आलमे बरज़ख

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आलमे बरज़ख लेखक:
कैटिगिरी: क़यामत

आलमे बरज़ख

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

लेखक: शहीदे महराब आयतुल्लाह दस्तग़ैब शीराज़ी
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आलमे बरज़ख
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आलमे बरज़ख

आलमे बरज़ख

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

हौज़े कौसर बरज़ख़ में

मुतादिद किताबों में (किताबे इख़्तेसास ,बसाएरूल दरजात ,बिहारूल अनवार जिल्दः- 3सफ़्हाः- 152और माआलिमुल ज़ुल्फ़ा वग़ैरा) अब्दुल्लाह इब्ने सनान से मरवी है कि मैंने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स) से हौज़े कौसर के बारे में पूछा तो हज़रत ने फ़रमाया ,उसका तूल इतना है जितना बसरे सनआऐ यमन तक का फ़ासला- मैंने इस पर तआज्जुब किया तो हज़रत ने फ़रमाया क्या तुम चाहते हो की मैं तुम्हें उसकी निशान देही करूँ ?मैंने अर्ज़ किया हाँ ऐ मौला ! हज़रत मुझको मदीने से बाहर ले गए और पाँव ज़मीन पर मारा फिर मुझसे फ़रमाया ,देखो ! (मलकूती परदा इमाम के हुक्म से मेरी आँखों के सामने से हट गया) मैंने देखा कि एक नहर ज़ाहिर हुई जिसके दोनो सिरे निगाहों से ओझल थे अलबत्ता जिस मक़ाम पर मैं और इमाम इस्तादा थे वो एक जज़ीरे की मानिन्द था मुझको ऐसी नहर नज़र आई जिसके एक तरफ़ पानी बह रहा था जो बर्फ़ से ज़्यादा सफ़ेद था और दूसरी तरफ़ दग्ध का धारा था ये भी बर्फ़ से ज़्यादा सफ़ेद था और इन दोनो के दरमियान ऐसी शराब जारी थी जो सुर्ख़ी और लताफ़त में याक़ूत की मानिन्द थी और मैंने कभी दूग्ध और पानी के दरमियान इस शराब से ज़्यादा कोई ख़ूबसूरत और ख़ुशनुमा चीज़ नहीं देखी थी मैंने कहा मैं आप पर फ़िदा हो जाऊँ ये नहर कहाँ से निकली है ?फ़रमाया कि ये उन चश्मों से हैं जिनके बारे में ख़ुदा वन्दे आलम क़ुरआने मजीद में फ़रमाता है कि बहिशत में एक चशमा दूध का ,एक चशमा पानी का और एक चशमा शराब का है वही इस नहर में जारी होते हैं इसके दोनो किनारों पर दरख़्त थे और हर दरख़्त के दरमियान एक हूरया थी जिसके बाल उसके सर से झूल रहे थे कि मैंने हरगिज़ इतने हसीन बाल नहीं देखे थे हर एक के हाथ में एक ज़र्फ़ था कि मैंने इतने ख़ूबसूरत ज़र्फ़ भी क़तअन नही देखे थे ,ये दुनियावी ज़ुरूफ़ में से नहीं थे उसके बाद हज़रत उनमें से एक के क़रीब तशरीफ़ ले गये और इशारा फ़रमाया कि पानी लाओ ! इस हूरिया ने ज़र्फ़ को उस नहर से पुर करके आपको दिया और आपने नौश फ़रमाया फिर मज़ीद पानी के लिये इशारा फ़रमाया और उसने दूबारा ज़र्फ़ को भरा जिसे हज़रत ने मुझे इनायत फ़रमाया और मैंने भी पिया.. मैंने इस से क़ब्ल कभी ऐसा ख़ुशगवार ,लतीफ़ और लज़ीज़ कोई मशरूब नहीं चखा था उससे मुश्क की ख़ुश्बू आ रही थी मैंने अर्ज़ किया ,मैं आप पर फ़िदा हो जाऊँ जो कुछ मैंने आज देखा है इससे पहले हरगिज़ नहीं देखा था और मेरे वहम ओ गुमान में भी नहीं था कि ऐसी कोई चीज़ हो सकती है ,हज़रत ने फ़रमाया ख़ुदा वन्दे आलम ने हमारे शियों के लिये जो कुछ मोहय्या फ़रमाया है उसमें सबसे कम तर ये चीज़ है जब मरने वाला इस दुनिया से जाता है तो उसकी रूह को इस नहर की तरफ़ ले जाते हैं वो इसके बाग़ों में चहलक़दमी करता है उसकी ग़िज़ाऐं इस्तेमाल करता है और इसकी मशरूबता पीता है और जब हमारा दुशमन मरता है तो उसकी रूह को वादिये बरहूत में ले जाते हैं जहाँ वो हमेशा इसके अज़ाब में मुब्तला रहता है ,उसका ज़क़्क़ूम (थोहड़ का फ़ल) उसे खिलाते हैं और उसका हमीम (खौलता हुआ पानी) उसके हलक़ में उडेलते हैं पस ख़ुदा की पनाह माँगों उस वादी से। मिन जुमला उन अशख़ास के जिन्होंने इस आलम में बरज़ख़ी बहिश्त को देखा है हज़रत सैय्यदुश शोहदा (अ.स) के असहाब भी हैं जिन्हें हज़रत ने शबे आशूरा इसका मन्ज़र दिखाया था। बिहारूल अनवार में जिल्दः- 3में इमामे मोहम्मद बाक़िर (अ.स) से मरवी है कि कोई मोमिने मतूफ़ी इस दुनिया से नहीं है लेकिन ये कि उसे आख़री साँस में हौज़े कौसर का ज़ाएक़ा चख़ाया जाता है और कोई काफ़िर नहीं मरता है लेकिन ये कि उसे हमीमे जहन्नम का मज़ा चखाया जाता है।

बरहूत बरज़ख़ी जहन्नम का मज़हर

जैसा कि बयान हो चुका है वादिउस्सलाम नेकबख़्त और सआदत मंद रूहों के ज़हूर और जमा होने का मक़ाम है और बरहूत जो एक ख़ुश्क बेआब ओ गियाह बियाबान है बरज़ख़ी दोज़ख़ का मज़हर और कसीफ़ ओ ख़बीस अरवाह का महल्ले अज़ाब है। इसके बारे में एक रवायत पेश करता हूँ ताकि मतलब ज़्यादा वाज़ेह हो जाए। एक रोज़ एक शख़्स हज़रते ख़ातेमुल अन्बिया (स.अ.व.व)   की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और अपनी वहशत का इज़हार करते हुए अर्ज़ किया कि मैंने एक अजीब चीज़ देखी है आँ हज़रत ने फ़रमाया क्या देखा है ?इसने अर्ज़ किया कि मेरी ज़ौजा सख़्त अलील हुई तो लोगों ने कहा कि अगर इसे कुऐं का पानी पिलाओ जो वादिये बरहूत में है तो ये उससे सेहतयाब हो जाएगी (बाज़ जिल्दी अमराज़ मादनी पानी से दूर हो जाते हैं) चूँनाचे मैं तैय्यार हुआ अपने साथ एक मश्क और एक प्याला लिया ताकि उस  प्याले से मश्क में पानी भरूँ जब वहाँ पहुँचा तो एक वहशतनाक सहरा नज़र आया बावजूदे कि मैं बहुत डरा लेकिन दिल को मज़बूत करके उस कुऐं को तलाश करने लगा नागहाँ ऊपर की तरफ़ से किसी चीज़ ने ज़ंजीर की मानिन्द आवाज़ दी और नीचे आ गई मैंने देखा कि एक शख़्स है जो कह रहा है कि मुझे सेराब कर दो वरना मैं हलाक हुआ ! जब मैंने सर बलन्द किया ताकि उसे पानी का प्याला दूँ तो देखा कि एक शख़्स है जिसकी गर्दन में ज़ंजीर पड़ी हुई है ज्यों ही मैंने उसे पानी देना चाहा उसे ऊपर की तरफ़ ख़ींच लिया गया यहाँ तक कि आफ़ताब के क़रीब पहुँच गया मैंने दो मरतबा मश्क में पानी भरना चाहा लेकिन देखा कि वो नीचे आया और पानी माँग रहा है मैंने उसे पानी का ज़र्फ़ देना चाहा तो उसे फिर ऊपर ख़ींच लिया गया और आफ़ताब के क़रीब पहुँचा दिया गया जब तीन मरतबा यही इत्तेफ़ाक़ हुआ तो मैंने मशक का दहाना बाँध लिया और उसे पानी नहीं दिया मैं उस अम्र से ख़ौफ़ज़दा होकर हज़रत की ख़िदमत में हाज़िर हुआ हूँ ताकि इसका राज़ मालूम कर सकूँ हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व)   ने फ़रमाया कि वो बदबख़्त क़ाबील था। (फ़तौअत लहू नफ़्सा क़त्ला अख़ीय फ़असबह मिनल ख़ासिरीन। सूराः- 5,आयतः- 33) (यानी हज़रत आदम का बेटा जिसने अपने भाई हाबील को क़त्ल किया था) और वो रोज़े क़यामत तक इसी अज़ाब में गिरफ़्तार रहेगा यहाँ तक कि आख़िरत में जहन्नम के सख़्त तरीन अज़ाब में मुब्तला किया जाऐगा।

किताब नूरूल अबसार में सैय्यद नूरूल शबलख़ी शाफ़ई ने अबुल क़ासिम बिन मुहम्मद से रवायत की है कि उन्होंने कहा मैंने मस्जिदुल हराम में मक़ामे इब्राहीम पर कुछ लोगों को जमा देखा तो उनसे पूछा क्या बात है ?उन्होंने बताया कि एक राहिब मुसलमान होकर मक्काए मोअज़्ज़मा आया है और एक अजीब वाक़िया सुनाता  है मैं आगे बढ़ा तो देखा कि एक अज़ीमुल जुस्सा बूढ़ा शख़्स पशमीने का लिबास और टोपी पहने बैठा हुआ है वो कहता था कि मैं समन्दर के किनारे अपने दैर में रहता था एक रोज़ समन्दर की तरफ़ देख रहा था कि एक बहुत बड़े गिध से मुशाबेह परिन्दा आया और पत्थर के ऊपर बैठ के क़ै की जिससे एक आदमी को जिस्म का चौथाई हिस्सा ख़ारिज हुआ और वो परिन्दा चला गया थोड़ी देर के बाद फिर आया और दूसरे चौथाई हिस्से को क़ै करके उगला इसी तरह चार बार में इन्सान के सारे आज़ाअ को उगल दिया जिन से एक पूरा आदमी बन के खड़ा हो गया मैं इस अजीब अम्र से हैरत में था कि देखा वही परिन्दा फिर आया और उस आदमी के चौथाई हिस्से को निगल कर चला गया इसी तरह चार बार में पूरे आदमी को निगल कर उड़ गया मैं मुताहय्यन था कि ये क्या माजरा है और ये शख़्स कौन है ?मुझको अफ़सोस था कि उस से पूछा क्यों नहीं दूसरे रोज़ फिर यही सूरते हाल नज़र आई और जब चौथी दफ़ा की क़ै के बाद वो शख़्स मुकम्मल आदमी बन के खड़ा हुआ तो मैं अपने सोमये से दौड़ा और ख़ुदा की क़सम दी कि बताओ तुम कौन हो ?उसने कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने कहा मैं तुम्हे उस ज़ात की क़सम देता हूँ जिसने तुम्हे पैदा किया है बताओ तुम कौन हो ?उसने कहा मैं इब्ने मुल्जिम (लानतुल्लाह अलैह) हूँ ,मैंने कहा तुम्हारा क्या क़िस्सा है ?और इस परिन्दे का क्या मामला है ?उसने कहा मैंने अली इब्ने अबी तालिब (अ.स) को क़त्ल किया है और ख़ुदा ने इस परिन्दे को मेरे ऊपर मुसल्लत कर दिया है कि जिस तरह तुमने देखा है मुझ पर अज़ाब करता रहे। मैं सोमऐ से बाहर आया और लोगों से पूछा कि अली इब्ने अबी तालिब कौन हैं ?मुझसे बताया गया कि हज़रत मोहम्मद सलल्लाहो अलैही वा आलेही वस्सलम के इब्ने अम और वसी हैं चुनाँचे मैंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया और हज्जे बैतुलहराम और ज़ियारते क़ब्रे रसूल से मुशर्रफ़ हुआ। (किताबे मआद सफ़्हाः- 63)

अक़्ल मआद और ख़ैर ओ शर को समझती है

ख़ुदाए तआला ने अक़्ल के जो ख़ुसूसियात और आसार इन्सान को अता फ़रमाये हैं उनमें से एक ये भी है कि वो अपनी मआद को समझ सकती है चुनाँचे एक बुर्ज़ग के क़ौल के मुताबिक़ अगर फ़र्ज़ कर लिया जाए कि वही का वजूद न होता तब भी अक़्ले इन्सानी मआद को दरयाफ़्त कर सकती थी ,इस दुनियावी ज़िन्दगी को किसी ग़ायत और मक़सद की हामिल होना चाहिये ताकि इसमें इन्सान अपने तकामुल और इरतिक़ा और सआदत पर फ़ायज़ हो सके। ये ख़ैर ओ शर का इदराक और इसकी सही ताबीर के मुताबिक़ जो रवायत में मनक़ूल है ख़ैरूल ख़ैरीन (यानी दो नेकियों में से बेहतर नेकी) का इदराक कर सकती है (क्योंकि हक़ीक़ी और वाक़ई शर हमारी फ़ितरत में मौजूद नहीं है बल्कि जो कुछ मौजूद है या ख़ैरे महज़ है या उसके ख़ैर होने का जज़्बा ग़ालिब है लेकिन यहाँ इस बहस का मौक़ा नहीं है) ये इस ख़ैर या उस ख़ैर को मालूम कर सकती है और अपनी ज़ाती या किसी दूसरे के अफ़आल में ख़ूबी और बदी की तमीज़ कर सकती है।

(किताबे तौहीद सफ़्हाः- 318)

अक़्ले इल्मी और उसका कम या ज़्यादा होना

इसी बिना पर हुक्मा का क़ौल है कि अक़्ल दो शोबे रखती है इल्मी और अमली। अक़्ले इलमी वही है ,इदराकात हैं जो इजमाली तौर पर ख़ुदाऐ तआला ,उसके अस्मा ,सिफ़ाते कमालिया ,उसके आसार और ख़्वासे अशया के बारे में हैं। अक़्ल अमली आमाल की ख़ूबी और बदी और कामों के सही ओ फ़ासिद होने का इदराक है यानी ये समझ सकती है कि कौन सा काम बेहतर है ताकि उसे अन्जाम दे और कौन सा काम बुरा है है ताकि उस से बाज़ रहे। अपनी सआदत और शक़ावत के असबाब को समझे क्यों कि ये एक फ़ितरी अमल है और ख़ुदा ने इन्सानी सरिशत में बदीयत फ़रमाया है जो तमाम अफ़रादे बशर को मामूल के मुताबिक़ दिया गया है हर चन्द कि ख़ुदा ने बाज़ इन्सानों को दूसरों से ज़्यादा दिया है और साथ ही उस से काम लेने से उसमे इज़ाफ़ा भी होता है ग़रज़ की इब्तेदा में सब इन्सानों को ये क़ूवत यकसाँ तौर पर दी गई है अगर इसे इस्तेमाल में लाऐं तो तरतीबवार ज़्यादा हो जाती है और अगर इसे मुअत्तल कर दिया यानी इसके क़वानीन ओ हिदायत को बाक़ाएदा तासीर का मौक़ा नहीं दिया तो रफ़्ता रफ़्ता कम हो जाती है ये एक ऐसी ख़िल्क़त है जिसे ख़ुदावन्दे आलम ने अफ़रादे बशर में क़रार दिया है। (फ़ितरूललहुल लती फ़ितरूलनास अलैहा ला तब्दीला ख़ल्क़ल्लाह ,सूराः- 30आयतः- 30)मुब्दा और मआद को पहचानने के लिये फ़ैज़ाने इलाही के वास्ते और वसीले यानी पैग़म्बर और इमाम हैं और इसी तरह अक़्ले इल्मीं के रिश्ते भी।

तुमने अपनी आख़िरत के लिये क्या बनाया है ?

ला दारूल मुरः बादुल मौत यसकुन्नहा -- इल्लल लती काना क़ब्लल मौत बाइनहा

फ़ाइन बनाहा बख़ैरा ताब मिसकुन्नहा -- वइन बनाहल बशर ख़ाबा ख़ामीहा

यानी आदमी के लिये मौत के बाद कोई घर नहीं है सिवा उसके जो उसने अपनी मौत के क़ब्ल बनाया है (अब तुमने जहाँ तक भी उसके साज़ ओ सामान को दुरूस्त किया हो) अगर उसे नेकी और ख़ैर के साथ तामीर किया है तो ख़ुशाहाल उसका जो अपनी क़ब्र के रूह ओ रेहान मुहय्या करे और उस से फ़ायदा उठाऐ ,लेकिन अगर किसी ने उसे बुराईयों और गुनाहो से बनाया है तो उसने अपने लिबास ,ख़ुराक ,मसकन और हर चीज़ को आग से तैय्यार किया है। (किताबे तौहीद सफ़्हाः- 343)

बहिशते बरज़ख़ और बहिशते क़यामत

अल्लामा मजलिसी अलैहिर्रहमा ने आयऐ मुबारिका की तशरीह करते हुऐ "जन्नतान" (यानी दो जन्नतों) के बारे में एक मुनासिब सूरत का ज़िक्र फ़रमाया है कि मुमकिन है एक जन्नत बरज़ख़ में और दूसरी जन्नत क़यामत में हो । जिस वक़्त से मोमिन की रूह क़ब्ज़ होती है वो बरज़ख़ी जन्नत के नाज़ ओ नअम में रहता है जो अनवा ओ अक़साम की बरज़ख़ी नेमतों के साथ एक वसीए बाग़ है और क़ुरआने मजीद में भी बरज़ख़ी जन्नत के लिये शवाहिद मौजूद हैं ( क़ीला अदख़ल्लल जन्नत क़ाला या लैती क़ौमी यामेलून सूराऐ यासीनः- 36आयतः- 28 (मज़ीद तफ़्सील के लिये शहीदे मेहराब आयतुल्लाह दस्तग़ैब रह. की किताब "क़ल्बे कुरआन तफ़्सीरे सूराऐ यासीन" में आयऐ मज़कूरा के ज़ैल में ,नीज़ किताबे मआद फ़स्ल दोम (बरज़ख़) की तरफ़ रूजू करें) अलावा उस जन्नत के जो क़यामत में होगी और जिसका हमेशा के लिये वादा किया गया है। (किताब बहिशते जावेदाँ सफ़्हाः- 328)

बरज़ख़ के बारे में एक शुब्हा

आलमे बरज़ख़ के बारे में ज़िन्दीक़ों ने एक शुब्हा पैदा किया है जो आज भी सुनने में आता रहता है जबकि उसकी अस्ल ओ बुनियाद पुरानी है वो नकीर और मुनकिर के सवालों के बारे में कहते हैं कि हम कोई चीज़ मय्यत के मुँह में रखते हं उसके बाद अगर उसकी क़ब्र को खोलते हैं तो वो चीज़ मय्यत के मुँह में बाक़ी होती है अगर मुर्दे से सवाल हुआ होता तो उसका मुँह जुन्बिश करता और वो चीज़ उसके अन्दर न ठहरती या मसअलन ये कहते हैं कि हम मय्यत में क़ब्र के अन्दर उठने बैठने के आसार नहीं पाते और इसी तरह के दीगर शुब्हात हैं । वो ये भी कहते हैं कि आदमी तो क़ब्र के अन्दर सड़ के फ़ना हो जाता है फिर आलमे बरज़ख़ और क़यामत तक उसके हालात क्या मतलब रखते हैं ?और इस तरफ़ मुसल्लमा रवायत ओ अहादीस में बताया गया है कि क़ब्र में मोमिन से कहते हैं कि देखो ! चुनाँचे उसका आलमे बरज़ख़ सत्तर हाथ और बाज़ मोमिन के लिये सत्तर साल की राह तक वसीय हो जाता है। नीज़ कुराने मजीद में भी आलमें बरज़ख़ के बारे में  सराहत के साथ आयतें मौजूद हैं रही ये बात कि इन शुब्हात के जवाब में क्या कहना है ?तो जवाब ये है कि अगर इन्सान अख़बार ओ रवायत के इस्तेमाल से आशना हो जाऐ तो उसके लिये ये मसअला ख़ुद ही हल हो जाएगा। इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स) जिस वक़्त आलमे बरज़ख़ के अज़ाब का ज़िक्र फ़रमाते हैं तो रावी अर्ज़ करता है बरज़ख़ क्या है ?हज़रत फ़रमाते हैं कि मौत के वक़्त से क़यामत तक है चुनाँचे क़ब्र का ग़ार आलमे बरज़ख़ और रूह की मंज़िलों में से एक मंज़िल है न ये कि जस्दे ख़ाकी के बोसीदा हो जाने से बरज़ख़ तमाम हो जाता है। अल्लामा मजलिसी रह. फ़रमाते हैं कि जिन रवायतों में क़ब्र का नाम लिया गया है वहाँ आलमे बरज़ख़ मुराद है न कि जिस्मानी क़ब्र और ये जो रवायत में वारिद हुआ है कि ख़ुदा मोमिन की क़ब्र को वुस्अत देता है तो इससे मुराद बरज़ख़ का आलमे रूहानी है क़ब्र की ज़ुल्मत और रौशनी जिस्मानी और माददी नहीं है अफ़सोस ! काश जिस्मानी और माददी होती "अबकी ज़ुल्मता क़ब्री" यानी मैं अपने अमल की तारीकी के लिये रोता हूँ।

एक शख़्स मासूम से उस शख़्स की फ़िशारे क़ब्र के लिये पूछता है जिसे सूली दी गई हो और वो बरसो दार पर लटका रहे तो आप जवाब में फ़रमाते हैं कि जो ज़मीन का मालिक है वही हवा का भी मालिक है ख़ुदा हुक्म देता है कि इसे फ़िशारे क़ब्र से ज़्यादा सख़्त फ़िशार दे (यानी अगर वो इस फ़िशार का मुस्तहक़ हो) चुनाँचे अबूअब्दुल्लाह (अ.स) फ़रमाते हैं "इन्ना रब्बुल अर्ज़ हुवा रब्बुल हवा................ज़ग़तत क़ब्र" बिहारूल अनवार जिल्दः- 3सफ़्हाः- 182। एक मुहक़िक़े बुज़ुर्ग का क़ौल है कि अगर कोई शख़्स ख़ुदा ,हज़रते रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व)   और वहीय पर ईमान रखता हो तो उसके लिये इन मतालिब का क़ुबूल कर लेना आसान है।

ख़्वाब बरज़ख़ का एक छोटा सा नमूना है

दुनिया में आलमे बरज़ख़ का नमूना ख़्वाब देखना है। आदमी ख़्वाब में अजीब अजीब चीज़ों का मुशाहिदा करता है कभी देखता है कि आग के शोलों में जल रहा है और फ़रियाद कर रहा है कि हमें बचाओ ! लेकिन जागने के बाद अपने क़रीब के लोगों से पूछता है कि मेरी आवाज़ सुनी थी ?तो वो कहते हैं कि नहीं ! दरहाँलाकि वो ख़ुद ये ख़्याल कर रहा था कि ज़्यादा चीख़ने की वजह से उसके गले में ख़राश आ गई है या ये देखता है कि वो ज़ंजीरों में क़ैद है और दबाव की शिद्दत से उसका दम घुट रहा है वो हर चन्द मदद के लिये पुकारता है लेकिन कोई उसकी फ़रियाद को नहीं पहुँचता इसी तरह ख़ुदा ही जानता है कि मुर्दे किस क़दर नाला ओ फ़रियाद करते हैं लेकिन हम नहीं सुनते यक़ीनन वो एक दूसरी ही जगह है अलबत्ता कभी कभी बातिनी ऊमूर ज़ाहिरी हालात में भी सरायत करते हैं। किताबे काफ़ी में इमाम बहक़्क़े नातिक़ जाफ़रे सादिक़ (अ.स) से रवायत है कि ख़्वाब ओ रोया इब्तेदाऐ ख़िलक़त में नहीं था अन्बियाऐ साबेक़ीन में से एक नबी जब क़यामत के बारे में गुफ़तगू करते थे तो लोग कुछ सवालात करते थे मसअलन कहते थे मुर्दा किस तरह ज़िन्दा होता है ?चुनाँचे उसी रात जब वो सोये तो कुछ ख़्वाब देखे और सुब्ह को एक दूसरे से बयान किये ,नीज़ अपने पैग़म्बर से भी उनका ज़िक्र किया तो उन पैग़म्बर ने फ़रमाया कि तुम्हारे ऊपर ख़ुदा की हुज्जत तमाम हो गई क्योंकि जो कुछ तुमने ख़्वाब में देखा है वो एक नमूना है उसका जो मरने के बाद देखोगे कभी कभी ऊमूरे बातिनी ज़ाहिर में भी असर दिखाते हैं ये जो कहा जाता है कि क़ब्ररिस्तान की ज़ियारत को जाओ ,और फ़ातिहा पढ़ो जबकि मुर्दे की रूह ख़ाक के उस नुक़्ते में महदूद नहीं है बल्कि ख़ुदा ही जानता है कि वो कहाँ है लेकिन चूँकि उसका जस्दे ख़ाकी उस नुक़्ताऐ ख़ाक में दफ़्न है लिहाज़ा वो इस मक़ाम से ताल्लुक़ रखती है रवायतों में बताया गया है कि मोमिन की रूह अमीरूलमोमिन अली (अ.स) के जवार में वादिस्सलाम के अन्दर और काफ़िर की रूह बरहूत में रहती है मरने के बाद जिस्म बरज़ख़ी होता है जो दुनियावी जिस्म की तरह कसीफ़ नहीं होता वो किसी माददी साज़ ओ सामान का मोहताज नहीं होता और इस क़दर लतीफ़ होता है कि बाज़ रूहें (अगर क़ैद ओ बन्द में न हों) तो सारे आलम का एहाता कर सकती हैं।

मरहूम शैख़ महमूद ईराक़ी ने अपनी किताब "दारूस्सलाम" के आख़िर में नक़्ल किया है कि सैयदे जलील और आरिफ़े नबील सैय्यद मुहम्मद अली ईराक़ी ने (जो उन लोगों में शुमार होते हैं जिन्होंने हज़रते हुज्जत (अ.स) की ज़ियारत की है) फ़रमाया कि जब मैं अपने बचपने के ज़माने में अपने असली वतन (क़रियऐ करमरूद जो ईराक़ के क़रियों में से है) में रहता था तो एक शख़्स ने जिसके नाम ओ नसब से मैं वाक़िफ़ था वफ़ात पाई और उसे उस क़ब्ररिस्तान में लाकर दफ़्न किया जो मेरे मकान के बिल्कुल सामने था। चालीस रोज़ तक रोज़ाना जब मग़रिब का वक़्त आता तो उसकी क़ब्र से आग के आसार ज़ाहिर होते थे और मैं उसके अन्दर से बराबर जाँसोज़ नालों की आवाज़ें सुना करता था इब्तेदाई दिनों में तो एक शब उसके गिरया ओ ज़ारी और नाला ओ फ़रियाद ने इस क़दर शिद्दत इख़्तियार कर ली कि मैं ख़ौफ़ ओ हिरास की वजह से लरज़ने लगा और मुझ पर ग़शी तारी हो गई ,मेरे हमर्दद अशख़ास मुतावज्जे हुऐ और मुझे अपने घर उठा ले गए काफ़ी मुद्दत के बाद मैं अपनी सही हालत पर आया लेकिन उस मय्यत का हाल जो देखा था उस से मुताज्जिब था क्योंकि उसके हालाते ज़िन्दगी ऐसे अन्जाम से मुताबिक़त नहीं रखते थे यहाँ तक कि मालूम हुआ कि वो शख़्स एक मुद्दत तक हुकूमत के दफ़्तर में काम कर चुका था वो ऐसे एक शख़्स से जो सैय्यद भी था मालियात के सिलसिले में इतनी रक़म का सख़्ती से मुतालिबा कर रहा था जिसे अदा करने पर वो सैय्यद क़ादिर नहीं था चुनाँचे उस शख़्स ने उसे क़ैदख़ाने में डाल दिया और मुद्दत तक उसे छत से लटकाए रक्खा। मरहूम ईराक़ी कहते हैं कि मैंने उस मरने वाले शख़्स को देखा था लेकिन रूसवाई के ख़ौफ़ से उसके नाम ओ नसब का ज़िक्र नहीं किया।

उसके बाद कहते हैं कि जनाब सैय्यदे मज़कूर ने नक़्ल किया कि मैं तेहरान से इमामज़ादा हसन (अ.स) की ज़ियारत के लिये एक क़रिये में गया मेरा एक साथी रौज़े के सहन में एक क़ब्र पर बैठा दुआ या ज़ियारत में मशग़ूल था यहाँ तक कि ग़ुरूबे आफ़ताब के वक़्त दफ़्अतन उस क़ब्र के अन्दर से तेज़ गर्मी ज़ाहिर हुई गोया उसके अन्दर किसी लोहार की भठठी जल रही थी और उस क़ब्र की क़रीब ठहरना मुमकिन नहीं था हाज़िरीन के मजमे ने भी इस कैफ़ियत का मुशाहिदा किया जब मैंने क़ब्र की  लौह को पढ़ा तो उस पर एक औरत का नाम नक़्श था। मतलब का ख़ुलासा ये है कि कभी ऐसा भी होता है कि आलमे बरज़ख़ में रूह के अज़ाब की शिद्दत इस जस्दे ख़ाकी पर भी असर अन्दाज़ होती है मिसाल के तौर पर यज़ीद इब्ने माविया अलैहुमुल हाविया की क़ब्र जिस वक़्त बनी अब्बास ने बनी उमय्या की क़ब्र को खुदवाया कि उनके अजसाद को नज़रे आतिश करें तो यज़ीद लानतुल्लाहे अलैह की क़ब्र में राख की एक लकीर के अलावा और कुछ नहीं मिला जो उस लईन के जले हुऐ जसदे ख़ाकी की अलामत थी और इस मतलब के शवाहिद और नमूने भी काफ़ी तादाद में हैं।

सिर्फ़ चन्द मवारिद नक़्ल करने पर इक्तेफ़ा

सफ़ीनतुल बिहार जिल्दः- 2सफ़्हाः- 568में नक़्ल किया गया है कि जिस ज़माने में माविया के हुक्म से ज़ेरे ज़मीन नहर जारी करने के लिये कोहे ओहद को खोदा जा रहा था तो तीशा हज़रते हमज़ा अलैहिर्रमा की उँगली में लग गया और उस से ख़ून जारी हो गया इसके अलावा जंगे ओहद के दो शहीद उमरू बिन जमूह और अब्दुल्लाह बिन उमरू की क़ब्रे भी नहर के रास्ते में आ रही थीं लिहाज़ा उनके जिस्म भी बाहर निकाले गऐ दरहालाँकि उनके जिस्म बिल्कुल तरो ताज़ा थे जबकि उनकी शहादत और दफ़्न के ज़माने से माविया के दौर तक चालीस साल गुज़र चुके थे चुनाँचे एक और क़ब्र तैयार करके दोनों शहीदों को एक ही क़ब्र में दफ़्न कर दिया गया।

किताब रौज़ातुलजिन्नात में मनक़ूल है कि बग़दाद के बाज़ हुक्काम ने जब देखा कि लोग इमाम मूसा काज़िम (अ.स) की ज़ियारत को आते हैं तो उन्होंने तय किया कि क़ब्रे मुबारक को खुदवा डालें और ये कहा कि हम क़ब्र को खोलते हैं अगर जिस्म ताज़ा हुआ तो ज़ियारत की इजाज़त देगें वरना नहीं ! उनमें से एक शख़्स ने कहा कि शिया अपने उल्मा के बारे में भी यही ऐतेक़ाद रखते हैं और उनके क़रीब ही शियों के एक बड़े आलिम मौहम्मद बिन याक़ूब क़ुलैनी अलैहिर्रमा की क़ब्र भी है लिहाज़ा बेहतर होगा कि शियों के अक़ीदे की सिदाक़त मालूम करने के लिये उन्हीं की क़ब्र को खोद कर देख लिया जाऐ चुनाँचे उनकी क़ब्र खोदी गई और उनका जिस्म बिल्कुल ताज़ा पाया गया और उनके पहलू में एक बच्चे का जसद भी मिला जो मुमकिन है उन्हीं के फ़रज़न्द का हो ,बग़दाद के हाकिम ने हुक्म दिया कि इन बुज़ुर्गवार की क़ब्र तामीर करके उस पर एक शानदार क़ुब्बा बना दिया जाए और ये मक़ाम एक ज़ियारतगाह की सूरत में मशहूर हुआ उसी किताब में शैख़ सुदूक़ मौहम्मद इब्ने बाबुविया रह. के करामात का तज़किरा करते हुए लिखते हैं कि उनकी क़ब्र शहरे रै में हज़रत अब्दुल अज़ीम अलै. के क़रीब है और ख़ुद हमारे ज़माने में उनकी ये करामत ज़ाहिर हुई जिसका बहुत से लोगों ने मुशाहिदा किया है कि उन बुज़ुर्गवार का जसद बाक़ी है इस वाक़िये की तफ़सील ये है कि सैलाब आ जाने की वजह से क़ब्र में एक शिग़ाफ़ पैदा हो गया जब लोगों ने उसकी तामीर का इरादा किया तो उस सरदाब का एक मुशाहिदा किया जिसमें आप दफ़्न हैं और आपके जसद को ताज़ा पाया ये ख़बर तेहरान में मशहूर हुई और फ़तह अली शाह क़ाचार के कानों तक पहुँची तो बादशाह ने कहा "मैं इस करामत को क़रीब से देखना चाहता हूँ चुनाँचे ये उल्मा ,वुज़्रा ,उमरा और अरकाने दौलत की एक जमाअत के साथ सरदाब में पहुँचा और जसदे मुबारक को वैसा ही पाया जैसा लोगों ने देखा और बयान किया था बादशाह ने हुक्म दिया कि इस क़ब्र पर एक पुरशिकोह इमारत तामीर की जाए और वो मक़ाम आज तक एक ज़ियारतगाह है। इब्ने बाबूविया की वफ़ात 381में हुई और जसद का इन्केशाफ़ 1238में हुआ इस बिना पर वफ़ात से इन्केशाफ़ तक आठ सौ पचास साल ( 850)की मुद्दत गुज़र चुकी थी।

ख़ुलासा ये कि आलमे बरज़ख़ और मौत से क़यामत  तक रूहे इन्सानी के हालात ऐतेक़ाद वहीऐ इलाही के तहत है जो क़ुराने मजीद और मुतावतिर रवायात के ज़रिये रसूले ख़ुदा सलल्लाहो अलैहे वा आलेही वस्सलम से हम तक पहँची है जैसा कि बयान हो चुका है मिसाल के तौर पर मलाएका ,क़यामत ,सिरात ,मीज़ान ,बहिश्त और दोज़ख़ ,सब पर बिलग़ैब है और इसका सबब भी वहीऐ इलाही है।

हर तरह के इस्तेबाद और शुब्हे को रफ़्आ करने और बरज़ख़ी सवाब ओ उक़ाब से इस बिना पर इन्कार करने वालों के जवाब के लिये ये क्यों कर हो सकता है कि रूहें सवाब ओ उक़ाब में हो और हम इन से बेख़बर रहें वही अच्छे और बुरे ख़्वाब काफ़ी हैं क्योंकि ख़्वाब में गुफ़्तगू आवाज़ें और जोश ओ ख़रोश सभी  कुछ होता है लेकिन आसपास के लोग नहीं सुनते ,और ये कि कभी कभी आलमे रोया में मरने वालों को बेहतरी और ख़ुशहाली या सख़्ती और बदहाली के आलम में देखा तो ख़्वाब देखने वाला इस वाक़िये और हक़ीक़ते अम्र की इत्तेला क़रार नहीं दे सकता क्योंकि बहुत से ख़्वाब अज़गास और एहलाम ,शैतानी और वहम की पैदावार होते हैं और उनमे बहुत से पेचीदा और ताबीर के मोहताज होते हैं हाँ ! उनमें से कुछ ख़्वाब सच्चे भी होते हैं जो मुर्दे की मौजूदा हालत के आईनादार होते हैं मसअलन् अगर कोई शख़्स किसी मुर्दे को राहत की हालत में देखे तो ये नहीं कहा जा सकता कि वो हमेशा ही इसी आलम में रहता है क्योंकि इस चीज़ का ऐहतेमाल है कि मुर्दा उस वक़्त अपनी इबादत और नेक कामों के औक़ात की मुनासिबत से फ़ायदा उठा रहा हो लेकिन वही दूसरे वक़्त में अपने ग़लत और नाजायज़ अफ़आल के औक़ात के लिहाज़ से उनके पादाश और सज़ा में गिरफ़्तार हो इसी तरह इसके बरअक्स अगर मय्यत को सकरात और बीमारी के आलम में देखिये तो इस बात का सुबूत नहीं है कि वो मुस्तक़िल तौर से इसी हालत में है इसलिये कि मुमकीन है कि वो शख़्स गुनाहगारी की साअतों के जवाब में मुसीबतें भुगत रहा हो और इसके बाद अपने नेक आमाल की साअतों के एवज़ मसर्रतों आराम के औक़ात से बहरामन्द हो "फ़मन यामल मिसक़ाला ज़र्रतन ख़ैरन यरा वमन यामन मिसक़ाला ज़र्रतन शरअन यरा" इस मतलब को पेश करने की ग़रज़ ये है कि अगर कोई शख़्स किसी मरने वाले को बुरी हालत में देखे तो मायूस न हो और ये ऐहतेमाल पेशेनज़र रक्खे कि हो सकता है इसके बाद उसे ख़ुशहाली नसीब हो और दुआ ,सदक़ा और उसकी नियाबत में आमाले सालेह बजा लाकर उसकी निजात के लिये कोशिश करे और अगर मुर्दे को बेहतर हाल में देखे तो इसका यक़ीन न करे कि ये हमेशा इसी हालत में रहेगा और ये ज़िन्दा अफ़राद की दादरसी और मदद से बेनियाज़ हो चुका है। इस तूले कलाम की दूसरी ग़रज़ ये है कि हम ये जान लें कि बरज़ख़ में हमारी सरगुज़शतें बहुत कम किसी के ऊपर ज़ाहिर होती हैं और अगर फ़र्ज़ कर लिया जाए कि मालूम हो भी जाती हैं तो ये कहाँ से मालूम हुआ कि हमारे मुताअल्लेक़ीन हमारे लिये दिलसोज़ी और हमर्ददी के ऊमूर अन्जाम देगें ?लिहाज़ा बेहतर यही है कि जब तक हम ज़िन्दा हैं ख़ुद अपनी फ़िक्र में रहें यानी अपने गुज़िश्ता आमाल का पूरे ग़ौर ओ ख़ौज़ से मुतालिआ करें अगर हम से कोई वाजिब तर्क हुआ है तो उसकी तलाफ़ी करें अपने गुनाहों से तौबा करें और जहाँ तक हो सकें आमाले सालेह में सई ओ कोशिश करें बिल ख़ुसूस वाजिब और मुस्तहब नफ़क़े अदा करें और सफ़रे आख़िरत के साज़ ओ सामान और ज़रूरियात पर तवज्जो रक्खेः-

"अल्ला हुम्मा अरज़ुक़नी अलतज़ फ़ी अन दारूल ग़ुरूर वल इस्तेदादइल मौत क़बला हुलूलुल फ़ौत"

मौत ताअल्लुक़ात से क़त्अ कर देती है

एक और अहम मतलब जिसे जान लेना ज़रूरी है ये है कि आलमे बरज़ख़ की सख़तियों में से एक ये भी है कि मरने वाला उन चीज़ों या इन्सानों की जुदाई से मुज़तरिब और बेचैन होता है जिनसे दुनिया में दिलचस्पी और मोहब्बत रखता था मज़ीद वज़ाहत के तौर पर अगर आदमी ने किसी चीज़ से तआल्लुक़ क़ायम कर लिया है तो जिस वक़्त उस से जुदा होता है उस वक़्त तकलीफ़ महसूस करता है मसअलन अगर किसी की ज़ौजा हसीन ओ जमील थी और उसको मौत आ गई तो वो उसकी जुदाई से किस क़दर मुतास्सिर होगा बाज़ औक़ात तो इस क़िस्म के हवादिस कुछ लोगों को दिवानगी की हद तक पहुँचा देते हैं। मेरे एक रिश्तेदार थे (ख़ुदा उन पर रहमत नाज़िल फ़रमाऐ) उनका बीस साल का जवान फ़रज़न्द मियादी बुख़ार में मुब्तिला हुआ और उस पर नाज़अः की हालत तारी हो गई जब बाप ने बेटे की ये कैफ़ियत देखी तो वज़ू किया और पूरी तवज्जो के साथ दुआ की कि ख़ुदावन्दा ! अगर तू मेरे बेटे को उठाना चाहता है तो पहले मुझे उठा ले ! उनकी दुआ क़ुबूल हो गई बाप को मौत आ गई बेटा ज़िन्दा रहा लेकिन मौत के मानी ,मौत क्या चीज़ है ?मौत यानी फ़िराक़ तुम एक शख़्स को देखते हो कि बीवी बच्चों और दौलत ओ सरवत की जुदाई में तड़पता है ये चीज़ ख़ुदा अपनी जगह पर आलमे बरज़ख़ के मुख़्तलिफ़ अज़ाबों में से एक हैं जिसका नमूना इस दुनिया में भी मौजूद है ,हद ये है कि दुनिया में इन्सान अपने को अफ़यून ,तम्बाकू नौशी और अख़बारबीनी वग़ैरा का आदी बना लेता है लेकिन बरज़ख़ में इस तरह के मशाग़िल मौजूद नहीं हैं।

मक़सद ये है कि इन्सान को मौत के वक़्त हर तरह के अलाएक़ से दस्तबरदार होना चाहिये ताकि आलमे बरज़ख़ के अन्दर उनके फ़िराक़ की अज़ीयत न बर्दाश्त करना पड़े।

क़ैस इब्ने आसिम बनी तमीम की एक जमाअत के साथ मदीनए मुनव्वरा पहुँचे और हज़रते रसूले ख़ुदा सलल्लाहो अलैही वा आलेही वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िरी का शरफ़ हासिल किया तो आँहज़रत से एक जामे और मुकम्मल मोएज़े की दरख़ास्त की (ज़िम्नी तौर पर ये जान लेना चाहिये कि क़ैस एक बड़े आलिम थे और क़ुबूले इस्लाम से क़ब्ल हुकमा में शुमार होते थे)। आँहज़रत ने फ़रमाया कि हर इज़्ज़त के लिये एक ज़िल्लत है और हर ज़िन्दगी के बाद मौत है और तुमने जो कुछ भी दिया है उसका एक अज्र और एवज़ है। इस इरशाद का मतलब ये है कि इस वक़्त जो काम करना चाहो कर सकते हो इस लिये कि तमाम कामों का हिसाब होगा।

आलमे बरज़ख़ में सिर्फ़ अमल तुम्हारे साथ है

आलमे बरज़ख़ में जो चीज़ इन्सान का साथ देती है वो सिर्फ़ अमले सालेह है जो इसके क़रीब रहता है और इसकी निगहदाशत करता है और अमल बद है तो इसकी दादरसी नहीं करता और इसे छोड़ता भी नहीं हज़रत अमीरूलमोमिनीन (अ.स) फ़रमाते हैं कि "जो शख़्स मौत के क़रीब होता है वो अपने माल की तरफ़ रूख़ करता है और कहता है कि मैंने तुझे जमा करने में बहुत ज़हमतें और मुसीबतें झेली हैं। माल जवाब देता है कि सिर्फ़ एक कफन के अलावा तुम मुझ से कोई और फ़ायदा नहीं उठा सकते फ़िर अपने फ़रज़न्दों की जानिब रूख़ करता है तो वो भी जवाब देते हैं कि हम सिर्फ़ क़ब्र तक तुम्हारे साथ हैं उसके बाद अपने अमल की तरफ़ रूख़ करता है तो वो कहता है कि मैं तुम्हारा हमेशा साथ दूँगा।

वाअसबरल हुक्म रब्बोका फ़इन्नका बाऐनना

यानी सब्र करो ऐ पैग़म्बर ! अपने परवरदिगार के हुक्म के लिये यक़ीनन तुम हमारी नज़र में हो इस जगह हुक्म से मुराद मुशरेकीन को मोहलत देना ,पैग़म्बर की तरफ़ से उन्हें इसलाम की दावत देना और उनकी अज़ीयत रसानी को बर्दाशत करना है ,ख़ुदा ने ये नहीं फ़रमाया के मुशरेक़ीन के आज़ारो अज़ीयत पर सब्र करो बल्कि ये फ़रमाया कि ख़ुदा के हुक्म पर सब्र करो ! हालाँकि नतीजा दोनो का एक ही था लेकिन सबब इसका ये था कि आँहज़रत के लिये सब्र आसान हो जाए यानी चूँकि हज़रते रसूले ख़ुदा  अब्दे मुतलक़ और मुहिब्बे सादिक़ थे लिहाज़ा जब आपका माबूद आपको हुक्म दे कि हमारे हुक्म पर सब्र करो यानी जब मैं ऐसा हुक्म दे चुका हूँ कि फ़िलहाल मुशरिक़ीन को मोहलत देता हूँ और उन्हें अज़ाब में गिरफ़्तार नहीं करूगा तो तुम भी दावते इस्लाम से दस्तबरदार न हो और उनकी अज़ीयतों आज़ार पर तहम्मुल से काम लो और इस तरह आप पर सब्र आसान हो जाए ख़ुसूसन "बेऐनना" के फ़िक़रे से साथ। खुलासा ये कि पैग़म्बरे ख़ुदा पर फ़र्ज़ था कि तेरह साल तक मक्काऐ मुअज़्ज़मा में रह के रंजो अलम का सामना फ़रमाऐं और ख़ुदा के लिये तरह तरह के ज़ुल्म ओ सितम बर्दाशत फ़रमाऐं यहाँ तक कि जंगे बद्र में दुशमनों से इन्तेक़ाम लिया जाऐ।

इस लिये कि अगर ये तय किया जाता कि ख़ुदा उन्हें मोहलत न दे और झुट लाने वाले जब इज़ा पहुँचाऐं तो हलाक कर दिये जाएं तो दावते ख़ुदावन्दी बे नतीजा होके रह जाती बल्कि ये ज़रूरी था कि उन्हें काफ़ी मुद्दत तक मोहलत दी जाएं ताकि उनमें से कुछ लोग ईमान ले आऐं और जो लोग कुफ़्र के ऊपर मुसिर हैं उनपर हुज्जत तमाम हो जाऐ और तमाम पैग़म्बरों के बारे में सुन्नते इलाही भी रही है बल्कि गुनाहगारों के बारे में यही दस्तूर है कि ख़ुदा उन्हें मोहलत देता है। रवायत में है कि जब हज़रत मूसा (अ.स) ने फ़िरऔन के बारे में नफ़रीन की तो पूरे चालीस साल की मुद्दत गुज़रने के बाद वो हलाक हुआ ख़ुदा मोहलत तो देता है लेकिन बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं जो अपनी इस्लाह के लिये इस मौक़े और मोहलत से फ़ायदा उठा ते हैं। (किताब क़यामत ओ कुरआन सफ़्हाः- 124)

तुम्हारी रूह आलमे बरज़ख़ में रिज़्क़ चाहती है

आओ इस हक़ीक़ी जमाल के लिये ऐहतेराम और कोशीश करो जिसकी असलियत आले मोहम्मद सलवातुल्लाहे अलैहिम अजमईन की मुक़द्दस ज़ातों में है मैदाने हश्र में सूरज और चाँद न होगें वहाँ कोई नूर न चमकेगा सिवा जमाले मोहम्मद सलल्लाहो अलैहे वा आलेही वस्सलम के या उस शख़्स के जो मुहम्मदी बन जाऐ वहाँ रूह का हुस्न ओ जमाल होगा बदन का नहीं अपने ऊपर ऊपर इस क़दर ज़ुल्म न करो और अपनी रूह से ग़ाफ़िल न रहो जिस्मानी आराम ओ आसाईश के लिये इस क़दर वसाएल मोहय्या हैं तो अपनी क़ब्र के लिये भी कोई काम अन्जाम दो ! आलमे बरज़ख़ में ये जिस्म नहीं बल्कि तुम्हारी रूह रिज़्क़ चाहती है कितने अफ़सोस की बात है अगर तुम्हारा लिबास आग से तैय्यार हो (सराबीलहुम मिन क़तरान वतग़शी वजूहूहूमुल ,नार सूराः- इब्राहीम आयतः- 50)काश तुम देखते कि आग ने ज़ालिमों को किस तरह जकड़ लिया है ये उन्हीं की ख़सलतों का नतीजा है कि आतिशे अज़ाब ने उन्हें चारों तरफ़ से घेर रक्खा है।

(किताबः नफ़्से मुतमइन्ना सफ़्हाः- 74)

ऐ दीन के हामी बरज़ख़ी जन्नत में आ जा !

आयऐ मुबारक "क़ीला अदख़लल जन्नत" के बारे में चन्द मुफ़स्सिरीन ने लिखा है कि जैसे ही पैग़म्बरों का ये हामी क़त्ल हुआ फ़ौरन उसकी रूहे मुकद्दस को निदा हुई कि बहिश्त में दाख़िल हो जा और रहमते ख़ुदावन्दी का ये हुक्म पहुँचा कि बोस्ताने इलाही में वारिद हो ! अलबत्ता यहाँ आख़िरत और क़यामत की जन्नत नहीं बल्कि बरज़ख़ी जन्नत मुराद है बरज़ख़ी जन्नत उस वक़्त से जब आदमी को मौत आती है क़यामत तक है जिस वक़्त से रूह और बदन के दरमियान जुदाई होती है बरज़ख़ शुरू हो जाता है। (वमन वराऐहुम बरज़ख़ा इला  यौमुल याबेसून ,सूराः- 23,आयतः- 100)मौत से क़यामत तक बरज़ख़ यानी एक दरमियानी वास्ता है न वो दुनिया के मिस्ल है ,उसकी क़साफ़तो के साथ ,न आख़िरत की मानिन्द है उसकी लताफ़तों के साथ ,ये एक दरमियानी हद है बरज़ख़ इस वक़्त भी मौजूद है और इसी आलम में है लेकिन उसके परदाए ग़ैब में है ,माद्दा और महसूसात से पोशीदा है ये माद्दी जिस्म उसे देख नहीं सकता तुम ख़ुद ग़ौर करो कि हवा मौजूद है और जिस्म मुरक्कब भी है लेकिन आँख उसे नहीं देखती  इसलिये कि वो लतीफ़ है ये मेरी और तुम्हारी आँख का नक़्स नहीं हैं कि सिवा माद्दे और माद्दियात के और किसी शै को नहीं देख सकती अलबत्ता इस जिस्म से अलहादगी के बाद बरज़ख़ी अजसाम भी जो माद्दी नहीं हैं क़ाबिले दीद हो जाते हैं। ख़ुदा वन्दे आलम ने क़ुरआने मजीद में बहिश्ते आख़िरत के लिये जो वादा फ़रमाया है वो बरज़ख़ी बहिश्त में भी है चुनाँचे रूह के जिस्म से जुदा होते ही उसे बशारत दे दी जाती है कि बहिश्त में आ जा ! शहीद तमाम गुनाहों से पाक हो जाता है और शहादत से बालातर कोई नेकी नहीं है (फ़ौक़ा कुल्ला बरबरा हत्ता यन्तेहा इलल्ल क़त्ला फ़ी सबील्लाह ,सफ़ीनतुल बिहार जिल्दः- 2सः- 687,किताब क़ल्बे क़ुरान ,सफ़्हाः- 85)

क़ीला अदख़लल जन्नता..................ख़ामेदून ,सूराऐ यास आयतः- 26से 29। यानी (हबीबे नज्जार) से कहा गया कि जन्नत में दाख़िल हो जाओ ! उस वक़्त उन्होंने कहा कि मेरे परवरदिगार ने मुझे बख़्श दिया और मुझे बुज़ुर्ग अफ़राद में से क़रार दिया है काश मेरी क़ौम वाले भी जान लेते और हम ने उनके बाद उनकी क़ौम पर न तो आसमान से कोई लशकर उतारा और न हम (इतनी सी बात के लिये कोई लश्कर) उतारने वाले थे वो तो सिर्फ़ एक चीख़ थी पस वो (चिराग़ की तरह) बुझके रह गऐ। (मुतारज्जिम)

मोमिन के लिये उसकी मौत से क़यामत तक बरज़ख़ी जन्नत है

जब मोमिने आले आसीन को और पैग़म्बरों के इस यार ओ मददगार को क़त्ल किया गया तो उनसे कहा गया कि बहिश्त में जाओ ! जब वो दाख़िले बहिश्त हुऐ तो कहा ,काश मेरी क़ौम ये जानती कि मेरे परवरदिगार ने मुझे बख़्श दिया है और मुझे बलन्द मरतबा लोगों में से क़रार दिया है दरअस्ल पैग़म्बर और ख़ुदा की तरफ़ दावतत देने वाले उम्मतों के ख़ैरख़्वाह होते हैं चूँकि वो सिवा हमर्ददी के और कोई ग़रज़ नहीं रखते लिहाज़ा चाहते हैं कि ये ख़िलक़त निजात पाऐ और सआदतमन्दी की मंज़िल पर फ़ायज़ हो बावजूद कि लोगों ने उन्हें मारा और क़त्ल किया फिर भी उन्होंने नफ़रीन नहीं की बल्कि दिलसोज़ी और मेहरबानी ही करते रहे और उनकी यही तमन्ना रही कि काश ये बेख़बर लोग जिन्होंने हमारी नसीहतों को क़बूल नहीं किया समझ लेते।

मैंने कहा था कि मेरा मक़सूद बरज़ख़ी जन्नत है जो मोमिन के लिये मौत के वक़्त से रोज़े क़यामत तक है अगर मोमिन हो और कुछ गुनाह भी रखता हो और बग़ैर तौबा के मर जाऐ तो अपनी उम्र की साआतों के हिसाब से बरज़ख़ के अज़ाब में भी रहेगा और सवाब में भी यहाँ तक कि आख़िरकार तसफ़िया हो जाऐ ,कभी ऐसा भी होता है कि इसी बरज़ख़ में गुनाहों से पाक हो जाता है और जिस वक़्त मैदाने महशर में वारिद होगा तो उसके ज़िम्मे कोई हिसाब न होगा। आयत "क़ीला अदख़ल्लल जन्नता" के बारे में बाज़ मुफ़स्सिरीन का क़ौल है कि इस मोमिन के क़त्ल की ख़बर पहले ही से दे दी जाना चाहिये थी इसके बाद ये फ़रमाया जाता कि इससे कहा गया............. लेकिन यहाँ क़त्ल का ज़िक्र नहीं हुआ इसका सबब ये है कि इस क़ौल से क़ब्ल इन्हीं आयत से मौत का मफ़हूम हासिल हो जाता है "वमा अनज़लना अला क़ौमेही मिन बादहू" में कल्माऐ मिन बाद............. से ज़ाहिर हो जाता है कि ऐसा उनकी मौत के बाद हुआ और ये ज़रूरी नहीं है कि दोबारा उनके क़त्ल होने का ज़िक्र किया जाऐ।

"या हसरता अलल इबाद......................................... लायरजेऊन"

बरज़ख़ में इन्सानों की हालत हक़ीक़तो का इन्केशाफ़ है

आयत "या हसरता अलल इबाद" के सिलसिले में बताया गया है कि हक़ीक़तन इन्सान की हालत बरज़ख़ और क़यामत में ज़ाहिर होगी क्योंकि जो कुछ यहाँ पोशीदा है वहाँ उसका इन्केशाफ़ हो जाऐगा उस वक़्त जिन लोगों ने पैग़म्बरों और ताबेईन के साथ तमस्ख़ुर और इस्तेहज़ा किया था "दआह इलल्लाह" ख़ल्के ख़ुदा को आख़िरत की तरफ़ दावत देने वाले उनसे तमस्ख़ुर करेंगे जिस वक़्त हक़ीक़त ज़ाहिर होती है तो ऐसे लोगों को किस क़दर अफ़सोस और निदामत आरिज़ होती है। क़ुराने मजीद में सारी क़यामत को यौम से ताबीर किया गया है "यौमल आज़फ़ता" "यौमुल क़यामत" "यौमुल वाक़िया" क़यामत में दुनिया के दिनों की तरह आफ़ताब न होगा (इज़्ज़श शम्सा कौरत जम्अश शम्से वल क़मर) (ज़मीने महशर में शम्स ओ क़मर न होंगे)