायत से यही ज़ाहिर है कि अहले-मग़्फ़ेरत है और उलमा-ए-शिया ने भी मुख़्तार की तारीफ़ की है।

अल्लामा अमीनी फ़रमाते हैः- शहीदे अव्वल ने जो ज़ियारत मुख़्तार के वास्ते लिखी है उससे मालूम होता है कि माज़ी में क़ब्रे मुख़्तार शियों की ज़ियारत गाह थी। आख़ीर में हम अल्लामा जवाद लिबनानी की रवायत नक़्ल करते हैं जो अल्लामा मजलिसी के हम ख़्याल होते हुए फ़रमाते हैं कि हम नियते मुख़्तार से आगह नहीं लिहाज़ा ख़ुदा पर छोड़ते हैं अगर मुख़्तार का मक़सद ख़िलाफ़त को उसके अहल तक पहुँचाना और शोहदा-ए-कर्बला का इन्तेक़ाम लेना था तो ख़ुशनूदिये ख़ुदा के लिये इससे बढ़ कर और क्या बात हो सकती है।

नतीजा

मुख़्तार की नुमाया शख़्सियत पर हम कितना ही परदा डालें लेकिन उसको हर्गिज़ नहीं छुपा सकते कि मुख़्तार ने हज़रत महदी (अ.स) के ज़ुहूर तक के लिये शियों के ज़ख़्मी दिलो पर मरहम लगाया है , लेकिन फिर भी यह ज़ख़्म कहाँ भर सकते हैं अगर चे मुख़्तार का यह इन्तेक़ामे अहलेबैत (अ.स) शियाने अहलेबैत (अ.स) के लिये बायसे मसर्रत हुआ लेकिन आशूरा के अलमनांक वाक़ेआ को कब भुला सकते हैं।

क्या वह दिन जिस दिन बनी उमय्या के दरिन्दों ने जाँबाज़ मुजाहिदों का ख़ून बहाया , भुलाया जा सकता है ? क्या वह दिन जिस दिन तेरह साल के मुजाहिदे इस्लाम क़ासिम बिन हसन (अ.स) ने मुसलमानों की आज़ादी की ख़ातिर जान दी क्या वह दिन जिस दिन पीरे मुजाहिद हबीब इब्ने मज़ाहिर मुजाहिदे आज़म की नुसरत को दौड़ा किया , वह दिन के बनी हाशिम के शेर दिल जवाने बा-वफ़ा ने जामे शाहादत पिया , ख़ुसूसन वह दिन जिस दिन पेशवाये मुजाहेदीन जान हथेली पर रखकर रोज़े आशूरा हैय-हात मिनज़-ज़िल्ला फ़रमाता हुआ सब कुछ क़ुर्बान कर गया और सय्यादुश शोहदा लक़ब पाया भुलाया जा सकता है , हर्गिज़ मुजाहेदीने कर्बला का सुर्ख़ ख़ून का जोश व ख़रोश कम नहीं हो सकता। ये वह जेहाद है जिसका सूरज ग़ुरूब नहीं हो सकता। यह जंग उस वक़्त तक दिलों से नहीं भुलाई जा सकती जब तक इमामे आख़िर (अ.स) ख़ूने नाहक़ का इन्तेक़ाम ना ले लें , और जब तक जा-उल-हक़ (हक़ आ गया) का पर्चम चहार- दांग- आलम में न लहराये , यज़ीद और यज़ीदियत का ज़ुल्म व इस्तेबदाद् सफ़ा-ए-हस्ती से न मिट जाये और आज़ादारी का स्याह पर्चम इन्तेक़ाम के सुर्ख़ पर्चम से न बदल जाये हम पुकार पुकार कर यह कहते रहेंगे कि शोहदा- ए- कर्बला के ख़ून का इन्तेक़ाम लेने वालो कहाँ हो ?

ज़िन्दगी ए मुख़्तार

हर आज़ाद इन्सान की ज़िन्दगी उसके माँ बाप और उसकी तरबियत से वाबस्ता है तारीख़ का मुतालेआ करने वाले ख़ूब जानते हैं कि एक बुलन्द फ़िक्र आज़ाद मर्द हमेशा एक मुक़द्दस आग़ोश और आली ख़ानदान की परवरिश का नतीजा होता है लेकिन इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता है कि कभी कभी शाज़ व नादर ख़श व ख़ाशाक के ढेर से भी लाला का फूल उगा है।

क़बीला ए सक़ीफ़

तायफ़ के हिजाज़ का एक मर्दम ख़ेज़ ख़ित्ता था जिस में अबु उबैदा बिन मसऊद (पदरे मुख़्तार) उरवा इब्ने मसऊद (अम्मूई मुख़्तार) अबु इस्हाक़ मुख़्तार इब्ने अबु उबैदे सक़फ़ी जैसे नामवर दिलावर अफ़राद पैदा हुए जिनकी मर्दानगी के नुक़ूश आज भी तारीख़ में मौजूद हैं।

मक्का की फ़तहा के बाद लश्करे इस्लाम ने ताएफ़ का रूख़ किया जहाँ क़बीला बनी सक़ीफ़ सुकूनत पज़ीर था वाक़ेआ यह पेश आया की अहले तायफ़ शिकस्त ख़ाकर पीछे हटे और शहर में क़िला बन्द हो गया।

लश्करे इस्लाम ने शहर का मुहासिरा कर लिया उनके बाग़ात व काश्त को बर्बाद किया मगर शहर पर क़ाबिज़ न हो सके की ज़िक़ाद का महिना आ गया और लश्करे इस्लाम मुहासिरा ख़त्म करके मक्के रवाना हो गया बिन आख़ीर तायफ ने इस्लाम क़ुबूल किया और लश्करे इस्लाम के नामूर बहादुरों में शुमार हुआ।

पिदरे मुख़्तार

पिदरे मुख़्तार (अबु उबैद बिन मसऊदे सक़फ़ी) मुजाहिदे इस्लाम ईरान और इस्लाम की जंग में शहीद हो गये यही मुख़्तार का बाप एक रोज़ इस्लाम के ख़िलाफ़ जंग कर रहा था लेकिन आज इस्लाम की राह में जान दे रहा है वजह ज़ाहिर और रौशन है कि जिस ज़माने में इस्लाम की हक़्क़ानियत पर पर्दा डाल कर उसको दीने हक़ की सदाक़त से ग़ाफ़िल रखा गया था तायफ़ की जंग के बाद उसको मालूम हुआ की दीने इस्लाम की तमाम अदयान से बेहतर और बर्तर है चुनाँचे इस्लाम के लश्कर के सरदारों में नाम पाकर इस्लाम की राह में जामे शहादत पिया।

जंगे ईरान और इस्लाम में मुख़्तार अपने बाप के हमराह था मगर कमसिन होने की वजह से शरीक़े जंग न था बाप की शहादत के बाद अपने चचा की सरपरस्ती में जो मोहिब्बे अहलेबैत था ज़िन्दगी बसर की।

मादरे मुख़्तार

मुख़्तार की वालिदा (दो-मतुल हसना) एक शेर दिल और शेर परवर ख़ातून थीं उनकी शुजाअत और दिलेरी के अफ़साने बेशुमार हैं हम ब-नज़रे इख़्तेसार सिर्फ़ इस वाक़ेआ पर इक्तेफ़ा करेंगे के इस्लाम और ईरान की जंग में यह ख़ातून अपने शौहर अबु उबैद ए सक़फ़ी के हमराह मसरूफ़े जेहाद थी और इस बहादुर ख़ातून ने उस जंग में अपने बहादुर शौहर को जामे शहादत पीते देखा।

कारनामा ए मुख़्तार

बाप की शहादत के बाद मुख़्तार ने अपना चचा साद बिन मसऊद की ज़ेरे सरपरस्ती जवानी का ज़माना गुज़ारा क्योंकि यह सारा घर इस्लाम का ख़ैर ख़ाह और दोस्तदाराने अहलेबैते अतहार था। मुख़्तार के दिल में भी मोहब्बते अहलेबैत जोश ज़न थी। सिर्फ़ दो वाक़ेआत हम पेश कर रहे हैं जो मुख़ालेफीने मुख़्तार के रूख़सार पर एक ज़बरदस्त तमाचा है।

(1) जिस ज़माने में ज़्याद बिन अबीहा हाकिमे कूफ़ा था। हजर इब्ने अदी के ख़िलाफ़ दोस्ती ए अहलेबैत (अ.स) के जुर्म में एक शिकायत नामा तैयार किया गया जिस पर मोअज़्ज़ेज़िने कूफ़ा के दस्तख़त लिये गये जब मुख़्तार की बारी आई तो मुख़्तार ने उस पर दस्तख़त करने से साफ़ इन्कार कर दिया।

(2) जब कूफ़ा की हुकूमत मुख़्तार के क़ब्ज़े में गई तो मुख़्तार ने अहलेबैते अतहार (अ.स) से दरख़ास्त की के वह इस हुकूमत को जो उन्हीं का हक़ है मन्ज़ूर फ़रमालें।

(अल-अफ़्फ़ानी जिल्द 4 स. 7)

मुख़्तार के इज़्ज़त व एहतेराम की हुकूमते वक़्त की नज़र में एक ख़ास वजह यह थी कि मुख़्तार की हमशीरा अब्दुल्लाह बिन उमर से जिसकी इज़्ज़त हुकूमत ख़ुद करती थी मनसूब थी।

तव्वाबीन की हंगामा आराई के वक़्त मुख़्तार की ज़िन्दगी से रिहाई का बायस भी यही रिश्ता बना।

मुख़्तार की फ़िदाकारी

जिस ज़माने में इमाम हसन (अ.स) और मुआविया में नेज़ाअ और जंग की सूरत पेश आई और सल्तनते ज़ाहिरी मुआविया के ग़ासेबाना हाथों में जा पहुँची शिया पैरू ए इमाम रहे और दुनिया परस्तों की अकसरियत ने अमीरे शाम के हाथ पर बैअत कर ली। मुख़्तार उस ज़माने में अमीरे शाम की ईरानी और रूसी शहनशाहिय्यत के जलवे देखकर और यज़ीद की वली अहदी का एलान सुनकर सोचता था कि यह जाह व जलाल और यह शान व शौकत यह हुकूमत में वरासत ख़िलाफ़े अहकामे इस्लाम है इसके ख़िलाफ़ हर मुस्लमान का फ़रिज़ा ए अव्वालीन है कि इस्लाम के रौशन एहकाम को ज़िन्दा रखने हक़्क़े अहलेबैत (अ.स) को वापिस लेने की कोशीश करें चुनाँचे मुख़्लेसाना तौर पर मुख़्तार काफ़ी मुद्दत इन्क़ेलाब की तदाबीर में मुनाफ़क्क़िर नज़र आता है।

शख़्सियते मुख़्तार

मुख़्तार मुजाहिदाने इस्लाम में एक बे-बदल मुजाहिद था जिसने अपने मक़सद की कामयाबी में इन्तेहाई मसायब और दुशवारियों का सामना किया। अशराफ़े कूफ़ा में एक शरीफ़ तरीन इन्सान था जिसकी शराफ़त , ज़ेहानत और मतानत के लिये यह वाक़ेआ बहुत काफ़ी है कि एक रोज़ अय्यामे तेफ़ूलियत में मुख़्तार को हज़रत अली (अ.स) की ख़िदमत में ले जाया गया। हज़रत बे- इन्तेहा शफ़क़्क़त व मोहब्बत से पेश आये अपनी आग़ोशे मुबारक में बैठा लिया सर पर हाथ फेरते जाते थे और ( या क़य्यिस या क़य्यिस ) ऐ अक़्लमन्द ऐ अक़्लमनद फ़रमाते जाते थे गोया हज़रत किसी आने वाले वक़्त के लिये उस बच्चे की ज़ीरकी की पेश गोई फ़रमा रहे थे।

मुख़्तार एक वह इन्क़ेलाबी मुजाहिद है जिसका मुसलमानों की अक्सरियत ने साथ दिया मुख़्तार एक शरीफ़ जादा शरीफ़ुल खानदान होने के बावजूद हमेशा ग़ोरबा (निर्धन) और मेहनत कश मज़दूरों में ज़िन्दगी बसर करता उनके दुख दर्द व तकलीफ़ में उनके मुआविन व मददगार बनता यही बातें थीं जो उसकी ग़ैरे मामूली कामयाबी का बायस बनी वह आक़िल व आदिल था। अदल व इन्साफ़ के पेशे नज़र उसने आक़ाओ व सरमायादारों के हालात को ख़त्म करके उसने बराबरी का परचम लहराया और ताजीस्त अपने उस ईमान पर मुस्तहक़म रहा।

अहलेबैते अतहार (अ.स) का बे बदल दोस्तदार था। जनाबे मुस्लिम बिन अक़ील से बचपन की मोहब्बत और अक़ीदत थी। मुख़्तार यारे ब वफ़ा साहेबे जूदो सख़ा ग़रीबों का दोस्तदार महनत कशों का मददगार , नेक किरदार और ख़ुशगुफ़्तार था। हज्जाज बिन युसूफ़ जैसा दुश्मनने जान , मुख़्तार के मुताल्लुक़ कहता था कि मुख़्तार आतिशे जंग का भड़कने वाला और दुशमनों की सरकशी की सरक़ूबी करने वाला है।

उसकी बीवी जिससे बढ़कर राज़दां नहीं हो सकती कहती है कि मुख़्तार की रातें इबादत में और दिन रोज़े में गुज़रते थे।

तारीख़

तारीख़ गवाह है कि हर मुजाहिद ने अपने मक़ासिदे इन्क़ेलाबी को इब्तेदा में पोशीदा रखा है और अर्से दराज़ के बाद मुनासिब मौक़ा और महल पर ज़ाहिर किया है मुख़्तार के हालात भी इससे जुदा नहीं हैं। मज़कूरा वाक़ेआत और हालात से मालूम होता है कि बचपन ही से इन्क़ेलाबी हालात उसके दिल व दिमाग़ में गर्दिश कर रहे थे जो अय्यामें जवानी में गाहे- गाहे ज़ाहिर होते रहे और बिल आख़ीर आज़मूदाकारी , तजुर्बा कारी में पुख़्तागी आने के बाद एक अज़ीम तहरीक़ की सूरत में ज़ाहिर हुए। मुख़्तार को इस तहरीक़ में अमली जामा पहनाने में बड़ी दिक़्क़ते आईं। इस लिये की उस ज़माने में उमवी जाबिर हुकूमत बर- सरे इक़्तेदार थी। आज़ादी ख़ाह और आज़ादी पसन्द अफ़राद पर हुकूमत की कड़ी नज़र थी। मुख़्तार अपने आफ़कारे इन्क़ेलाबी को सामने लाने के लिये मौक़े का मुन्तज़िर रहा। मुख़्तार के तारीख़ी कारनामों का दोहराना अगर चे ज़्यादा मुफ़ीद नहीं लेकिन अगर तौफ़ीक़ाते इलाही शामिल हों तो क्या अजब कि आज़ादी पसन्द नौजवानों के लिये दर्से इबरत हो सके।

हज़रते मुस्लिम (अ.स) का कूफ़े में दाख़िला

पाँचवी शव्वाल को ब-रवायते तबरी व इब्ने असीर हज़रत मुस्लिम (अ.स) कूफ़े में दाख़िल हुए और अपने बचपन के दोस्त मुख़्तार के घर को जाए- अम्न क़रार दिया क्योंकि तमाम अहले कूफ़ा मुख़्तार की बे इन्तेहा इज़्ज़त करते थे मुख़्तार आपकी तशरीफ़ आवरी से बे इन्तेहां ख़ुश हुए और बड़ी इज़्ज़त व एहतेराम से पेश आये। हज़रत मुस्लिम को उनके पेशवाये बुज़ुर्ग हज़रत इमाम हुसैन (अ.स) की तरफ़ से जो प्रोग्राम सुपुर्द हुआ था उसमें एहले कूफ़ा के ख़यालात और अफ़कार का जायज़ा भी लेना था चुनाँचे आपने मुख़्तार को हुक्म दिया कि वह अतराफ़े कूफ़ा में इन उमूर का जायज़ा लें। मुख़्तार हालियाने कूफ़ा का जायज़ा लेने और अपना हम ख़याल बनाने की ग़रज़ से कूफ़े से रवाना हुआ। हज़रत मुस्लिम हानी बिन उरवा के मकान में मुनतक़िल हो गये। अठ्ठारह हज़ार कूफ़ियों ने हज़रत मुस्लिम के हाथ पर बैअत कर ली , कि इब्ने ज़्याद कूफ़े का हाकिम बनाकर भेज दिया गया। जाबिर हुकूमत नें डरा धमका कर तमअ ए ज़र के वायदा वईद करके अहले कूफ़ा को अपना हम ख़्याल बना लिया मगर लोगों के दिल अभी जनाबे मुस्लिम ही की तरफ़ मायल थे। मगर क़त्ल होने , क़ैद होने और ला-वारसी ए अतफ़ाल के ख़ौफ़ ने हज़रत मुस्लिम का साथ देने से बाज़ रखा और उन लोगों ने यह बेहतर समझा कि उमूरे सियासी में ख़ामोशी ही इख़्तेयार की जाये , और घर के गोशे में ख़ामोश बैठकर हज़रत की कामयाबी की दुआ करते रहें।

लेकिन इस मामले में जान को अज़ीज़ रखना सही न था। क्या कभी सुना है कि मुसलमाने इस्लामी ग़ज़वात में अस्लेह से दस्तर्बदार होकर मस्जिद में दुआ के लिये बैठ गयें हों और जंग में फ़त्हा पा ली हो। मुजाहिदीने इस्लाम ने जब सर ब कफ़ होकर जान की बाज़ी लगाई तब मुसलमानों को फ़त्हा व कामरानी नसीब हुई है देखो इमाम हुसैन (अ.स) ने अगर शब को दुआ के लिये मोहलत चाही तो दिन को जान की बाज़ी लगाई। अगर इमाम (अ.स) के अन्सान ने रात इबादत में गुज़ारी तो दिन को दरगाहे ख़ुदावन्दी में सर को नज़्र कर दिया।

अबुल फ़ज़लिल (अ.स) नें अगर रात नमाज़ियों की हिफ़ाज़त में बसर की तो दिन में राहे ख़ुदा में सर दे दिया। मर्दुमें कूफ़ा क्यों सुल्हो पसंद बन बैठे क्यों इस्लाम को सिर्फ़ नज़रे ज़ाहिर से देखा उन्हें चाहिये था कि हज़रत मुस्लिम का साथ देते क्योंकि वह नायबे इमाम थे और इमाम की तरफ़ से इजाज़त याफ़्ता थे। क्या यह इजाज़त सिर्फ़ हज़रत मुस्लिम (अ.स) के वास्ते थी। हमें ज़रा अपने हाल पर नज़र करनी चाहिये। हमारा हाल भी इस वक़्त कूफ़ियों से कम नहीं। आख़ीर कार हज़रत मुस्लिम शहीद हुए और तमाम कूफ़े में सिर्फ़ एक जान फ़रोश हानी बिन उरवा निकला जिसने हज़रत मुस्लिम पर जान निसार कर दी और सिर्फ़ एक औरत जिसने अपने घर में पनाह दी। आख़ीर वह वक़्त आया कि हज़रत मुस्लिम दारूल-अमारा से फेके गये। सारा कूफ़ा बेचैन था लेकिन क़ैद व बन्द के ख़ौफ़ से अपनी बेचैनी और इज़्तेराब को भी ज़ाहिर नहीं कर सकता था।

मुख़्तार की कूफ़े की तरफ़ वापसी

मुख़्तार नें वापसी पर शहर को पुर आशोब देख कर अन्दाज़ा लगाया कि ज़रूर कोई हादिसा हुआ है। कूफ़े में दाखिल होते वक़्त अबु क़दाम ए शामी पासबाने दरवाज़ा ए शहर से मुलाक़ात हुई अबु क़दाम से शहादत हज़रत मुस्लिम (अ.स) का हाल मालूम करके मुख़्तार और मुख़्तार के साथी इस क़द्र मुतास्सिर हुए कि देर तक रोते रहे।

मुख़्तार ने क़बाएल के बहादुर साथियों को रूख़सत किया और ख़ुद कूफ़े में तन्हा दाख़िल हुआ इससे मालूम होता है कि मुख़्तार को हज़रते मुस्लिम (अ.स) के क़ैद होने और शहीद होने का बिल्कुल इल्म नहीं था।

दूसरे दिन मुख़्तार की मुलाक़ात अमरौं बिन हरीस निगेहबाने शहर से हुई। अमरौ ने मुख़्तार को उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद से मिलने का मशविरा दिया।

(बद बातिनी)

मुख़्तार ने उसकी सरकशी और बद बातिनी के बायस उससे मिलने से इन्कार कर दिया मगर अमरौ हिफ़ाज़त का वायदा कर के मुख़्तार को उबैदुल्लाह के पास ले गया मुख़्तार निहायत लापरवाही और बे-एअतेनाई से उबैदुल्लाह के सामने जा बैठा जिसको यह मुताकब्बिर और ख़ुद परस्त इन्सान देख कर बर आशोफ़्ता हुआ और कलमाते नाज़ेबा मुख़्तार के लिये इस्तेमाल किये कि क्यों मुस्लिम को अपने घर में पनाह दी। मुख़्तार जवाब देना चाहता था कि अमरौ ने मुख़्तार की तरफ़दारी में कुछ कल्मात कहे ही थे कि अबु क़दामा के शिकस्त ख़ौरदा साथी उबैदुल्लाह के दरबार में दाख़िल हुए और मुख़्तार की शिकायत की , उबैदुल्लाह ने निहायत बर अफ़रोख़्ता होकर मुख़्तार को क़ैद का हुक्म सादिर कर दिया।

शेर पिंजरे में

मुख़्तार उबैदुल्लाह के हुक्म से क़ैद कर दिया गया लेकिन यह ज़िन्दान मुख़्तार के लिये बेहतरीन दर्सगाह साबित हुआ। यहाँ मुख़्तार को मीसमे तम्मार जैसे दीनदार बुज़ुर्ग से मुलाक़ात और उनके तजुर्बात से फ़ायदा उठाने का मौक़ा मिला। हज़रत इमाम हुसान (अ.स) के ख़ूने नाहक़ के इन्तेक़ाम के सिलसिले में मीसमे तम्मार ने मुफ़ीद राय और पेश बीनी की राहें दिखलायीं। तारीख़ गवाह है कि अवाम की परेशान हाली और सल्बे सल्बे आज़ादी ही अवाम को हुकूमत दुशमनी पर आमादा करती रही है। मुख़्तार बावजूद कूफ़े के मुमताज़ और मोअज़्ज़ज़ होने के हमेशा मज़लूमों और कमज़ोरो का मुआविन व मददगार रहा। इस लिये ग़ुलामी की जकड़ी ज़ंजीरों में अवाम की कसीर जमाअत मुख़्तार की हम ख़याल हो गई। मुख़्तार की क़ैद ख़ाने में पा सिर्फ़ मीसमे तम्मार की बल्कि उमैर इब्ने आमिर से भी मुलाक़ात हुई। मीसमे तम्मार हज़रत अली (अ.स) के असहाबे ख़ास में से थे और यही एक वजह उनकी क़ैद की हुई और हज़रत (अ.स) की पेशीन गोई के बिल्कुल मुताबिक़ आपकी शहादत वाक़ेअ हुई। उमैर इब्ने आमिर कूफ़े के उलमा में से एक मुमताज़ आलिम- मोअल्लिम और दोस्तदाराने अहलेबैत (अ.स) में से था दर्सगाह में जब के मशग़ूले दर्स थे प्यास मालूम हुई और पानी पीने के बाद आपने इमाम हुसैन (अ.स) पर दुरूद भेजा तलबा में सनान बिन अनस का लड़का भी था उसने बाप से दुरूद भेजने का हाल जा कहा और यही वजह उनके क़ैद की हुई। हुकूमत ख़ूब जानती थी कि जब तक नामे हुसैन (अ.स) लोगों के दिलों से ख़त्म न होगा हुकूमत की पायदारी और इस्तहक़ाम नामुमकिन हैं। एक अर्से बाद अमीर बिन आमीर अपने भाई की सिफ़ारिश से जो दरबारी अफ़सर था रिहा हुए। मुख़्तार ने इस मौक़े का फ़ायदा उठाया और एक ख़त अपनी क़ैद व बन्द के हालात का अब्दुल्लाह बिन उमर बिन ख़त्ताब को जो मुख़्तार का बहनोई था लिखकर दे दिया कि यज़ीद से रिहाई की सिफ़ारिश करे ये वह मवाक़े हैं जिनमें एक आज़ादी चाहने वालें मुजाहिद को क़ैद व बन्द में रहते हुए भी मामूली फ़ुर्सत को हाथ से न जाने देना चाहिये , और उससे बड़े से बड़ा फ़ायद उठाने चाहिये। मुख़्तार चाहता था कि क़ैद से निकल कर आवाम को ख़ाबे ग़फ़लत से बेदार करें और हुसूले आज़ादी में क़ुर्बानियाँ देने से भी दरेग़ न करें। यज़ीद के हुक्म से उबैदुल्लाह मुख़्तार के आज़ाद करने पर मजबूर हो गया और इस शर्त पर रिहा किया कि फिर हुकूमत के ख़िलाफ़ किसी सियासी कोशिश में हिस्सा न लें और तीन रोज़ के अन्दर कूफ़े से निकल जायें।

मुख़्तार की हिजाज़ को रवानगी

इन मज़कूरा शरायत पर मुख़्तरा रिहा होकर मक्के की तरफ़ चल पड़ा और मक्का पहुँच कर सुना की अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर इन्तेक़ामे हुसैन (अ.स) का दावेदार है यह सुन कर दिल ही दिल में बहुत ख़ुश हुआ कि एक हम ख़याल साथी और मिल गया फ़ौरन अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर से मिलकर उसको अपनी हिमायत का यक़ीन दिलाया। अब्दुल्लाह क्योंकि मुख़्तार की नुमायां शख़्सियत और मक़बूलियत से ख़ूब वाक़िफ़ था फ़ौरन राज़ी हो गया मगर बाज़ मोअर्रेख़ीन ने लिखा है कि मुख़्तार को अपना रक़ीब समझ कर वह इम काम में अपना शरीक न करना चाहता था अपने असहाब के इसरार और मशविरे के बाद राज़ी हुआ। यज़ीद की मौत के बाद अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर ने अपना रूख़ बदला बजाये इन्तेक़ाम के अब वह सल्तनत और अवाम पर हुकूमत की गुफ़्तुगू करता और ख़ूने हुसैन (अ.स) के इन्तेक़ाम के सिलसिले में कभी ज़बान ही नहीं खोलता। मालूम हुआ , अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर ने यह देखकर कि अवाम इन्तेक़ामें ख़ूने हुसैन (अ.स) के प्यासे हैं उनको अपनी तरफ़ मायल करने के लिये इब्तेदा में अवाम के सामने ख़ुद को ख़ूँ ख़ाही के रंग में पेश किया था। मुख़्तार ने अब्दुल्लाह का यह रंग देख कर कूफ़े का रूख़ किया क्योंकि अगर उसका इरादा हुकूमत करना होता तो अब्दुल्लाह का साथ न छोड़ता। मुख़्तार सिर्फ़ अवाम की आज़ादी और इन्तेक़ामें ख़ूने हुसैन (अ.स) का ख़ाहाँ था। कूफ़े में उस वक़्त पहुँचा जबकि तव्वाबीन का गरोह इन्तेक़ामें ख़ूने हुसैन (अ.स) के लिये तैयार हो चुका था। मुख़्तार ने कूफ़े में अपने घर पर मोअज़्ज़ेज़ीने कूफ़ा की एक मजलिस मुनक़्क़द की जिसमें अपने अजायम और मक़ासिद की वज़ाहत की गई। मोअज़्ज़ेज़ीने कूफ़ा ने एक होकर मुख़्तार से दर्ख़ास्त की कि वह अभी कुछ तवक़्क़ुफ़ करें और अपने इरादे को अमली जामा न पहनायें क्योंकि अहले कूफ़ा से सुलेमान बिन सर्दे ख़ुज़ाई ने बैअत ले ली है।

मुख़्तार गाहे गाहे लोगों से इस सिलसिले में बात करता और उनकी तवज्जोह अपने मक़सद की तरफ़ मुन- अतिफ़ करता रहा। शाही इनामात के वायदे वईद जैसा कि हर हुकूमत करके लोगों को अपनी तरफ माएल करती है दर हक़ीक़त बेकार और फ़ुज़ूल है , इसलिये कि क़ौम व मिल्लत जानती है और ख़ूब समझती है कि कौन दोस्त है और कौन दुशमन और जब ताक़त पकड़ लेती है तो इन्केलाबे अज़ीम का बायस होती है। मुख़्तार जानता था , और अपने फ़रायज़ को हत्तुल- इम्कान अदा करता रहा।

तव्वाबीन (तौबा करने वाले)

इससे पहले की हम इस गरोह के हालात पर रौशनी डालें ज़रूरत है कि लफ़्ज़ (तव्वाबीन) की वज़ाहत कर दें। तव्वाबीन के माना तौबा करने वालों के हैं। तौबा वह करता है जो अपने गुज़ीश्ता अमालों से ज़िश्त से नादिम होकर अहद करे कि आइंन्दा वह अमले ग़ैरे मुस्तहसन न करेगा। यहाँ तव्वाबीन से मुराद उन लोगों से है जिन्होनें तीसरी ख़िलाफ़त के बाद हज़रत अली (अ.स) के हाथ पर बैअत की थी और अब ख़ूने हुसैन (अ.स) और इन्तेक़ामे हुसैन (अ.स) लेने जमा हुए थे। उनका मक़सद सिर्फ़ यह था कि ज़ालिम के तरफ़दारों को ज़्यादा से ज़्यादा क़त्ल करें और ख़ुद भी शहीद हो जायें।

गिरोहे तव्वाबीन

इस जमाअत की बुनियाद 61 हिजरी में बादे शहादते इमामे हुसैन (अ.स) पड़ी लेकिन यह लोग चाहते थे कि अपने इरादों को कुछ साल पोशीदा रखें। इस गरोह ने अपने इरादों को 61 हिजरी से 64 हिजरी तक पोशीदा रखा और आलाते जंग व सामाने हर्ब मोहय्या करते रहे हत्ता के 64 हिजरी में यज़ीद वासिले जहन्नम हो गया उसे बाद तब्लीग़े इन्क़ेलाबी का आग़ाज़ हुआ और सुलेमाने बिन सर्दे ख़ुज़ाई की सरकर्दगी में बसरा और कूफ़े के इर्द- गिर्द मुरासलत शुरू हो गई और बुज़ुर्गाने जमाअत ने इस काम मे काफ़ी रूपया ख़र्च किया।

आशूरा के बाद सुलेमान बिन सर्द मुख़्तार के साथ क़ैद में था। आज़ाद होने पर मुख़्तार मक्के की तरफ़ चला गया और सुलेमान ने कूफ़े में रहकर मख़्फ़ी कोशिश जारी रखी।

जिन लोगों ने उबैदुल्लाह बिन ज़्याद से रिश्वत ले कर ख़ामोशी इख़्तेयार कर ली थी आहिस्ता- आहिस्ता शर्मसार और नादिम हुए। उसी ज़माने में सुलेमान ने भी उन लोगों को अपनी तरफ़ कर के इन्तेक़ाम और ख़ून चाहने पर तैयार कर लिया। सबसे पहले सुलेमान ने मोअज़्ज़ेज़ीने कूफ़ा से जो अहलेबैत अतहार (अ.स) से ताल्लुक़ रख़ते थे , बात की , जिनमें अबदुल्लाह बिन वाल , वलीद बिन हसीन भी थे। लोगों ने इसी मजलीस में सुलेमान को अपना रहबर चुन लिया। चुनने के बाद सुलेमान ने एक दिलकश पुर – ज़ोर तक़रीर की। हाज़िरीन ने इस तक़रीर के बाद ख़ुद को एक बड़ी तारीकी मे देखा और अहद कर लिया की शहीद होने से पहले हम आराम से न बैठेंगे। इसी मजलिस में अरकाने मजलिस के तक़सीमें कार का इन्तेख़ाब हुआ।

बेहतरीन अफ़राद के सुपुर्द मैदाने जंग का फ़रीज़ा किया गया। पहले बताया गया कि यज़ीद के मरने के बाद और दूसरी रवायत से मरवान के मरने के बाद इन्तेक़ाम का खुल्लम खुल्ला काम हुआ। इन्तेक़ाम की आवाज़े हर तरफ़ से उठीं। या सारातुल हुसैन (अ.स) की सदाओं से कूफ़े की फ़िज़ायें गूँजने लगीं।

या-सारातुल-हुसैन का फ़िक़रा तव्वाबीन का ईजाद किया हुआ है। अरबी डिक्शनरी में "सार" के माना (अर्थ) तहरीक या जुंबिश के हैं , यह कह कर लोगों को इन्तेक़ाम में शिरकत के लिये बुलाया जाता था। चुनाँचे 16 हज़ार अफ़राद की भीड़ इमाम के चाहने वालों की जमा हो गई। इसमें ज़्यादातर वे लोग थे जिन्होंने दावते इमाम (अ.स) पर "लब्बैक" न कही थी और अब अपनी ग़लती का एहसास करके शर्मिन्दा थे। मुक़र्रेरीन गरोह अपनी पुर- ज़ोश तक़रीर से लोगों के दिल हिला देते थे जिससे इन्तेक़ाम की आग और भी भड़क गई। इन्ही तक़ारीर करने वालों में एक ख़तीब ख़ालीद बिन कूफ़ी भी था जिसने अपनी तक़रीर में यह कहा कि ख़ुदा की क़सम अगर हमारी तौबा दरगाहे अहादीस में क़ुबूल हो जाये और वह मुन्तक़िमे हक़ीक़ी मुझसे राज़ी हो जाये तो अपना सब माल व मताअ उसकी राह में क़ुर्बान कर दूगाँ सिवाय उस तलवार के जिससे ज़ालिमों से जंग करूँ यहाँ तक के क़त्ल हो जाऊँ। मक़सद यह की इस क़िस्म की तक़रीरें लोगों के मुर्दा एहसास में ज़िन्दगी डाल कर फ़िदाकारी और जाँनिसारी पर आमादा और तैयार कर रही थीं।


3

4

5