आलमे बरज़ख

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आलमे बरज़ख लेखक:
कैटिगिरी: क़यामत

आलमे बरज़ख

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

लेखक: शहीदे महराब आयतुल्लाह दस्तग़ैब शीराज़ी
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आलमे बरज़ख
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आलमे बरज़ख

आलमे बरज़ख

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

मुक़दमा

अक़ीदाऐ मआद आफ़रीनशे आलम का हमअस्र

अक़ीदा ए माद अक़्ल का एक हतमी फ़ैसला है और इसका ऐतेक़ाद आफ़रीनशे आलम के साथ साथ चलता रहा है गुज़िशता लोगों के हालात और ज़माना ए माक़ब्ल की तारीख़ के तज़किरों में हम पढ़ते हैं कि बाज़ क़बाएल ज़िन्दगी के ज़रूरी वसाएल इस ख़्याल से मुर्दे के साथ दफ़्न किया करते थे कि आइन्दा क़यामत के रोज़ जब ये मुर्दा ज़िन्दा हो तो ख़ास ख़ास ज़रूरियाते ज़िन्दगी इसके पास मौजूद हों।

आसमानी मज़ाहिब का बुनियादी रूक्न

अक़ीदाऐ मब्दा के बाद आसमानी मज़ाहिब का दूसरा रूक्न अक़ीदाऐ मआद रहा है इसका सबब मालूम है कि पैग़म्बरों की दावत ओ तबलीग़ की बुनियाद मानावीयत ,ऐतेक़ादे उलूहियत और खुलासा ये कि सवाब ओ अक़ाब और ख़ुदा की तरफ़ बाज़गश्त पर क़ायम हैं क्योंकि अक़ाएद हो या इख़लाक़ या अहकाम हमेशा मसअले का मानवी और बातिनी पहलू साहबाने शरीयत के पेशे नज़र रहा है। मुक़द्दस दीने इस्लाम ने तमाम आदियान में कामिल तरीन होने की बिना पर इस बारे में भी दूर रस सिफ़ारिशात की हैं और इस क़ज़िये का मानवी रूख़ एक वसीतर आलमे आख़िरत के ऐतेबार से पेश करता है। मौत को छोटी क़यामत का नाम देकर उसी वक़्त से सवाब ओ अज़ाब का दरवाज़ा ख़ुला हुआ क़रार देता है इज़ा मातल रजुल क़ामता क़यामत नीज़ क़ुराने मजीद ख़ुदा की तरफ़ बाज़गश्त को लक़ाए ख़ुदा यानी मौत ही के वक़्त से याद दिलाता है और मौत की ख़्वाहिश को औलियाऐ ख़ुदा की निशानी बताता है। ( सूराए जुमा आयतः - 6)

मौत और बरज़ख़ को क़रीब देखने की तासीर

मौत के साथ ही शुरू होने वाली आलमे बरज़ख़ की सज़ा और जज़ा और पादाशे अमल को अपने क़रीब देखने का अशख़ास के अक़ीदे ,इख़लाक़ और अमल पर मुसबत असप पड़ता है कुछ नादान लोग रोज़े क़यामत का अक़ीदा रखने के बावजूद अपने लावबालीपन की जेहत से उज़्र तराशी करते हुऐ कहते है कि अभी क़यामत तक क्या है ?यानी हो सकता है कि क़यामत हज़ारों साल बाद आये लेकिन जब बरज़ख़ का सिलसिला मौत के वक़्त से ही शुरू हो जाता है तो चन्द साल से ज़्यादा नहीं कि इन्सान अपने अक़ीदो और अख़लाक़ और आमाल का अन्जाम देख लेता है।

"अशहदो अन्नल मौत हक़" लिहाज़ा इस अम्र की तरफ़ पूरी तवज्जोह रखनी चाहिये कि अपने फ़राएज़ और ज़िम्मेदारियों के बरख़िलाफ़ किसी फ़ेल का मुरातकिब न हो ,क्योंकि बहुत ही जल्द उसका नतीजा सामने आने वाला है।

बरज़ख़ की याद देहानी में तहज़ीबे नफ़्स और इस्लाह का अन्दाज़

शहीदे बुज़ुर्गवार आयतुल्लाह सैयद अब्दुलहुसैन दस्तग़ैब जो इमामे उम्मत के इरशाद के मुताबिक़ मुअल्लिमे इख़लाक़ ,तहज़ीबे नफ़्स के माहिर और इन्सानों को राहे हक़ दिखाने वाले थे। इस्लाहे नुफ़ूस ,लोगों को ग़फ़लतों से होशियार करने और उन्हें गुनाहों से बाज़ रखने के लिये मौत और बरज़ख़ की सज़ाओं की याद दिहानी करना के ज़रिये ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेफ़ादा फ़रमाते थे और तफ़्सीर या अक़ाएद या इख़लाक़ की बहसों में मुख़्तलिफ़ मुनासिबतों के साथ आलमे बरज़ख़ की अज़मत का जिसकी वुसअत इस क़दर है जैसी इस आलमे दुनिया की रहमे मादर की तन्गी के मुक़ाबिले में ज़िक्र करते थे और इसके सवाब ओ अज़ाब की अज़मत ओ बुज़ुर्गी के असरात को सुनने या पढ़ने वालों के दिलों में बख़ूबी नक़्श कर देते थे ताकि उन्हें हक़ीक़ी और लाज़िमी तौर से यक़ीन हो जाऐ कि दुनिया की जल्द ख़त्म हो जाने वाली ख़ुशी और राहत ,बरज़ख़ और क़यामत के ग़ैर मामूली रन्ज ओ मुसीबत के मुक़ाबिले में कोई हक़ीक़त नहीं रखती बल्की इसके बरअक्स दुनिया के चन्द रोज़ा रन्ज और ज़हमत का तहम्मुल वाक़ियन वज़्न और क़द्रो क़ीमत रखता है क्योंकि उसके पीछे एक तूलानी राहत ओ आराम है वो इन हक़ाएक़ को समझाने के लिये सादा ओ दिलनशीन और मूसिर बयानात के ज़रिये मुतादिद अख़बार ओ आयात और दास्तानों से फ़ायदा उठाते थे और आलमे बरज़क़ के बारे में उन सच्ची हिक़ायतों और हक़ीक़ी हालात ओ वाक़ेयात को सुबूत ओ शहादत में पेश करते थे जो मोतबर किताबों में दर्ज हैं और अफ़राद के नुफ़ूस और क़ुलूब पर कमा हक़्क़हू असर अन्दाज़ हो सकते हैं।

डराने और ख़ुशख़बरी देने के चन्द नमूने

डराने और ख़ौफ़ दिलाने के मौक़े पर उस मोमिन की हिक़ायत का हवाला देते थे जो बग़दाद के एक यहूदी का कुछ क़र्ज़दार था और उसके नतीजे में यहूदी की उँगली की बरज़ख़ी आग ने उसे जला दिया था और वो मुद्दतों बिस्तरे बीमारी पर पड़ा रहा था या उस आग का जो ज़ालिम की क़ब्र को इस तरह जला रही थी कि सभी ने ये जान लिया कि ये माददी और दुनयावी आग नहीं है ज़ालिम को डराने के लिये ज़िक्र फ़रमा रहे थे।

ख़ुशख़बरी के मक़ाम पर और आमाले ख़ैर का शौक पैदा करने के लिये भी उन अख़बार और अहादीस और रवायत से इस्तेफ़ादा फ़रमाते थे जिनका एक नमूना हम हज़रते पैग़म्बरे ख़ुदा की इस हदीस में देखते हैं कि "मैने हज़रते हमज़ा और हज़रते जाफ़रे तय्यार को बरज़ख़ी बहिशत में बरज़ख़ी मेवों से लुत्फ़अन्दोज़ होते हुए देखा है" और वो तीन चीज़ें जो तमाम चीज़ों से ज़्यादा बरज़ख़ में काम आती है यानी हज़रत अली (अ.स) की मोहब्बत ,मुहम्मद ओ आले मोहम्मद अलैहुम्मुसलातो वस्सलाम पर सलवात भेजने और पानी पिलाने को बयान फ़रमाते थे और इन शवाहिद का ज़िक्र करने के बाद सुनने या पढ़ने वालों को इन नेकियों की तरफ़ दावत देते और रग़बत दिलाते थे। खुलासा ये कि इन बुज़ुर्गवार के आसार और जूदअसर और फ़सीह ओ बलीग़ बयानात पर ग़ौर करने के बाद शायद ही कोई शख़्स ऐसा हो जिसके हालात में इन्क़ेलाब न पैदा हो ये किताब जो बरज़ख़ और आख़िरत के मसअले में इन शहीदे बुज़ुर्गवार के इरशादात का एक इन्तेख़ाब है जनाबे सुक़्क़तुल इस्लाम आक़ाइ हाज शैख़ हसन सिदाक़त के तवस्सुत से मुरत्तिब हुई है और जिस तरह ये उन बुज़ुर्गवार के ज़मानाऐ हयात में नशरो इशाअत के काम में उनकी पुर खुलूस अयानत करते थे उनकी शहादत के बाद उसमें इज़ाफ़ा हो गया है। ख़ुदा उन्हें मज़ीद तौफ़ीक़ात अता फ़रमाये और इस तरह के आसारे बाक़िया को उनकी नशरो इशाअत में हाथ बटाने वालों के लिये ज़ख़ीराए आख़िरत क़रार दे ,और उन शहीदों सईद और उनके मोहतरम हमराहों को मुक़र्रर ग़रीक़े रहमत फ़रमाये।

बेऔनहू व करमहू

सैय्यद हाशिम दस्तग़ैब

बिस्मिल्ला हिर्ररहमा निर्ररहिम

लोगो के हक़ अदा न करने पर अज़ाबे बरज़ख़

मोतबर किताब "मिस्बाहुल हरमैन" में लिखा हुआ है कि एक नेक इन्सान शैख़ अब्दुल ताहिर ख़ुरासानी अपनी उम्र के आख़री अय्याम में इस इरादे से मक्का ए मोअज़्ज़मा रवाना हो गये कि वहीं रहेंगे और वहीं मरेंगे उसी ज़माने में एक शख़्स जवाहरात और नक़द रक़्म से भरी हुई एक थैली अमानत रखने के लिये किसी मोअतमद अमीन की तलाश में था।

लोगों ने शैख़ की तरफ़ उसकी रहनुमाइ की और बताया के मक्का ए मोअज़्ज़मा में ये बहुत दयानतदार और लायक़े ऐतमाद इन्सान है चुनाँचे उसने अपनी अमानत उनके सुर्पुद करदी ,चन्द रोज़ के बाद शैख़ का इन्तेक़ाल हो गया और अमानत रखने वाला जब अपनी अमानत वापस लेने आया तो मालूम होने के बाद कि अब वो इस दुनिया में नहीं है उनके वारिसों के पास पहुँचा लेकिन उन लोगों ने बताया के हम को अमानत के बारे में कोई इल्म नहीं है उसने अपना सर पीट लिया कि अब वो क्या करे क्योंकि वो बिल्कुल मुफ़लिस हो चुका है और उसके सामने कोई रास्ता नहीं है उसने सुन रखा थी कि मोमिनीन की मुक़द्दस रुहें वादिउस्सलाम में रहती हैं और वो आज़ाद और एक दूसरे से मानूस हैं लिहाज़ा उसने तवस्सुल इख़्तियार करने की कोशिश शुरू की और दुआ की कि बारेऐलाह! कोई ऐसी सूरत पैदा करदे कि मैं उस मय्यत को देख सकूं और उससे अपने माल का पता मालूम कर सकूँ।

इसी तरह एक मुद्दत गुज़रने के बाद बाज़ बाख़बर हज़रात के सामने सूरते वाक़ेया पेश की और कहा ये क्या बात है कि मैं हर चन्द तवस्सुल क़ायम करने की कोशिश करता हूँ लेकिन उनसे मूलाक़ात नहीं होती ?उन्होंने जवाब दिया कि शायद वो उन मक़ामात पर हों जो अश्क़िया और गुनाहगारों के लिये मख़सूस हैं और मुमकिन है कि वो यमन की वादिये बरहूत में हो वो एक हैबतनांक वादी है जिसमें वहशतनांक मक़ामात हैं और मुक़र्रर नक़्ल हुआ है कि उससे दहशतनांक आवाज़ें सुनी जाती हैं ख़ुलासा ये कि मौला ए कायनात हज़रत अली (अ.स) के जवार में वादीउस्सलाम जिस क़दर रहमते इलाही का महल्ले ज़हूर और पाकीज़ा रूहों का मसकन है उसी क़दर वादीउल बरहूत अशक़िया और अरवाहे ख़बीसा का मज़हर और क़यामगाह है। - 1

(1-मुअल्लिफ़ शहीद की किताबे मआद में वादिउस्सलाम और वादीउलबरहूत में रूहों के बरज़ख़ी मक़ाम के बारें में तफ़्सील से बहस की गई है इस किताब के दूसरे हिस्से में जो बरज़ख़ से मुताल्लिक़ है उसका मुतालिआ किया जा सकता है।)

वो शख़्स वहाँ के लिये रवाना हो गया और रोज़ा दुआ और तवस्सुलात में मशग़ूल हुआ यहाँ तक की एक रोज़ शैख़ अब्दुल ताहिर का मुशाहिदा किया उसने पूछा कि आप ही शैख़ अब्दुल ताहिर हैं ?उन्होंने कहा हाँ! और क्या तुम वही शख़्स नहीं हो जो मक्के में रहता था ?उसने कहा कि क्यों नहीं फिर पूछा कि मेरी अमानत कहाँ है और तुम्हारे सर पर ऐसी मुसीबत क्यों नाज़िल हुई ?उन्होंने जवाब दिया कि तुम्हारी अमानत मैंने एक कूज़े में रख के घर के फ़ुलाँ हिस्से में ज़ेरे ज़मीन दफ़्न कर दी थी उसके बाद तुम नहीं आये ताकि तुम्हारे सुर्पुद कर दूँ यहाँ तक कि मैं दुनिया से रूखसत हो गया ,जोओ और मेरे वारिसों को पता बता के अपनी अमानत उनसे ले लो।

वह गुनाह जो बरज़ख़ में गिरफ़्तारी के वजह हैं

रही ये बात कि मैं बद बख़्त यहाँ किस वजह से गिरफ़्तार हुआ हूँ तो मेरे तीन गुनाह इस बदबख़्ती का सबब बने (हक़ीक़त ये है कि दूसरों के हुक़ूक़ मुर्ग़ के पाँव में पत्थर  की मानिन्द है जो उसे परवाज़ करने की इजाज़त नहीं देता करबलाऐ मोअल्ला और मशहदे मुक़द्दस के सफ़र करने के बाद ये शख़्स मक्का ए मुअज़्ज़मा का मुजाविर होकर दुनिया से इन्तेक़ाल करता है लेकिन हुक़ूक़े इसको इस तरह से मजबूर बना देते हैं कि मरने के बाद उसे अहलेबैत (अ.स) की ख़िदमत में नहीं पहुँचने देते हैं न वादिउस्सलाम न मक्का और मदीना ,जिस्म जहाँ भी हो रूह गिरफ़्तार है और उसे आलमे मलकूत की तरफ़ बढ़ने नही देती).

शैख़ के क़ौल के मुताबिक तीन हुक़ूक़

शैख़ अब्दुल ताहिर की रूह ने कहा- पहला गुनाह जो मुझ से बताया गया ये था कि तुमने ख़ुरासान में क़त्ऐ रहम किया और मक्के में क़याम कर लिया! क़तऐ रहम हराम है तुमने अपनी क़ौम और अक़रूबा की रियायत नही की कुछ लोग अपनी औलाद या वालैदैन के ज़रूरी इख़राजात के कफ़ील नहीं होते और इसकी परवाह नहीं करते कि ये लोग किसी परेशानी में तो मुब्तिला नहीं है ख़ुद दूसरे शहर में रहते हैं और उनके है हालात की ख़बर नहीं लेते यक़ीनन वो मुजरिम हैं।

दूसरा ये कि मैंने एक दीनार ग़ैर शख़्स को अदा कर दिया था ,इस किताब में जो इबारत तहरीर है शायद उसका मतलब ये है कि उन्हें एक दीनार किसी मुस्तहक़ तक पहुँचाने के लिये दिया गया था लेकिन उन्होंने मसामिहा किया और मुस्तहक़ को न देकर एक ग़ैरे मुस्तहक़ को दे दिया और हक़दार को महरूम करना हराम है।

आलिम की इहानत और उसकी सख़्त उक़ूबत

और तीसरा ये कि मेरे मकान के क़रीब एक आलिम रहता था मैंने उसकी इहानत की थी आलिम तुम्हारे ऊपर हक़ रखता है और तुम्हारा दीन उससे वाबस्ता है वो क़ौम और मुआशरे पर ज़िन्दगी का हक़ रखता है अगर किसी आलिम की कोई इहानत हो गई तो जनाबे रिसालतमआब की मशहूर हदीस है कि आँहज़रत ने फ़रमाया "जो किसी आलिम की इहानत करे उसने मेरी इहानत की" अगर कुछ लोग इस तरफ़ मुतावज्जे नहीं है और किसी आलिम से बेअदबी य उसकी बेहुरमती करते है तो उन्होंने उसके हक़ का कुफ़रान किया है और उन्हें उसकी जवाबदेही करना होगी। ख़ुदावन्द! अगर तू हमारे साथ अपने अद्ल से मामला करेगा तो हम क्या करेंगे ?-1

(1.वमन अदलोका मुहरबी)

परवरदिगार! हमारा ख़ौफ़ तेरे अद्ल से है। या इलाही! हमारे साथ अपने फ़ज़्ल ओ करम से मुआमला करना क्योंकि हमारे अन्दर तेरे मामलाऐ अद्ल की ताक़त नहीं है।- 2

(2.जल्लत अन युख़ाफ़ा मिनकल अदल व अन युरजा मिन्नाकलएहसान वल फ़ज़ल)

मौत के वक़्त हमसायों से माफ़ी चाहना

मुस्तहब है कि कोई शख़्स ये महसूस करे कि उसकी मौत क़रीब आ गई है तो अपने हमसायों ,हमनशीनों और हमसफ़रों से हुक़ूक़ की मुआफ़ी तलब करें ये न कहो कि मैने ऐसा और वैसा एहसान किया है क्योकि तुमने अक्सर मवाक़े पर हक़्क़े हमसायगी के ख़िलाफ़ अमल किया है ,बलन्द आवाज़ से ख़िताब किया है और हमसायों को परेशान किया है जो तुम्हें अब याद नहीं है ,सोहबत और हम नशीनी का हक़ भी फ़रामोश मत करो हमसफ़री का हक़ भी इसी रियायत के साथ समझ में आता है ।

हज़रत अली (अ.स) और यहूदी की हमसफ़री का लिहाज़

मरवी है कि मौला अली अलैहिस्सलाम एक सफ़र में कूफ़े की तरफ़ तशरीफ़ ला रहे थे असनाऐ राह मे एक शख़्स हज़रत के साथ हो गया इसी दौरान हज़रत ने उसका नाम ,तौर तरीक़ा और मज़हब दरयाफ़्त किया तो उसने बताया कि मैं कूफ़े के क़रीब फ़ुलाँ क़रिये का रहने वाला हूँ और मेरा मज़हब यहूदी है तो हज़रत ने फ़रमाया मैं भी कूफ़े का बाशिन्दा हूँ और मुसलमान हूँ दोनों साथ साथ चलते रहे और यहूदी बातें करता रहा यहाँ तक कि एक दोराहे पर पहुँच गऐ यहाँ से एक रास्ता कूफ़े को और एक यहूदी के गाँव को जाता था यहूदी के साथ हज़रत भी उसके गाँव के रास्ते पर चलते रहे एक बार यहूदी मुतावज्जे हुआ और कहा की आप कूफ़े नहीं जा रहे हैं ?आप ने फ़रमाया क्यों नही! उसने कहा कूफ़े का रास्ता दूसरी तरफ़ था शायद आपने तवज्जोह नहीं की ?आप ने फ़रमाया मैं उसी मुक़ाम पर मुतावज्जेह था लेकिन चूँकि मैं तुम्हारा हमसफ़री था लेहाज़ा चाहा कि सोहबत की रियायत करूँ और चन्द क़दम तुम्हारी मशायत करूँ।

यहूदी ने ताअज्जुब के साथ पूछा कि ये आपका ज़ाती मसलक है या आप के दीन का तरीक़ा ?और इस तरह से हुक़ूक़ का लेहाज़ क्या आपके मज़हब से ताअल्लुक़ रखता है ?आप ने फ़रमाया यही हमारा मसलक़ और दीन है। यहूदी ग़ौरे फ़िक्र में पड़ गया कि ये कैसा दीन है जो इस हद तक हुक़ूक़ की रियायत करता है ?दूसरे रोज़ कूफ़े आया तो देखा कि मस्जिदे कूफ़ा के क़रीब वही कल वाला अरब मोजूद है और लोगों का कसीर मजमा उसके चारों तरफ़ हल्क़ा किये हुए उसके इकराम व एहतेराम में मसरूफ़ है उसने पूछा की ये कौन बुज़ुर्गवार हैं ?तो लोगों ने बताया कि ख़लीफ़ातुल मुस्लेमीन और अमीरुलमोमिनीन हैं ,उसने अपने दिल में सोचा के ये बुज़ुर्ग मुसलमानों के रईस और सरदार थे जिन्होंने कल मेरे साथ इस क़दर तवाज़ोह और इन्केसार का सुलूक किया था ,चुनाँचे उसने हज़रत के हाथों और पाँव पर बोसे दिये और मुसलमान होकर आपके शियों में शामिल हो गया।

मज़ालिम सिरात में और जहन्नुम के ऊपर

अगर कोई शख़्स अदाऐ हुक़ूक़ की ज़िम्मेदारी पूरी न करे और इसी हालत में दुनिया से उठ जाये तो क़यामत और सिरात में मज़ालिम की उक़ूबत में गिरफ़्तार होगा मतलब कि वज़ाहत के लिये मुक़दमें के तौर पर सिरात के बारे में कुछ मतालिब अर्ज़ करता हूँ सिरात के लग़वी मानि रास्ते के हैं लेकिन इस्तेलाह और जो कुछ शरेह मुक़द्दस में वारिद हुआ है और जिसका ऐतेमाद हर मुस्लिम पर वाजिब है और जिसे ज़रूरीयाते दीन में शुमार किया जाता है (सुरा ए मोमेनून 23आयत 74)इसके मुताबिक़ इससे जहन्नम के ऊपर एक पुल मुराद है।

सिराते जहन्नम के ऊपर एक पुल

ख़ातेमुल अम्बिया हज़रत रसूले ख़ुदा सलल्लाहो वा आलेहि वसल्ल्म से मन्क़ूल है कि हज़रत ने फ़रमाया जब क़यामत बरपा होगी तो जहन्नम को मैदाने हश्र की तरफ़ ख़ींच कर लाया जायेगा (सुराए फ़ज्र आयतः- 23)उसकी एक हज़ार मिहारें होगीं और हर मिहार एक लाख ग़लाज़ ओ शदाद यानी सख़्त व दुरश्त फ़रिश्तों के हाथों में होगी जिस वक़्त उसे ख़ींचेगें तो जहन्नम से एक शोला बलन्द होगा जो तमाम ख़लाएक़ को घेर लेगा सभी लोग (वअनफ़सा व रब्बे नफ़्सी) कहेगें यानी ख़ुदा वन्दा मेरी फ़रियाद को पहुँच! सिवा हज़रते ख़त्मुल अम्बिया के कि आप कहेगें "रब्बे उम्मती" यानी ख़ुदा वन्दा मेरी उम्मत की फ़रियाद को पहुँच! दरहक़ीक़त पैग़म्बरे ख़ुदा ऐसे पिदरे मेहरबान हैं जिन्हें ख़ुदा ने पाक व पाकीज़ा क़रार दिया है और जो अपनी उम्मत की नीजात के लिये कोशाँ हैं।

अब हम रवायत का आख़री हिस्सा पेश करते हैं कि जब जहन्नम को लाया जाऐगा तो उसके ऊपर एक पुल क़ायम किया जाऐगा और जन्नत तक पहुँचने के लिये सबको उस पर से गुज़रना होगा।

तीन हज़ार साल सिरात के ऊपर

ये सही है कि बहिश्त का रास्ता सिरात है लेकिन अब अजीब ओ ग़रीब रास्ता है। हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व)   से मरवी है कि सिरात तीन हज़ार साल की राह है एक हज़ार साल बलन्दी की तरफ़ जाने के लिये ,एक हज़ार साल नशेब की तरफ़ उतरने के लिये और एक हज़ार साल संगलाख़ रास्ते के लिये दरकार होंगे जिसमें बिच्छू और दूसरे जानवर भी होंगे अलबत्ता सिरात से गुज़रने का अन्दाज़ यकसाँ न होगा हर शख़्स अपने अक़ाएद और आमाले सालेह के नूर की मिक़दार के मुताबिक़ इस पर से गुज़रेगा।

सिरात के अक़ीदे और आमाल का नूर

सिरात में कोई ख़ास नूर नहीं है बल्कि वो तारीक है और वहाँ कोई आफ़ताब या महताब काम नहीं कर रहा है सिवा जमाले मोहम्मदी के ,क़यामत के रोज़ सिर्फ़ नूरे मोहम्मदो आले मोहम्मद (अ.स) यानी इनका नूरे विलायत ही मदद करेगा हर शख़्स का नूरे विलायत ही ख़ुद उसके हमराह होगा नमाज़ ,रोज़ा ,तिलावते क़ुरआन ,जिक्रे ख़ुदा और इख़लास का नूर हर तरफ़ से रौशनी फैलाऐगा और सामने और दोनो पहलूओं के अतराफ़ को रौशन और मुनव्वर कर देगा (सूराऐ हदीद 58,आयतः- 12)लेकिन इस हद तक जिस मिक़दार में यहाँ नूर हासिल किया होगा एक शख़्स का नूर वहाँ तक होगा जहाँ तक नज़र काम करती है दूसरे का एक फ़रसख़ और तीसरे का सिर्फ़ इतना की अपने क़दमों के पास देख सके। मरवी है कि एक शख़्स का नूर इतना कम होगा कि सिर्फ उसका अगूठा रौशनी देगा और वो सिरात पर से गिरता पड़ता हुआ गुज़रेगा।

ये तवील रास्ता बग़ैर नूर के कैसे तय होगा

ये दुरूस्त है कि वुज़ू ओ ग़ुस्ल और इबदत का नूर भी है जो तमाम आज़ाओ जवार से ज़ाहिर होगा बशर्ते कि गुनाह की तारीकी उसके आगे हायल न हो जाऐ ये तीन हज़ार साल की मुसाफ़त होगी इसको बग़ैर रौशनी के क्यों कर तय किया जा सकता है ?तुम जितना नूर भी अपने साथ ले जा सको कम ही है वही नूर जो तुम्हें अपने साथ क़ब्र में ले जाना चाहिये।

सिरात भी शऊर रखती है

आलमे दुनिया के बर ख़िलाफ़ आलमे आख़िरत के जुमला मौजूदात हिस और शऊर के हामिल होते हैं। ज़मीने क़यामत शऊर रखती है ,सिरात हिस ओ शऊर और फ़हम ओ इदराक रखती है जो यहाँ की चीज़ों में नहीं है। जो शख़्स सिरात पर क़दम रक्खेगा अगर मोमिन है तो उसके नीचे की जगह साफ़ ख़ुन्क और कुशादा होगी और सिरात शाद और मसरूर होगी और जब कोई काफ़िर या गुनाहगार उस पर पाँव रक्खेगा तो सिरात लरज़ने लगेगी ,क़ुरान मजीद में है कि आलमे आख़िरत एक मुकम्मल ज़िन्दगी है (सूरा ए अन्काबूत , 29आयतः- 64)और तमाम आलमे आख़िरत पर हयात का तसल्लुत है। सिरात अशख़ास को पहचानती है चुनाँचे जब उसको एहसास होता है कि एक मुतीय और फ़रमाबरदार बन्दा उस पर से गुज़र रहा है तो उसके लिये हमवार ओ उस्तवार हो जाती है और जब ये जान लेती है कि कोई गुरेज़पा बन्दा है तो उसके क़दमों की नीचे काँपने लगती है यहाँ तक कि आगे चलकर बाल से ज़्यादा बारीक ,तलवार की धार से ज़्यादा तेज़ और अंधेरी रात से ज़्यादा तारीक हो जाती है उसमें अक़बात और घटियाँ हैं जिनमें से बहस की मुनासिबत से हम ती घटियों का ज़िक्र करते हैं।

वहशतनाक और सच्चे ख़्वाब

हाजी नूरी अलैहिर्रहमा की किताब मुस्तदरिकुल वसाएल में बुज़ुर्ग मशाएख़ में से एक बुज़ुर्गवार से मन्क़ूल है कि उन्होंने फ़रमाया कि हमारे गाँव में एक मस्जिद है जिसके मुतव्वली मुहम्मद इब्ने अबी हज़ीना हैं ये शैख़ साहब मस्जिद के मुतव्वली भी थे और मुदर्रिस भी हर रोज़ मुअय्यना वक़्त पर मस्जिद में आते थे और वहीं दर्स भी देते थे एक रोज़ काफ़ी इन्तेज़ार के बाद भी नहीं आये तो लोगों ने किसी शख़्स को दरयाफ़्त करने के लिये भेजा मालूम हुआ कि शैख़ बिस्तर पर पड़े हुए हैं। हम सब लोग उनकी अयादत के लिये पहुँचे तो देखा कि वो शबख़्वाबी के लिबास में पड़े हुए हैं और एक बड़े तौलिये से अपने जिस्म को सर से पाँव तक छुपाए हुए नाला ओ फ़रियाद में मसरूफ़ हैं कि मैं जला ,मैं जला ,हम लोगों ने हाल पूछा तो बताया कि सिवा रानों के सर से पाँव तक मेरा जिस्म जल रहा है ,हम पूछा कि आप कैसे जल गये ?तो कहा कि गुज़िशता रात मैं सो रहा था आलमे ख़्वाब में देखा कि क़यामत बरपा है ,जहन्नम को लाया गया है और उसके ऊपर पुल (सिरात) क़ायम किया गया है ताकि लोग उसपर से गुज़रगें।

चुनाँचे मैं भी उन्हीं लोगों में से था जिन्हें उसपर से चलना था मेरी इब्तेदाई रफ़्तार तो ठीक थी लेकिन मैं जिस क़दर आगे बढ़ता था रास्ता दुशवार और मेरे पाँव के नीचे बारीक से बारीक तर होता जा रहा था मैं काँप रहा था यहाँ तक की रफ़्ता रफ़्ता वो रास्ता बहुत ही बारीक हो गया मेरे क़दमों के नीचे बहुत ही तारीक और स्याह आग शोलाज़न थी जो पहाड़ों की चोटियों के मानिन्द बुलन्द हो रही थी मेरा पाँव लड़खड़ाता था तो अपने को दूसरों पाँव से सभांलता था ,आख़िरकार नौबत इस हद तक पहुँची कि मैं गिर गया और आग के शोले ने मुझे नीचे की तरफ़ ख़ींचा कोई चीज़ ऐसी नज़र नहीं आ रही थी जिसका मैं सहारा ले सकता जितना भी इधर उधर हाथ मार रहा था न कोई जाएपनाह मिलती थी न कोई फ़रियाद रस था नागाह मेरे दिल में यह गुज़रा कि क्या हज़रत अली (अ.स) फ़रियाद रस नहीं हैं ?

हज़रत से वाबस्तगी ने अपना काम किया और मैंने कहा या अली! जैसे ही ये जुमला मेरे दिल और ज़बान पर जारी हुआ हज़रत अली (अ.स) के नूर को अपने बालाऐ सर महसूस किया सर उठा कर देखा तो आप पुले सिरात के ऊपर इस्तादा नज़र आये मुझसे फ़रमाया कि अपना हाथ मुझे दो मैंने हाथ बढ़ाया तो आपने भी हाथ बढ़ाया और आग एक किनारे से हट गई हज़रत का दस्ते करम आया और उसने मुझे आग की कशिश से निजात देकर ऊपर निकाल लिया और मेरी रानों पर हाथ फेरा मैं भी उसी वहशत के आलम में बेदार हुआ तो मेरा जिस्म जल रहा था सिवाए उस मक़ाम के जहाँ हज़रत ने हाथ रक्खा था।

उन्होंने तौलिये को अलग किया तो उनकी रान के कुछ हिस्से तो सालिम थे बक़िया सारा जिस्म जला हुआ था उन्होंने तीन महीने तक मुसलसल इलाज किया तब किसी तरह सेहतयाब हुए जब उनसे किसी मजलिम में इसके मुताल्लिक़ दरयाफ़्त किया जाता था और वो इस वाक़िये की तफ़्सील बयान करते थे तो हौल की वजह से उन्हें बुख़ार आ जाता था।

कौन सारी ज़िन्दगी सिराते मुस्तक़ीम पर है

बिहारूल अनवार जिल्दे सोम में मरवी है कि अव्वलीन ओ आख़ेरीन में से कोई शख़्स बग़ैर मशक़्क़त के सिरात से नहीं गुज़रेगा सिवा ख़त्मुल अन्बिया हज़रते मुहम्मदे मुस्तफ़ा (स.अ.व.व)   और आपके अहलेबैत (अ.स) के आँहज़रत ने ख़ुद फ़रमाया है कि या अली कोई शख़्स सिरात से बग़ैर ज़हमत के नहीं गुज़रगे सिवा मेरे और तुम्हारे और तुम्हारे फ़रज़न्दों के यही चौदह पाक ओ पाकीज़ा नूर हैं जो बग़ैर किसी लग़ज़िश के गुज़र जाऐंगे और बक़िया ख़लाएक़ में से कोई शख़्स गिरने से नहीं बचेगा कौन है जो तकलीफ़े शरई की इब्तेदा से अपनी उम्र के आख़री लम्हात तक दयानत की सिराते मुस्तक़ीमम पर क़ायम रहा हो ?कौन है जिसके ऊपर कोई ऐसा दिन गुज़रा हो जिसमें उससे लग़ज़िश न हुई हो ?कौन है जो बन्दगी के तौर ओ तरीक़े से एक लहजे के लिये भी मुन्हारिफ़ न हुआ हो और उससे दूर न रहा हो ?

तशख़ीस बाल से ज़्यादा बारीक और अमल तलवार से ज़्यादा तेज़

कितने ज़्यादा दिन ऐसे हैं जो सुब्ह से शाम तक इन्हेराफ़ और ख़ुदा की नाफ़रमानी में गुज़रते हैं ये ख़ुदा की इताअत और बन्दगी के ख़ते मुस्तक़ीम पर नहीं बल्कि मुकम्मल तौर पर हवा ओ हवस की राह पर होते हैं और इन्सान अपने मक़सदे हयात से हज़ारों फ़रसख़ दूर चला जाता है दर हॉलांकि ख़ुद उसको तवज्जोह नहीं होती वो दरमियानी मंज़िल जो शरह और उसपर अमल का रास्ता है दर हक़ीक़त उसकी तशख़ीस करना बान से भी ज़्यादा बारीक है और उस पर अमल करना तलवार से ज़्यादा तेज़ धार वाला है।

हर शख़्स को जहन्नम से सदमा पहुँचेगा

खुलासा यह है कि सभी लोग जहन्नम से गुज़रेगें और हर शख़्स उससे किसी न किसी सूरत में ज़हमत से दो चार होगा। पुले सिरात से उबुर के वक़्त हौले जहन्नम ,आग के शोले ,दिल की तपिश और इन्तेहाई ख़ौफ़ ओ हिरास का सामना होगा दोज़ख़ से ऐसी आग बलन्द होगी जो सभी को घेर लेगी और पैग़म्बर को भी लरज़ा बर अन्दाम कर देगी हम नहीं जानते कि हमारे ऊपर क्या गुज़रेगी हर शख़्स घुटनों के बल सर निगूँ हो जाऐगा (सूराऐ जासिया आयतः- 72)।

हर शख़्स "रब्बे नफ़्सी" की सदा बलन्द करेगा यानी ख़ुदा वन्दा मेरी फ़रियाद को पहुँच! और आख़िरकार निजात नेकूकार के लिये है (सूराऐ मरियम आयतः- 72)दूसरे अल्फ़ाज़ में अगर कोई शख़्स ये ख़्याल करे कि सिरात से फ़रार और निजात हासिल कर लेगा तो ये मुहाल है सिरात बहिश्त का रास्ता है जिसके नीचे जहन्नम है इस पर से वही शख़्स गुज़र सकता है जो इस दुनिया में मज़ालिम से मुबर्रा और महफ़ूज़ रहा हो।

आख़िरत के मतालिब तसव्वुर के क़ाबिल नहीं

ये अर्ज़ किया जा चुका है कि आलमे आख़िरत के हालात किसी वक़्त भी इस दुनिया वालो की अक़्ल ओ दिमाग़ में नहीं आ सकते और ये अम्रे मोहल्लात में से है इन्सान जब तक दुनिया में है जहन्नम और बहिश्त की हक़ीक़त को समझने से क़ासिर है लफ़्ज़ों में इश्तेराक़ से इतना  होता है कि मानी और मतालिब की एक सूरत का तसव्वुर कर लेता है दरहाँलांकि हक़ीक़ते मतलब इससे कहीं बालातर है मसअलन जब कहा जाता है कि आतिशे जहन्नम तो नाम और लफ़्ज़ के इश्तेराक़ की वजह से इन्सान उस आग की तरफ़ मुतावज्जेह हो जाता है जो लकड़ी से पैदा होती है जब कहा जाता है कि जहन्नम के साँप और अज़दहे तो इसी दुनिया के गज़न्दों की मिसाल ज़ेहन में आती है चूँकि इन्हें पहले से महसूस कर चुका है लिहाज़ा इन्हीं का तसव्वुर करता है।

आतिशे जहन्नम मोमिन की दुआ पर आमीन कहती है

दुनिया की आग हिस्स और शऊर नहीं रखती लेकिन दोज़ख़ देखने और सुन्नत की सलाहियत रखती है यहाँ तक कि बात भी कर सकती है मरवी है जिस वक़्त कोई बन्दा कहता है "आएतेक़नी मिन्ननार" यानी ख़ुदाया मुझे आतिशे जहन्नम से निजात फ़रमा तो जहन्नम आमीन कहता है ये हक़ीक़त है कि जो शख़्स दोज़ख़ के शर से ख़ुदा की पनाह चाहता है और उसके लिये दुआ करता भी करता है तो ख़ुद जहन्नम उसके लिये आमीन कहता है उसी तरह जिस तरह कोई शख़्स बहिश्त के लिये दुआ करे तो ख़ुद बहिश्त उसके लिये आमीन कहती है इसी सूरत में हूरूलऐन के बारे में भी है कि जिस वक़्त कोई मोमिन दुआ करता है "वज़वजनी मिनल हूरूलऐन" यानी ख़ुदाया मेरे साथ हूर की तरवीज फ़रमा तो ख़ुद हूरूलऐन भी आमीन कहती है।

जहन्नम कहता है अभी मेरे पास जगह है

जहन्नम की आग जब दूर से गुनाहगारों को देखती है तो पेचो ताब खाती है ,ग़ैज़ में आती है और नारा मारती है (सूराऐ फ़ुरक़ान आयतः- 12)दोज़ख़ की आग क़ाबिले ख़िताब है क़ुराने मजीद में इरशाद है जिस रोज़ हम जहन्नम से कहेगें कि आया तू भर गई है ?तो वो कहेगी क्या इससे ज़्यादा और भी है ?(सूराऐ काफ़ आयतः- 30)

क्या अभी कोई मुजरिम बाक़ी है ?बाज़ मुफ़स्सरीन ने इस मक़ाम पर जहन्नम के निगाहबानों को मुराद लिया है और ये समझे हैं कि ख़ुदा का ख़िताब उन फ़रिश्तों से होगा जो जहन्नम पर मामूर है लेकिन ये ज़ाहिरे आयत के ख़िलाफ़ है क्योंकि दूसरी दूसरी आयतों में भी दोज़ख़ के शऊर और इदराक का अन्दाज़ा होता है जैसा कि इससे क़ब्ल बयान हो चुका है अगर कोई जाहिल ये ख़्याल करता है कि आतिशे जहन्नम सिर्फ़ कुफ़्फ़ार और दुश्मनाने अहलेबैत के लिये है दूसरों को इससे कोई वास्ता नहीं और ये मोमिनीन के लिये नहीं है तो उसे जान लेना चाहिये कि अव्वलन यही कब ज़रूरी है कि हर शख़्स बाईमान दुनिया से उठे ?क्या तुम्हें इसका ख़ौफ़ नहीं है कि शैतान तुम्हारे ईमान को ग़ारत कर दे ?दूसरे अगर फ़र्ज़ कर लिया जाऐ कि तुम्हें ईमान ही के ऊपर मौत आई तो क्या तुम ये नहीं जानते कि जहन्नम के सात तबक़े हैं ?ये तो मुसल्लेमात में से है और नस्से क़ुरानी से साबित है (सूराऐ हज्र आयतः- 44)

पहला तबक़ा जिसका अज़ाब दूसरे तबक़ात से कम है उन गुनाहगारों के लिये है जो बरज़ख़ में गुनाहों से पाक नहीं हुए और अज़ाब क़यामत पर उठा रक्खा गया।

दोज़ख़ में अज़ाब के दर्जे मुख़्तलिफ़ हैं

हज़रते रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व)   ने फ़रमाया कि मेरी उम्मत के बाज़ लोग पिन्डलियों तक बाज़ रानों तक बाज़ कमर तक एक गिरोह अपनी गरदनों तक और कुछ लोग अपने सारे जिस्म के साथ आग में ग़र्क़ होगें (बिहारूल अनवार जिल्दे सोम)

इसी तरह फ़रमाया कि जहन्नमी अफ़राद में से जिस शख़्स का अज़ाब कम से कम होगा उसके पाँव में आग के ऐसे जूते पहनाऐ जाऐंगे कि उनके असर से उनका दिमाग़ ख़ौलने लगेगा हम बहुत दूर हैं मंज़िले निजात से हमारे ईमान के आसार कहाँ हैं ?हमारा ख़ौफ़ ओ रिज़ा कहाँ हैं ?

तीन हज़ार साल तक फूँकने के बाद आतिशे दोज़ख़ का रंग

बावजूद ये कि ख़ुदावन्दे आलम ने हज़रते रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व)   से मग़फ़िरत का सरीही वादा फ़रमाया है (सूराऐ फ़तह आयतः- 2)और ख़ुद आँहज़रत भी रहमतो मग़फ़िरत का मज़हर हैं लेकिन इसके बाद भी आपकी क्या हालत थी और आपके दिल में जहन्नम का कितना ख़ौफ़ था ,अबूबसीर कहते हैं कि मैं इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और अर्ज़ किया ,आक़ा! मेरे दिल में कसावत पैदा हो गई है आपने फ़रमाया कि एक रोज़ जिबरईले अमीन हज़रते ख़त्मुल अन्बिया के पास नाज़िल हुए ,वो हमेशा बश्शाश और मुत्ताबस्सिम रहते थे लेकिन उस रोज़ अफ़सुरदा और महजून ओ दिलगिरफ़्ता थे और ग़मों अन्दोह के आसार उनके चहरे से ज़ाहिर थे हज़रते रसूले ख़ुदा ने उनसे फ़रमाया ये आज तुम रंजीदा और ग़मग़ीन क्यों नज़र आ रहे हो ?उन्होंने अर्ज़ किया या रसूल्लाह! जहन्नम को फूंकने और धौंकने का सिलसिला आज तमाम हुआ ,आँहज़रत ने फ़रमाया ये फूंकने का क्या मामला है ?तो जिबरीले अमीन ने अर्ज़ किया कि परवरदिगार के हुक्म से जहन्नम को एक हज़ार साल तक फूंगा गया यहाँ तक कि उसका रंग सफ़ेद हो गया फिर एक हज़ार साल तक फूंका गया और वो सुर्ख़ हो गया उसके बाद मज़ीद एक हज़ार साल तक फूँका गया और उसकी आग स्याह हो गई जो फ़रिश्ते इस काम पर मामूर थे वो अब फ़ारिग़ हुए हैं मै इसी आग के हौल से ग़मगीन हूँ पैग़म्बरे ख़ुदा रोने लगे तो एक फ़रिश्ता नाज़िल हुआ और अर्ज़ किया कि ख़ुदा ने वादा फ़रमाया है कि आपको हर उस गुनाह से महफ़ूज़ रखेगा जो आतिशे जहन्नम का मूजिब हो।

ज़क़्क़ूम हन्ज़ल से भी ज़्यादा तल्ख़

क़रआने करीम में ख़ुदा वन्दे आलम ने बार बार ख़बर दी है की दोज़ख़ में गुनाहगारों की ख़ूराक ज़क़ूम होगी (सूराऐ हाम दुख़्ख़ान आयतः- 43)ये एक ऐसा दरख़्त है जिसका फल हन्ज़ल से भी ज़्यादा कडुवा होता है इतना तल्ख़ कि उसका सिर्फ़ एक ज़र्रा इस सारे आलम पर तक़सीम किया गया ,मुरदार की लाश से भी ज़्यादा गन्दा और बदबूदार होता है उसकी ज़ाहिरी शक्ल भी बहुत ही वहशत अंगेज़ और मुहीब है जिस वक़्त गले से नीचे उतरता है तो जोश मारता है लेकिन भूख की तकलीफ़ इस क़द्र शदीद होती है कि जहन्नमी उसे खाने पर मजबूर हो जाते हैं ये बड़ा फ़िशार और तकलीफ़ है कि जिसे रफ़ा करने के लिये ज़कूम खाना पड़ेगा दोज़ख़ की दूसरी ग़िज़ाओं में ग़स्लीन और जरीअ भी हैं

(मज़ीद तशरीह के लिये किताब "मआद" हिस्साऐ पंजुम मुलाहिज़ा हो)।

खौलता हुआ पानी जो चेहरे के गोश्त को गला देता है

दोज़ख़ की पीने वाली चीज़ों की जानिब भी इशारा कर दूँ मिन्जुमला उनके सदीद है जिसके मुताल्लिक़ बताया गया है कि वो ज़िनाकार औरतों की गन्दगी है जो बहुत ही गर्म ,खौलती हुई इन्तेहाई बदबूदार और मुताफ़िन है ये एक सैलाब की तरह बह रही होगी और दोज़ख़ियों पर इस क़दर प्यास ग़ालिब होगी कि उसी से पियेंगें और फ़रियाद करेगें कि हमको पिलाओ (सूराऐ कहफ़ आयतः- 29)

इसी तरह पीने वाली चीज़ों में हमीम है जो इस क़दर गर्म है कि जब उसका जाम पिलाने के लिये लाऐगें तो वो अभी मुँह में दाख़िल न होगा कि उसकी गर्मी की शिद्दत से चेहरे का तमाम गोश्त गिर जाऐगा।

मोमिनीन यक़ीन करते हैं

कुफ़्फ़ार जब सुनते हैं तो कहते हैं कि ये सब रूस्तम और अस्फ़न्दयार की दास्तानों की मानिन्द अफ़साने हैं (सूराऐ इन्आम आयतः- 25)लेकिन ऐसा नहीं है कुरआन हक़ है ,क़यामत और बहिश्त ओ दोज़ख़ हक़ है (सूराऐ अल्हाक़ा आयतः- 1)मोमिनीन जिस वक़्त सुनते हैं तो यक़ीन करते हैं जिस वक़्त उनके सामने क़ुरआने मजीद की आयतें पढ़ी जाती हैं तो उनके ईमान में इज़ाफ़ा हो जाता है (सूराऐ इन्फ़ाल आयतः- 2)।

दोज़ख़यों का लिबास आग का होगा

"सराबीलाहुम मिन क़तरान" क़ुरआने मजीद में मुतादिद मक़ामात पर ख़बर दी गई है कि दोज़ख़ी आग का लिबास पहनेगें (सूरऐ हज आयतः 19)और जिस तरह जेलख़ानो मे क़ैदियों को एक मख़सूस लिबास पहनाया जाएगा जो आग का बना होगा दोज़ख़ के ख़ूसूसियात और उसके अज़ाब की कैफ़ियत भी सुनने की ज़रूरत है सत्तर हाथ की ज़ंजीर जहन्नमी के गले में डाली जाऐगी और उसके बाद उसे आग में घसीटा जाऐगा। (सूराऐ अल्हा क़् क़ा आयतः- 33)

ख़ौफ़े आतिश से हज़रत अली (अ.स) का रोना

ये हज़रत अली (अ.स) थे जो शब के दरमियान ग़श कर जाते थे और ऐसे अज़ाबों से ख़ुदा की अमान चाहते थे आप अपनी मुनाजातों में अर्ज़ करते हैं "इलाही असअलोकल अमान यौमल यनफ़ा माल वल बुनून अलअमन अतिअल्लाह बेक़ल्बे सलीम" यानी ख़ुदाया मैं रोज़े क़यामत के लिये तुझसे अमनो अमान तलब करता हूँ जिस रोज़ माल ओ औलाद कोई फ़ायदा न पहुँचाऐंगे सिवा उस शख़्स के जो सालिम दिल के साथ आऐं।

अज़ाबे जहन्नम के चन्द नमूने

जहन्नमी ज़ंजीरों का एक हल्क़ा भी अगर इस दुनिया में लाया जाए तो सारे आलम को जला दे अज़ाब के शोबों में से जहन्नम के निगाहबान हैं जो बहुत तुन्दखू ,कजख़ुल्क़ ,मुहीब और वहशतनाक है जिस वक़्त दोज़ख़ी आतिशे जहन्नम से बाहर आने की कोशीश करेंगे तो फिर उसी में पलटा दिये जायेंगे (सूराऐ हज आयतः- 22)। मरवी है कि दोज़ख़ी सत्तर साल तक उसमें धसंते चले जाऐंगे उसके बाद ऊपर आने के लिये हाथ पाँव मारेंगे और जब ऊपर पहुँचने के क़रीब होंगे तो दोज़ख़ के मामूरीन और पहरेदार अपने आहनी गुर्ज़ (जिनको मक़्मआ कहते हैं और उसकी जमा मक़ामा है सूराऐ हज आयतः- 21)उनके सरों पर मार के फ़िर उसी में वापस कर देंगे।

दोज़ख़ियों के सरों पर जहन्नम के गुर्ज़

ये कोई ज़ईफ़ रवायत नहीं है बल्कि कुरआने मजीद की सरीही ख़बर है कि जो सर अपनी ज़िन्दगी में ख़ुदा के सामने न झुके और सरकशी करे दरहक़ीक़त वही जहन्नमी गुर्ज़ों का सजावार है जो उसके ऊपर मारे जायेंगे। हज़रतें रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व )से मरवी है कि जिबरीले अमीन ने आँहज़रत को ख़बर दी कि अगर उनका एक गुर्ज़ इस आलम के पहाड़ों पर मारा जाऐ तो ज़मीन के सातवें तबक़ तक रेज़ा रेज़ा कर दें।

अहले सलम जहन्नम में नहीं जाऐंगे

दरअस्ल एक सरकश आदमी ही ऐसी उक़ूबतों का सज़ावार है जहन्नम सरकशों का मक़ाम है वरना अगर कोई शख़्स साहबे सलम है और उसने ख़ुदा के सामने सरे तसलीम ख़म कर दिया है तो उसको जहन्नम से क्या वास्ता ?अलबत्ता जो लोग सरकश और नाफ़रमान हैं और कुरआनी ताबीर के मुताबिक़ "उतुल" यानी बदखू और ज़ालिम वग़ैरा है। (सूराऐ क़लम आयतः- 13)

तो क्या क़यामत में उनके बदन भी उनके नफ़्सों के मानिन्द सख़्त ,ज़ख़ीम और दुरूशत हो जाऐंगे जहन्नमियों के जिस्म उनके दिलों की तरह सख़्त होगें क्योंकि दुनिया में उनके दिल पत्थरों से ज़्यादा सख़्त थे (सूराऐ बक़र आयतः- 74)

चूँकि क़यामत में उनके बदन भी उनके दिलों की मानिन्द हो जायेंगे लिहाज़ा कोई शख़्स ये ईरादा ओ ऐतेराज़ न करे कि उनके कमज़ोर जिस्म के लिये इतने सख़्त अज़ाब क्योंकर मुमकिन है ?

उनके दिलों की तरह उनके सख़्त जिस्म

किताब किफ़ायतुन मुवहेदीन में मज़कूर है कि अहले अज़ाब की सत्तर जिल्दें होगीं और हर जिल्द की सख़ामत चालीस हाथ होगी जो सरकश नफ़्स दुनिया में क़ुरानी आयत का असर क़ुबूल नहीं करता था क़यामत में उसका जिस्म भी इसी तरह सख़्त हो जाऐगी और रवायत में एक दूसरी ताबीर भी बयान की गई है कि उसके दाँत कोहे ओहद के बराबर हो जाऐंगे वही सख़्त और नफ़्स और दिल उसके बदन में ज़ाहिर होगा जो क़ुरान से मुतास्सिर नहीं होता था दरहाँलाकि पानी पत्थर को मुतास्सिर और शिग़ाफ़्ता कर देता है (सूराऐ बक़र आयतः- 74)वो कहता है कि मौत है क़यामत है लेकिन उसकी कोई परवाह नहीं करता उसकी सलाबत और सगंदिली इस हद तक पहुँच जाती है कि इमाम हुसैन (अ.स) ये फ़रमाते हैं कि तुम इस शीरख़ार बच्चे को लेकर ख़ुद ही पानी पिला दो लेकिन वो यज़ीद के इनामो इकराम को तरजीह देता है।

आख़िरत में बातिन का ग़लबा ज़ाहिरी सूरत पर

आख़िरत में सूरत के ऊपर अन्दरूनी कैफ़ियत का ग़लबा होता है यानी ज़ाहिरी हैसियत बातिनी हक़ीक़त के मुताबिक़ होती है और जो कुछ दिल में है बदन भी उसी का नमूना बन जाता है जिस से क़ल्बी हालत ज़ाहिर हो जाती है (सूराऐ तारिक़ आयतः- 9)। जो दिल इतने रफ़ीक़ और नाज़ुक है कि इन अज़ाबों का बयान सुनने का ताक़त नहीं रखते उनके जिस्म भी फूल की तरह लतीफ़ हो जाते हैं चुनाँचे बहिशती लोग भी ऐसे ही हैं ,वो ये बात सुनने की ताब नहीं रखते कि इमाम हुसैन (अ.स) के शीरख़ार बच्चे का नाज़ुक गला सैहशोबा तीर का निशाना बनाया गया।

जन्नत और जहन्नम अगर मौजूद हैं तो कहाँ हैं ?

सवाल किया जाता है कि आया बहिशत और जहन्नम इस वक़्त भी मौजूद है ?और अगर हैं तो कहाँ हैं ?ये सवाल रवायतों के अन्दर भी पाया जाता है और इमाम हुसैन (अ.स) ने इसका जवाब भी दिया है कि हाँ बहिशत और जहन्नम आज भी मौजूद हैं ,रही ये बात की ये दोनो मक़ाम कहा है ?तो रवायत के मुताबिक़ आपने इस तरह ताबीर फ़रमाई है कि बहिशत सातवें आसमान के ऊपर और जहन्नम ज़मीन के नीचे है। बाज़ हज़रात ने ये भी फ़रमाया है कि "वल बहरूल मस्जूर" (यानी क़सम है ख़ौलते हुऐ समन्दर की)  इसी की तरफ़ इशारा कर रहा है यानी ज़मीन की अन्दरूनी आग बाहर आ जाएगी। बहिश्त और जहन्नम की मौजीदगी पर जो शवाहिद दलालत करते हैं उन्हीं से वो रवायत और अख़बार भी हैं जो मेराज के बारे में वारिद हैं। आपने अक्सर सुना होगा कि रसूलेख़ुदा ने फ़रमाया "मैं शबे मेराज जन्नत में पहुँचा और जिबरईल ने मुझे बहिशती सेब दिया जिसे मैंने खा लिया और वही हज़रते फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.व.व)   का माददाऐ तख़लीक़ बना।

जहन्नम में ख़ुनूद सिर्फ़ कुफ़्फ़ार के लिये है

साहेबाने ईमान को ये ख़ुशख़बरी भी देता चलूं कि जो शख़्स एक ज़र्रा बराबर भी ईमान अपने हमराह ले जाऐगा वो हमेशा जहन्नम में नहीं रहेगा बल्कि आख़िरकार एक रोज़ उससे बाहर आऐगा ख़ुलूद यानी हमेशा दोज़ख़ में रहना मआन्दीन और कुफ़्फार ओ मुशरिक़ीन के लिये है (दुआऐ कुमैल)। अगर कोई मोमिन अपने गुनाहों से तौबा किये बग़ैर मर गया और बरज़ख़ या क़यामत की उक़ूबतों से पाक नहीं हुआ तो उस वक़्त तक जहन्नम में रहेगा जब तक पाक न हो जाए लेकिन कितनी मुद्दत तक रहेगा ?तो ये उसके उन गुनाहों की मिक़दार पर मुन्हसिर है जिन्हें वो अपने साथ ले गया है ख़ुलासा ये कि तुमने इस दुनिया में अपने को जैसा बनाया  होगा वैसा ही वहाँ देखोगे अगर अपने को भेड़िया बनाया है ,जानवर बनाया है ,लोमड़ी बनाया है तो आख़िरत में भी यही सूरत होगी अगर यहाँ फ़रिशता ख़सलत रहे हो तो वहाँ भी फ़रिशता बन के उठोगे और जब तक फ़रिशता सिफ़्त न बनोगे तुम्हारे लिये मलकूत अलैहा और जन्नत में जगह नहीं है। इन्सान जब तक फ़रिशते की सीरत इख़्तेयार नहीं करेगा गिरोह दर गिरोह मलाएका उसकी ज़ियारत को नहीं आऐगें (सूराऐ राद आयतः- 23)।

क़ब्र की पहली शब और उसके बाद दीगर आलमों में उसका हश्र उसी सूरत पर होगा जिसके साँचे में अपने को ढाला है।

नकीर और मुनकर ही बशीर और मुब्बश्शिर हैं

आपने अक्सर सुना होगा कि क़ब्र में पहली शब दो फ़रिश्ते मय्यत से बाज़ पुर्सी के लिये आते हैं जिनके नाम नकीर और मुनकर हैं यानी ज़रर पहुँचाने वाले और बेचैन करने वाले नकीर और मुनकर किस के लिये हैं ?उस शख़्स के लिये जो आदमी न बना मर गया लेकिन जिसने आदमीयत इख़्तियार की उसके लिये नकीर और मुनकर नहीं हैं बल्कि बशीर और मुब्बश्शिर हैं यानी ख़ुशखबरी देने वाले। माहे रजब की दुआ है "वरऐनी मुब्बश्शिरा वा बशीरा वला तरीनी मुनकिरा व नकीरा" यानी ख़ुदावन्दा! क़ब्र की पहली शब मुझे मुनकिर और नकीर को न दिखाना बल्कि मुब्बश्शिर और बशीर को दिखाना ,दर अस्ल दो फ़रिश्तों से ज़्यादा नहीं हैं उस मोमिन इन्सान के लिये जिसने यहाँ अपनी इस्लाह करली है बशीर और मुब्बश्शिर हैं और उसके ग़ैर के लिये जिसने वहाँ के लिये साज़ो सामान मुहय्या नहीं किया नकीर और मुनकिर। अब ये ख़ुद तुम्हारे हाथ में है कि तुम कैसे बनते हो ? "ला दारूल मुरअः बादुल मौत यस्कुनहाः इल्ललती काना क़ब्ललमौत बाईनहाफ़ाइबनाहा ब ख़ैरा ताबा मिसकन्नहाः वइन बनाहा बश्शरा ख़ाबा हावीहा" इस बारे में चन्द जाज़िब नज़र अशआर मिलते हैं जो अमीरूलमोमिनीन हज़रत अली (अ.स) से मन्सूब हैं हर शख़्स की मौत के बाद उसका साज़ो सामान वही है जो उसने यहाँ तैय्यार किया है अब उसने अपने लिये जैसा घर तामिर किया हो ,सिर्फ़ दो बालिश्त का ,लाम्बा चौड़ा या हद्दे नज़र तक तवील ओ अरीज़ ,अगर उसने अपने वुजूद में वुस्अत पैदा की होगी तो उसके लिये कोई ज़िक और तन्गी नहीं है मौत के बाद इन्सान की फ़राग़त और फ़राख़ी इस आलम में उसकी वुस्अते क़ल्ब और सीने की कुशादगी की ताबे है।

लोग सीरतों के मुताबिक़ सूरतों पर महशूर होगें

तफ़्सीरे क़ुम्मी में आयते मुबारिका कि "यौमा यनफ़िक़ फ़िस्सूर फ़तातूना अफ़वाज़न" (यानी जिस रोज़ सूर फूँका जाऐगा बस तुम लोग गिरोह दर गिरोह आओगे) के ज़िम्न में रवायत है कि हज़रते रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व)   से पूछा गया कि ये आयत काफ़िरों के बारे में है या मुसलमानों के ?तो हज़रत ने फ़रमाया कि मुसलमानों के बारे में जिनकी दस सिफ़्तें मैदाने महशर में वारिद होगीं ,कुछ बन्दरों की सूरत में ,कुछ सूअरों की सूरत में एक गिरोह औंधे मुँह एक गिरोह अन्धा एक गिरोह अपनी ज़बानों को चाबता होगा और उनसे पीप जारी होगा वग़ैरह

(अरबी मत्न और तरजुमा और रवायत की फ़ारसी तशरीह शहीदे दस्तग़ैब की किताब "मआद" में मुलाहिज़ा हो)

और एक गिरोह ऐसा भी महशूर होगा कि उनके चेहरे चौदहवीं रात के चाँद की मान्निद चमक रहे होंगे ये फ़रिशतों की तरह अहले महशर से बलन्द मक़ाम पर चल रहे होंगे।

ख़ुलासा ये है कि हर शख़्स अपनी अन्दुरूनी हालत के मुताबिक़ महशूर होगा यानी उसका बातिन जिस नौवियत का होगा उसका ज़ाहिर भी उसी का नमूना होगा अगर उसने अपने अन्दर फ़रिशतों की ख़सलतें पैदा की हैं तो रोज़े क़यामत मलाएका से बेहतर हुस्न ओ जमाल का मालिक होगा अगर दरिन्दा सिफ़्त रहा है और ख़श्म ओ शहवतरानी की आदत इख़्तियार की है तो इसी महशूर रवायत के मुताबिक़ इरशाद है कि कि लोग ऐसी सूरतों में महशर में वारिद होगें कि बन्दर और सूअर भी उनसे ख़ूबसूरत है (यहश्शरूलनास अला सूरता हुस्ना इन्दोहा क़िरदा वल ख़नाज़ीर) वो अपनी शक्लों से इस क़द्र वहशतज़दा होगें कि आरज़ू करेगें कि जल्द से जल्द उन्हें क़ारे जहन्नम में डाल दिया जाए ताकि लोग ये मन्ज़र न देखें वो किस क़दर मुजतरिब होगें कि दोज़ख़ उनके लिये आसाइश की जगह होगी ?हाँ जो शख़्स दरिन्दा ख़सलत रहा है वो ऐसा है गोया कुत्ता है जो अपने दाँतों से काट रहा है वो अपनी ज़बान और क़लम से चीरता फ़ाड़ता है ,नीशज़नी करता है उसे अपनी तक़रीर ओ तहरीर के ज़रिये किसी की आबरू रेज़ी और दिलअज़ारी करने में बाक नही होता ख़ुलासा ये कि क़यामत में हर शख़्स की शक्ल उसके बातिनी कैफ़ियात और मलक़ात के मानिन्द होगी ताकि उसका बातिन जो कुछ भी हो अगर इन्सान हो तो बेहतरीन शक्ल में अगर हैवान हो तो बदतरीन सूरात में महशूर हो।

आख़िरत का अज़ाब दुनियावी अज़ाब से अलग है

मआद के बारे में मालूमात हासिल करने का एक फ़ायदा ये है कि इन्सान ये समझ ले कि आलमे आख़िरत का अज़ाब ओ उक़ाब दुनिया की उक़ूबतों के मान्निद नहीं है मसअलन किसी शख़्स को गिरफ़्तार करके लाते हैं उसे क़ैदख़ाने में डाल देते हैं और तागूत और सरकश और ज़ालिम हुक्काम के ज़माने की मान्निद उसके नाख़ून उखाड़ देते हैं तो ये एक दूसरी सूरते हाल है और इसका आलम दुनियावी उक़ूबतों के साथ मक़ालीसा और मुवाज़िना नहीं किया जा सकता है आमाल के मुजस्सम होने को भी हम उनवान नहीं बनाना चाहते इसी तरह वो आग है जो ख़ुद इन्सान की ज़ात से शोलावर होती है

(सूराऐ बक़र आयतः- 24)

ख़ुलासा ये कि हम जिस क़दर भी चाहें कि जहन्नम और उसके अज़ाबों का अपने ज़ेहन में तस्सवुर करें कामयाब न होंगे इजमाली तौर पर सिर्फ़ इस क़दर जान लेना चाहिये कि वो यहाँ की तरह नहीं है और उनकी कैफ़ियत और ख़ुसूसियात का इल्म भी ज़रूरियाते मज़हब में से नही है कि उनका ज़ानना और उनका अक़ीदा रखना लाज़िमी हो।

ख़्वाब बरजख़ी सवाब और अज़ाब का नमूना है

आयत "मनामकुम बिललैल वन नहार" के सिलसिले में उसले काफ़ी के अन्दर एक और अहम नुक्ता ये है कि एहलाम ,रोया ,और ख़्वाब इन्सानों के अन्दर इब्तेदाऐ ख़िल्क़त से नहीं थे यहाँ तक कि एक पैग़म्बर जब अपनी उम्मत पर मबऊस हुऐ तो उन्होंने हर चन्द बरज़ख़ ,क़ब्र के सवाल ओ जवाब और अज़ाब ओ उक़ाब के बारे में उन्हें बताया लेकिन लोगों ने क़ुबूल नहीं किया वो कहते थे मुर्दे से सवाल ओ जवाब कैसा ?वो तो ख़ाक होकर फ़ना हो जाता है इस पर ख़ुदाऐ ताला ने सारी उम्मत को ख़्वाब देखने की सलाहियत अता की हर शख़्स ने एक मुख़्तलिफ़ और जदीद क़िस्म का मख़्सूस ख़्वाब देखा जब एक दूसरे से मिलता था तो कहता था कि मैंने कल शब ख़्वाब में कुछ चीज़ें देखीं लेकिन बेदार हुआ तो कुछ भी न था दूसरा कहता है कि मैंने इस से बालातर और अहम मनाज़िर देखे जब बेदार हुआ तो कोई चीज़ न थी जब उन्होंने अपने पैग़म्बर से इसका तज़किरा किया तो उन्होंने फ़रमाया कि ख़ुदाऐ अज़्ज़ व जल तुम को समझाना चाहता है कि आदमी मौत के बाद ख़्वाब की हालत में रह सकता है लेकिन उसका ये जिस्म ख़ाक के नीचे एक तूलानी नींद में होगा या ख़ुदा ना ख़्वास्ता नाले और फ़रियाद कर रहा होगा। (बिहारूल अनवार जिल्दः- 3)

मआनी उल अख़बार में वारिद है कि हज़रते रसूलेख़ुदा (स.अ.व.व)   ने फ़रमाया कि मैं बेअसत से क़ब्ल अपने चचा अबूतालिब (अ.स) की भेड़ें चराया करता था मैं कभी कभी देखता था कि भेड़ें बग़ैर किसी हादसे के उछल के सकते में आ जाती थीं और थोड़ी देर के लिये चरना छोड़ देती थीं चुनाँचे मैंने जिबरीले अमीन से इसका सबब पूछा तो उन्होंने कहा कि जिस वक़्त आलमे बरज़ख़ में किसी मय्यत के नाले ओ फ़रियाद की आवाज़ बलन्द होती है तो उसे जिन्नात ओ इन्सान के अलावा सभी सुनते हैं ये जानवर मुर्दों के नालों की आवाज़ से मुतावहिश होते हैं ख़ुदाऐ ताला ने अपनी हिकमते बालिग़ा से मुर्दों की इस आवाज़ को ज़िन्दों से पोशीदा रखा है ताकि उनका ऐश खराब न हो।

मुर्दे ज़िन्दों से इल्तेमास करते हैं

अगर आदमी अपने घरवालों और रिश्तेदारों के नाला ओ फ़रियाद और आह ओ ज़ारी की आवाज़े सुन ले तो ज़िन्दा नहीं रह सकता ,ये भी ख़ुदा की एक हिकमत है कि कोई शख़्स मरने वालों की हालत से आगाही न रखता हो ,उस वक़्त सिर्फ़ ख़ुदा ही जानता है कि मरने वाले किस क़दर नाले किस क़दर आह ओ ज़ारी और हमसे तुमसे किस क़दर इल्तिजाऐं करते हैं और ख़ास तौर पर शबे क़दर में इल्तिमासे दुआ करते हैं ये इल्तिमासे दुआ उस तरह का नहीं होता जैसा हम लोग आपस में एक दूसरे से करते हैं हमारा इल्तिमास एक तरह का रस्मी फ़रमाइश और ख़्वाहिश होती है लेकिन मय्यत का इल्तेमास गदाइ ,ख़ुशामद और तज़्ज़रओ ओ ज़ारी है रवायत में है कि हज़रते रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व)   ने गिरया किया और फ़रमाया कि अपने मुर्दों पर रहम करो बिलख़ुसूस माहे रमज़ान में वो तुम से कहते हैं कि हमने भी रमज़ान के महीने गुज़ारे और शबे क़दरों से गुज़रे लेकिन उनकी क़दर न जानी और ये हमारे हाथों से निकल गई तुम भी हमारे पास आने वाले हो लेकिन अभी तक माहे रमज़ाने तुम्हारी दस्तरस में है हमारे लिये भी कुछ फ़िक्र करो। (सफ़ीनतुल बिहार जिल्दः- 2सफ़्हाः- 556)

वो इस तरह से इल्तेमास और इल्तेजा करते हैं कि उसने हज़रत रसूले ख़ुदा को भी रूला दिया है कभी कभी ऐसा होता है कि आदमी कुछ वहशतनांक ख़्वाब देखता है नाले और आह ओ फ़ुग़ाँ करता है लेकिन जो शख़्स उसके पहलू में होता है वो भी नहीं सुनता या ख़ुशी से इस क़द्र हँसता है कि अगर आलमे बेदारी में हो तो उसके क़हक़हे की आवाज़ काफ़ी दूर तक जाती लेकिन जो शख़्स उसके पहलू में है वो भी महसूस नहीं करता। जब तुम अपने बाप की क़ब्र पर जाते हो तो कुछ भी नहीं सुनते लेकिन ख़ुदा जानता है कि वो बेचारा इस वक़्त किन मुसीबतों और फ़रियादो ज़ारी में है या इन्शाल्लाह किन मर्सरतों और बहजतों और सरूर से लुत्फ़अन्दोज़ है इहलाम यानी ख़्वाब देखने में एक हिकमत ये भी है कि इन्सान मौत के बाद दोबारा ज़िन्दा होने पर ग़ौर करे इसलिये कि मौत के बाद पेश आने वाले हालात का एक नमूना भी ख़्वाबों में देखता है।

मैं कनीज़ों को आज़ाद करता हूँ ताकि जहन्नम में न जाऊँ

लिखा है कि मदीनऐ मुनव्वरा की एक साहबे हैसियत औरत मस्जिदे नबवी में पैग़म्बरे ख़ुदा (स.अ.व.व)   के पीछे नमाज़ पढ़ने के लिये हाज़िर हुई आँहज़रत ने नमाज़ में ये आयत पढ़ी जिसका मफ़हूम ये है कि "दरहक़ीक़त जहन्नम उनकी वादागाह है जो शख़्स (कुफ़्र के साथ मरे) उसकी जगह जहन्नम है उसके सात दरवाज़े या सात तबक़े हैं और हर गिरोह के लिये जहन्नम के दरों में से एक एक दर है (सूराऐ हूजर आयतः- 43-45)वो औरत बाईमान थी पैग़म्बर की ख़िदमत में हाज़िर हुई और शिद्दत से गिरया करने के बाद अर्ज़ किया या रसूलल्लाह! इस आयत ने मुझे बहुत डराया  है और मैं बहुत बेचैन हूँ मैं क्या करू कि ये जहन्नम के दरवाज़े मेरे लिये न खोले जाऐं ?आपने ख़ुद ही फ़रमाया कि सदक़ा आतिशे जहन्नम से बचाने वाली एक सिपर है (अस्सद्क़ातो जुन्नता मिन्ननार- सफ़ीनतुल बिहार जिल्द- 2)या रसूलल्लाह मैंने माले दुनिया से सात कनीज़ें ख़रीदी हैं उनके अलावा और कुछ नहीं रखती (यानी अपनी सारी दौलत उन कनीज़ों की ख़रीदारी में सर्फ़ कर दी है) मैं जहन्नम का हर दरवाज़ा अपने ऊपर बन्द करने के लिये एक एक कनीज़ को राहे ख़ुदा में आज़ाद करती हूँ या रसूलल्लाह आप मुझे इत्मीनान दिलाऐं कि जहन्नम की आग मुझ को न जलाऐगी।