आलमे बरज़ख

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आलमे बरज़ख लेखक:
कैटिगिरी: क़यामत

आलमे बरज़ख

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

लेखक: शहीदे महराब आयतुल्लाह दस्तग़ैब शीराज़ी
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आलमे बरज़ख
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आलमे बरज़ख

आलमे बरज़ख

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

तासीर और तास्सुर की शिद्दत

इस दुनिया पर आलमे बरज़ख़ की बरतरी और इम्तियाज़ी ख़ुसूसियात में से तासीर की क़ुव्वत है हिकमते इलाहिया के बारे में एक इल्मी बयान हो चुका है जो आम इन्सानों के सामने पेश करने की चीज़ नहीं है लिहाज़ हम इस मौज़ू की तरफ़ सिर्फ़ एक इशारा करते हुए आगे बढ़ते हैं। ( मुदरिक यानी इदराक करने वाला और इदराक होने वाला जिस क़दर ज़्यादा लतीफ़ होगा इदराक भी ज़्यादा क़वी होगा)

ये मेवे ,शीरीनियाँ और लज़्ज़तें जो हम चखने और खाने से हासिल करते हैं आलमे बरज़ख़ के मेवों ,शीरीनियों और लज़्ज़तों में से सिर्फ़ एक क़तरा हैं इनकी अस्ल ओ बुनियाद उसी मुक़ाम पर है- अगर हुरैन की सूरत का एक गोशा भी खुल जाए तो आँखें खीरा हो जाऐं हूर का नूर अगर इस आलम में आ जाऐ तो आफ़ताब के नूर पर ग़ालिब आ जाए हक़ ये है कि जमाले मुतलक़ उसी जगह पर है ,परवरदिगारे आलम क़ुराने मजीद में फ़रमाता हैः

जो कुछ ज़मीन पर है उसे हमने उसके लिये ज़ीनत क़रार दिया है लेकिन ऐसी ज़ीनत जो बाएसे इम्तिहान है (सूराः- 18,आयतः- 6)

ताकि छोटे को बड़े से और नादान बच्चे को अक़्लमन्द से तमीज़ दी जा सके और मालूम हो जाए कि कौन शख़्स इस बग़ीचे से शाद ओ मसरूर होता है और कौन इसके फ़रेब में नहीं आता बल्के लज़्ज़ते हक़ीक़ी ,जमाले वाक़ई और सच्ची ख़ुशी की तलाश में रहता है।

इजमाली तौर पर मेरा मक़सदे बयान ये है कि तासीर की शिद्दत और क़ूवत आलमे बरज़ख़ में है जिसका इस दुनिया पर क़यास नहीं किया जा सकता बाज़ अवक़ात उस आलम की हक़ीक़त ओ असलियत के कुछ नमूने सामने भी आ जाते हैं जो दूसरों के लिये बायसे इबरत हैं मिनजुमला उनके मरहूम निराक़ी ने ख़्ज़ाएन में अपने एक मूवस्सिक़ और मोतमद दोस्त का ये बयान नक़्ल किया है कि मुझे अपनी जवानी की उम्र में अपने बाप और चन्द रफ़ीक़ों के हमराह अस्फ़ेहान में ईदे नौरोज़ के मौक़े पर दीद और बाज़दीद के लिये जाना था चुनाँचे एक सहशन्बा को अपने एक रफ़ीक़ की बाज़दीद के लिये गया जिसका मकान क़बरिस्तान के क़रीब था लोगों ने कहा कि वो घर में नहीं हैं ,हम लोग एक लम्बा रास्ता तय करके आय थे लिहाज़ा ख़स्तगी दूर करने के लिये और अहले क़ुबूर की ज़ियारत करने के लिये क़ब्ररिस्तान में चले गये और वहाँ थोड़ी देर के लिये बैठ गये रफ़ीक़ों में से एक शख़्स ने क़रीब की एक क़ब्र की तरफ़ रूख़ करके मिज़ाह के तौर पर कहा कि ऐ साहबे क़ब्र ! ईद का ज़माना है क्या आप हमारा ख़ैर मक़दम नहीं करेंगे ?नागहाँ एक आवाज़ आई कि एक हफ़्ते बाद सहशन्बे को इसी जगह आप सब लोग हमारे महमाने होंगे इस आवाज़ से हम सभी को वहशत पैदा हो गई और हमने ख़्याल किया कि आईन्दा सहशन्बे से ज़्यादा ज़िन्दा नहीं रहेगें लिहाज़ा अपने कामों की दुरूस्ती और वसीयत वग़ैरा में मशग़ूल हो गए लिहाज़ा मौत के आसार ज़ाहिर नहीं हुए सहशन्बे को थोड़ा दिन चढ़ने के बाद हम लोग जमा हुए और तय किया कि उसी क़ब्र पर चलना चाहिये शायद उस आवाज़ से हमारी मौत मुराद नहीं थी जिस वक़्त हम क़ब्र पर पहुँचे तो हम में से एक शख़्स ने कहा ऐ साहबे क़ब्र ! अब अपना वादा पूरा करो ! एक आवाज़ आई कि तशरीफ़ लाईये (इस जगह ये बात क़ाबिले तवज्जोह है कि ख़ुदाए तआला कभी कभी निगाहों के सामने हायल और माने दीदारे बरज़ख़ी के परदे हटा देता है ताकि इबरत हासिल हो) उस वक़्त हमारी आँख़ों के सामने का मन्ज़र बदल गया और मलकूती आँख खूल गई हमने देखा कि एक इन्तेहाई सरसब्ज़ ओ शादाब और ख़ुशनुमा बाग़ ज़ाहिर हुआ ,उसमे साफ़ ओ शफ़ाफ़ पानी की नहरें जारी हैं ,दरख़्तों पर हर क़िस्म के और हर फ़स्ल के मेवे मौजूद हैं और उन पर तरह तरह के ख़ुशअलहान परिन्दे नवासन्जी कर रहे हैं बाग़ के दरमियान हम एक शानदार और आरास्ता इमारत में पहुँचे तो वहाँ एक शख़्स इन्तेहाईं हुस्न ओ जमाल और सफ़ाई के साथ बैठा हुआ था और बहुत ही ख़ुबसूरत ख़ादिमों की एक जमाअत उसकी ख़िदमत में मसरूफ़ थी जब उसने हमको देखा तो अपनी जगह से उठ के उज़्रख़्वाही की वहाँ हमने अनवाओ अक़साम की शीरीनियाँ ,मेवे और ऐसी चीज़े देखीं जिन्हें कभी दुनिया में न देखा था बल्कि उनका तसव्वुर भी नहीं किया था।

मेरा अस्ल मक़सूद उनका ये जूमला है कि जिस वक़्त हमने उन्हें खाया तो वो इतने लज़ीज़ थे कि हमने कभी ऐसी लज़्ज़त नहीं चक्खी थी और हम जिस क़दर भी खाते थे सेर नहीं होते थे यानी फिर भी खाने की ख़्वाहिश बाक़ी रहती थी मुख़्तलिफ़ अक़साम के दीगर मेवे और शीरीनियाँ भी लाई गईं और साथ ही तरह तरह की दूसरी ग़िज़ाऐं भी मौजूद थी जिनके ज़ाएक़े मुख़्तलिफ़ थे।

एक साएत के बाद हम लोग उठे कि देखें अब क्या सूरत पेश आती है उस शख़्स ने बाग़ के बाहर तक हमारी मशायत की मेरे बाप ने उससे पूछा कि तुम कौन हो कि ख़ुदाए तआला ने तुम्हें ऐसी वसीअ और शानदार जगह इनायत फ़रमाई है कि अगर चाहो तो सारी दुनिया को अपना मेहमान बना सकते हो और ये कौन सी जगह है ?उसने कहा मैं तुम्हारा हमवतन और फ़ुलाँ मोहल्ले का फ़ुलाँ क़स्साब हूँ हम लोगों ने कहा इतने बुलन्द दरजात और मक़ामात मिलने का सबब क्या है ?उसने जवाब दिया कि दो सबब थे एक ये कि मैंने अपनी दुकानदारी में कभी कम नहीं तौला था और दूसरा ये कि मैंने अपनी सारी ज़िन्दगी में कभी अव्वल वक़्त की नमाज़ तरक नहीं की थी अगर गोश्त को तराज़ू में रख चूका होता था और मोअज़्ज़िन कि सदाए "अल्लाहो अकबर" बलन्द होती थी तो मैं उसे वज़न नहीं करता था और नमाज़ के लिये मस्जिद चला जाता था इसी लिये मरने के बाद मुझे ये मक़ाम दिया गया है। गुज़िश्ता हफ़्ते जब तुमने वो बात कही थी तो उस वक़्त तक मुझे दावत देने की इजाज़त हासिल न थी चुनाँचे इस हफ़्ते के लिये मैंने इज़्न हासिल किया। इसके बाद हम लोगों में से हर फ़र्द ने अपनी मुद्दते उम्र के बारे में सवाल किया और उसने जवाब दिया। मिनजुमला इनके एक उस्तादे मकतब के लिये कहा कि तुम नव्वे साल से ज़्यादा की उम्र पाओगे चुनाँचे वो अभी ज़िन्दा हैं और मेरे लिये कहा कि तुम फ़ुलाँ कैफ़ियत और हालत में रहोगे और तुम्हारी ज़िन्दगी में अब मज़ीद दस पन्द्रह साल बाक़ी रह गऐ हैं उसके बाद हमने ख़ुदा हाफ़िज़ कहा और उसने हमारी मशायत की हमने फ़िर पलटना चाहा तो दफ़अतन नज़र आया कि हम उसी पहली जगह क़ब्र के ऊपर बैठे हुए हैं।

(किताबे मआद सफ़्हाः 32)

हालाते आख़िरत के बारे में एक रवायत

जिस वक़्त मौलाऐ मुतक़्कीयान अली इब्ने अबी तालिब (अ.स) की मादरे गिरामी जनाबे फ़ातिमा बिन्ते असद (स.अ. )ने वफ़ात पाई तो अमीरूल मोमिनीन रोते हुए हज़रत पैग़म्बरे ख़ुदा (स.अ.व.व )के पास आए और कहा कि मेरी माँ ने इस दुनिया से इन्तेक़ाल फ़रमाया हज़रत रसूले ख़ुदा ने फ़रमाया कि मेरी माँ ने रेहलत की है इस लिये की वो मोअज़्ज़मा पैग़म्बर से बहुत ही मुहब्बत करती थी और एक मुद्दत तक आँ हज़रत के साथ बिल्कुल माँ की तरह सुलूक किया था। कफ़न देने के वक़्त आँ हज़रत अपना पैराहन लाए और फ़रमाया कि उन्हें पहना दिया जाए क़ब्र के अन्दर ख़ुद थोड़ी देर के लिये लेटे और दुआ फ़रमाई फिर दफ़्न के बाद सिरहाने खड़े हुए और कुछ देर बाद बलन्द आवाज़ से फ़रमाया "अबनोका अबनोका वला अक़ील वला जाफ़र" लोगों ने पैग़म्बरे ख़ुदा से पूछा कि इन आमाल का सबब क्या था ?तो फ़रमाया कि एक रोज़ क़यामत की बरहनगी का ज़िक्र हुआ तो फ़ातिमा बिन्ते असद रोने लगीं और मुझ से ख़्वाहिश की मैं अपना पैराहन उन्हें पहनाऊँ वो फ़िशारे क़ब्र से भी ड़रती थीं इसी वजह से मैं उनकी क़ब्र में लेट गया था और दुआ की थी (ताकि ख़ुदा उन्हें फ़िशारे क़ब्र से महफ़ूज़ रक्खे) लेकिन मैंने जो ये कहा था कि (अबनोका..........) तो उसका सबब ये था कि जब फ़रिश्ते ने उनसे ख़ुदा के बारें में सवाल किया तो उन्होंने कहा अल्लाह ,पैग़म्बर के बारे में पूछा तो कहा मोहम्मद ! लेकिन जब इमाम के बारे में सवाल हुआ तो उन्हें जवाब में तरदुद हुआ इसी लिये मैंने कहा कह दो तुम्हारा फ़रज़न्द अली ,न जाफ़र और न अक़ील

(मालूम होता है कि ये बात इस लिये पेश आई कि ये वाक़िया ग़दीरे ख़ुम और ख़ीलाफ़ते अमीरूल मोमिनीन के सरीही ऐलान से क़ब्ल पेश आया था)  (इस रवायत की सेहत मोहताजे जुस्तुजू है क्योंकि जनाबे फ़ातिमा बिन्ते असद जैसी ख़ातूने इमामत ओ रिसालत पनाह के लिये मुमकिन ही नहीं कि वो हज़रत अली (अ.स) की माँ होने के बावजूद इस मंज़िल से गुज़रें जबकि आम मुहिबे अहलेबैत की शान इस से बुलन्द है और रसूल के लिये ये मुमकिन ही नहीं की वो इमामते अली के ऐलान के लिये मना फ़रमाऐं जबकि ये एक वाजबी अम्र हैः- हिन्दी मुतारज्जिम)

इस मक़ाम पर काफ़ी गुफ़्तगू और वाज़ ओ नसीहत की जा सकती है हज़रते फ़ातिमा बिन्ते असद जैसी जलीलुल क़दर औरत अज़ीमुलमरतबत ख़ातून ऐसी मोहतरम बीबी जो शरीफ़तरीन मक़ाम ख़ानाऐ काबा में तीन रोज़ तक ख़ुदा की मेहमान रह चुकी थीं ऐसी मुख़्तदरा जिनका शिकमे मुबारक हज़रत अमीरूलमोमिनीन के जिस्मे मुत्ताहर की परवरिश का अहल और महल था और ये दूसरी औरत थीं जो पैग़म्बरे ख़ुदा पर ईमान लाईं थीं अपनी तमामतर इबादतों के बावजूद आख़िरत की सख़्तियों से इस क़दर ड़रती थीं और रसूले ख़ुदा स 0अ 0भी उनके साथ ऐसा मुआमला फ़रमाते हैं तो हमें सोचना चाहिये कि हमारा क्या हाल होगा ?

अब हम अपने अस्ल मतलब पर वापस आते हैं कि मुख़बिरे सादिक़ यानी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.व.व) फ़रमाते हैं कि सवाल ओ जवाब फ़िशारे क़ब्र और बरहन्गी ,क़यामत वग़ैरा बरहक़ हैं।

(किताब मआद सफ़्हाः 42)

जिस्मानी बदन में रूह की तासीर

हर चन्द बरज़ख़ में नेमत वा ख़ुशहाली या अज़ाब व उक़ाब रूह के लिये होता है लेकिन रूह की क़ूवत के तहत बदने ख़ाकी भी मुतास्सिर होता है जैसा कि कभी कभी हयाते रूहानी की शिद्दत के असर से ये बदन क़ब्र के अन्दर भी बोसीदा नहीं होता और हज़ारों साल गुज़रने के बाद भी तरो ताज़ा रहता है। इस मौज़ू के शवाहिद भी बहुत हैं मसअलन इब्ने बाबुविया अलैहिर्रहमा के डेढ़ सौ साल बाद क़ब्ल तक़रीबन फ़तेह अली शाह के दौर में जब तामीराती काम चल रहा था और उस सिलसिले में लोग सरदाब के अन्दर दाख़िल हुए तो देखा कि उन बुज़ुर्गवार का जनाज़ा बिल्कुल तरो ताज़ा है और कफ़न भी क़तअन बोसीदा नहीं हुआ है बल्कि उससे ज़्यादा अजीब बात ये थी कि नौ सौ साल से ज़्यादा गुज़रने के बाद भी आपके नाख़ूनों से हिना का रंग बरतरफ़ नहीं हुआ था इसी तरह किताब "रौज़ातुल जिन्नात" में लिखते हैं कि " 1238"के दौरान बारिश की वजह से शैख़ सुदूक़ अलैहिर्रहमा के मक़बरे में रख़ना और ख़राबी पैदा हो गई थी लिहाज़ा लोगों ने चाहा कि उसकी इस्लाह और तामीर कर दें चुनाँचे जब क़ब्रे मुबारक के सरदाब में पहुँचे तो देखा कि उनका जिस्मे मुताहर क़ब्र के अन्दर बिल्कुल सही और सालिम है दरहाँलाकि वो तनो मंद और तन्दरूस्त थे और उनके नाख़ूनों पर ख़िज़ाब का असर था ये ख़बर तेहरान में मशहूर हो गई और फ़तह अली शाह के कानो तक पहुँची तो ख़ुद बादशाह उल्मा की एक जमाअत और अपने अरकाने दौलत के हमराह तहक़ीक़ के लिये गया और उस वाक़िये की सूरते हाल उसी तरह पाई जिस तरह सुनी थी चुनाँचे बादशाह ने हुक्म दिया कि उस शिग़ाफ़ या सूराख़ को बन्द करके इमारत की तजदीद और आईनाबंदी की जाए ।

(किताबे मआद सफ़्हाः- 43)

बरज़ख़ कहाँ हैं ?

मुमकिन है कि बाज़ लोगों के ज़ेहन में ये सवाल पैदा हो कि इस क़दर तूल और तफ़्सील के साथ आलमे बरज़ख़ कहाँ वाक़ेअ है ?यक़ीनन हमारी अक़्ल इस की हक़ीक़त को समझने से क़ासिर है अलबत्ता रवारयत में कुछ तशबीहें वारिद हुईं हैं मिसाल के तौर पर ज़मीनों और आसमानों समेत ये सारा आलमे दुनिया आलमें बरज़ख़ की निस्बत से ऐसा ही है जैसे किसी बियाबान के अन्दर कोई अंगूठी पड़ी हो जब तक इन्सान इस दुनिया में है सेब के अन्दर एक कीड़े या शिकमे मादर के अन्दर एक बच्चे की मानिन्द है जिस वक़्त उसे मौत आजाती है और आज़ाद हो जाता है तो कहीं और नहीं चला जाता बल्कि क़तअन इसी आलमे वुजूद में रहता है लेकिन उसकी महदूदियत ख़त्म हो जाती है इसलिये कि ज़मानो मकान की क़ैद नहीं होती ,ये क़यूद तो इस दुनिया यानी आलमे माददा और तबीयत की चीज़ें हैं।

अगर शिकमे मादर के अन्दर बच्चे से कहा जाए कि तुम्हारे इस मसकन से बाहर एक ऐसी वसीए दुनिया मौजूद है जिसके मुक़ाबिले में ये शिकमे मादर कोई हक़ीक़त नहीं रखता तो वो इसको समझने से क़ासिर होगा।

इसी तरह हमारे लिये अवालिमे आख़िरत क़ाबिले इदराक है कि कोई शख़्स नहीं जानता कि उसके लिये कौन सी चीज़ें मुहय्या की गईं हैं। (सूराः- 32आयतः- 127)

हाँ इतना ज़रूरी है कि चूँकि मुख़बिरे सादिक़ ने ख़बर दी है लिहाज़ा हम भी उसकी तस्दीक़ करते हैं ,आलमे बरज़ख़ इस दुनिया पर मुहीत है जिस तरह ये दुनिया रहमे मादर का एहाता किये हुए है और इससे बेहतर ताबीर नहीं की जा सकती। (किताबे मआद सफ़्हाः- 50)

रूहें आपस में मुहब्बत करती हैं

असबग़ बिन नबाता कहते हैं कि मैंने अपने मौला अमीरूल मोमिनीन अलैहिस्सलाम को देखा कि कूफ़े के दरवाज़े में सहरा की जानिब रूख़ किये खड़े हैं और गोया किसी से गुफ़्तगू फ़रमा रहे हैं लेकिन मैंने किसी दूसरे को नहीं देखा मैं भी खड़ा हो गया यहाँ तक कि काफ़ी देर तक ख़ड़ा रहने से थक कर बैठ गया और जब थकान दूर हुई तो दोबारा ख़ड़ा हो गया इसी तरह फिर थक कर बैठा और खड़ा हुआ लेकिन अमीरूलमोमिनीन (अ.स) उसी तरह खड़े और गुफ़्तगू में मसरूफ़ रहे मैंने अर्ज़ किया या अमीरूलमोमिनीन किस से गुफ़्तगू फ़रमा रहे हैं ?तो फ़रमाया कि मेरी ये बात चीत मोमिनीन के साथ उन्सो मुहब्बत है मैंने अर्ज़ किया मोमिनीन ?तो फ़रमाया हाँ ! जो लोग इस दुनिया से चले गये हैं वो यहाँ मौजूद हैं मैंने अर्ज़ किया सिर्फ़ रूहें हैं या उनके अजसाम भी हैं ?फ़रमाया रूहें हैं ,अगर तुम उन्हें देख सकते हो तो देखते कि किस तरह आपस में हल्क़ा बाँधे हुए बैठे हैं एक दूसरे से उन्स ओ मोहब्बत रखते हैं बातें करते हैं और ख़ुदा को याद करते हैं। (किताबे मआदः- 50- 51)

वादिउस्सलाम रूहों का घर हैं

दीगर अहादीस में वारिद हुआ है कि दुनिया के मशरिक़ ओ मग़रिब में जो मोमिन भी रहलत करता है उसकी रूह क़ालिबे मिसाली में जगह पाने के बाद जवारे अमीरूल मोमिनीन (अ.स) में वादिउस्सलाम के अन्दर ज़ाहिर हती है बअल्फ़ाज़े दीगर नजफ़े अशरफ़ मलकूते उलिया की नुमाईशगाह है जैसा कि काफ़िर के लिये सहराऐ बरहूत है ये यमन के अन्दर एक हैबतनाक वादी है जिसमें न घास उगती है न कोई परिन्दा वहाँ से गुज़रता है यही मलकूते सिफ़ला का महल्ले ज़ुहूर है तुमने हज़रत अली (अ.स) के जवार मे जवार में रहने की अहमियत का जो ज़िक्र सुना है वो रूहानी मुजावरत के बारे में है हर चन्द उसका बदन दूर हो अमीरूल मोमिनीन से नज़दीकी सिर्फ़ इल्म और अमल के ज़रिये मुमकिन है किसी शख़्स से अगर एक गुनाह सरज़द होता है तो वो उसी के अन्दाज़े के मुताबिक़ आप से दूर हो जाता है अगर रूह हज़रत अली (अ.स) के साथ हो तो जस्दे ख़ाकी भी नजफ़े अशरफ़ में दफ़्न होता है और कितनी बेहतर है ये अज़ीम मआदत लेकिन ख़ुदा न करे कि किसी का जिस्म तो नजफ़े अशरफ़ पहुँच जाए लेकिन उसकी रूह वादिये बरहूत में अज़ाब झेल रही हो। इसी बिना पर पूरी कोशिश करना चाहिये कि रूहानी इत्तीसाल क़वी रहे अलबत्ता जिस्म का वादिउस्सलाम में दफ़्न होना भी बेअसर नहीं है बल्कि पूरी तासीर रखता है क्योंकि ये भी हज़रत अमीरूल मोमिनीन की इनायत से एक तरह का तवस्सुल है।

हज़रत अमीरूल मोमिनीन की इनायत के ज़ैल में किताबे मदीनतुल मआजिज़ के अन्दर मनक़ूल है कि एक रोज़ मौलाऐ मुतक़्क़ीयान अपने चन्द असहाब के साथ दरवाज़ाऐ कूफ़ा की पुश्त पर तशरीफ़ फ़रमा थे ,आपने एक मरतबा नज़र उठाई और फ़रमाया जो कुछ मैं देख रहा हूँ तुम लोग भी देख रहे हो ?लोगों ने अर्ज़ किया नहीं या अमीरूल मोमिनीन ! आपने फ़रमाया कि मैं देख रहा हूँ कि दो शख़्स एक जनाज़े को ऊँट पर रखे हुए ला रहे हैं उन्हें यहाँ पहुँचने में तीन दिन लगेंगे तीसरे रोज़ हज़रत अली (अ.स) और आपके असहाब इस इन्तेज़ार में बैठे हुए थे कि देखें क्या सूरते हाल पेश आती है सबने देखा कि दूर से एक ऊँट ज़ाहिर हुआ जिसके ऊपर एक जनाज़ा रक्खा हुआ था एक शख़्स ऊँट की मिहार पकड़े हुए है और एक शख़्स ऊँट के पीछे चल रहा है। जब क़रीब पहुँचे तो हज़रत ने पूछा ये जनाज़ा किस का है और तुम लोग कौन हो और कहाँ से आ रहे हो ?उन्होंने अर्ज़ किया कि हम लोग यमन के रहने वाले हैं और ये जनाज़ा हमारे बाप का है उन्होंने वसीयत की थी कि मुझे ईराक़ की तरफ़ ले जाना और कूफ़े में दफ़्न करना ,हज़रत ने फ़रमाया ,आया तुम लोगों ने इसका सबब भी दरयाफ़्त किया था ?उन्होंने कहा कि हाँ ! हमारा बाप कहता था कि वहाँ एक ऐसी हस्ती दफ़्न होगी जो अगर सारे अहले महशर की शफ़ाअत करना चाहे तो कर सकती है। हज़रत अली (अ.स) ने फ़रमाया ,सच कहा उसने ,फिर दो मरतबा फ़रमाया मैं वही हूँ !

मुहद्दिसे क़ुम्मी ने मफ़ातिहुल जिनान के अन्दर इस बारे में कि जो शख़्स हज़रते अमीरूलमोमिनीन की क़ब्रे मुबारक की पनाह ले तो उस से बहरामंद होगा ,एक अच्छी और मुनासिब मसल बयान की है ,इमसाले अरब में है कि कहते हैं "अहम्मा मिन मजीरूल जराद" यानी अपनी पनाह में आने वाले के लिये फ़ुलाँ शख़्स की हिमायत टिडडियों को पनाह देने वाले से ज़्यादा है और किस्सा इसका ये है कि क़बीलाए तै का एक बदिया नशीन शख़्स जिसका नाम बदलज इब्ने सवेद था एक रोज़ अपने ख़ेमे में बैठा हुआ था उसने देखा कि क़बीलाऐ तै के लोगों का एक गिरोह आया जो अपने हमराह कुछ ज़ुरूफ़ और बड़े थैले भी लाया था ,उसने पूछा क्या ख़बर है ?उन्होंने कहा ,तुम्हारे ख़ेमे के चारो तरफ़ बेशुमार टिडडियाँ उतरी हैं हम उन्हें पकड़ ने के लिये आये हैं ,मदलज ने ज्यों ही ये बात सुनी उठकर अपने घोड़े पर सवार हुआ ,नैज़ा हाथ में लिया और कहा ,ख़ुदा की क़सम जो शख़्स भी इन टिडडियों ताअरूज़ करेगा मैं उसे क़त्ल कर दूगाँ आया ये टिडडियाँ मेरे जवार और मेरी पनाह में होंगी और तुम उन्हें पकड़ लोगे ?ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता वो इसी तरह से बराबर उनकी हिमायत करता रहा ,यहाँ तक कि धूप तेज़ हुई और टिडडियाँ वहाँ से उड़ के चली गईं उस वक़्त उसने कहा कि ये टिडडियाँ मेरे जवार से चली गईं अब तुम जानों या वो जानें -- -- चुनाँचे फ़ी जुमला ये बदीही अम्र है कि अगर कोई शख़्स अपने मौलाऐ कायनात के जवार में पहुँचा दे और आप से पनाह तलब करे तो क़तअन आपकी हिमायत से फ़ैज़याब होगा। (किताबे मआद सफ़्हाः- 51)

क़ब्र से रूह का ताअल्लुक़ बहुत गहरा है

मुहद्दिसे जज़ाएरी अनवारे नोमानिया के आख़री सफ़्हात में कहते हैं कि अगर तुम कहो कि जब रूहें क़ालिबे मिसाली में और वादिउस्सलाम के अन्दर हैं तो उनकी क़ब्रों पर जाने का हुक्म किस लिये दिया गया है ?और वो अपने को ज़ायर किस तरह समझ लेती हैं दर हाँलाकि वो यहाँ मौजूद नहीं हैं ?तो हम जवाब में कहेंगे कि इमामे जाफ़र सादिक़ (अ.स) से रवायत है कि रूहें हर चन्द वादिउस्सलाम में हों लेकिन क़ब्रों के मक़ामात उनके अहाताऐ इल्मिया के अन्दर होते हैं जिनकी वजह से वो अपने क़ुबूर पर आने वालों और ज़ियारत करने वालों को जान लेती हैं ,इमाम ने अरवाह की तशबीह आफ़ताब से दी है यानी जिस तरह आफ़ताब ज़मीन पर नहीं बल्कि आसमान पर है लेकिन उसकी शुआऐं ज़मीन के हर मक़ाम का अहाता किये हुऐं हैं इसी तरह अरवाह का एहातऐ इल्मिया है हक़ीर कहता है कि जिस तरह शुआऐं आफ़ताब का ज़हूर उस मक़ाम पर क़तअन दीगर मक़ामात से ज़्यादा होता है जहाँ कोई आईना और बिल्लौर मौजूद हो उसी रूह की तवज्जो और एहाता अपनी क़ब्र पर दूसरी जगह से ज़्यादा होता है क्यों कि उस बदन से उसकी दिलचस्पी और तआल्लुक़ होना ही चाहिये जिसने सालहा साल उसके लिये काम किया है और इसी बयान से उस शख़्स का जवाब भी मिल जाता है जो ये कहता है कि इमाम तो हर जगह हाज़िर ओ नाज़िर हैं लिहाज़ा उनकी क़ब्रे मुबारक की ज़ियारत के लिये जाना क्या ज़रूरी है ?क्योंकि इस मक़ाम और दीगर मक़ामात में कोई फ़र्क़ नही पड़ता।

इसमें कोई शक नहीं कि आइम्मा और बुर्ज़ुगे दीन की क़ब्रों के मक़ामात हमेशा उनकी अरवाहे मुक़द्दसा के लिये मुरिदे तवज्जो ,बरकतों और ख़ुदा की रहमतों के लिये महल्ले नुज़ूल और मलाएका की आमद ओ रफ़्त की मंज़िलें हैं अगर कोई शख़्स चाहता है कि उसे इन बुर्ज़गाने दीन के बाबे करम से पूरा फ़ैज़ हासिल हो तो उसे चाहिये कि इन मक़ामाते मुक़द्दसा से ग़ाफ़िल न रहे और जिस तरह से हो सके अपने को वहाँ तक पहुँचाऐ। (किताबे मआद सफ़्हाः 53)

दूसरा शुब्हा और उसका जवाब

बाज़ लोग एक और दूसरा शुब्हा पैदा करते हैं और कहते हैं कि मरने के बाद जब इन्सान की रूह एक बदने मिसाली के नाम से एक लतीफ़ बदन इख़्तियार कर लेती है जो इसी बदन की मानिन्द होता है (जैसा कि बयान हो चुका है) इसी बदन के साथ सवाब ओ उक़ाब का सामना करता है हाँलाकि जब इन्सान ने अपने माद्दी और ख़ाकी जिस्म के साथ इबादत की है तो क्या वजह है कि उसका दूसरे बदन को मिले ?या इसी क़ब्र के अन्दर बोसीदा और सड़े हुए जस्दे ख़ाकी के ज़रिये गुनाह किये हैं तो वो बदने मिसाली के लिये अज़ाब में मुब्तला हो ?इस सवाल के चन्द जवाब पेश किये जाते हैः

जैसा कि अल्लामा मजलिसी अलैहिर्रहमा बयान फ़रमाते हैं बदने मिसाली कोई ख़ारजी चीज़ नहीं है जिसे मौत के बाद क़ब्र पर लाया जाए और मसअलन उससे कहा जाए कि रूह के साथ रहो अब तुम ही उसका बदन हो! बल्कि बदने मिसाली एक लतीफ़ बदन है जो इस वक़्त भी इन्सान के साथ है हर रूह दो बदन रखती है एक लतीफ़ और एक कसीफ़ उसने इबादत भी दोनों के साथ की है और मासियत भी दोनो के साथ ,ये समझाने के लिये कि ख़्वाबे माददी की हालत में दोनों एक दूसरे से जुदा रहते हैं इस तरफ़ मुतावज्जे करना बेमहल न होगा कि इन्सान जो कुछ ख़्वाब में देखता है वो इसी मिसाली बदन के ज़रिये होता है रास्ता चलना और गुफ़्तगू करना सब बदने मिसाली से अन्जाम पाता है ,एक चशमे ज़दन में करबला पहुँच जाता है ,मशहद चला जाता है और सारे मशरिक़ और मग़रिब का सफ़र कर सकता है इसके लिये कोई हदबन्दी नहीं है इसी बिना पर मदने मिसाली हमेशा इन्सान के साथ रहता है। मजलिसी अलैहिर्रहमा का ये बयान बहुत मुहक़िक़ाना है और इसके लिये कसरत से शवाहिद भी मौजूद हैं।

दूसरी सूरत ये है कि रूहें इन्सानी मौत के बाद उसके दुनयावी जिस्म के मिस्ल एक सूरत इख़्तियार कर लेती है ,न ये कि एक ख़ारजी बदन से मुताल्लिक़ होती है बल्कि रूह की सूरत जिस्मे इन्सानी की हम शक्ल होती है अब तुम उसे ख़्वाह बदने मिसाली कहो या क़ल्बे बरज़ख़ी या रूह लेकिन चूँकि ये लतीफ़ है लिहाज़ा उन्सरी और माददी आँख इसका मुशाहिदा नहीं कर सकती मुख़्तसर ये कि ये रूह थी जिसने दुनिया में मासियत की और यही रूह बाद को अज़ाब में भी मुब्तला की जाऐगी ,अब ये बदने मिसाली से वाबस्ता हो या बज़ाते ख़ुद मुस्तक़िल हो और फिर क़यामत में इसी माद्दी जिस्म के साथ महशूर हो जैसा कि आईन्दा ज़िक्र होगा। (किताबे मआद सफ़्हाः- 53)

बरज़ख़ का सवाब ओ अज़ाब क़ुरआन में

(1).अन्नारो यारेजूना अलैहा--------- इल्ला आख़िर सूराः- 40,आयतः- 49,यानी वो सुब्ह शाम आग के ऊपर पेश किये जाऐगें और जिस रोज़ क़यामत बरपा होगी (तो हुक्म होगा की) आले फ़िरऔन को सख़्त तरीन अज़ाब में दाख़िल करो मिन जुमला उन आयात के जो क़ुराने मजीद में अज़ाबे बरज़ख़ पर दलालत करती हैं ये आयऐ शरीफ़ा भी है जो फ़िरऔन वालों के बारे में हैं।

जब फ़िरऔन के साथी दरियाऐ नील में ग़र्क होकर हलाक हुए उसी वक़्त से हर सुब्ह शाम आग के ऊपर पेश किये जाते हैं यहाँ तक कि क़यामत क़ायम हो और वो सख़्त तरीन अज़ाब में दाख़िल किये जाऐं। इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स) का इरशाद है कि क़यामत में सुब्ह शाम नहीं है ये बरज़ख़ के बारे में है और हज़रते रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व)   से मरवी है कि जहन्नम में उसे उसकी जगह उसे बरज़ख़ में हर सुब्ह ओ शाम दिखाई जाती है अगर वो अज़ाब पाने वालों में से हैं और अगर अहले बहिश्त में से हैं तो बहिश्त में उसकी जगह की निशानदही की जाती है और कहा जाता है कि ये है तुम्हारी क़यामगाह क़यामत में।

(2).फ़अम्मल लज़ीना शक़्वा फ़िन्नार -------------------- इला आख़िर (सूराः- 11,आयतः- 105से 108).यानी जो लोग बदबख़्ती और शक़ावत वाले हैं वो जब तक ज़मीन ओ आसमान बरक़रार रहे आग में रहेंगे ,उनके लिये सख़्त फ़रियाद और आह ओ नाला है सिवा इसके कि जो तुम्हारा परवरदिगार चाहे दर हक़ीक़त तुम्हारा परवरदिगार जो चाहता है करता है लेकिन जो लोग नेक बख़्त हैं जब तक आसमान और ज़मीन बरक़रार है वो बहिश्त में रहेंगे........... इमाम (अ.स) फ़रमाते हैं ये आयत बरज़ख़ के बारे में है और यहाँ बरज़ख़ी अज़ाब ओ सवाब मुराद है वरना क़यामत में तो कोई आसमान नहीं है "इज़ा समाऐ इन्शक़्क़त" और ज़मीन भी बदल दी जाऐगी फिर ये ज़मीन बाक़ी न रहेगी "यौमा तब्बदिल्लुल अर्ज़ ग़ैरूल अर्ज़ वस्समावात वा बरज़ुल्लाहअल वाहिदुल क़हहार"।

(3).क़ीला अदख़ुलल जन्नता क़ाला या लैता.................... इला आख़िर (सूरा- यासीन आयतः- 26वा 27).ये आयते मुबारक हबीबे नज्जार मोमिने आले फ़िरऔन के बारे में है जब उन्होंने अपनी क़ौम को पैग़म्बरों की पैरवी करने की तरफ़ दावत दी तो लोगो ने उन्हें डराया धमकाया (जैसा कि तफ़्सीरे सूरा ऐ यासीन में है) और बिल आख़ीर उन्हें सूली पर चढ़ाया और क़त्ल कर दिया यहाँ तक कि वो सवाबे इलाही में पहुँचे और मरने के बाद कहा कि काश मेरी क़ौम वाले जान लेते कि मेरे परवरदिगार ने मुझे बख़्श दिया और बलन्द मरतबा लोगों में क़रार दिया है इस मक़ाम पर ख़ुदा का इरशाद है कि उनसे कहा गया कि बहिश्त में दाख़िल हो जाओ इमाम (अ.स) फ़रमाते हैं "यानी बरज़ख़ जन्नत में है" और दूसरी रवायत में जन्नते दुनियावी (यानी बहिशते क़यामत से पस्त जन्नत) से ताबीर फ़रमाई है और फ़िल जुमला आयते मुबारक का ज़ाहिर ये है कि जब मोमिने आले फ़िरऔन शहीद हुए तो बिला फ़ासला बहिश्ते बरज़ख़ी में दाख़िल हुए और चूँकि उनकी क़ौम अभी दुनिया में थी लिहाज़ा उन्होंने कहा कि काश मेरी क़ौम जानती कि ख़ुदा ने मुझे कैसी नेमतें और अतियात इनायत फ़रमाऐं हैं तो वो तौबा कर लेती और ख़ुदा की तरफ़ रूजू करती।

(4).वमन आरज़ा मिन ज़िक्री.................. इला आख़िर (सूराए ताहा आयतः- 124)जिसने यादे ख़ुदा से रूर्गदानी की यक़ीनन उसके लिये सख़्त और अज़ीयत नाक ज़िन्दगी है और हम उसे क़यामत के रोज़ औंधा महशूर करेंगे- ज़्यादा तर मुफ़स्सरीन का क़ौल है कि मइशते ज़न्क से अज़ाबे क़ब्र और अज़ाबे बरज़ख़ की तरफ़ इशारा है और ये मतलब इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) से मरवी है।

(5).हत्ता इज़ा जाआ........................ इला याबेसून (सूराए मोमिनून आयतः- 100)यानी यहाँ तक कि उनमें (यानी कुफ़्फ़ार में) से किसी फ़र्द की मौत आती है तो वो अर्ज़ करता है कि परवरदिगार ! मुझे दुनिया में वापस कर दे ताकि मैंने जो परवोगुज़ाश्त की है उसमें कोई नेक अमल बजा लाऊँ तो उसके जवाब में कहा जाता है कि ऐसा नहीं होगा (यानी तुम वापस नहीं जा सकते हो)। वो दरअस्ल ऐसी बात कहता है जिसका कोई फ़ायदा नहीं है और उन लोगों के पीछे आलमे बरज़ख़ है उस रोज़ तक जब वो उठाए जाऐंगे लाज़मी तौर से ये आयत इस बात पर बख़ुबी दलालत कर रही है कि दुनयावी ज़िन्दगी के बाद और हयाते आख़िरत और क़यामत से पहले इन्सान एक और ज़िन्दगी रखता है जो इन दोनों ज़िन्दगीयों के दरमियान हद्दे फ़ासिल है और उसे आलमे बरज़ख़ या आलमे क़ब्र का नाम दिया जाता है फ़ी जुमला मज़कूरा आयत और दीगर आयतों में मजमूई तौर से ग़ौर और तद्दबुर के बाद यह बात साबित और वाजेह होती है कि रूहे इन्सीनी एक ऐसी हक़ीक़त है जो बदन के अलावा है और रूह का बदन के साथ एक तरह का इत्तेहाद है जो इरादे और शऊर के ज़रिये बदन का इन्तेज़ाम चलाती है और इन्सान की शख़्सियत रूह से है बदन से नहीं कि वो मौत के बाद ख़त्म हो जाए और अज्ज़ाए बदन के मुन्तशिर हो जाने के साथ वो भी फ़ना हो जाए बल्कि इन्सान की हक़ीक़त और शख़्सियत (रूह) बाक़ी रहती है और एक सआदत ओ हयाते जावेदानी या शक़ावते अब्दी में बसर करती है इस आलम में उसकी सआदत ओ शक़ावत मलकात और इस दुनियामें उसके आमाल से वाबस्ता है न कि उसके जिस्मानी पहलूओं और इज्तेमाई ख़ुसूसियात से हुक्माऐ इस्लाम ने भी ये साबित करने के लिये कि रूह जिस्म के अलावा है और मौत से निस्त ओ नाबूद नहीं होती और उसके अहकाम जिस्म के अहकाम से जुदागाना हैं ,अक़्ली दलीलें क़ायम की हैं लेकिन ख़ुदा और रसूल और आइम्माऐ ताहिरीन (अ.स) के अक़वाल के बाद हमें उनकी एहतियाज नहीं है और ये मतलब हमारे लिये आफ़ताब से भी ज़्यादा रौशन है।

(6).बरज़ख़ी जन्नत के बारे में जो आयतें नाज़िल हुईं मिन्जुमला उनके सुराऐ फ़ज्र का आख़िरी हिस्सा भी है जिसमें इरशादे ख़ुदा वन्दे आलम है कि "या अय्यो हतुल नफ़सुल मुतमइन्ना इरजई इला रब्बेका राज़ियतुन मरज़िया फ़दख़्ली फ़ी इबादी वा अदख़्ली जन्नती"।

इसमें नफ़्से मुतमईन रखने वाले से मौत के वक़्त ख़िताब होता है कि "दाख़िले बहिश्त हो जाओ" यहाँ बरज़ख़ी जन्नत के साथ ताबीर की गई है और इसी तरह "मेरे बन्दों (के ज़ुमरे) में दाख़िल हो जा" यानी मोहम्मद ओ आले मोहम्मद (अ.स) की ख़िदमत में हाज़िर हो जा इनके अलावा दीगर आयतें भी हैं जिनमें सरीहन या कनायेतन बरज़ख़ी बहिशत या जहन्नम के बारे में ज़िक्र हुआ है लेकिन इस क़दर काफ़ी है।

बरज़ख़ी सवाब ओ अज़ाब रवायतों में

आलमे बरज़ख़ में सवाब ओ उक़ाब से मुताल्लिक़ रवायतें कसरत से हैं यहाँ चन्द रवायत पर इक्तेफ़ा की जाती है अली इब्ने इब्राहीमे क़ुम्मी से और उन्होंने हज़रते अमीरूल मोमिनीन (अ.स) से रवायत की है कि हज़रत अली (अ.स) ने फ़रमाया जिस वक़्त आदमी दुनिया के आख़री और आख़िरत के पहले रोज़ के दरमियान होता है तो उसका माल ,औलाद और अमल उसके सामने मुजस्सम होते हैं वो अपने माल की तरफ़ रूख़ करता है और कहता है ख़ुदा की क़सम मैं तेरे बारे में हरीस और बख़ील था अब तेरे पास मेरा हिस्सा किस क़दर है ?वो कहता है सिर्फ़ अपने कफ़न के मुताबिक़ मुझसे ले लो। इसके बाद वो अपने फ़रज़न्दों की तरफ़ मुतावज्जे होता है कि ख़ुदा की क़सम मैं तुम्हें अज़ीज़ रख़ता था और तुम्हारा हामी और मददगार था अब तुम्हारे पास मेरा हिस्सा क्या है ?वो कहते हैं हम तुम्हें तुम्हारी क़ब्र तक पहुँचा के उसमें दफ़्न कर देंगे। उसके बाद वो अमल की तरफ़ देखता है और कहता है ख़ुदा की क़सम मैंने तेरी तरफ़ इल्तेफ़ात नहीं की और तू मेरे ऊपर गराँ था अब तेरी जानीब से मेरा हिस्सा कितना है ?तो वो कहता है कि मैं क़ब्र और क़यामत में तुम्हारा हमनशीं रहूँगा यहाँ तक कि मैं और तुम दोनों तुम्हारे परवरदिगार के सामने पेश किये जाऐंगे अगर ये शख़्स ख़ुदा का दोस्त है तो इसका अमल इन्तेहाई नफ़ीस ख़ुशबू ,इन्तेहाई हुस्न ओ जमाल और एक बेहतरीन लिबास वाले शख़्स की सूरत में इसके पास आता है और कहता है बशारत हो तुमको रूह ओ रेहान और ख़ुदा की बहिश्ते नईम की ओर तुम्हारा आना मुबारक हो ! ये शख़्स पूछता है कि तुम कौन हो तो वो कहता है कि मैं तुम्हारा अमले सालेह हूँ अब दुनिया से जन्नत की तरफ़ रवाना हो! ये अपने ग़ुस्ल देने वालों को पहचानता है और अपना जिस्म संभालने वाले को क़सम देता है कि इसे जल्द अज़ जल्द हरकत दे फिर जब क़ब्र में दाख़िल होता है तो दो फ़रिश्तें जो क़ब्र के अन्दर इम्तिहान लेने के लिये आते हैं ज़मीन को अपने दाँतों से शिग़ाफ़ कर देते हैं उनकी आवाज़ बादल की सख़्त गरज की मानिन्द होती है और उनकी आँखें बिजली की तरह तड़पती हैं इससे कहते हैं कि तुम्हारा परवरदिगार कौन है ?तुम्हारा पैग़म्बर कौन है ?और तुम्हारा दीन क्या है ?ये कहता है मेरा परवरदिगार ख़ुदा है ,मेरे पैग़म्बर मोहम्मद (स.अ.व.व)   हैं और मेरा मज़हब इस्लाम है ! वो कहते हैं ख़ुदा तुमको इस चीज़ में साबित क़दम रखे जिसको तुम दोस्त रखते हो और जिस से राज़ी हो ये वही बात है जिसके बारे में ख़ुदा ने इशारा फ़रमाया है "यसबतल्लाहुल लज़ीना आमेनू बिल क़ौलइस्साबित फ़लि हयातुत दुनिया वा फ़िल आख़िर" इसके बाद उसकी क़ब्र को वहाँ तक वसीय कर देते हैं जहाँ तक नज़र काम करती है उसमें जन्नत का एक दरवाज़ा खोल देते हैं और कहते हैं "रौशन आँखों के साथ सो जाओ जिस तरह एक ख़ुशनसीब और कामयाब नौजवान सोता है" ये वही चीज़ है जिसके लिये ख़ुदा फ़रमाता है "असहाबुल जन्नता ख़ैरा मुस्तक़्क़रा वा अहसना मुक़ीलन"।

लेकिन अगर दुश्मने ख़ुदा हो तो उसका अमल बदतरीन लिबास और शदीद तरीन बदबू के साथ इसके पास आता है और कहता है "बशारत हो तुझको दोज़ख़ के खौलते हुए पानी और जहन्नम में दाख़िल होने की" वो अपने ग़ुस्ल देने वाले को देखता है और अपना जिस्म संभालने वाले को क़सम देता है कि इसे अपने हाल पर छोड़ दे जिस वक़्त उसे क़ब्र में दाख़िल करते हैं तो आज़माईश करने वाले क़ब्र में आते हैं उसका कफ़न ख़ींच लेते हैं और उससे कहते हैं कि तेरा परवरदिगार कौन है ?तेरा पैग़म्बर कौन है ?और तेरा दीन क्या है ?वो कहता है नहीं जानता ! वो कहते हैं तू न जाने और हिदायत न पाए फिर एक आहनी असा से उस पर एक ऐसी ज़र्ब लगाते हैं सिवा जिन्नात और इन्सानों के दुनिया की हर मुताहर्रिक़ मख़लूक़ उसके असर से वहशतज़दा हो जाती है उसके बाद आतिशे जहन्नम का एक दरवाज़ा उस पर खोल दिया जाता है और उस से कहा जाता है कि बदतरीन हालत में सो ! उसे ऐसे तंग मकान में जगह दी जाती है जो नैज़े के फल के उस सूराख़ की मानिन्द होती है जिसमें नैज़े की आख़िरी नोक नस्ब की जाती है और उस पर इस क़दर सख़्त फ़िशार होता है कि उसका भेजा उसके नाख़ूनों और कानों से बाहर आता है ख़ुदा उस पर साँपों और बिछुओ और हशरातुल अर्ज़ को मुसल्लत फ़रमाता है कि उसे डसें और डंक मारें और यही हालत क़ायम रहेगी यहाँ तक कि ख़ुदा उसे उसकी क़ब्र से उठाए वो इतने शदीद अज़ाब में होगा कि जल्द क़यामत बरपा होने की आरज़ू करेगा।

नीज़ इमालीऐ शैख़े तूसी में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स) से एक हदीस मनक़ूल है जिसके आख़िर में इमाम (अ.स) ने फ़रमाया है कि "जिस वक़्त ख़ुदा मरने वाले की रूह क़ब्ज़ फ़रमाता है और उसकी रूह को असली (दुनियावी) सूरत के साथ बहिश्त में दाख़िल फ़रमाता है तो ये वहाँ खाती और पीती है और जिस वक़्त कोई ताज़ा रूह उसके सामने आती है तो ये उसको उसी सूरत में पहचानती है जो सूरत उसकी दुनिया में थी।

दूसरी हदीस में फ़रमाया कि मोमिनीन की रूहें एक दूसरे से मुलाक़ात करती हैं ,आपस में सवाल ओ जवाब करती और एक दूसरे को पहचानती हैं इस हद तक कि अगर तुम किसी वक़्त उनमें से किसी को देखो तो कहोगे कि हाँ ये तो वही शख़्स है।

एक हदीस में इरशाद है कि रूहें अपने जिस्मानी सिफ़ात के साथ जन्नत के एक बाग़ में क़याम करती हैं एक दूसरे को पहचानती हैं और एक दूसरे से सवाल करती हैं जिस वक़्त कोई नई रूह उनके पास वारिद होती है तो कहती हैं "इसे अभी मौक़ा दो (और अपने हाल पर छोड़ दो) क्योंकि ये एक अज़ीम हौल (यानी मौत की वहशत) से गुज़र कर हमारी तरफ़ आ रही है इसके बाद इससे पूछती है "फ़ुलाँ शख़्स क्या हुआ और फ़ुलाँ शख़्स किस हाल में है ?अगर ये रूह कहती है कि जब मैं आई तो ज़िन्दा था तो उसके बारे में उम्मीद करती हैं (कि वो भी हमारे पास आऐगी) लेकिन अगर कहती है कि वो दुनिया से गुज़र चुका था तो कहती है कि वो गिर गया ये इस बात की तरफ़ इशारा है कि चूँकि वो नहीं आया लिहाज़ा यक़ीनन दोज़ख़ में गया है।

बिहारूल अनवार जिल्द तीन में किताबे काफ़ी वग़ैरा से चन्द रवायतें नक़्ल की गई हैं जिनका खुलासा ये है कि रूहें आलमे बरज़ख़ में अपने अहलेख़ाना और अक़रूबा की ज़ियारत ओ मुलाक़ात और दरयाफ़्ते हाल के लिये आती हैं बाज़ रोज़ाना ,बाज़ दो रोज़ में एक बार ,बाज़ तीन रोज़ में एक बार ,बाज़ हर जुमे को ,बाज़ महीने में एक मरतबा ,बाज साल में एक मरतबा और ये इख़्तिलाफ़ हालात के तफ़ावुत ,उनके मकान की वुस्अत ओ फ़राख़ी और ज़ीक़ ओ तंगी और उनकी आज़ादी और गिरफ़्तारी के ऐतेबार से है।

एक रवायत में है कि मोमिन अपने घर वालों की सिर्फ़ वही चीज़ें और हालात देखता है जो बेहतर और उसके लिये बाएसे मर्सरत हों और अगर कोई ऐसी बात होती है जिस से उसे रंज या तकलीफ़ पहुँचे तो वो उस से छुपा दी जाती है और काफ़िर की रूह सिवा बदी और उसको अज़ीयत पहुँचाने वाले उमूर दे दूसरी कोई चीज़ नहीं देखती है। (किताबे मआद सफ़्हा 58से 61)