इस्लाम और पर्दा

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इस्लाम और पर्दा लेखक:
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इस्लाम और पर्दा

इस्लाम और पर्दा

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

इस्लाम और पर्दा

(लेखकः- अल्लामा ज़ीशान हैदर जव्वादी)

(अनुवादकः- सैय्यद ग़ुलाम हुसैन सदफ़ जौनपुरी)

अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क

प्राक्कथन

औरत का समाज में स्थान एंव महत्व के विषय पर बहुत से लेख लिखे जा चुके हैं। आज के इस नवीन युग में पूरे संसार में सत्री जाति की स्वत्रंता के लिये संघर्ष हो रहा है और यहाँ संघर्ष पुरूषो की तरफ़ से है ऐसा प्रतीत होता है जैसे स्वयं स्त्रीयाँ अपने हित अहित, अपनी परतंत्रता और स्वतंत्रता के विषय में विचार करने में सक्षम न हो और इस कार्य का उत्तरदायित्व पुरूष जाति के कांधो पर ही रूका है।

इस संघर्ष और आन्दोलन को आड़ बना कर बहुधा धर्मो पर दोषारोपण किया जाता है और इस दोषारोपण का प्रमुख लक्ष्य इस्लाम धर्म को बनाया जाता है और यह वयक्त करने का प्रयत्न किया जाता है कि इस्लाम ने औरतों को "परदे" के बन्दीग्रह में डाल कर स्त्रियों का सबसे अधिक शोषण किया।

यदि न्याय की दृष्टि से देखा जाए तो सत्यता इसके विपरीत है इसलिये की इस्लाम नें स्त्री को दासी नहीं समझा है बल्कि उसको उसका उचित स्थान दिया है। इस्लाम की दृष्टि में एक स्त्री का कार्य क्षेत्र से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है इसलिये कि भविष्य के लिये पुरूषों का योगदान केवल नई पीढ़ियों की सृष्टि सृजन तक सीमित है जबकि स्त्रियों पर सृष्टि सृजनता के साथ नई पीढ़ी के संस्कारों की रचना आने वाली पीढ़ी को मानवता के उच्च गुणों से सुशोभित करना इत्यादि का दायित्व भी नीभाना पड़ता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भविष्य के विषय में एक पुरूष से ज़्यादा एक स्त्री का महत्व है और जो जितना महत्वपूण होता है उसकी सुरक्षा का उतना ही अधीक ध्यान रखा जाता है आप किसी कार्यालय में चले जायें तो आपको प्रतीत होगा कि एक बाबू जो फ़ाइलों के मध्य बैठा कार्यरत है प्रकट में वह आफ़िस कार्य कर रहा है और कार्यालय अधिकारी को स्त्रीयों की भांति पृथक, कक्ष में पर्दे के भीतर स्थान देकर एक अलग कक्ष में बैठा दिया गया है, जहाँ बाबू की सीट से कम कार्य है मगर उसकी सुरक्षा ज़्यादा है उसको रक्षा कर्मी भी मिला है चपरासी भी है क्यों केवल इस लिये की वह अधिक महत्वपूर्ण है। कार्य बाबू अधिक करता है मगर कार्य की रूप रेखा अधिकारी बनाता है।

ठीक उसी प्रकार जीवन रूपी इस कार्यालय में वर्तमान की कार्यशैली और जीवन यापन का कुल भार पुरूष रूपी बाबू के सर पर हैं परन्तु भविष्य की पीढ़ियों की कर्मठता का मानचित्र केवल स्त्री रूपी अधिकारी द्वारा बनाया जाता है। इसी कारण इस्लाम ने स्त्री को महत्वपूर्ण मानते हुए गृह कक्ष में रहने की अज्ञा दी जिस प्रकार एक अधिकारी का अपमान है कि वह बाबुओं वाले कार्य करे उसी प्रकार एक स्त्री का यह अपमान है कि पुरूषों के कार्य वह करे।

फिर सृष्टि की संरचना पर विचार करते हुए हर न्यायप्रिय व्यक्ति यह अनुभव कर सकता है कि पुरूष प्राकृतिक रूप से बलिष्ठ है और स्त्री प्राकृतिक रूप से कोमल जो बलिष्ठ है उसे भोतिक आवश्यकताओं की पूर्ती का कार्य करना चाहिये और जो कोमल है उसे मानसिक और अन्तरात्मा की भांति तथा रचनात्मक कार्य करना चाहिये इसलिये प्रकृति ने पुरूष को शौर्य, वीरता, बलिष्ठता का प्रतीक माना है।

परन्तु आज के इस युग में आधुनिकता के नाम पर स्त्री की लज्जा, शीलता, शालीनता, सौन्दर्य आदि गुणों को वासना की प्रतिपूर्ति बना देना चाहा है। ऐसे भयानक वातावरण में बस अल्लाह ही समाज की इस डूबती नैया का बेड़ा पार लगाए। आमीन।

प्रस्तुत पुस्तक "परदा" अल्लामा ज़ीशान हैदर जव्वादी की एक ऐसी कृति है कि जिसमें बहुत संक्षेप में क़ुरान और हदीस के प्रकाश में स्त्रियों के वास्तविक मूल्यों को उनके महत्व व स्थान को दर्शाया गया है तथा इस बात की बौध्दिक द़ष्टि से विवेचना की गई है कि समस्त विचार धाराओं में केवल इस्लाम ही ऐसा धर्म है जिसने औरत को उसके सही स्थान पर पहुँचाया अर्थात वासानात्मक समाज की पथ भष्ट दृष्टि से बचा कर उसे परदे की सुरक्षा में रखा।

प्रस्तुत किताब चूँकि उर्दू में थी अतः मैंने यह चाहा कि हिन्दी पढ़ने वाले इस अमूल्य कृति से लाभावन्चित हो इसी कारण इसका हिन्दी रूपान्तरण इस्लाम और पर्दा के नाम से प्रस्तुत करने का बीड़ा उठाया है।

अन्त में मैं उन लोगों का आभार प्रकट करना भी आवश्यक समझता हूँ जिन्होंने मुझे इस पुण्य कार्य में सहयोग दिया विशेष कर मौलाना सदफ़ ज़ैदी का अभारी हूँ कि जिन्होंने अपना अमूल्य समय देकर इस पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद किया। मैं मौलाना ज़िशान हैदर जव्वादी का भी अभारी हूँ कि उन्होंने अपनी इस पुस्तक का हिन्दी संस्करण प्रकाशित करने की मुझे अनुमति दी।

सै0 अली अब्बास तबातबाई

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

हिन्दी अनुवाद

महा पवित्र ईश्वर के नाम से

कटुक.......... प्रखर ............कटु

स्त्री................ स्वाभिमान उपदेश

स्त्री! मानव समाज का वह महत्वपूर्ण स्तम्भ जिसके बिना मानव जाति असमाप्त एंव मनुष्यता अपूर्ण रह जाति है तथा मानव जीवन का वह मूल केन्द्र जिसने बिना मनुष्य के अस्तित्व की परिधि का स्थापित होना सम्भवतः असम्भव और कठिन है। संसार में ऐसे मनुष्य मिल सकते है जो अपने अस्तित्व में माता पिता दोनो से निष्काम रहे हों ऐसे मनुष्य भी उपलब्ध हो सकते हैं जो अपनी प्रकृति में पिता से लालसा रहित रहे हों किन्तु मनुष्यता के इतिहास में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अपने अस्तित्व में स्त्री क अनुगृहीत न रहा हो तथा जिसके अस्तित्व में माता पिता जैसे स्त्री का निवेश न रहा हो।

स्त्री मनुष्य की सभ्यता व प्रशिक्षण की वह मात्र उत्तरदायी है जिसके लालन पोषण पर संपूर्ण समाज की सभ्यता निर्भर है और जिसके लालन पालन पर समस्त समाज का कल्चर आधारित है। पुरूष के प्रशिक्षण का मैदान समाज व समुदाय है और स्त्री के प्रतिपालन का क्षेत्र उसके उत्संग (गोद) मनुष्य के पालन पोषण की प्रथम श्रेणी है। गृह गंत्व्य स्थान का दूसरा स्थान है और समाज तथा सम्मेलन समाज के प्रशिक्षण का अंतिम अधिष्ठान। अतः मनुष्य की सभ्यता पर आवरण चढ़ाने और उसकी वास्तिविकता को छुपाने का कार्य तो पुरूष भी सम्मान कर सकता है किन्तु स्वभाव निर्माण और प्रकृति के प्रतिपालन का भौतिक कार्य स्त्री को अधिकृत है जैसी स्त्री होगी वैसी ही शिक्षा होगी तथा जैसा प्रथम चित्र होगा वैसा ही मानचित्र बनेगा। प्रसिध्द कहावत हैः-

खिश्ते अव्वल चूँ नेहद मेमार कज,

तां सुरय्या भी खद दीवार कज

(जब राजन प्रथम ईंट टेढ़ी रख देता है तो वह दीवार आकाश तक टेढ़ी ही जाती है)

स्वाभिमान ! यही से स्त्री जीवन में स्वाभिमान के महत्व का अनुमान होता है। स्त्री जितनी ही लज्जाशील होगी उसी के अनुसार सिक्षा भी सदाचारयुक्त व स्वस्थ होगी। स्वाभिमान से तात्पर्य मात्र लज्जा से सिर झुका लेना नहीं है वरन स्वाभिमान की परिधि में वे समस्त पुन्य तथा शिक्षायें आ जाती हैं जिनके बिना मनुष्य का प्रतिपालन अपूर्ण रह जाता है। एक स्वाभिमानी और समाजी प्रतिबंध का आदर करता है वहीं उन सैध्दाँतिक नियमों का भी कड़ाई से पालन करता है जिनकी सत्यता को स्वीकार कर चुका है। धर्म, विशवास तथा दृष्टिकोंण से अधिक महत्वपूर्ण स्वाभिमान को परख का कोई मानक नहीं। वर्तमान में समय में नैतिक स्वाभिमान के साथ- साथ धार्मिक स्वाभिमान का समाप्त हो जाना ही वह बड़ी घटना है जिसपर प्रकृति माँ आठ- आठ आँसू बहा रही है। मुसलमान इस्लाम पर आघात धार्मिक पवित्र स्थानों का विनाश, धर्माविधान के नियमों तथा आदेशो की दुर्दशा देख रहा है तथा बहुत ही शाँति पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा है उसे न तो कभी इन आदेशों के नष्ट होने का दुख होता है तथा न उन शिक्षाओं की समाप्ती का दुख, बल्कि यदा कदा तो अपने कर्तव्यों के इस विनाश में वह बराबर का भागीदार बन जाताह तथा उसे अपने किये का आभास भी नहीं होता।

अमीरूलमोमिनीन अली इब्ने अबीतालिब (अ0) ने इसी मर्यादा व स्वाभिमान को चैतन्य हेतु मसजिदे कूफ़ा में बड़े ही तीखे स्वर में कहा था जब आप को सूचना मिली थी कि कुछ मुसलमान स्त्रीयाँ बाज़ारों में विचरन कर रही हैं तथा भीड़ भाड़ में अन्य पुरूषों के कन्धों से कन्धा मिला कर चल रही हैं तथा आपने इस सूचना का सिंहासन से वर्णन करते हुए अति वेदना युक्त प्रभाव युक्त तथा क्रोधातुर रूप में कहा थाः- क्या तुम्हे लज्जा नहीं आती ? क्या तुम में स्वाभिमान नहीं रह गया ? अर्थात यदि स्वाभिमान होता तो धार्मिक उदगार का आदर होता। परिवार के खुलेआम फिरने पर आपत्ति प्रकट करते। अन्य पुरूषों से स्त्रीयों के टकराव पर स्वाभिमान जाग उठता किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिससे ज्ञात होता है कि तुम्हारे स्वाभिमान की अनुभूति समाप्त तथा लज्जा का उदगार नष्ट हो चुका है। इस्लामी दृष्टिकोण से स्वाभिमान ही से उपदेश की राह मिलती है।

उपदेश ! उपदेश मनुष्य को अपने कर्म के परिणाम की ओर आकर्षित करता है। उपदेश अचेत को चेत में लाता है तथा वर्तमान के दर्पण में भूत का भयावह मुखड़ा दिखाता है। उपदेश प्राप्त व्यक्ति अपनी भूल पर बल नहीं देता तथा अपनी त्रुटि पर हठ नहीं करता उसके सम्मुख उस आग्रह का परिणाम तथा उस हठ का अन्त होता है।

वर्तमान युग में इस्लामी स्वाभीमान की कमी अथवा उसके अभाव ने जो शोकपूर्ण दृष्य प्रस्तुत किये हैं वह एक योग्य व्यक्ति के उपदेश हेतु पर्याप्त है। इस्लामी देशों एवं मुस्लिम समाज में अभी उपदेश की सम्भावनाऐं तथा आभास करने के अवसर उपलब्ध हो सकते हैं अभी शूक्र मांस तथा मंदिरा से अचेतना नाड़ियों में प्रविष्ट हो जाए। पशिचम अपनी करनी से इस कारण विवश है कि उसने पूर्व में ही सीधावट को तर्ज दिया है तथा शूक्र मांस एवं मदिरा को अपना जीवन अंग बना लिया है। उसके लिये उपदेश की संभावनाऐं अत्यंत कम है। उसके स्वाभिमान की नाड़ियाँ इतनी मर चुकी हैं जिसकी नारी (मांदा) हर समय अनेको नरों से सम्बन्ध स्थापित रखती है तथा मदिरा एक ऐसी आनन्दयुक्त विपत्ति है जो आनन्द रूपी आपरण में स्नाय को जर्जर करके आभास शक्ति को लगभग नष्ट कर देती है। इसके अभ्यस्त व्यक्ति इस तातपर्य का विश्वास ही नहीं कर सकतें जिन्हें एक अवचेतनाबध्द अनुभूतशील तथा आत्म सम्मान रखने वाले मुसलिम समाज को विशवस्त कराया जा सकता है।

पश्चिम की यही वह चालाकी थी जिसे मुसलमान प्रारम्भ न समझ सका तथा अब समझने का समय आया तो वह अपनी आभास शक्ति को खो चुका था। पश्चिम ने अपनी मांसे भक्षक एंव मदिरा सेवन प्रवृति से यह निणर्य किया कि युवती का हाथ एक युवक के हाथ में पकड़ा देना कोई अवगुण नहीं है। सम्मिलित शिक्षा यौन सम्बन्धी समस्या का सर्वोच्च समाधान है। सम्मिलित नृत्य मनुष्य की सभ्यता का उत्तम आदर्श है इस लिये प्रकार अपनी यौन सम्बन्धी संतुष्टी की सामग्री तो उपलब्ध हो जाती है, चाहे अपनी पुत्रीयाँ अन्य पुरूषों के प्रयोग में ही क्यों न आजाऐं। इसका आभास इस कारण भी नहीं होता कि मदिरा सेवन ने आभास की नाड़ियों को दुर्बल कर दिया है तथा शूक्र की प्रवृत्ति ही यह है कि वह अपनी स्त्री (मादा) के साथ अन्य नर के सम्बन्ध को सरलता से देख सकता है तथा उस पर कोई प्रतिशोध भावना उतपन्न नहीं होती किन्तु जब यह सभ्यता पूरब में आई तो इसकी बड़ी हँसी उड़ाई गई तथा स्वाभिमानी व्यक्तियों ने इसके विरुध्द तीव्र विरोध प्रकाशन किया। महाप्रलय यह हुआ कि यह सभ्यता शासक तथा विजयी जाति के सुरक्षित बक्सों में बन्द होकर आई थी अतः उन्होंने हंसाई के मार्ग को बल से रोका तथा प्रवृत्ति को बदलने हेतु त्वरित उपाय धारण करना आरम्भ कर दिया। उन्हें यह विदित था कि मदिरा तथा शूक्र मांस का विमुग्ध (प्रेमी) समाज इस सभ्यता का स्वागत करता है और इन दोनों वस्तुओं का विरोध समाज उसका विरोध करता है इस कारण उन्हें मौलिक चिन्ता यह संबध्द हुई कि समाज को इन दोनों ही वस्तुओं से परिचित कराया जाए। शासक वर्ग हेतु यह कार्य कठिन नहीं होता तथा अपरिपक्य बुध्दि वालों को विचलित करने में कोई विशेष कठिनाई नहीं होती अतएव उन्होंने उच्च शिक्षा को अपने क्षेत्र में आलंबित करके तथा उच्च पदों के पणों (शर्तों) में अपने समाज में स्थायित्व का प्रतिबन्ध लगाकर पूर्वी सभ्यता के उपासकों को इस बात पर विवश कर दिया कि वह पश्चिम में जीवन व्यतित करें तथा दो चार वर्ष वहाँ की सभ्यता का सामना करें। वह सभ्यता जिसमें मदिरा जल का प्रतिस्थानी हो, शूक्र मांस भोजन का प्रमुख भाग हो तथा स्त्रीयों की वस्त्रविहीनता एंव आधिक्य पग पग पर दुष्टि प्रलोभन हेतु आमंत्रित कर रहा हो। परिणाम यह निकला कि यह व्यक्ति अपनी मूल लज्जा व स्वाभिमान तज कर अपने साथ एक अनुलग्नक लेकर पल्टो।

नारी मनुष्य की एक स्वाभिवक असामर्थ्य का नाम है जिसने भी इस एक पन्थ दो काज का प्रतिरूप देखा उसने सुदूर यात्रा की योजना बनाना आरम्भ कर दी तथा वहाँ से तीनों उपहार साथ लेकर पलटे मदिरा व्यसन (आदत), शूक्र मांस का स्वाद तथा नारी। ऐसी दशा में कौनसी धार्मिक शिक्षा इस उग्रवाद को रोकती है तथा कौन सा उद्देश्य इस बाढ़ के सम्मुख खड़ा होता है। शासन रूपी लोहें की दीवारें अपने कलचर की रक्षा हेतु पहले ही खड़ी थीं। परिणाम वही हुआ जो होना चाहिये था। उपदेश करताओं ने असक्षम होकर स्थल से पग हटा लिया, कम साहस वालों ने अपने समाज से संधि करली, लेखक गण ने पर्दे के शीर्षक पर विवेचनात्मक सामग्री एकत्र करना प्रारम्भ कर दिया ताकि इस स्वभाविक स्वाभिमान की भावना को जगाने की चेष्टा समाप्त करदी। निर्लज्यता के कारणों को दृष्टिगोचर करना छोड़ दिया तथा आज समाज इस सीमा पर आ गया कि अन्य तो अन्य स्वयं मुसलमान भी स्वाधीनता के नाम पर लज्जा व स्वाभिमान गाड़ दे रहा है। नवीन सभय्ता का नाद उठा कर मर्यादा को लुटा रहा है। वक्ताओं पर प्रतिबन्ध लगाया जाता है, लेखनी पर पहरे बैठे जाते हैं, इस्लामी सभ्यता के उपासकों की हँसी उड़ाई जाती है तथा मनुष्य अपने ग्रीवा (गरदन) में मुखड़ा डाल कर नहीं विचार करता कि जहाँ सिनेमा हाल में हम कुछ चित्रों के दर्शक बन जाते हैं वहाँ अन्य युवक भी हमारी बहनों एंव कन्याओं के दर्शक बन जाते हैं। कालेजों में जहाँ शिक्षा दी जाती है वहीं पार्श्व में व्यभिचार के अड्डे भी स्थापित हो गये हैं। निर्लज्यता को आवश्यकता का नाम देना अन्य को तो संतुष्ट भी कर सकता है किन्तु अपनी अन्तर आत्मा को निश्चित नहीं कर सकता।

दृष्टिगत पत्रिका लिखते समय मुझे इस बात का पूर्ण विश्वास है कि मेरी वाणी मरूस्थल ध्वनि न सिध्द होगी, मेरी बात स्वाभीमानी व्यक्तियों के कानों तक पहुँचेगी तथा वह इन भ्यावह परिमामों से उपदेश ग्रहण करेंगे जिसमें आज हमारा समाज लिप्त है।

इस पत्रिका में प्रारंभिग रूप से इसलामी आदेशों के मूल आधारों पर वितर्क प्रस्तुत किया गया है तत्पश्चात कुरआन सुन्नत के दरपण में यह सिध्द किया गया है कि इस्लाम लज्जा एंव स्वाभिमान का धर्म है वह परिवार की नारियों के खुले बाज़ार फ़िरने को सहन नहीं कर सकता, वह ऐसी शिक्षा को निन्दनीय मानता है जिसमें उसकी शिक्षा का आदर न किया जाए तथा ऐसी सभ्यता को असभ्यता मानता है जिसमें सभ्यता के आवरण में व्यभिचार तथा अशलीलता को परिपाटी बना दिया गया हो।

यह एक पीड़ित हृदय की पुकार है जो स्वाभिमानी मुसलमान को सुनाई जा रही है तथा यह दुहाई का नियम है कि वह प्रभावित करे अथवा न करे, उसे अवश्य लिया जाता है।

वस- सलाम आपकी सुरक्षा में

सैय्यद ज़ीशान हैदर