आलमे बरज़ख

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आलमे बरज़ख लेखक:
कैटिगिरी: क़यामत

आलमे बरज़ख

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

लेखक: शहीदे महराब आयतुल्लाह दस्तग़ैब शीराज़ी
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आलमे बरज़ख
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आलमे बरज़ख

आलमे बरज़ख

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हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

आलमे बरज़ख़ में बहुत ख़ौफ़ और ख़तरे हैं

किताब "मन ला यहज़रूल फ़क़ी" में इमाम मूसा काज़िम (अ.स) के एक ख़ास सहाबी से ये क़ौल मन्क़ूल है कि मैंने अपने आक़ा से एक ऐसी हदीस सूनी है कि जब तक ज़िन्दा रहूँगा ये हदीस मुझको ख़ौफ़ ज़दा रक्खेगी इसने मेरा सुकून और आराम छीन लिया है अब दुनिया की कोई सख़्त से सख़्त मुसीबत भी पेश आ जाऐ तो मुझ पर असर नहीं कर सकती क्योंकि मैने एक ऐसी आग हासिल की है जिसकी मौजूदगी में कोई दूसरी आग दिल पर असर अन्दाज़ नहीं होती। एक रोज़ मैं हज़रत इमाम मूसा काज़िम (अ.स) की ख़िदमत में हाज़िर था तो आपने (रिक़्क़ते क़ल्ब के सिलसिले में) फ़रमाया जब तुम किसी मय्यत को दफ़्न करना चाहो तो जनाज़े को एक ही बार में क़ब्र में न ले जाओ अगर मर्द है तो जनाज़े को क़ब्र की पाएतीं की जानिब रख दो और अगर औरत है तो क़िब्ले की सिम्त में उसे तीन बार उठाओ बारी बारी कुछ क़रीब ले जाकर रक्खो और तीसरी बार में क़ब्र में उतारो "फ़इन्ना क़ब्रा अहवाला" इस लिये कि क़ब्र के लिये बहुत से ख़ौफ़ हैं आलमे बरज़ख़ के मराहिल बड़े हौलनाक हैं लेकिन हमारे दिलों में किस क़दर क़सावत पैदा हो चुकी है।

रावी कहता है मैं उम्र के आख़री दम तक इस सोज़िश में मुब्तिला रहूँगा लेकिन बातों के बावजूद हम कोई असर क़ुबूल नहीं करते हैं जो शख़्स इन मतालिब को क़िस्सा कहानी समझता है वो हज्जाज की मानिन्द इन्तेहाई क़सासुल क़ल्ब आदमी है।

अगर मैं सिरात से गुज़र गया

एक मर्तबा एक मुनाफ़िक़ शख़्स ने जनाबे सलमान से जो अव्वलुल मुस्लिमीन थे और जिनका लक़ब सलमाने मोहम्मदी है उनकी हुकूमत और मदाएन की गर्वनरी के ज़माने में कहा सलमान! ये तुम्हारी सफ़ेद दाढ़ी बेहतर है या (माज़अल्लाह) कुत्ते की दुम ?ये सलमान थे कोई बच्चा नहीं थे फिर भी ये बात सुनने के बाद आप जोश व ग़ुस्से में नहीं आए बल्कि इन्तेहाई मुलायमियत के साथ फ़रमाया अगर मैं पुले सिरात से गुज़र जाऊँ तो मेरी दाढ़ी बेहतर है अगर गिर जाऊँ तो कुत्ते की दुम बेहतर है।

 चूँकि आख़िरत उनके नज़दीक़ बहुत बहुत अज़ीम चीज़ थी लिहाज़ा ये फ़िक़रे और मज़ाहमतें उनके लिये मक्खी की भनभनाहट से ज़्यादा वक़्अत नहीं रखती थी जो मोमिन के क़ल्ब और रूह पर कोई असर नहीं डालतीं ,जो शख़्स ख़ुद बुज़ुर्ग और बुज़ुर्ग को पहचान ने वाला होता है उसके नज़दीक़ माददी ज़िन्दगी छोटी और हक़ीर हो जाती है जब तक तुम ख़ुद बुज़ुर्ग न बनोगे बुज़ुर्ग तक नहीं पहुँच सकते अगर बफ़र्ज़े मुहाल पहुँच भी जाओ तो तुम ख़ुद फ़रारा इख़्तियार करोगे उस बुज़ुर्ग मन्ज़िल से कोई फ़ायदा न उठा सकोगे और इदारेकात ओ मआरिफ़ के रूहानी फ़यूज़ ओ बरकात से बहरामंद न हो सकोगे इसका रास्ता भी सब्र ही है।

(किताबे ईमान सः- 271)

ख़ुदाई आग से जली हुई क़ब्रे यज़ीद (ल 0)

चन्द सदियाँ क़ल्ब मोअर्रेख़ीन लिखते हैं कि हमारे ज़माने में एक ख़राबा और वीराना है जिसके मुतालिक़ मशहूर है कि यहाँ यज़ीद की क़ब्र है और इसका तजरूबा हुआ है कि जो शख़्स इस राह से गुज़रे और कोई हाजत रखता हो तो एक पत्थर या ढेला यहाँ फेंक दे उसकी हाजत पूरी हो जाऐगी इसी वजह से ये एक मुज़बला बन गया है। अब हमारे ज़माने में तो क़ब्र की वो जगह भी मौजूद नहीं है जिस वक़्त बनी अब्बास शाम में पहुँचे तो बनी उमय्या की तमाम क़ब्रों को खोद के उनके जनाज़ों को जला दिया था। यज़ीद की क़ब्र के अन्दर एक क़ददे आदम लम्बाई में खुदाई आग से जली हुई राख की सिर्फ़ एक लकीर मौजूद थी लिहाज़ा मुवस्सिक़ मुअर्रिख़ीने आम्मा की तहरीर के मुताबिक़ उसे पुर कर दिया गया और वो चन्द साल पहले तक एक ख़राबे की सूरत में रहा लेकिन अब तो ख़राबा भी नहीं हैं। (सूराऐ इन्आम आयतः- 25,किताब ईमानः- सः 316)

तीन वक़्तों में ज़मीन के तीन नाले

यही ज़मीन जिस पर तुम रास्ता चलते हो बज़ाहिर शऊर और गोयाई की ताक़त नहीं रखती लेकिन इसका बातिन मोमिन और काफ़िर को पहचानता है क्या तुमने नहीं सुना है कि ज़मीन तीन औक़ात में तीन क़िस्म के लोगों से नाला करती है ?एक उस वक़्त जब किसी मज़लूम का ख़ून उस पर बहाया जाता है ,दूसरे उस वक़्त जब उस पर ज़िना की रूतूबत गिराई जाती है और तीसरे उस वक़्त जब कोई शख़्स तुलूऐ सुब्ह से तुलूऐ आफ़ताब तक सोता रहे और दो रकअत नमाज़ पढ़ने के लिये न उठे।

(अलहरम -------------- बैनलतुलूऐन ,लिआलीअल अख़बार सफ़्हाः- 585)

 रवायत में है कि जिस वक़्त मोमिन के जनाज़े को क़ब्र में उतार कर चले जाते हैं तो क़ब्र (यानी ख़ुद ज़मीन) बात करती है क़ब्र की मलूकूती क़ूवत मोमिन से कहती है कि ऐ मोमिन ! तू मेरे ऊपर रास्ता चलता था तो मैं फ़ख़्र करती थी क्योंकि तू मेरे ऊपर ख़ुदा की इबादत करता था और मुझे शाद करता था मैं कहती थी कि तू मेरे शिकम में आऐगा तो मैं इसकी तलाफ़ी करूँगी अब ये मेरी तलाफ़ी का मौक़ा है मलकूते क़ब्र हदे निगाह तक वुस्अत पैदा कर देता है । (मद्उलबसर)

और इसके  बरअक्स अगर वो तारिकुस्सलात था तो मुलकूते क़ब्र कहता है कि तू मेरे ऊपर रास्ता चलता था तो मैं तेरी वजह से फ़रियाद करती थी अब इसकी तलाफ़ी का मौक़ा है चुनाँचे वो इस क़द्र तंग हो जाती है जैसे किसी दिवार में मेंख़ ठोक दी जाऐ किस क़दर सख़्त है ये फ़िशार जिसमें ये ग़रीब मुब्तला है।

(बिहारूल अनवार जिल्दः- 3)

मलकूते क़ब्र के लिये नूर और फ़र्श

ये ख़्याल न करो कि अश्या में शऊर नहीं है या आलम के दरो दिवार में तो शऊर ओ इदराक और नुत्क़ हर जगह फैला हुआ है लेकिन मलकूत में नहीं है ताकि जो लोग वहाँ हैं वो सुन सकें जो लोग आलमे बरज़ख़ में जा चुके हैं वो वहाँ मौजूदात की गुफ़्तुगू और आवाज़ें सुनकर उनके नुत्क़ को समझते हैं वो ज़माना आने वाला है जब ज़मीन की आवाज़ को तुम ख़ुद भी सुनोगे जिस वक़्त तुम्हारी क़ब्र तुम से कहेगी "नम नौमतुल उरूस" अगर मोमिन मर्द है तो कहेगी दामादों की मानिन्द आराम से सो जाओ और अगर औरत है तो कहेगी दुल्हनों की तरह सो जाओ ,बेसबब नहीं है कि माहे सयाम की रातों में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स) किस तरह ये कहते है "अबकी नुतलमतल क़ब्री" यानी मैं अपनी क़ब्र की तारीकी के लिये रोता हूँ "लम अफ़रशहू बिल अमल सिस्सालेह" जिसके लिये मैंने अमले सालेह का कोई फ़र्श नहीं भेजा है ,न मैंने अपनी क़ब्र के लिये ईमान का नूर भेजा है न तक़्वा की रौशनी ,मेरी क़ब्र के लिये तो मलकूते क़ब्र का ही फ़र्श होगा मैं कहना चाहता हूँ कि अपनी क़ब्र के ज़ाहिर को नहीं बल्कि उसकी अन्दरूनी और हक़ीक़ी मंज़िल को आरास्ता करो ख़्वाह उसका ज़ाहिर एक ख़राबा हो सड़ी हुई मिट्टी हो या किरमानी फ़र्श और ये सब बग़ैर अमले सालेह के अन्जाम नहीं पा सकता जो काम तुम ने ख़ुदा के लिये किया है गोया अपनी क़ब्र के हुजरे के मुज़य्यन किया है। (किताबे मआरिफ़े अज़ क़ुरान सफ़्हाः- 83ता 85)

तीन गिरोहों की हसरत बहुत सख़्त होगी

तुमने ये रवायत सुनी होगी कि तीन गिरोह ऐसे हैं जिनकी हसरत क़यामत में सबसे ज़्यादा होगी। अव्वल हर वो आलिम और वाऐज जिसके इल्म और नसीहत पर दूसरों ने तो अमल किया लेकिन वो ख़ुद दुनिया से बेअमल उठा वो क़यामत के रोज़ जब ये देखेगा कि दूसरें लोग उसके वाज़ और इल्म की बरकत से जन्नती बन गये लेकिन ख़ुद उसको जन्नत में लिये जा रहे हैं तो किस क़दर ख़िजालत होगी ?वो आरज़ू करेगा की उसे जल्द से जल्द जहन्नम में डाल दिया जाऐ ताकि लोग उसे न देखें ,दूसरे वो मालदार जिसने अपने माल से फ़ायदा नहीं उठाया और उसे छोड़ कर चला गया लेकिन उसके वारिसों ने उसे ख़ैरात और नेक आमाल में सर्फ़ किया ज़हमतें उसने उठाईं और फ़ायदा दूसरों ने हासिल किया और कल भी उसकी हसरत उसके साथ होगी ,और तीसरा वो आक़ा है जो अपने बेअमली की वजह से अज़ाब में मुब्तला होगा लेकिन उसका ग़ुलाम सवाब के आलम में होगा। (लेआलिअल अख़बार स. 2हाः 29)

ये वो रूहानी अज़ाब है जो अज़ाबे जहन्नम से क़त्ऐ नज़र और उस से भी बदतर है ज़िन्दगी भर तो वो ये कहता रहा कि मैं आक़ा हूँ मैं मालिक हूँ और मक़दूम हूँ मेरे पास नौकर और कनीज़ें हैं लेकिन अब उन्हीं ख़िदमत गुज़ारों को देखता है कि दरअस्ल आक़ा और मक़दूम वही हैं और ख़ुद बद बख़्त और पस्त ओ ज़लील है।

रहमे मादर और आलमे दुनिया ,दुनिया और बरज़ख़ की मान्निद

एक और सूरत इबरत हासिल करने की ये है कि जब हम रहमे मादर में थे उस वक़्त अगर हम से कहा जाता कि इस महदूद चहारदिवारी के बाहर एक ऐसी वसीय दुनिया मौजूद है जिसका क़यास इस तंग मकान के साथ नहीं किया जा सकता वहाँ तरह तरह की खाने और पीने की चीज़ें पैदा होती हैं जो इस ग़िज़ा से कोई निस्बत नहीं रखतीं जो यहाँ तुम्हें नाफ़ के ज़रिये हासिल होती हैं तो क्या हम उन मतालिब को सही तौर से समझ सकते हैं ?

इसी तरह ये भी जान लो और समझ लो कि आलमे बरज़ख़ में तुम्हारी मंज़िल ऐसी ही होगी जैसे शिकमे मादर के मुक़ाबिले में ये आलमे दुनिया है जब तुम पैदा होते है और शिकमे मादर से बाहर आते हो तो एक ऐसे आलम में वारिद होते हो जिसे न तुम्हारी आँखों न देखा था और न कानों ने सुना था यहाँ तक कि तुम्हारे दिल में इसका तस्सवुर भी न गुज़रा था ये नूर दर नूर और लज़्ज़त दर लज़्ज़त है और हर तरफ़ आसारे जमाल मुशाहिदा किये जा सकते हैं।

(सराऐ दीगर सफ़्हाः- 342)

मुहब्बत या ग़ुस्से के साथ क़ब्ज़े रूह

जब ख़ुदा मौत देता है और क़ब्ज़े रूह का वक़्त आता है तो लोगों की रूहे दो तरीक़ों से निकाली जाती हैं बाज़ की मेहर ओ मुहब्बत और रहमत के साथ ,और बाज़ की क़हर ओ ग़ज़ब और शिद्दत के साथ अलबत्ता दोनों के लिये कुछ मरातिब और दरजात हैं यहाँ तक कि इरशादे बारी तआला है कि "इज़राईल (मलकुल मौत) के मुआविन फ़रिशते कुफ़्फ़ार की जानें निकालने के लिये आतिशीं हरबों के साथ आते हैं

(सूराः- 47आयतः- 27)

और उनकी रूहें उन्हीं आग के हरबों से क़ब्ज़ करते हैं।

मेहरबानी और रहमत के साथ जान निकालने के भी कई दर्जें हैं इस हद तक कि फ़रिशते बहिशती फूलों का गुलदस्ता अपने साथ लाते हैं।

(सूराऐ नहल आयतः- 28)

ये जन्नत की ख़ुशबुऐं और इनआमात ओ इकरामात जिस मरने वाले के लिये मुहय्या किये जाते हैं वो किस क़दर मसरूर होता है। मलकुल मौत बहुत ही ख़ुबसूरत शक्ल में आते हैं और हर शख़्स के लिये नई सूरत में हाज़िर होते हैं उनकी शक्लो सूरत ख़ुद उस मरने वाले के जमाल के मुताबिक़ होती है ताकि जिस क़दर उसका जमाल हो उसी क़दर उनका हसीन जलवा सामने आए। इस से बालातर ये बात भी कह दें कि हज़रत अली (अ.स) का अन्दाज़ भी यही है कि तुमने अपने अन्दर जिस क़दर जमाल पैदा किया होगा अच्छी सिफ़्तें इख़्तियार की होंगी आलमे वुजूद में मर्दानावार ज़िन्दगी बसर की होगी दूसरों के साथ नेक सुलूक किया होगा अपनी उम्र में जिस क़दर साबिर बाविक़ार हलीम ओ बुर्दबार और शाकिर रहे होंगे और अक़्ल ओ दानाई का हुस्न हासिल किया होगा उसी के मुताबिक़ अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) को देख़ोगे चुनाँचे अगर ख़ुदा न ख़्वास्ता अपनी शक़ावत ,बदमिज़ाजी ,क़सावते क़ल्ब और बदहाली की मुनासिबत से मलकुल मौत की सख़्ती और दुरशती का सामना करना पड़ा तो ख़ुदा ना कर्दा हज़रत अली (अ.स) के क़हर ओ ग़ज़ब की सूरत भी देखना होगी। तुम्हारी क़ब्र की सूरते हाल भी यही है नकीर और मुनकर के बारे में ये ख़्याल न करो कि दोनों फ़रिशतें एक ही हालत में आते हैं ऐसा नहीं है ये शख़्स की बाली पर आते हैं ख़ुद उसी मय्यत के हालात ओ किरदार के मुताबिक़ आते हैं ये दोनों मलक हैं लेकिन ख़ुद तुम्हारी वज़ा के नमूने हैं।

तुम दुआ में पढ़ते हो कि ख़ुदा वन्दा! मैं बशीर और मुब्बश्शिर को देखूँ लेकिन देखना ये होगा की तुम्हें क्या बन के रहना है ?आया सारी उम्र आदमी बन के गुज़ारी या दरिन्दा बनके ?ये दोंनो फ़रिश्ते बाज़ अशख़ास की की क़ब्रों में इन्तेहाई सख़्त ओ दुरश्त और मुहीबतरीन शक्लों में आते हैं उनके बाल ज़मीन पर ख़ींचते होगे ,उनके देहनों से अज़दहे की मानिन्द आग के शोले होगें ,उनकी आँखें ख़ून से लबरेज़ काँसों के मानिन्द और  आग उगलती हुई यानी ख़ुद मय्यत के बातिन के मुताबिक़ किस क़दर शरीर ,बेहूदा ,मूज़ी ,मुर्गसिफ़्त और चीते की सी ख़सलत का हामिल था ये शख़्स ?बहरहाल जो कुछ भी था अपनी उफ़्तादे तबा के मुताबिक़ था बहुत ही अजीब है आलमे मलकूत और बरज़ख़।

ये सारी चीज़ें हक़ाएक़ हैं और हमारे ही बातिन और मलकूत आमाल ,जो सूरत इख़्तियार करके ज़ाहिर होते हैं।

मोमिन के लिये बशीर और मुब्बश्शिर हैं जो उसे परवरदिगार की बेइन्तेहा रहमतों और सवाबों की बशारत देते हैं।

(वराऐनी मुबश्शरन वा बशीरा ,दुआऐ माहे रजब ,बन्दगी राज़े आफ़रीनश सफ़्हाः- 684)

सवालः- एक शख़्स एक हज़ार साल क़ब्ल मर चुका है और एक शख़्स आज मरता है तो क्या आलमे बरज़ख़ दोनों के लिये यकसाँ है ?और साथ ही मिसाली जिस्म की तौज़ीह भी फ़रमाइये।

जवाबः-आलमे बरज़ख़ में क़यामते कुबरा तक रूहों के ठहरने की मुद्दत यक़ीनन मुख़्तलिफ़ है लेकिन रूहें बरज़ख़ में क़यामत तक मोअत्तल नहीं हैं बल्कि या तो बरज़ख़ी रहमतों से बहरामंद हैं (अगर वो गुनाहों से पाक होकर उठे हैं) या बरज़ख़ी अज़ाबों में गिरफ़्तार हैं लेकिन अगर कोई मरने वाला मुस्तज़अफ़ीन में से था यानी हक़ ओ बातिल का तमीज़ की क़ुदरत नहीं रखता था या जिस तरह चाहिये उस पर हुज्जत तमाम नहीं हुई थी जैसे वो लोग जो बलादे कुफ़्र में रहते हैं और मज़ाहिब के इख़्तिलाफ़ में कोई आगाही नहीं रखते या अगर उससे बाख़बर भी हैं तो दूसरे मुल्कों या शहरों में जाने और दीने हक़ का तजस्सुस करने की ताक़त और सलाहियत नहीं रखते इसी तरह नाबालिग़ बच्चे और मजनून अशख़ास तो ऐसे लोगों के लिये बरज़ख़ में कोई सवाल और अज़ाब ओ सवाब न होगा और इनका मामला क़यामत पर उठा रक्खा जाएगा ताकि वहाँ ख़ुदा ए तआला उनके साथ अपने अदल या फ़ज़्ल के ज़रिये मामला फ़रमाए।

क़ालिब मिसाली से मुराद वो जिस्म है जिस से मरने के बाद रूह अपना ताअल्लुक़ क़ायम करती है वो ऐसा जिस्म है जो सूरत में दुनियावी जिस्म के मानिन्द है। चुनाँचे हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स) से मरवी है कि आपने फ़रमाया "लौ रायतेही लेक़लत हवहवा बे ऐनेही" यानी अगर तुम उसे बरज़ख़ में देखोगे तो कहोगे ,ये तो बे ऐनेही वही शख़्स है यानी शक़्ल ओ सूरत के लिहाज़ से जिस क़द्र दुनिया के मुताबिक़ है लेकिन माददे की हैसियत से मुकम्मल सफ़ाई और लताफ़त रखता है।

अल्लामा मजलिसी अलैहिर्रहमा बिहार में फ़रमाते हैं कि ये लताफ़त में जिन्न और मलाएका से मुशाबे है नीज़ फ़रमाते है कि रवायत और अख़बार में वुस्अते क़ब्र ,रूह की हरकत ,हवा में उसकी परवाज़ और अपने घर वालों के दीदार के बारे में जो कुछ वारिद हुआ है वो सब इसी जिस्म से मुताल्लिक़ है।

बाज़ मुहक़्क़ेकीन ने लताफ़त के लिहाज़ से बरज़ख़ी जिस्म को उस सूरत से तशबीह दी जो आईने में मुनअकिस होती है सिवाऐ इसके कि आईने की सूरत का वुजूद दूसरे वुजूद के ज़रिये क़ायम है और फ़हम ओ इदराक से महरूम होता है।

( 82पुरसिश सः- 115).

तीन चीज़े बरज़ख में बहुत काम आती है

एक रोज़ हज़रते रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व)   ने मसर्रत के साथ इरशाद फ़रमाया कि मैंने हमज़ा सैय्यदुश्शोहदा और जाफ़रे तय्यार इन दोनों अज़ीज़ शहीदों को देखा कि बहिश्ती अंगूरों का एक तबक़ उनके सामने रक्खा हुआ था उन्होंने उनमें से कुछ खाया फिर वो बहिशती रूतब बन गये ऐसे रूतब जिनमें न गुठली होती है न कोई सक़्ल न गरानी और उनकी मुशक जैसी ख़ुशबू कई फ़रसख़ तक जाती है।

आँहज़रत ने फ़रमाया कि मैंने उनसे पूछा इस मक़ाम पर कौन सी चीज़ें तुम्हारे लिये तमाम चीज़ों से बेहतर हैं ?तो हमज़ा ने कहा कि तीन चीज़े ऐसी हैं जो बरज़ख़ में बहुत ही फ़रहत अंगेज़ हैं अव्वल अली इब्ने अबीतालिब (अ.स) की मुहब्बत (ख़ुदावन्दा! तू हमारे दिलों में अली इब्ने अबीतालीब (अ.स) की मुहब्बत को बढ़ा दे जो दूध की तरह उतर जाऐ और जानों के साथ बाहर आए) दोम मुहम्मद ओ आले मोहम्मद अलैहुमस्सलातो वस्सलाम पर सलवात भेजना और सोम (तीसरी) किसी प्यासे को पानी पिलाना । अगर कोई तशनालब सामने आ जाए तो उसकी तशनगी दूर करो ये बरज़ख़ में तुम्हारे बहुत काम आऐगा। जो शख़्स एक दिल को ख़ुन्क करेगा कल उसकी क़ब्र में उसका दिल ख़ुन्क होगा।

बख़ील का बरज़ख़ी फ़िशार ऐसा है जैसे दीवार में मेख

हमें चाहिये कि अपनी पिछली कोताहियों से तौबा करें कितने ही मवाक़े ऐसे आऐ कि कारे ख़ैर और दाद ओ दहिश करना हमारा फ़रिज़ा था लेकिन हमने नहीं किया हम कितनी आग अपनी क़ब्र के लिये भेज चुके हैं दूसरों के हालात पर ग़ौर न करो बल्कि ख़ुद अपनी ख़बर लो कि तुमने अपनी हद के अन्दर रहते हुए किस शख़्स के बारे में कितने बुख़्ल से काम लिया है और अपनी क़ब्र को तंग किया है जब मौत आ जाऐगी तो वहाँ कोई फ़राख़ी और वुस्अत न होगी बल्कि जैसा रवायत बताती है बख़ील आदमी का फ़िशार इतना सख़्त होगा जैसे कोई मेख़ दीवार में ठोंक दी जाए।

दुनिया में हम्माल और बरज़ख़ में बादशाह

एक हिक़ायत मेरे ज़ेहन में आई जो एक बुज़ूर्ग इन्सान से मन्क़ूल है कि मैंने एक रात वाक़ेयी तौर पर बरज़ख़ी जन्नत का एक मन्ज़र देखा वहाँ मैंने एक आलीशान महल देखा जिसके रास्ते बहुत बड़े थे ,सरबाफ़लक़ दरख़्त लगे हुए थे और तरह तरह के मेवे और अश्याए ख़ुरद ओ नोश मुहय्या थीं उस इमारत के बालाख़ाने पर एक बुज़ुर्ग इन्तेहाई अज़मतो विक़ार के साथ बैठे हुए थे मैं ये हालात देखकर सोचने लगा कि ग़ालेबन इनका हमारी दुनिया से तआल्लुक़ नहीं है और हैरत में पड़ गया कि ख़ुदाया! ये कौन शख़्स है ?मैनें ख़ुदा की बरगाह में दुआ की कि मुझे उसकी हक़ीक़त से आगाह फ़रमा दे नागाह ख़ुद उन्हीं बुज़ुर्ग ने आवाज़ दी कि "अनल हम्माल" मैं दुनिया में बार बरदारी (क़ुली) का काम करता था और पीठ पर बोझ लाद कर इधर से उधर पहुँचाता था जो लोगों के नज़दीक़ एक पस्त और हक़ीर तरीन पेशा है।

वो आग जो क़ब्र से शोलाज़न हुई

दारूस्सलाम ईराक़ में क़ाचारी के दरबार के एक रूकन के बारे में ये वाक़ेया दर्ज है (हतके हुरमत के ख़्याल से उस दरबारी का नाम नहीं ले रहा हूँ) कि उसका जनाज़ा तेहरान से क़ुम लाए उसके लिये एक हुजरा हासिल किया और क़ब्र पर एक क़ारी मोअय्यन किया नागहाँ उस क़ारी ने देखा कि क़ब्र से आग के शोले बाहर निकल रहे हैं लिहाज़ा उसने वहाँ से फ़रार इख़्तियार किया उसके बाद लोग उस चीज़ की तरफ़ मुतावज्जे हुए कि क़ालीन और जो कुछ हुजरे में था सब जल गया है लेकिन इस अन्दाज़ से कि सभी ने ये समझ लिया कि ये दुनियावी हरारत नहीं थी बल्कि उसकी क़ब्र की आग ऊपर तक आ गई थी। उसकी क़ब्र आग से इस तरह भर गई थी कि उसका असर बाहर तक पहुँच रहा था।

तुमने आग के बीज बोए हैं लेकिन उनसे फूल हासिल करना चाहते हो अगर तुम्हारी क़ब्र के ऊपर एक हज़ार गुलदस्तें भी सजा दिये जाऐं तो उससे तुम्हारी बातिनी कसाफ़तों पर क्या असर पड़ता हैं ?अलबत्ता इस तरह हम अपने दिल ख़ुश कर लेते हैं। ख़ुदा के लुत्फ़ ओ करम के उम्मीदवार रहो ऐसा न हो कि तुम्हारे ऊपर ग़ुरूर मुसल्लत हो जाए इन्सान को हमेशा उम्मीद ओ बीम के दरमियान रहना चाहिये मुमकिन है ख़ुदा की नज़रे लुत्फ़ हो जाए।

ग़ुस्से को ज़ब्त करना आग के ऊपर पानी डालना है

ग़ुस्सा ज़ब्त करने की मलकूती सूरत क़ब्र की आग पर पानी डालना है। ग़ैज़ ओ ग़ज़ब की हालत में अपने ऊपर क़ाबू रक्खो ,अपनी ज़ात को बेलगाम न छोड़ो अपने सुकून और आसाइश की हिफ़ाज़त करो उठो और अपनी राह लो ,पानी पी लो ,अपनी हालत में तग़य्युर पैदा करो ,सुनी हुई बात को अनसुनी कर दो वरना कहीं ऐसा न हो कि क़त्ए रहम के मुरतकिब हो जाओ ,सिलाऐ रहम के ज़रिये अपनी आतिशे क़ब्र को सर्द करो! खुलासा ये कि हर गुनाह पुले सिरात से नीचे गिरने है ,बहिश्त की राह सुल्ह ओ सफ़ाई है ,जहन्नम का रास्ता निज़ा ,जंग ओ जिदाल और तैश में आना है अब ये तुम ख़ुद जानते हो कि कौन सा रास्ता चलना चाहिये। (सूराऐ दहर आयतः- 3),बग़ैर एहसान जताने और अज़ीयत देने के सख़ावत और जूदो करम राहे बहिश्त है ,जन्नत तक आने के लिये सिरात की सहूलत इसी में है कि जहाँ तक मुमकिन हो अपनी ज़बान से अच्छी बात कहो ,अमानतदार बनो और इसके उसके ऐब को छुपाओ अलबत्ता उसके बरख़ेलाफ़ दोज़ख़ का रास्ता है। अगर तुम चाहते हो कि ख़ुदा के क़हर ओ ग़ज़ब से दूर रहो तो ख़ुद अपने को ग़ज़ब से दूर रक्खो।

मरवी है कि एक शख़्स अज़ाब और आतिशे जहन्नम में घिरा होगा उस हालत में आवाज़ आऐगी कि मेरे पास इसकी एक अमानत है चूँकि इसने मेरे लिये अपने ग़ुस्से को फ़रो किया था लिहाज़ा आज इसकी तलाफ़ी का दिन है।

पोशीदा सदक़ा और अज़ाब के ख़ौफ़ से गिरया

जो चीज़ें तुम्हारी आतिशे क़ब्र को ख़ामोश करती हैं उनमें से एक "सदक़ातुल सिर" है यानी ख़ुदा की राह में पोशीदा तरीक़े से सदक़ा और ख़ैरात देना जिसकी ताबीर इस तरह की गई है कि देने वाले के हाथ की ख़बर दूसरे हाथ को भी न हो कुजा और से भी ज़िक्र न करे यहाँ तक कि ख़ुद अपने से भी न कहे और हदीसे नफ़्स न करे यानी इसको बिल्कुल फ़रामोश कर दे।

मिनजुमला चीज़ों के जो आग को ख़ामोश करती हैं , आँसू का वो क़तरा है जो तुमने ख़ौफ़े ख़ुदा से गिराया हो अपनी बुराइयां याद करो ,तरह तरह के अज़ाब ओ उक़ाब का तसव्वुर कर अगर तुम्हारे दिल पर ख़ौफ़ तारी हो जाए ,जिस्म में लरज़ा पैदा हो जाए और ख़ुदा के इस ख़ौफ़ से आँसू का एक क़तरा भी गिर जाए तो ये अज़ाब के भड़कते हुए शोलों को ख़ामोश कर देगा।

नफ्स परस्ती सिरात से दूर ले जाती है

इस नफ्स परस्ती और ख़ुदगरज़ी का मतलब भी सिरात से गिर जाना है ,आया तुमने उस शख़्स को देखा है जिसने अपनी ख़्वाहिशे नफ़्स को अपना ख़ुदा बना लिया है (सूराऐ जासिया आयतः- 25),नफ्स परस्ती इन्सान को क़अरे जहन्नम की तरफ़ ख़ींचती है (सूराऐ क़ारिया आयतः- 9)जो शख़्स ये कहता है मेरा दिल चाहता है ,अपने दिल की हवस के पीछे दौड़ता है और हराम ओ हलाल का लिहाज़ नहीं करता उसकी आक़िबत और अन्जाम ये है कि वो आग का रास्ता इख़्तियार कर लेता है और ख़ुदा की बन्दगी और राहे रास्त को छोड़ देता है। सूराऐ यासीन में ख़ुदा की बन्दगी को सिराते मुस्तक़ीम बताया गया है ,एक बन्दे की तरह ज़िन्दगी बसर करो ,गरदनकशी न करो ,अपने को आज़ाद मुतलक़ और मुस्तक़िल हैसियत का मालिक न समझो ,और ख़ुदा की मुतलक़ हाकमियत को समझो।

गुनाहगार हक़ीक़ी ग़ासिब है

जिस हस्ती ने तुम्हें ज़बान अता फ़रमाई है उसने उसके इस्तेमाल के लिये कुछ हुदूद भी मोअय्यन फ़रमाये हैं ,हक़ीक़ी ग़ासिब कौन है ?वो शख़्स है जो ख़ुदा के इस अतिये और अमानत से फ़ोहश बातें करता है ,तोहमत लगाता है बग़ैर इल्म के बात कहता है और लोगों की आबरू रेज़ी करता है ये सारी तस्सरूफ़ात ग़ासिबाना हैं ये तुम्हारे ख़ुदा की मिल्क है इस पर तुम्हारे तस्सरूफ़ात और इख़्तियारात महदूद हैं इसे मुकम्मल तौर पर इसके हक़ीक़ी मालिक के ज़ेरे असर होना चाहिये। (किताब फ़ातिहलतुल किताब सफ़्हाः- 68, 85, 151, 247से 250, 294)।

जहन्नम दुशमनाने अली (अ.स) के लिये है

इरशाद है कि अगर तमाम ख़िलक़त अली (अ.स) की दोस्ती पर जमा होती (और अली (अ.स) की दोस्ती के साथ दुनिया से जाती) तो ख़ुदा जहन्नम को पैदा ही न करता। यक़ीनन जहन्नम दुशमनाने अली (अ.स) के लिये है। अगर तुम पूछते हो अली (अ.स) के दोस्त तौबा के साथ मरते हैं और ख़ुद मोहब्बते अली (अ.स) इस दुनिया से तौबा के साथ उठने की मुजिब है अगर ये फ़र्ज़ कर लिया जाए कि यहाँ से कोई शख़्स आलूदा गया तो बरज़ख़ में पाक हो जाता है।

अली (अ.स) का दोस्त जहन्नम में नहीं रहेगा

मुहक़िक़्क़े क़ुम्मी फ़रमाते हैं कि जहन्नम में ख़ुलूद यानी आग में हमेशा रहना उनके लिये है जो अली (अ.स) के दोस्त नहीं हैं और शायद हदीस के मानी भी यही हो कि अली (अ.स) की दोस्ती के साथ कोई गुनाह उसे हमेशा जहन्नम में नहीं रोकता उसके लिये कोई ऐसा ख़तरा नहीं है जो आग में रहने का सबब बने ख़्वाह ये रिहाई तीस हज़ार साल बाद हो।

बहिश्त और दोज़ख़ की कुंजियाँ अली (अ.स) के हाथ में

अख़्तबे ख़्वारज़मी और सालबी ने लिखा है कि रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व)   ने फ़रमाया कल क़यामत के रोज़ मेरे लिये एक बहुत वसीय मिम्बर नस्ब किया जाएगा जिसमें सौ ज़ीने होगें सबसे बलन्द ज़ीने पर मैं बैठूँगा दूसरे ज़ीने पर अली (अ.स) होंगे और सबसे नीचे वाले ज़ीने पर दो फ़रिश्ते बैठे होंगे उनमें से एक कहेगा कि ऐ महशर वालों! मैं रिज़वान ख़ाज़िने बहिश्त हूँ और बहिश्त की कुंजी में पास है ख़ुदा ने मुझे हुक्म दिया है कि ये जन्नत की कुंजी हज़रत मोहम्मद (स 0अ 0)को पेश करदूँ और दूसरा कहेगा कि मैं मालिके दरोग़ाए जहन्नम हूँ और मुझे भी हुक्म दिया है कि दोज़ख़ की कुंजी हज़रत मोहम्मद (स 0अ 0)के सुपूर्द कर दूँ आँहज़रत का इरशाद है कि मैं उन्हें लेकर अली इब्ने अबी तालिब (अ.स) को दे दूगाँ और ख़ुदाऐ तआला के क़ौल "अलक़या फ़ी जहन्नम कुल्ला कुफ़्फ़ार उनीद" (सूराऐ क़ाफ़ आयतः- 24) (यानी अलक़या या मुहम्मद (स 0अ 0)व अली (अ.स) फ़ी जहन्नम) का मतलब ये है कि ऐ मुहम्मद (स.अ.व.व)   और ऐ अली (अ.स) तुम हर सरकश काफ़िर को दोज़ख़ में डाल दो। (किताब इमामत सफ़्हाः- 68, 72).

बुर्ज़ुगाने दीन क़यामत की बरहनगी से डरते हैं

किताब मुआलिमुल ज़ुल्फ़ा में है कि पैग़म्बरे अकरम सलल्लाहो वा आलेही वस्सलम ने फ़रमाया क़यामत के रोज़ जब औरतें महशूर होगीं बरहना होगीं इस पर जनाबे फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.व.व)   ने गिरया करना शरु किया और फ़रमाती थीं "वा फ़ज़ीहता" उस वक़्त जिबरईले अमीन पैग़म्बर पर नाज़िल हुए और अर्ज़ किया कि ख़ुदा हज़रते ज़हरा (स.अ.व.व)   को सलाम कहता है और फ़रमाता है कि हम हज़रते ज़हरा (स.अ.व.व)   के ज़ामिन हैं कि उन्हें रोज़े क़यामत दो बहिश्ते हुल्ले पहनाए जाऐगें। अमीरूलमोमिनीन (अ.स) की मादरे गिरामी हज़रते फ़ातिमा बिन्ते असद जो एक ऐसी बीबी थीं जिन्हें विलादते फ़रज़न्द के मौक़े पर ख़नाए काबा के अन्दर बुलाया गया और तीन शबाना रोज़ वहाँ मेहमान रहीं और जो पैग़म्बर के लिये माँ की हैसियत रखती थी क़यामत की बरहन्गी से ख़ौफ़ज़दा होकर हज़रते रसूले ख़ुदा के सामने रोने लगीं और आँहज़रत से पनाह तलब करके ख़्वाहिश की कि आप उन्हें अपने पैराहन के एक पारचे का कफ़न दें। उम्मुलमोमिनीन हज़रते ख़दीजातुल कुबरा (स.अ.व.व)   जब सफ़रे आख़िरत के लिये आमादा हुईं तो जनाबे फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.व.व)   को जो उस वक़्त सात साल की थीं पैग़म्बरे ख़ुदा की ख़िदमत में भेजा और कहा कि अपने बाप से कहो कि मेरी माँ कहती है आपसे मेरी ख़्वाहिश और दरख़ास्त ये है कि मुझे अपने पैराहन का कफ़न दें ताकि महशर में बालिबास उठूँ........ ये हैं रोज़े क़यामत से बुज़ुर्गाने दीन के ख़ौफ़ का एक नमूना वो दिन जो बहुत सख़्त है और जिसके बारे में ख़ुदा इरशाद फ़रमाता है जिस रोज़ अल्लाह की तरफ़ से एक बुलाने वाला एक ज़िश्त और नापसन्दीदा अमर के लिये बुलाएगा ,नुकर माद्दाए इन्कार से है ,जिस चीज़ को इन्सान ख़िलाफ़े मामूल और बुरी जानता है और वो उसे ख़ौफ़ो इज़्तेराब में मुब्तिला करती है उसे नुकर कहा जाता है (एक क़िरअत सुकूने क़ाफ़ के साथ भी है) और उन दो फ़रिश्तों को भी जो कुफ़्फ़ार के लिये क़ब्र की पहली शब में आते हैं इसी मुनासिबत से नकीर और मुनकर कहा जाता है चुनाँचे मरहूम फ़ैज़ और दीगर हज़रात का क़ौल है कि फ़रिश्तों का आना मय्यत के अमल के मुताल्लिक़ है अगर मरने वाला नेकूकार है तो बशीर और मुब्बश्शिर वरना नकीर और मुनकर होते हैं वही दोनों फ़रिश्तें मोमिन के लिये अच्छी सूरत में बशारत के लिये और काफ़िर और फ़ासिक़ के लिये ख़ौफ़नाक सूरतो हैबत में अज़ाबे इलाही से डराने के लिये आते हैं वरना हैं दोनों तरह के फ़रिश्ते एक ही जैसे हज़रत ईज़राईल जो दरहक़ीक़त हैं एक ही लेकिन नेको के लिये बेहतरीन सूरत में और बदों के लिये बदतरीन और मुहीबतरीन सूरतो हयत में आते हैं।

मेरी ग़रज़ नकर की मुनासिबत से है ये आयत गुनाहगारों के बारे में है जो ऐसे अम्र की जानिब बुलाए जाऐगें जो इज़तिराब और फ़रियाद ओ ज़ारी पैदा करने वाला है और वो रोज़े हिसाब का हौल है।

(किताब हक़ाएक़े अज़ कुरान सः- 57)

बिखरी हुई टिडिडयाँ

दरहक़ीक़त उनकी आँखें ख़ाशे और झुकी हुई होंगी ख़ुश्बू एक क़ल्बी अम्र है जिसका सरचश्मा दिल है और इसका असर आज़ा ओ ज़वारे से ज़ाहिर होता है ख़ुशूव सबसे ज़्यादा आँखों से नुमाया होता है क्योंकि दीगर आज़ा के मुक़ाबले क़ल्ब का आँख से रब्त ज़्यादा है हर शख़्स की ख़ुशी और ग़म और शर्म ओ हया को उसकी आँखों में पढ़ा जा सकता है इसी बिना पर ख़ुदाए तआला ख़ुशूव को आँखों से निस्बत देता है जबकि ये दरअस्ल क़ल्ब से मरबूत है ,चूँकि ज़िल्लत और बदबख़्ती के आसार भी आँखों पर तारी होते हैं लिहाज़ा फ़रमाता है कि उनकी आँखें ख़ाशे और झुकी हुई होगी "वो क़ब्रों से बाहर आएगें" अजदास जदस की जमा है जिसके मानी क़ब्र के हैं "दर हाँलाकि वो बिखरी हुई टिडिडयों की मानिन्द होंगे" ये टिडिडयों के ख़ुसूसियात में से हैं कि वो परवाज़ के वक़्त ग़ैरे मुनज़्ज़म और सरगरदाँ होती हैं लेकिन तुमने देखा होगा कि वो बाहमी तन्ज़ीम ओ तरतीब के साथ दरो दीवार पर टूट पड़ती है और तमाम चीज़ों को खा जाती हैं और इसी सबब से उनमें से अक्सर हलाक भी हो जाती हैं ,ख़ुदाए तआला क़ब्रों से बाहर आने के वक़्त इन्सानों की हालत को टिडिडयों से तशबीह देता है क्योंकि वो हैरतज़दा होगें ऐसी चीज़ें देखेगें जो कभी न देखी होंगी और ऐसी जगह जाऐंगे जहाँ कभी न गये होंगे उस वक़्त अव्वालीन ओ आख़िरीन सभी जमां होंगे।

वो लोग जो मुज़्तरिब न होंगे

हाँ सिर्फ़ कुछ लोग ऐसे होंगे जिन्हें कोई इज़्तेराब न होगा वही लोग जिन्होंने ईमान और अमले सालेह इख़्तियार किया है और ख़ुदाए तआला ने उनके दिलों में सकीना और क़रार को जागुज़ीं किया है (हुवल लज़ी अनज़लस्सकीना फ़ी क़ुलूबिल मोमिन) और वो इसी हालत के साथ दुनिया से रूख़सत हुए हैं अगर कोई शख़्स यहाँ अक़ीदे और अमल के लिहाज़ से मुताज़लज़िल है तो यक़ीन रक्खो कि उसे आख़िरत में भी इज़ितराब लाहक़ होगा (मन काना फ़ी हाज़ा अमा फ़हुवा फ़ील आख़िरते अमा) चूँकि वो इधर या उधर किसी जानिब मुस्तक़िल नही है लिहाज़ा अगर अक़ीदे के इज़तेराब के साथ मर गया तो इसी तरह मैदाने महशर में भी मुज़तरिब वारिद होगा।

( किताब हक़ाएक़े अज़ क़ुरान सफ़्हाः- 60 )

क़यामत का अज़ाब बहुत सख़्त है

"वस्साआ औदा वा अम्र" ताकीद के लिये ख़ुदाए तआला फ़रमाता है कि क़यामत "औहा" है ,जिस ख़ौफ़नाक और मुज़तरिब करने वाली मुसीबत से फ़रार और ख़लासी का कोई रास्ता न हो उसे वहिया कहते हैं और अदहा इसका फ़ेलुत तफ़ज़ील है यानी हर वो सख़्ती और ग़ैरे मामूली अज़ाब जिसका दुनिया में मुशाहिदा होता है ,क़यामत उससे कहीं ज़्यादा सख़्त है अगर कोई शख़्स इन बलाओं में मुब्तिला होगा तो दुनिया के अज़ाब को भूल जाएगा जैसे किसी के साँप ने डस लिया हो तो वो फिर मच्छर के काटने की परवाह नहीं करता है।

(किताब हक़ाएक़े अज़ क़ुरान सफ़्हाः- 196 )

तालिबाने हुक़ूक़ और क़यामत

तुमने क़यामत की हौलनाकियों के बारे में क़ुराने मजीद में बार बार पढ़ा होगा कि रोज़े क़यामत एक ऐसा दिन है जिसमें हर फ़र्दे बशर को बलन्द किया जाऐगा ताकि सब लोग उसे देख सकें उसके बाद एक मुनादी निदा करेगा जो शख़्स इस शख़्स पर कोई हक़ रखता हो वो आ जाए! उस वक़्त अपने हुक़ूक़ तलब करने वाले उसकी  तरफ़ रूख़ करेगें जिन लोगों के बारे में शायद ज़ाती तौर पर उसे ख़ुद भी ऐहतेमाल न होगा कि मैंने इनके हुक़ूक़ अदा नहीं किये हैं उसके गिर्द जमा हो जाएगें उसने किसी की आबरू रेज़ी की होगी ,किसी की ग़ीबत की होगी किसी का माल खाया होगा या किसी का क़र्ज़दार होगा और उसे भूल गया होगा ये सब उससे अपने हक़ का मुतालिबा करेगें इस बेचारे को उन्हें अपनी नेकियों में से देना होगा नमूने के तौर पर रवायतों में वारिद है कि एक दिरहम माल के एवज़ मक़बूल नमाज़ों की सात सौ रक्अतें देना होंगी अब इससे बड़ी और मुसीबत और क्या होगी। अम्मारा मुर से बना है जिसके मानी है तल्ख़ ,और अम्मुर के माना हैं बहुत ही तल्ख़ तुम इस दुनिया में जिस नागवार औऱ तल्ख़ चीज़ का तसव्वुर कर सको क़यामत में उससे भी ज़्यादा तल्ख़ है इस क़दर तल्ख़ कि भाई भाई से ,बेटा माँ बाप से ,ज़ौजा शौहर से ,शौहर ज़ौजा से फ़रार करेगा (यौमा यफ़्फ़रूल मुरा मिन अख़ीहू व उम्महू व अबीहू व साहबतहू व बनीहू) इस ख़ौफ़ से कहीं ये अपने हक़ का मुतालिबा न कर बैठे

(किताब हक़ाएक़े अज़ क़ुरान सः 196)

जिस्म के आज़ा की शहादत

क़यामत का एक मौक़फ़ आज़ा ओ जवारेह का बोलना है हर शख़्स के आज़ा उसके अफ़आल की गवाही देगें और इस पर क़ुराने मजीद की नस मौजूद है।

(असुन्नतहुम वा ऐदहुम वा अरजलहुम बिमा कानू यालेमून. सुराः- 24आयतः- 24)

बल्कि जिस वक़्त वो शख़्त ऐतेराज़ करेगा कि तुम मेरे ख़िलाफ़ क्यों गवाही दे रहे हो ?तो वो कहेगें ये हम अपने इख़्तियार से नहीं कह रहे हैं बल्कि हमें ख़ुदा ने गोयाई दी है। (क़ालू अन्तक़ल्लाहिल लज़ी अन्तुक़ कुल्ला शैइन. सूराः- 41,आयतः- 20)किताब हक़ाएक़े अज़ क़ुरान सः- 197.

आग और गुमराही मुजरेमीन के लिये

"इन्नल मुजरेमीना फ़ी ज़लालिन वसअर" यानी मुशरेकीन यक़ीनन गुमराही और आग में हैं अगरचे लुग़त के मुताबिक़ मुजरिम गुनाहगार के मानी में हैं लेकिन आयाते माक़ल्ब का तरीक़ा बताता है कि यहाँ मुशरिक मुराद है यानी मुशरेकीन हक़ से गुमराही में हैं (फ़ी ज़लालिन मिनल हक़) दुनिया के अन्दर उनकी तमाम हरकतें दो रोया हैं यानी वो अपने ही गिर्द ताना बाना बुनते हैं उनसे कोई मुसबत अमल नहीं होता जो उनकी पेशरफ़्त का बाएस बने उनकी तमाम क़ूवते ग़ौर ओ फ़िक्र दौलत जमा करने और जाह ओ मनसब और शोहरत ओ रियासत हासिल करने के लिये वक़्फ़ होती है जिसका नतीजा ख़ुदा की राह से गुमराही है "सुअर" जुनून के मानी में हैं और मुमकिन है दोनों से दुनिया के अन्दर ज़लाल ओ सुअर मुराद हो और उनसे जुनून के मानी मुराद लिये गये हों यानी मुशरेक़ीन गुमराही में हैं और दीवाने हैं चुनाँचे बिहारूल अनवार के अन्दर हज़रते रसूलेख़ुदा (स.अ.व.व)   से एक रवायत मनक़ूल है जिसका ख़ुलासा ये है कि हज़रत रसूलेख़ुदा की एक दीवाने से मुलाक़ात हुई आपने उसका हाल पूछा लोगों ने कहा कि ये दीवाना है तो आँहज़रत ने फ़रमाया "बल हुवा मसाब" बल्कि मुसीबत ज़दा है और एक बला में गिरफ़्तार है "इनामल मजनूना मन असरद्दुनिया अल्लल आख़िरा" दर अस्ल मजनून तो वो शख़्स हैं जो दुनिया को आख़िरत पर इख़्तियार करता है।

निजात का रास्ता खो देते हैं

ज़लाल व सअर के दूसरे मानी ये हैं कि दोनों आख़िरत से मुताल्लिक़ है। क़यामत के रोज़ मुशरेक़ीन बहिशत के रास्ते से भटके हुए हैं और उसे हासिल नहीं कर सकते (सूराः- 57आयतः- 13).

"यौमा यस्हबूना फ़िन्नारे अला वजूहहुम" यानी जिस रोज़ मुशरिकीन मुँह के बल आग में झोंक दिये जाऐगें वो ऐसा दिन होगा कि मुशरिक़ीन को ख़ींचते हुए आग की तरफ़ ले जाऐंगे और उन्हें मुँह के बल उसमें गिरा देंगे चूँकि वो दुनिया में हक़ से रूगरदानी करते थे लिहाज़ा कल क़यामत के रोज़ उन्हें जहन्नम में औंधे मुँह डाल दिया जाऐगा और उन से कहा जाऐगा कि "ज़ूक़ूमस्सक़र" यानी चक्खो जहन्नम का मज़ा।

चक्खो आतिशे जहन्नम का मज़ा

सकर जहन्नम का नाम है इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स) से मरवी है कि आपने फ़रमाया कि जहन्नम में एक बयाबान है जिसे सक़र कहते हैं (इन्ना फ़ी जहन्नमा वादियो यक़ालुल लहुस सक़र) और दूसरी रवायत में इरशाद है कि सक़र जहन्नम का एक तबक़ा है इसने ख़ुदा से एक साँस लेने की इजाज़त माँगी है जब उसे इजाज़त मिल गई तो उसने एक ऐसी साँस ख़ींची कि जहन्नम के शोले भड़क उठे ये बाते कोई क़िस्सा कहानी नहीं हैं बल्कि ऐसी हक़ीक़ते हैं जो हमे झंझोड़ कर रख दें ताकि हम ऐसे ख़तरनांक मवाक़िफ़ के बारें में ग़ौर व फ़िक्र से काम लें और इनसे अम्न ओ अमान हासिल करने की कोशीश करें जब तक कि मौत के वक़्त मलाएकाऐ रहमत का मुशाहिदा न कर लें और रहमते ख़ुदा की आवाज़ न सुन लें कि हमें बहिश्त में तलब किया जा रहा है (या अयताहन नफ़सुल मुतमइन्ना तुरजाइ इल्ला रबेहे राज़ीयतम मरज़ीया फ़दख़ुली फ़ी इबादी  वदख़ुली जन्नती) हमें आराम से न बैठना चाहिये बल्कि हमेंशा ख़ौफ़ के आलम में रहना चाहिये कि ख़ुदा न ख़्वास्ता दुनिया से बग़ैर ईमान के उठें और बग़ैर तौबा किये हुए मर जाए आया कोई शख़्स भी ये इत्मीनान रखता है कि बेहतरीन हालात में उसकी मौत आएगी ?

(किताब हक़ाएक़े अज़ क़ुरान सः- 200)

क़यामत में मुन्तशिर अज्ज़ा फ़िर जमा किये जाऐंगे

अजीब बात ये है कि अज्ज़ा व ज़र्रात दोबारा मुन्तशिर हो जाते हैं जिस वक़्त चावल या गेहूँ बाप के गले से नीचे तो जिस्म के तमाम अज्ज़ा और ज़र्रात में मुन्क़सिम और मुन्तशिर हो जाता है फिर उसे दस्ते क़ुदरत बाप के सुल्ब में यक्जा कर देता है और ये माददाऐ तौलीद के मख़ज़न से रहमे मादर में मुन्तक़िल होता है "तुम देखते हो कि हमने किस तरह से मुताफ़्ररिक़ ज़र्रात को जमा कर दिया उनमें से कुछ दुरूस्त हालत में आगये उसके बाद मुन्तशिर और परागन्दा ज़र्रात को फ़िर जमा करेंगे"

क़ुराने मजीद के इस मतलब को बार बार याद दिलाया गया है "कह दो! कि उसे वही हस्ती ज़िन्दा करेगी जिसने उसे पहली बार पैदा किया है"

(सूराः- 34आयतः- 16).

क़ुदरत का वही हाथ जिसने इब्तेदा में मुताफ़्ररिक़ ज़र्रात को जमा किया है इन्तेशार के बाद उन्हें दोबारा जमा फ़रमाऐगा तुम्हारे सामने इस तरह से मआद का नमूना पेश किया जाता है आया तुम फिर भी ताअज्जुब करते हो ?और कहते हो "आया जब हम मर जाऐगे और ख़ाक हो जाऐंगे तो उसके बाद दोबारा ज़िन्दा किये जाएगें ?(सूराः 37, आयतः 79)किताबे बन्दगी राज़े आफ़रीनश जिल्द अव्वल सः- 141).

मौत के बाद ज़मीन की ज़िन्दगी

अगर अब भी कोई तरदुद् या शुबा बाक़ी हो तो अपनो पाँव के नीचे ज़मीन का मुशाहिदा करो और देखो की सर्दी के मौसम में किस तरह मौत की हालत में रहती है और नबातात ख़ुश्क लकड़ी की सूरत इख़्तियार कर लेते हैं लेकिन मौसमें बाहार के शुरू होते ही उसको एक नई ज़िन्दगी अता होती है उससे आसारे हयात की बारिश होने लगती है और तरह तरह के पेड़ पौधे रंग बिरंगे मेवों के साथ पैदा होने लगते हैं ये है मौत के बाद की ज़िन्दगी।

(किताब राज़े आफ़रीनश जिल्दः- 1,सः- 141)

ख़ुदा ने जहन्नमियों को पैदा ही क्यों फ़रमाया

दूसरी बात ये कि जब ख़ुदा जानता था कि ये मख़लूक़ सआदत और नेकबख़्ती का रास्ता नहीं इख़्तियार करेगी तो उसे पैदा ही क्यों फ़रमाया ?ऐ इन्सान! मजमूई तौर पर तेरी ये चूँ ओ चरा तेरी हद से आगे है तुझे कहना ये चाहिये कि मैं नहीं जानता और ख़िलक़त के बुनियाद राज़ को समझने में क़ासिर हूँ न ये कि ऐतेराज़ करे और हिकमते इलाहिया का मुनकिर हो जाए अलबत्ता इस शुब्हे के जवाब में सिर्फ़ एक सादा सी मिसाल के ज़रिये बात को वाज़ेह करता हूँ अगर कोई साहबे इख़्तेदार और करीमुन्नफ़्स बादशाह अपने मुल्क में बसने वाले अफ़राद की तादाद के मुताबिक़ अपने ख़ज़ाने में तरह तरह के लिबास ,माल ओ ज़र और जवारात वग़ैरा जमा करके उसके बाद अपने ख़ज़ाने ,अपने महल और अपने मेहमानख़ाने के दरवाज़े खौल दे और आम तौर से इजाज़त दे दे कि जो शख़्स आना चाहे आ सकता है दर हाँलाकि ये जानता हो कि  इधर उधर कुछ ऐसे लोग भी लगे हुए हैं जो चाहते हैं कि इन मोहताजों को मोहताजख़ाने में ही मश्ग़ूल रक्खे लिहाज़ा इस तरह ज़रूरतमन्दों की एक जमाअत महरूम रह जाएगी मसअलन किसी ने आवाज़ दी कि वहाँ न जाओ ,ऐसा कोई ऐलान नहीं हुआ है चन्द लोग तो उन बदबख़्तों की बात सुनते और चन्द लोग नहीं सुनते हैं ऐसी सूरत में जबकि बादशाह जानता है कि कुछ लोग ख़राबानशीनीं अख़्तियार करेंगे तो क्या अपने ख़ज़ाने के दरवाज़े बन्द करद दे ?उसका काम तो दावत देना और नेमतों को हर तरफ़ पहुँचाना है अब अगर चन्द अफ़राद नहीं आते तो ख़ुद उन्हीं का नुकसान है। (किताबे बन्दगी राज़े आफ़रीनश जिल्दः- 1सः- 177).

अस्ल ग़रज़ रहमत और फ़ज़्ल को वुस्अत देना है

ऐ इन्सान! ख़ुदा जुमला अफ़रादे बशर को पज़ीराई के लिये दावत देता है हाँलांकि पहले ही से जानता है कि सब नहीं आऐंगें।

(इन्ना हदैनाहुस्सबील इम्मा शाकिरऊँ व इम्मा क़फ़ूरा. सूराः- 76,आयतः- 3).

गर जुमला कायनात काफ़िर गरदन्द............ बर दामने किबरियाश नशीनद गरद....

यानी  अगर सारी कायनात काफ़िर हो जाए तब भी उसकी दामने किबरीयाई पर गर्द नहीं पड़ेगी। इस मक़ाम पर एक लतीफ़ नुक़्ता और चन्द हक़ाएक़ हैं अगर ये सारे अफ़रादे बशर न आएं बल्कि सिर्फ़ एक शख़्स आ जाए तो ख़ुदा की क़ुदरतो रहमत और करामतो अज़मत के ज़हूर के लिये के काफ़ी है। मेरी ग़रज़ ये है कि रब्बुलइज़्ज़त की शान आमादा करना और दावते आम देना है अलबत्ता मख़लूक़ को चाहिये कि अपने इख़्तियार से आऐं और ग़नी होकर पलटें और ये ज़ौर ज़बरदस्ती से और ऐसे इख़्तियार से भी नहीं हों जिसमें शैतान का तसल्लुत काम कर रहा हो और हवा और हवस का हुजूम हो। बाज़ लोग इस मुक़ाम पर ये भी कहते हैं कि ये सब छोड़ दो दुनिया गुज़रती जा रही है नक़्द को हाथ से न दो ,कौन मुर्दा ज़िन्दा हुआ ?यानी फ़ुक़रा मोहताज ख़ाने को ना छोड़ आलमे माददा ओ तबीयत और दुनिया की मसर्रतो और ख़ुशियों को तरक न करो तुम्हें आख़िरत और बहिश्त से क्या सरोकार तुम्हें तो ये चाहिये कि हैवानात के जवार में रहो तुम्हे जवारे मोहम्मद ओ आले मोहम्मद (अ.स) से क्या काम ,ये है शैतान और उसकी सदा अब चूँकि ये शैतानी बातें हैं और बेशतर लोग उसकी बातें सुनते भी हैं तो क्या ख़ुदा अपनी बारगाहे फ़ज़्ल ओ करम को सबके लिये बन्द करदे तुम ये नहीं कह सकते कि ख़ुदा जानता था कि ये और वो नहीं आऐंगें तो उन्हें क्यों पैदा किया ये बचकाना बातें हैं हम आलमे ख़िलक़त के असरार में ख़्यालआराई नहीं कर सकते जिससे ये समझ सकें कि मलकुलमुलूक ने इस ख़िलक़त में कौन कौन सी हिकमतें और असरार ओ रमूज़ पोशीदा रखें हैं और इसमें कौन सी मसलेहतें कारफ़रमा हैं जिन्हें वो ख़ुद जानता है या उसकी दरगाह की मुर्क़रब हस्तियाँ ।

उमरे साद और मुल्के रै की शैतानी आवाज़

उमरे साद का मामला क्या था ?मुल्के रै के लिये एक नफ़्सानी आवाज़ और शैतानी दावत कि अगर तू करबला जाए और इमाम हुसैन (अ.स) से जंग करे तो हुकूमते रै तेरे क़ब्ज़ें में आ जाएगी उसने बहिश्त के लिये हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व)   की इतनी कसीर दावतों में से एक को भी क़ुबूल नहीं किया सिर्फ़ शैतानी दावत पर लब्बैक कही और वो भी किस तरह कि  इसे अपने ख़्याल में दुरूस्त क़रार देता है और मरज़ीए इलाही पर इस तरह क़लम फैरता है कि हुसैन (अ.स) को क़त्ल करके अपना मतलब हासिल करेगा उसके बाद अगर आख़िरत भी कोई चीज़ है तो तौबा कर लेगा रहमानी और शैतानी निदाऐं क़यामत तक के लिये थीं और हैं औ रहेगी ये दोनो निदाऐं हर शख़्स के लिये हैं बल्कि हर फ़र्द के लिये रोज़मर्रा ये दो क़िस्म की निदाऐं बाक़ी हैं।

(किताबे ज़िन्दगी राज़े आफ़रीनश सः 179).

मौत क़ुदरते ख़ुदावन्दी का नमूना

इस कल्मे की मिस्ल या इससे बालातर हज़रत अली (अ.स) का इरशाद है कि जनाज़ों की मानिन्द को मोऐज़ा नहीं है (वक़फ़ा व अआज़ा बिल मौत आयनतमूहाः- नहजुल बलाग़ा) अगर तुम देखना चाहते हो कि क़ुदरत सिर्फ़ ज़ाते ख़ुदावन्दी के लिये है तो जाँकनी के वक़्त पर ग़ौर करो (या मन फ़िल क़ुबूरे इबरतेही या मन फ़िल ममाते क़ुदरतेही ,जौशन कबीर) क्यों कि तुम ख़ुद भी इस मंज़िल से गुज़रने वाले हो एक पहलवान हर तरह की क़ुदरत की क़ुदरत रखने के बावजूद अब तक मक्खी को भी नहीं उड़ा सकता बोलने की पूरी सलाहियत रखता था लेकिन इस वक़्त कल्माए "लाइलाहा इल्लाह" कहना चाहता है मगर नहीं कह सकता या वसीयत करना चाहता है और नहीं कर सकता है तो शदीद दुशवारी के साथ (ला यस्तइउना तवसीयता वला इला अहलहुम यरजाऊन). इसके अलावा और कोई क़ुदरत भी इसके पास नहीं है बल्कि रोज़े अव्वल ही से नहीं थी वो आरज़ू करता है कि अपने घर पहुँच जाऐं लेकिन नहीं पहुँच सकता और किसी सहरा में किसी सवारी पर या किसी गली कूचे में मौत से दोचार होता है वो जितनी भी तमन्नाऐं रखता हैं उन पर कोई दूसरा इरादा कारफ़रमा है। तुम क्या हो ?और पहले से भी कुछ नहीं थे आज तुम्हारा इश्तेबाह और ग़लतफ़हमी खुल के सामने आ रही है तुम किस लिये इबरत हासिल नहीं करते कितनी ज़्यादा मशीनें और इंजन के ज़रिये चलने वाली सवारियाँ ऐसी हैं जो अपने मालिक के लिये वबाले जान और क़ातिल बन गईं कितनी ही इमारते ऐसी हैं जिन्हें तामीर करने वालों ने पूरी जांकही और मेहनत के साथ तामीर किया लेकिन उनके अन्दर से उनके जनाज़े निकालें गये अब तुम इस दुनिया के मज़ीद इश्तियाक़ और वाबस्तगी में कमी करो और आलमे बाक़ी के मुशताक़ बनो ख़ुदा किस किस तरह से मुतानब्बे और मुतावज्जे करता है लेकिन ये बशर इबरत हासिल करने के लिये तैय्यार नहीं (मा अक्सरूल इबर अक़्लुल ऐतेबार).

बनी हाशिम के नाम इमामे हुसैन (अ.स) का ख़त

गोया कि दुनिया दरअस्ल थी ही नहीं (वाक़ियन जिसने चालीस पचास साल की उम्र पाई हो वो ऐसा है कि अभी आया हो) लेकिन आख़िरत के लिये क़तअन फ़ना नहीं है हमेशा से थी और अब भी है ये इमाम हुसैन (अ.स) हैं जिनका दिल दूसरे आलम की तरफ़ मुतावज्जे है ,आपने करबला पहुँचने के मौक़े पर भी इन्हीं मज़ामीन का ख़त लिखा है (किताब क़ामिलुज़्ज़ियारात में रवायत है कि हज़रते सैय्यदुश्शुहदा ने एक ख़त अपने भाई हज़रते मुहम्मदे हनफ़िया को और दीगर बनी हाशिम को इस तरह लिखा "बिस्समिल्लाहिर्रमानिर्रहीम मिनल हुसैन इब्ने अली इला मुहम्मद इब्ने अली वमन क़ब्लहू मिन बनी हाशिम अम्मा बाद कानद दुनिया लम तकुन वा कानल आख़िरते लम तज़ला वस्सलाम ) ख़ुदावन्दा! वास्ता इमाम हुसैन (अ.स) का तू हमें अपनी बक़ा व शौक़ और आख़िरत की मुहब्बत इनायत फ़रमा। इमाम हुसैन (अ.स) मौत के इतने ज़्यादा मुश्ताक़ हैं कि चाहते हैं जल्द अज़ जल्द अपने नाना पैग़म्बरे ख़ुदा ,अपने पिदरे बुज़ुर्गवार अली ए मुरतज़ा (अ.स) ,अपनी माँ हज़रते फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.व.व)   और अपने भाई हज़रते हसने मुजतबा (अ.स) से जा मिलें हज़रते याक़ूब हज़रते यूसूफ़ की मुलाक़ात के किस क़दर मुशताक़ थे इसी तरह हज़रत इमाम हुसैन (अ.स) भी अपने छुटे हुए अक़रूबा को देखने के लिये बेचैन हैं और बाद को आपने इससे आगाह भी फ़रमा दिया कि मैं करबलाई हूँ जो शख़्स करब ओ बला की हवस रखता हो तो बिस्मिल्लाहः- सलल्लाहो अलैका या अबा अब्दुल्लाह! (जिस वक़्त इमाम ने मक्के से रवानगी का क़स्द फ़रमाया तो ये ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया "अलहम्दो लिल्लाह वा लाहौला विला क़ूवते इल्ला बिल्लाह वा सल्लाहो अला रसूलेही ख़तुल मौत अला वलेगे आदमा फ़ख़तुल क़लादत अला जीदुल फ़ता वमा औलेहनी इला इस्लाम फ़ी इश्तियाक़ा याक़ूबा इला यूसूफ़....... इला आख़िर नफ़्सुल महमूम सफ़्हाः- 87).किताब बन्दगी राज़े आफ़रीनश सः- 257ता 259.

बरज़ख़ में अज़ादारे हुसैन की फ़रियादरसी

तीसरा मौक़फ़ बरज़ख़ है यानी क़ब्र से क़यामत तक ,रूह के बदने मिसाली से मुताल्लिक़ होने के बाद अगर मरने वाला नेकूकारों में से है तो उसका मज़हर जवारे अमीरूलमोमिनीन अलैहिस्सलाम में वादिउस्सलाम है और अगर अशिक़या और बदकारों में से हो तो उसका महल्ले ज़हूर वादिये बरहूत में है अगर वो मुकम्मल तौर से पाक ओ पाकीज़ दुनिया से उठा है तो बरज़ख़ राहत के अन्दर मसर्रतो शादमानी और लज़्ज़त के आलम में है और अगर गुनाह या हुक़ूक़ुन्नास और मज़ालिम से आलूदा है तो दीवार में ठोंकी हुई मेख़ की मानिन्द फ़िशार में है आया कोई शख़्स ये दावा कर सकता है कि वो इस दुनिया से हतमि तौर पर पाकबाज़ उठेगा और बन्दों का किसी तरह का हक़ उसके ज़िम्मे न रह जाएगा ?आया उसने अपनी सारी ज़िन्दगी में किसी की आबरूरेज़ी नहीं की है ?किसी की ग़ीबत नहीं की है ?इन तमाम सूरतों में राहे चाराऐ तदबीर क्या है ?इस हदीसे मुबारक में है इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स) फ़रमाते हैं "वइन्नल मौज़ः क़ल्बहू फ़ीनल यफ़रा फ़ी" यानी जिस शख़्स का दिल हमारी मुसीबत में बेचैन हो तो मौत के वक़्त उसे ऐसी फ़रहत नसीब होगी जो क़यामे क़यामत तक बाक़ी रहेगी यानी उसे आलमे बरज़ख़ में कोई रंज ओ ग़म न होगा ।

(किताब सैय्यदुश्शोहदा अलैहिस्सलाम सः 83)

महशर में इमाम हुसैन (अ.स) के ज़ेरे साया

इमाम हुसैन (अ.स) पर गिरया करने का अच्छा असर क़यामत में भी ज़ाहिर होगा वरना ज़ाहिर है कि रोज़े क़यामत कैसा दिन है तुम इस दिन के बारे में आयते क़ुरानी के ज़रिये कम ओ बेश वाक़फ़ियत रखते ही होगे ख़ुदा ऐसे दिन की "फ़ज़्ऐ अकबर" यानी सबसे बड़ा ख़ौफ़ ओ हिरास से ताबीर फ़रमाता है इस रोज़ वहशतो इज़ितराब सभी को अपनी गिरफ़्त में ले लेगा और कोई शख़्स ऐसा न होगा जो मुज़्तरिब न हो (इन्ना ज़लज़लता साआ शैइन अज़ीम यौमा तरौनहा तज़हल कुल्ला मरज़ा अम्मा अरज़िअत वताज़ा कुल्ला ज़ात हमला हम्लुहा) रोज़े क़यामत अम्नो अमान के लिये इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स) से एक हदीसे मुबारक मनक़ूल है कि "मन तरका सइ फ़ी हवाएजे फ़ी यौमुल आशूरा" यानी रोज़े आशूर जो शख़्स अपने उमूर मुअत्तल रक्खे यानी कस्बे माश और अपने दीगर कामों के पीछे न जाऐ (जैसा कि बनी उमय्या अपनी कोर चशमी से इस दिन को मुतबर्रिक जानते थे) और अपनी रोज़ाना मइशत के लिये भी कोई काम अन्जाम न दे तो ख़ुदाए तआला उसकी दुनिया ओ आख़िरत की हाजतें बर लाएगा और जिस शख़्स के लिये रोज़े आशूरा हुज़्न ओ अन्दोह का दिन हो तो उसके लिये हमारा शाहिद भी जुमला है कि "जाअल्लाहो यौमुल क़यामत यौमुस्सुरूर" यानी इसके एवज़ फ़रदाए क़यामत जो सबके लिये हौल और ख़ौफ़ का दिन होगा उसके लिये ख़ुशी और सुरूर का दिन होगा। एक और सख़्त मौक़फ़ हिसाब का मौक़फ़ है उस वक़्त का तसव्वुर करो जब ख़ुदा फ़रमायेगा कि तुम ख़ुद अपना नामाए आमाल पढ़ो (किताबुका बेनफ़्सोका अल यौमे हसीबा) उस वक़्त हर शख़्स अपने छोटे से छोटे अमल को भी देखेगा अगर अमल नेक है तो उसकी जज़ा भी नेक और अगर बद है तो उसका बदला भी बुरा दिया जायेगा (फ़मन यामल मिसक़ाला ज़र्रातन ख़ैरन यरा वमन यामल मिसक़ाला ज़र्रतन शर्रन यरा) रही ये बात की मौक़फ़े हिसाब पर कितनी देर ठहरना होगा ?तो इसमें अशख़ास के हालात की मुनासिबत से फ़र्ख़ होगा जीस शख़्स का हिसाब तूल ख़ीचेगा तो ये चीज़ ख़ुद ही उसके लिये एक मुसीबत और सख़्त रूहानी अज़ाब होगी ,क्योंकि वो बेचारा इस जाँगुसल ज़ेहनी करब में मुब्तला होगा कि न जाने उसका अन्जाम कैसा होने वाला है ?वो नहीं जानता कि आया वो बहिश्ती है कि जहन्नमी ?लेकिन कुछ अफ़राद ऐसे भी हैं कि रवायत की नस के मुताबिक़ उस मुद्दत तक जब लोग हिसाब में मुब्तिला होगें ये अर्श के साये में रहेंगे और ये इमाम हुसैन (अ.स) के अज़ादार हैं ये उस वक़्त हज़रते सय्यदुश्शोहदा (अ.स) के जवार में होगें जब दूसरे लोग हिसाब देने की अज़ीयत झेल रहे होगें ये अपने आक़ा की ख़िदमत यानी हक़ीक़ी जन्नत की नेमतों से बहरामंद होंगे।

(किताबः- सैय्यदुश्शोहदा सः 84)

तकमीले ख़िलक़त के बाद रूह फूँकना

इसी बिना पर ख़ुदा के लिये एक दूसरी ख़िलक़त ज़रूरी है ,आलमे मिसाली और बरज़ख़ या क़यामत के अवालिम फ़ख़रूद्दीन राज़ी अपनी तफ़्सीर में निशाते सानिया या दूसरी ख़िलक़त के बारें में कहते हैं कि निशाता उख़रा इबादत है ,रहम के अन्दर जनीन की की तकमील के बाद उसके बदन में रूह फूँकने से............ ख़ुदाऐ तआला ने इन्सान को पहले ख़ाक से फ़िर नुत्फ़े से उसके बाद फ़िर अल्क़े से उसके बाद मज़ग़े से दुरूस्त किया उसके बाद हड्डी पैदा की और उसके बाद हडडी पर गोश्त चढ़ाया और जब ये जिस्मानी साख़्त चार माह की मुद्दत में पूरी हुई तो उस वक़्त दूसरी तख़लीक़ की जो इन्सान की रूह थी।

(सूराः- 23आयतः- 15)

इस मुक़ाम पर कहते हैं कि ये मानी ज़्यादा मुनासिब हैं कि हम रहम के अन्दर नुत्फ़े के इन्ऐक़ाद को बदन की तकमील तक निशाते ऊला और रूहे इन्सानी की ख़िलक़त को निशाते उख़रा समझें इस लिये कि इससे क़ब्ल की आयतें रूह की जिहत के बग़ैर सिर्फ़ ख़िलक़ते जिस्म के बारें में हैं।

(किताबे तफ़्सीर सूराऐ नजम (मैराज) सफ़्हाः- 270)

ज़िनाकार का बरज़ख़ी अज़ाब

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स) ने भी ये फ़रमाया है कि जो शख़्स किसी मुसलमान या यहूदी या नसरानी या मजूसी ,आज़ाद या कनीज़ से हरामकारी करे और उसकी तौबा न करे बल्कि इस गुनाह पर इसरार के साथ दुनिया से उठे तो ख़ुदाए तआला उसपर क़ब्र में अज़ाब के ऐसे तीन सौ दरवाज़े खोलता है कि हर दरवाज़े से आग के साँप ,बिच्छू और अज़दहे बरामद होते हैं उसके बाद फ़रमाते हैं कि वो रोज़े क़यामत तक जलता रहेगा।

(किताब गुनाहानेकबीरा जिल्द अव्वल सफ़्हाः- 202)