जनाबे फिज़्ज़ा

जनाबे फिज़्ज़ा0%

जनाबे फिज़्ज़ा लेखक:
कैटिगिरी: मुसलमान बुध्दिजीवी

जनाबे फिज़्ज़ा

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

लेखक: जनाब राहत हुसेैन नासरी
कैटिगिरी: विज़िट्स: 4683
डाउनलोड: 1739

कमेन्टस:

जनाबे फिज़्ज़ा
खोज पुस्तको में
  • प्रारंभ
  • पिछला
  • 8 /
  • अगला
  • अंत
  •  
  • डाउनलोड HTML
  • डाउनलोड Word
  • डाउनलोड PDF
  • विज़िट्स: 4683 / डाउनलोड: 1739
आकार आकार आकार
जनाबे फिज़्ज़ा

जनाबे फिज़्ज़ा

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

इफ़्तेताहिया (प्रारम्भिक)

अल्हम्दो लिल्लाहिल लज़ी ला तुदरेबेहाश शवाहेदों वला तहवीहिल मशाहेदो वला तराहुन नवाज़िरो वला तहज़ुबुहू वस्सलातो वस्सलामो व नवामिय्ये बराकातेका अला मोहम्मदिन अब्देका व रसूलेकल जातमे लेमा सबका बल फ़ातेहे लेमन ग़लका बल मुआलेनिल हक्के बिल हक़्क़े अर्रसूलिल मुसद्ददे अबिल कासिमे मोहम्मद वा आलेहित तयेबीनत ताहेरीनल मासूमीनल लज़ी अज़ हबल्लाहो अन्हुमुर्रिजसा व तहहिस्हुम ततहीरा। अम्माबादः

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

जीवन रचनाः

जितना महत्वपूर्ण और ज़रूरी काम है उतनी ही मुश्किल ज़िम्मेदारी का फ़रीज़ा है। अगर सीरत निगार ने सही जीवन रचना की और भावनाओं में डूबकर बाहुल्य और अबाहुल्य से काम लिया तो यह जीवन चरित्र की सही रूप रेखा न होगी और यह जीवनीकार के साथ अन्याय होगा। जीवन रचनाकार का सर्वप्रथम कर्तव्य यह है कि वह क़लम उठातो वक़्त इस बात का पूरा लिहाज़ रखे कि सही हालात बिला जज़बात को दख़ल दिये हुए क़लम बन्द करे। जीवन चरित्र और जीवनी लिखने में यह एक आम तरीक़ा है कि लिखने वाला अपनी श्रध्दाओं और भावना से काम लेकर वाक़ेआत के अनुचीत अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। जीवनी और जीवन परिचय के अध्य्यन से ज्ञात होता है कि यह भावना रोग की तरह बड़े बड़े इतिहासकारों में संक्रामक का रूप धारण कर गई है। प्राचीन इतिहासकारों की पुस्तकें पढ़ी जायें तो मालूम होगा कि सत्यता से कितनी दूर हो गई हैं। जनाब मौलाना शिबली साहब वास्तव में एक उच्च स्तरीय साहित्यकार और कुशल जीवन रचियता थे किन्तु उनकी पुस्तकों को पढ़कर ज्ञात होगा कि कोई इतिहास इस भावना से ख़ाली नहीं है यधपि सीरतुन्नबी (स0 अ0) ऐसी महत्वपूर्ण पुस्तक भी अपनी भावनाओं एवं श्रृध्दाओं के अन्तर्गत लिखि गई और रसूल (स0 अ0) के जीवन के विचित्र और अदभुत अन्दाज़ में प्रस्तुत करके सच्चे वाक़ेआत को केवल अपने विश्वासों पर चोट लगने से बचाने के लिये रूपान्तरित कर दिया है उनकी एक और मान्य पुस्तक "अल फ़ारूक़" के अध्यन से मालूम होगा कि लेखन ने श्रृध्दा और प्रेम की भावनाओं में डूबकर कितनी ही घटनाओं को ग़लत तरीक़े से पेश किया है और कितने ऐसे वाक़ेआत को जिनसे विश्वास का मत पर आघात लगती थी छुपाया है। ग़रज़ यह सिर्फ़ उन ही पर निर्भर नहीं बल्कि बड़े बड़े रचियता और इतिहासकार भी इस से नहीं बच सकें हैं।

जीवन चरित्र के लिये सबसे ज़रूरी यह है कि जीवनीकार के हालात को मुद्रित करते वक़्त उसके व्यक्तित्व और उसके पूरे माहौल पर नज़र रखें ताकि यह अनुभव हो सके कि जीवनीकार के हालात उसके माहौल के अनुसार हैं या नहीं, और आया जिस माहौल में उसने ज़िन्दगी व्यतीत की है उसका प्रभाव उस पर कितना हुआ है और उसके स्वभाव व फ़ितरत में उस माहौल ने कितना असर किया है।

इतिहास युग में बहुत से सकुशल लोग ऐसे गुज़रे हैं जो बावजूद ज्ञानी और कुशल होने के आज उनके नाम व निशान का भी पता नहीं है और समय परिवर्तन ने उनके नाम अस्तित्व पृष्ठों से बिल्कुल मिटा दिये। विशेषकर वो धर्मान्त व्यक्ति जो दामने अहलेबैत (अ.स) से वाबस्ता थे और जीनके किरदार बायसे ज़ीनते तारीख़ होते और जिनके बेहतरीन किरदार के नमूने आज मूसलमानों के लिये मार्गदर्शक होते। उनकों भुला करके एक ऐसा बड़ा नुकसान इस्लाम धर्म को पहुँचाया जिसकी पूर्ती सम्भव नहीं है। किसी दूसरे से हमको यह शिकायत अनुचित होगी क्योंकि वह तो अपने अक़ायद को सुरक्षित रखने और अपने धर्मगुरूओं को चोट लगने से रोकने के लिये नज़र अन्दाज़ करते हैं क्योंकि जब स्वंय अहलेबैते रसूल (स0 अ0) की ज़िन्दगी के हालात को हर सम्भव तरीके से गुप्त रखने, बल्कि मिटाने की कोई कोशीश उठा न रखी गई तो फिर उनके सम्बन्धियों के हालात किस तरह लिखे जाते, क्योंकि उनके हालात लिखने का उद्देश्य उनके विपरीत चरित्र रखने वालों को आईना दिखाना होता, किन्तु शिकायत उनसे है जो दामने अहलेबैत (अ.स) से सम्बन्धित हैं कि उन्होंने इसमें कोताही की और उनके हालात को क़ौम के सामने प्रस्तुत नहीं किया। भूतकालीन उलमा तो समय की प्रतिकूलता के कारणवश सत्यता को स्पष्टता में असहाय थे किन्तु वर्तमानकाल में जबकि हर प्रकार की स्वतन्त्रता प्राप्त है हमारे ज्ञानियों की ग़फ़लत व लापरवाही ही यक़ीनन आश्चर्य जनक है।

इसमें सन्देह नहीं हमारे उलमा ए केराम ने आइम्मा ए मासूमीन (अ.स) की जीवनी और चरित्र पर बहुत पुस्तके लिखकर दुनिया ए शीयत को बहुत फ़ायदा पहुँचाया है किन्तु इसी के साथ यह भी बहुत आवश्यक था कि उन आदरणीय व्यक्तियों के हालाते ज़िन्दगी पेश करके दिखाते कि ख़ानदाने अहलेबैत (अ.स) की पाक हस्तियाँ तो तक़लीद योग्य थीं हीं लेकिन उनके दामन से सम्बन्ध स्थापित करने वालों ने चरित्र के वह क़िमती और बहुमूल्य नमूने पेश कर दिये जिनकी मिसाल नहीं मिल सकती और अगर शिया क़ौम बल्कि मुसलमान सिर्फ़ इन्हीं हस्तियों को मार्गदर्शक बनाऐं और उसके प्रकाश में चरित्र ग्रहण करें तो मनुष्यता की उस श्रेणी पर आगमन हो सकते हैं जहाँ दूसरों का गुज़र भी नहीं हो सकता और संसार यह कहने पर बाध्य हो जाए कि आले मोहम्मद (अ.स) के अनुयायी ऐसे होते हैं।

जनाबे सलमाने फ़ारसी, जनाबे अबुज़रे ग़फ़्फ़ारी, जनाबे अम्मारे यासीर, जनाबे मिक़दाद, जनाबे कुमैल, जनाबे क़म्बर, जनाबे मिसमें तम्मार और जनाबे फ़िज़्ज़ा ये वह अस्तित्व हैं जिन्होंने दामने आले मोहम्मद (अ.स) से सम्बन्ध स्थापित कर किरदार के वह बेहतरीन नमूने प्रस्तुत किये जिनको पढ़कर बुध्दि अचम्भे में आ जाती है और बेइख़्तियार मुंह से निकलता है "अल्लाह के बन्दे इस दुनिया में ऐसे भी आए हैं " लेकिन अफ़सोस की इन आदरणीय हस्तियों के हालात आम लोगों की निगाहों से पोशीदा हैं और आज हमारी क़ौम के बच्चे सिर्फ़ नाम से तो मजालिस की बर्कत की बदौलते परिचित है मगर उनको नहीं मालूम कि उन्होंने दुनिया में किन ख़तरनाक हालात में कैसे कैसे उच्चस्तरीय चरित्र प्रस्तुत किये और किन कठोर मुश्किल कठिनाइयों में अपनी जानों पर खेल कर आले मोहम्मद (अ.स) की दीनी और अमली तबलीग़ (प्रचार) की सम्भव है कि अरबी या फ़ारसी भाषाओं में इन हज़रात के हालात लिखे गये हों लेकिन जहाँ तक उर्दू ज़बान का सम्बन्ध है इन योग्य व्यक्तियों के हालात बहुत ही कम मिलते हैं। हाल ही में मेरे प्रिय मिल्ला मोहम्मद ताहिर साहब क़िब्ला के पुत्र मिर्ज़ा मो0 जाफ़र साहब सल्लामहू ने जनाबे अबूज़रे ग़फ़्फ़ारी के हालात में दो बहुमूल्य पुस्तकें प्रकाशित की हैं, परवरदिगारे आलम अहलेबैते अतहार (अ.स) के सदक़े में जनाबे सल्लामहू को दीर्घायु प्रदान करें और अहलेबैते अतहार (अ.स) के प्रति उनकी सेवा भावना में वृध्दि करता रहे।

जनाबे सलमाने फ़रासी की जीवनी लिखने के बाद मैं अर्से से इस ख़्याल में था कि जनाबे फ़िज़्ज़ा के हालाते ज़िन्दगी लिख दिये जाऐं, मगर बड़ी दिक्कत ये पेश आई कि इन आदरणीय स्त्री के हालाते ज़िन्दगी इतने पोशीदा रही कि आज उनका खोजना अतयन्त कठिन कार्य है अतः खोज एवं जिज्ञासा के पश्चात डेढ़ साल की लम्बी अवधि में पुस्तकालयों की ख़ाक छानने के बाद कुछ जीवन पर आधारित घटनाऐं विभिन्न पुस्तकों से प्राप्त हो सकीं, फिर भी पूरे हालात न मिल सके विशेषकर जनाबे सैय्यदा (अ.स) की सेवा में आने पूर्व के हालात बिल्कुल पोशीदा है केवल उनका अस्ली नाम और वतन अत्यधिक जिज्ञासा के पश्चात विभिन्न प्रतिकूलताओं के साथ ज्ञात कर सके। इसी तरह अहलेबैते रसूल (अ.स) के घर से रूख़सत होने के कारण और उसके बाद के हालात भी सविस्तार नहीं मिल सके, जो घटनाऐं विभिन्न पुस्तकों से प्राप्त हो सकीं केवल वह पाठकगण की सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ। अगरचे सविस्तार हालातज उपलब्ध न हो सके लेकिन जो इस संक्षिप्त पुस्तिका में पेश किया जा सका है वही उनके आचरण एवं चरित्र की महत्ता को सिध्द करने के लिये काफ़ी है और उनसे क़ौम की बेटिया बहुत कुछ लाभ अर्जित करके अपने आचरण को सँवार कर सकती है यहाँ तक लिखने के बाद अब मैं अपनी जाति की बेटियों से कहना चाहता हूँ कि तुम उस क़ौम की औलाद हो जो अपने को अहलेबैते रसूल (अ.स) से सम्बन्धित होने और उनकी ग़ुलामी की दावेदार हैं तो फिर इस बात को विचारना होगा कि इन पवित्र अस्तित्वो से सम्बन्ध स्थापना और ग़ुलामी का क्या अर्थ है।

क्या इसका सिर्फ़ यह मतलब हो सकता है कि ज़बान से लोग ग़ुलामी का दावा करते रहें और अय्यामें अज़ा (मोहर्रम के दिन) में उनका ज़िक्र सुनकर सिर्फ़ चन्द आँसू बहा लें या सीनाकूबी (सीना पीटना) कर लें सत्य तो यह है कि यह न तो सम्बन्ध स्थापना है और न ग़ुलामी, बल्कि ये केवल पैतृक रस्म परस्ती है और उनका नाम लेकर उनको बदनाम करना है बल्कि सम्बन्ध स्थापना और ग़ुलामी का सही अर्थ ये है कि हम उनके पद चिन्ह पर चलने का प्रयत्न करें और उनके किरदार को अपने व्यवहारिक जीवन में मार्गदर्शक बनायें। जो क्रियाऐं एवं व्यवहार उन्हें पसन्द नहीं उनसे हम बचें उनके आचरण एवं चरित्र के प्रस्तुत करने का उद्देश्य ही यही है कि उनके चाहने वाले और शिया उनकी व्यवहारिक अनुसरण करें। अतः प्रेम व मोहब्बत का दावा उसी समय सच्चा हो सकता है जब हम उनके आचरण को ग्रहण करने का प्रयत्न करें जब यह निश्चित है कि शिया होना इसी पर निर्भर हैं तो अब अपनी आत्मा का परिक्षण करना चाहिये और देखना चाहिये कि हम हक़ीक़त में शिया हैं या सिर्फ़ ज़बानी दावेदार हैं क्या हमारे किरदार या चाल चलन में कोई समानता भी उनके किरदार की है क्या हमने कथन एवं आदेशों पर कभी अमल करने का भी ख़्याल किया है ? आम तौर पर लोग यह कहकर कर्तव्यों से मुक्ति होने का प्रयत्न करते हैं कि वे मासूम थे, इमाम थे, हम उन जैसा किरदार कैसे प्रस्तुत कर सकते हैं लेकिन यह कभी नहीं कहा जाता कि तुम उनकी तरह मासूम हो जाओ। तुम क्या यह तो वे हस्तियाँ हैं जिनकी बराबरी गत अम्बिया (अ.स) नहीं कर सके किन्तु उनके पद चिन्हों पर चलने की कोशिश ही उनका अनुसरण है और सिर्फ़ कोशिश ही करने से बहुत कुछ प्राप्त हो सकता है।

यह सच्च है कि तुम जनाबे सैय्यदा (स0) नहीं बन सकतीं, हमारे बेटे भी हसन (अ.स) व हुसैन (अ.स), आबिद (अ.स) व बाक़िर (अ.स) इत्यादि जैसे नहीं हो सकते क्योंकि वे मासूम थे लेकिन (ऐ क़ौम की बेटियों) तुम फ़िज़्ज़ा तो बन सकती हो, हमारे बेटे सलमान, अबुज़र, अम्मार, मिक़दाद व कुमैल तो बन सकते हैं। जनाबे फ़िज़्ज़ा एक अर्से तक कुफ़्र के वातावरण में परवरिश पाने के बाद अहलेबैत (अ.स) की सेवा में आईं और उन्होंने अपने चरित्र को आले मोहम्मद (अ.स) के आचरण से सबक़ लेकर ऐसा सवाँरा की अपने अन्दर उसकी झलक उत्पन्न कर ली इसके विपरीत तुम तो कई पीढ़ियों से धर्मवलम्बी चली आ रही हो तुम में पूर्ण योग्यता किरदारे अहलेबैत (अ.स) के आत्मसात करने की मौजूद होना चाहिये फिर तुम में वह भी है जिनको उनकी संतान होने का सौभाग्य प्राप्त है और जनाबे सैय्यदा (अ.स) का पवित्र ख़ून तुम्हारी रगों में दौड़ रहा है उनमें तो स्वंय किरदारे जनाबे सैय्यदा (अ.स) के गुण होने चाहिये उनके लिये तो यह ख़्याल ही काफ़ी है कि इन मासूमा (अ.स) की संतान हैं।

अतः उनके चरित्र की झलक अपने अन्दर उत्पन्न करने की कोशिश भी करना चाहिये लेकिन यह अत्यन्त दुख की बात है कि नशवर समृध्दि के ख़्याल से शाशवत जीवन के सुख चैन को क़ुर्बान कर दिया जाए।

मेरी प्यारी बच्चीयों तुम दूसरी जातियों का अनुसरण कर सकती हो, उनके व्यवहार व आचरण को ग्रहण करने में तुमको कोई परेशानी अनुभव नहीं होती बल्कि शौक से ग्रहण कर लेती हो जबकि इसमें शाशवत सुख की हानि है। किन्तु जिनका अनुसरण करना सामायिक तकलीफ़ों और समृध्दि की प्रतिभू है और सांसरिक जीवन में भी तुम्हें मनुष्यता के पराकष्ठा पर पहुँचा सकती है उनको तुम ने पकड़ छोड़ रखा है। तुम जनाबे ज़ैनब (अ.स) की बेपरदगी का मातम करती हो किन्तु तुम स्वंय इच्छानुसार जन समूह में बे पारदा निकलती हो, पश्चिमी ज्ञान प्राप्ति में बढ़ चढ़ कर भाग लेती हो लेकिन अहलेबैत (अ.स) के ज्ञान प्राप्ति की ओर ध्यान नहीं देती।

मिल्लते जाफ़रिया की बच्चियों – मैं पश्चिमी ज्ञान प्राप्ति का विरोधी नहीं हूँ अवश्य प्राप्त करो किन्तु उसके साथ अपने दीन पर भरपूर तवज्जोह देना भी ज़रूरी है (बल्कि धार्मिक ज्ञान प्राप्ति एक कर्तव्य है और न भूलों की तुम अहलेबैते अतहार (अ.स) की नाम लेवा हो इसलिये उनके किरदार की मुमकिन हद तक तुम्हारे अन्दर झलक होना आवश्क है और इसी उद्देश्य से तुम्हारे सामने जनाबे सैय्यदा (अ.स) का नहीं बल्कि उनकी कनीज़ (सेविका) जनाबे फ़िज़्ज़ा का हाल जितना मुझसे सम्भव हो सका प्रस्तुत कर रहा हूँ और हार्दिक इच्छा है कि तुम कम से कम उन्हीं का अनुसरण करके दुनिया पर सिध्द करो कि अहलेबैत (अ.स) की सेविकाऐं ऐसे उत्तम और पवित्र आचरण वाली होती हैं।

बहरहाल मैंने दो वर्ष पूर्व इस पुस्तिका को लिखना प्रारम्भ किया था किन्तु उस बीच कई(Heart Attack) पडने के कारण शीर्घ पूरी न हो सकी लेकिन ईश्वर का अभारी हूँ कि उसने अहलेबैत (अ.स) के सदक़े में मौत से इतनी मोहलत अता फ़रमाई कि मैं इस धार्मिक सेवा को सम्पन्न कर सका ख़ुदा का शुक्र है पुस्तक सर्वाग करके पाठकगण के समक्ष प्रस्तुत की जाती है। अत्यन्त प्रयत्न किया गया है कि घटनायें सही लिखी जायें, अपने इस प्रयत्न में किस हद तक सफ़लता प्राप्त कर सका हूँ ज्ञानी इसका फ़ैसला करेंगे, ख़ताकार होने के कारण ख़ता की सम्भावना को स्वीकार करते हुए पाठकगण से क्षमा याचना का भी इच्छुक हूँ और दुआ ए ख़ैर से याद किये जाने का भी निवेदक और प्रार्थी हूँ कि अध्य्यन पश्चात कमियों और त्रुटियों से सौहार्द पूर्ण सूचित किया जाता और लाभकारी तथा उपादेय परामर्श और निर्देशों से नवाज़ा जाये।

यह संक्षिप्त प्रस्तुति अपनी मख़्दूमा जनाबे फ़िज़्ज़ा (अ.स) की ख़िदमते आलिया में प्रस्तुत करके निवेदक हूँ कि बीबीः यह हदिया आपके योग्य तो नहीं है लेकिन इसके लिखित उद्देश्य पर नज़र करते हुए आप इसको अपनी शहज़ादी जनाबे सैय्यदा (अ.स) की सेवा में प्रस्तुत कर सिफ़ारिश करवाकर स्वीकृत प्रमाण प्रदान करा दें तो महाप्रलय के दिन मेरे पापों का प्रायश्चित और नरक की कष्ट एवं यातनाओं से मुक्ति का आदेश पत्र प्राप्त हो जायेगा।

वस्सलाम

वलहम्दो लिल्लाहे रब्बिल आलामीन व सल्लल्लाहो

अला मोहिम्मदिन व आले हित तय्येबीनत ताहेरीनल

मासूमीना व लानतुल्लाहे अला अआदा ए हिम अज मईन

अहक़रूल एबाद

राहत हुसैन नासिरी

बिस्मिल्लाह हिर्रहमा निर्रहीम

जनाबे फ़िज़्ज़ा के इस्लाम स्वीकृति से पूर्व के हालात और आपका वतन

आपके निश्चित वतन के सम्बन्ध में बहुत भिन्नतायें हैं अक्सर लोगों का विचार है कि आप हबिश उन नस्ल थीं और हबश (अफ़्रक़ा) देश से जब जनाबे जाफ़रे तैय्यार वापिस आये तो हबश के शासक ने जनाबे रसूले मक़बूल (अ.स) की सेवा में उपहार स्वरूप पेश किया था और इसकी पुष्टि में वह घटना प्रस्तुत की है कि जब यज़ीद के दरबार में आप अहलेहरम के समक्ष पर्दा करने के उद्देश्य से सीधी खड़ी हो गई थीं और यज़ीद ने आदेश दिया था कि उनको सामने से हटा दिया जाए, तो उस समय आपने दरबार में नियुक्त हबशी ग़ुलामों को लज्जा दिलाई थी। जिस पर वह तलवारें ख़ींच कर जंग पर तैय्यार हो गये थे, तो यज़ीद को ख़ामोश होना पड़ा था लेकिन एक (जनाबे नासिरूल मिल्लत आलल्लाहो मक़ामहू) अन्वेषणक का कथन है कि यह घटना जनाबे फ़िज़्ज़ा की नहीं है बल्कि एक दूसरी कनीज़े हबशिया की है और चूँकि सिर्फ़ यही "कनीज़े जनाबे सैय्यदा (अ.स) प्रसिध्द थीं इस लिये आप ही को ख़्याल किया गया और इस प्रकार आपका शुभ नाम इस घटना में आ गया।

पुस्तक शीराज़ी में लेखक मुद्रित करते हैं कि जनाबे फ़िज़्ज़ा हिन्द की रहने वाली थीं, राजपुताना के किसी सम्मानित एंव प्रतिष्ठित परिवार की फ़र्द थीं। प्रारम्भिक प्रवास के समय में कुछ मिस्री लूटमार के सिलसिले में हिन्द पहुँचे और जनाबे फ़िज़्ज़ा के परिवार को लूटा और उनको बन्दी बनाकर मिस्र ले आए और मिस्र के शासक को उपहार स्वरूप भेंट किया। यह घटना अन्वेषणकों के समक्ष सही है जबकि सरकारे नासिरूल मिल्लत का भी कहना है।

आपके नस्ल के सम्बन्ध मेः यथार्थ विवरणात्मक हालात नही मिल सके तारीख़े वसीर के अध्ययन से केवल इतना ज्ञात हो सका है कि आपका सम्बन्ध राजपुताना के किसी प्रतिष्ठित राजपूत घराने से था। आपका नाम इस्लाम स्वकृति से पूर्व नौबिया था और कुछ नौबिया ए हिन्दीया और कुछ नौबिया ए हबशिया लिखते हैं। जब आपको जनाबे रसूले मक़बूल की सेवा में उपस्थित किया गया तो हुज़ूरे सरवरे कायनात ने आपका नाम फ़िज़्ज़ा रखा।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

आपका हुलिया ए मुबारकः

तारीख़े अल ख़ुल्फ़ा के लेखक इमामे स्यूति ने अपनी पुस्तक "सीरतल सहबियात" में और जौहरी ने अपनी तारीख़ में और साहिबे मनाकिब ने अपनी पुस्तक "मनाकिब" में आपके हुलिये से सम्बन्ध बयान किया है कि आप लम्बी चौड़ी थीं, रंग महकता हुआ गुंदुमी बड़ी बड़ी आँखें और शरीर के अंग मुतानासिब थे।

रसूल (अ.स) की सेवा में आपकी आपकी उपस्थितिः

जनाबे अल्लामा मजलिसी ने "बेहारूल अनवार" के सातवें भाग के पाठ जनाबे सैय्यदा (अ.स) में और "हुलियातुल औलिया" में ज़ोहरी ने जनाबे अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तालिब से खामत की है कि एक दिन जनाबे अमीरूल मोमिनीन (अ.स) ने जनाबे सैय्यदा (अ.स) से इरशाद फ़रमाया कि घर का काम करने से और चक्की पीसने से तुम्हारे हाथ ज़ख़्मी हो गये हैं, कुछ क़ैदी लायें गये हैं, अतः आप जनाबे रसूले मकबूल (स0 अ0) से अपने लिये एक कनीज़ (सेविका) की इच्छा करें चुनाँचे जनाबे सैय्यदा (अ.स), जनाबे अमीरूल मोमिनीन(अ.स) के साथ रसूल (अ.स) की सेवा में गई मगर कुछ कह न सकीं और वापिस आ गई किन्तु आवश्यकता ने मजबूर किया इसलिये दूसरे दिन भी आप जनाबे अमीरूल मोमिनीन (अ.स) के संग सेवा में पुनः उपस्थित हुईं और अपनी इच्छा व्यक्त की।

हुज़रे अकरम ने फ़रमाया मैं उनकी क़ीमत अहले सुफ़्फ़ा को देना चाहता हूँ और उसके बदले में आपको "तस्वीह" तालीम फ़रमाई जो तस्बीहे फ़ातिमा ज़हरा (अ.स) के नाम से आज तक पढ़ी जाती है लेकिन किताब शीराजी में सविस्तार लिखा है कि जिस समय जनाबे फ़ातिमा ज़हरा (अ.स) ने सेविका की इच्छा की तो हज़रत(अ.स) के नेत्रों में आंसू भर आये और आपने फ़रमाया ऐ बेटी ! उस अस्तित्व की क़सम जिसने मुझे सत्य के साथ ईश्वरीय दूतत्व के स्थान पर नियुक्त किया कि इस समय मस्जिद में चार सौ व्यक्ति ऐसे हैं जिनके पास सेवन हेतु कुछ नहीं है अगर मुझको यह अन्देशा न होता कि इस तरह तुम्हारे सवाब में कमी हो जाऐगी तो मैं तुमको सेविका दे देता तुमको इस बात का अधिक ख़्याल होना चाहिये कि महाप्रलय के दिन अली इब्ने अबी तालीब (अ.स) पति स्वरूप तुमसे अपने किसी अधिकार की माँग करें,

इसके पश्चात आपने जाप की शिक्षा दी जब दोनो हज़रात वापिस आये तो अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) ने इरशाद फ़रमायाः

(हम दोनों, रसूलुल्लाह से दुनिया की चीज़ तलब करने गये थे, लेकिन अल्लाह ने हमें सवाबे आख़िरत (परलोक का ईनाम) अता फ़रमाया।)

जनाबे अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तालिब बयान करते हैं कि जब अली (अ.स) और फ़ातिमा (अ.स) घर वापिस हुए अभी रास्ते में ही थे कि जिब्राईल अमीन प्रकट हुए और कहा कि ईश्वर बाद तोहफ़ा ए दुरूद ओ सलाम इरशाद फ़रमाता है कि तुमने आख़रित (परलोक) के सवाब को दुनिया पर अधिमान किया और मेरी कनीज़े ख़ास (मुख्य सेविका) फ़ातिमा (अ.स) ने मेरी प्रसन्नता के लिये उसको स्वीकार किया इसलिये हम चाहते हैं फ़ातिमा (अ.स) का सवाल निरस्त न करें और आयत नाज़िल फ़रमाई।

"व इम्मा तोअरेज़न्ना मिन्हुमुब तेग़ा अ रहमतिम

मिर्रब्बेका तर्जूहा फ़क़ुल ल हुमा क़ौलन मैयसूरा"

(ऐ हमारे रसूल!) अगर तुम अपने परवरदिगार की ख़ुशनूदी के लिये किसी बात से एअराज भी करो तो इन दोनों से नर्मी से बात करो)

इसके पश्चात मिस्र के शासक ने रसूल (स0 अ0) की सेवा में एक सेविका उपहार स्वरूप भेजी जिसको हज़रत (अ.स) ने स्वीकार कर लिया और उस सेविका को जनाबे सैय्यदा (अ.स) के पास भेज दिया। इस सेविका का नाम नौबिया था और जनाबे रसूले ख़ुदा (स0 अ0) ने उसका नाम फ़िज़्ज़ा रखा।

जनाबे सैय्यदा (अ.स) की सेवा में आने के पश्चात के हालातः

जिस समय जनाबे फ़िज़्ज़ा जनाबे सैय्यदा (अ.स) के विश्रामालय में आयी तो अपनी मालिका के घर को "गौरन्वित निवास स्थान" समझकर सेवा में व्यस्त हो गईं। जनाबे मासूमा (अ.स) ने भी कार्य विभाजन उसी न्याय पर किया जो इस घर का तरीक़ा था कि घर का सम्पूर्ण काम एक दिन स्वंय करती थीं और एक दिन आपकी सेविका जनाबे फ़िज़्ज़ा किया करती थीं।

इस भाग्यशाली निवासग्रह में आने के पश्चात जनाबे फ़िज़्ज़ा ने अनुभव किया कि जनाबे सैय्यदा (अ.स) के घर के सदस्य अक्सर अनाहार एवं उपवास में जीवन व्यतीत करते हैं जिससे आपको अत्यन्त कष्ट हुआ चूँकि उन्हें अभी मारेफ़ते अहलेबैत (अ.स) प्राप्त नहीं हुई थी इस लिये अहलेबैत (अ.स) के अनाहार को संकुचित आय पर निर्भर किया और इस सोच में रहीं कि अपनी शहज़ादी की यह तकलीफ़ दूर करने का उपाय करें।

आप इल्मे कीमिया (सोना बनाने की विधि) से परिचित थीं बल्कि इस कला में निपुणता रखती थीं। इस से यह ज्ञात होता है कि आप किसी ऐसे ख़ानदान की सदस्य थीं जहाँ ज्ञान और कलाँओ का चर्चा था वरनः उस ज़माने में किसी औरत के किसी विधा और कला में निपुण होने का प्रशन ही नहीं उत्पन्न होता।

जनाबे फ़िज़्ज़ा का कीमिया द्वारा लोहे को सोना बनाकर जनाबे अमीरूल मोमिनीन (अ.स) की सेवा में प्रस्तुत करनाः

एक दिन आपने बाज़ार से एक लोहे का टुकड़ा और कुछ औषधियाँ ख़रीदीं और उन दवाओं के द्वारा लोहे को सोने में परिवर्तित किया और जनाबे अमीरूल मोमिनीन (अ.स) की सेवा में उपस्थित होकर निवेदन किया कि मैंने औषधियों के द्वारा यह सोना बनाया है आपको इसको बाज़ार में विक्रय कर बच्चों के लिये जलपान हेतु सामान ले आइये।

जनाबे अमीरुल मोमिनीन (अ.स) ने मुस्कुरा कर फ़रमाया, अच्छा जाओ एक पत्थर उठा लाओ

जब वह पत्थर लेकर आईं तो जनाबे अमीरूल मोमिनीन (अ.स) ने पत्थर की ओर इशारा किया, वह तुरन्त सोने में परिवर्तित हो गया, इसके पश्चात आपने फ़िज़्ज़ा को धरती की ओर देखने को कहा और ज़मीन की तरफ़ त्वरित इशारा भी किया, ज़मीन में दरार पड़ गई फ़िज़्ज़ा ने देखा की दरार के अन्दर सोने का भण्डार मौजूद है।

जनाबे फ़िज़्ज़ा यह सब कुछ देखकर आश्चर्य में पड़ गईं और मन में सोचने लगीं कि यह क्या मामला है।

जनाबे अमीरूल मोमिनीन (अ.स) ने जनाबे फ़िज़्ज़ा की हैरानी को दूर करने और किसी हद तक अपना परिचय कराने हेतु फ़रमायाः ऐ फ़िज़्ज़ा हमारा अनाहार एवं दरिद्रता तो ईश्वर इच्छा हेतु है न कि किसी मजबूरी के कारणवश। हमें ईश्वर ने प्रत्येक चीज़ पर अधिकार और उपभोग स्वत्व प्रदान किया है हम स्वंय इस दुनिया के आनन्दमयी जीवन को छोड़ कर के केवल परलोक का आनन्द प्राप्त करते हैं और यही हम अहलेबैते रसूल (अ.स) की परम्परा है।

इसके बाद आपने हुक्म दिया कि वह तख़्ती सोने की और पत्थर उसी सोने के भण्डार में डाल दियें जाऐं, फिर आपने इशारा किया तो दरार बन्द हो गई।

यह सब कुछ देखने के बाद जनाबे फ़िज़्ज़ा को अनुभव हुआ कि वह जिस घर में आईं हैं उस घर के सदस्य किस प्रतिष्ठित एवं मान्य पद पर सम्मानित हैं और कितने उच्च आचरण के स्वामी हैं।

जनाबे फ़िज़्ज़ा का संयम एवं निस्पृहता तथा ईश्वरीय आराधनाः

मनुष्य स्वभाव का यह स्वीकार्य विषय है कि मनुष्य अपने यर्थाथ स्वभाव पर पैदा होता है किन्तु वातावरण उसके स्वभाव पर ग़ालिब होकर उसको अपने साँचे में ढ़ाल लेता है प्रायः ऐसा हुआ है कि मनुष्य ग़लत माहौल में रहकर अपना सार एवं दक्षता खो देता है और अगर फिर सही माहौल मिल जाए तो भटकी हुई फ़ितरत के सीधे रास्ते पर आने की सम्भावना अधिक होती है।

कुछ हस्तियाँ ऐसी भी देखी गईं हैं जिन पर प्रकृति का प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि उनकी बुध्दि शक्ति दूसरी सम्पूर्ण शक्तियों (शहविया व ग़ज़बिया वग़ैरा) पर ग़ालिब रहती है जो बग़ैर सोच विचार और बुध्दि के विपरीत किसी बात को स्वीकार करने पर तैयार नहीं होतीः किन्तु कवि अनुसार

ईय सआदत ब ज़ोरे बाज़ू निस्त

ता न बख़्शद ख़ुदा ए बख़्शिन्दा।

चुनाँचे जनाबे सलमाने फ़ारसी की मिसाल हमारे सामने मौजूद है उनके माता पिता काफ़िर थे और उन्होंने उनको अपने धर्म की शिक्षा भी दी थी, और सम्भावित प्रयत्न इस बात का करते रहे कि वह अपने पूर्वजों के धर्म को न त्यागें किन्तु यह बचपन ही से अपने पैतक धर्म से निकल, रूष्ट तथा असंतुष्ट थे और सत्य की खोच में परेशान रहे, माता पिता की सख़्तियाँ सहन की, घर से निकाले गये, अवधियों इस दोहे के चरित्रार्थ रहे कि

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

एक उम्र पाये चुनार रहे एक उम्र सुख़न ताबीक़ी

अर्सा गुज़रा घर से निकले इश्क ने ख़ाना ख़राबी की

ईश्वर और रसूल के प्रेम में कहाँ कहाँ फिरे किन्तु कुफ़्र स्वीकार नहीं किया जनाबे फ़िज़्ज़ा के गत धर्म के सम्बन्घ में कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि उस समय का कोई विवरण इतिहास पुस्तकों में नहीं मिलता लेकिन यह स्पष्ट है कि उस समय हिन्दुस्तान में मुर्तीपूजा प्रचलित थी या फिर बौध्द धर्म था उस समय तक वहाँ कोई दूसरा धर्म नहीं पहुँचा था हबश देश में ईसाई धर्म चालू था यह भी ज्ञात नहीं हो सकता कि जनाबे सलमाने फ़ारसी की तरह यह भी अपने पैतृक धर्म से रूष्ट थी या नहीं किन्तु इसे नकारा नहीं जा सकता कि सुशील, मनीष एवं पवित्र स्वभाव पूरी तरह उनमें मौजूद था और सत्य स्वीकरने का जौहर उसमें ग़ालिब था जिसने आपको इस प्रतिष्ठा पर सम्मानित किया जहाँ बड़े बड़े संयमी एवं सदाचारी न पहुँच सके।

इस सौभाग्यशाली गृह में पधारने के पश्चात उन्होंने देखा कि घर भर ईश्वरीय पूजा अर्चना सदाचार एवं संयम का साकार एवं साक्षात तस्वीर बना हुआ है अतः सुशीलता ने पूरा काम करना प्रारम्भ किया।

दूसरी ओर शिक्षकों की लाभप्रदानता ईशवर की सहायता और स्वंय में अच्छाई स्वीकार करने की भरपूर सक्षमता, जब यह सब बातें एकत्रित थीं तो नतीजा प्रकाशमयी सूर्य की तरह स्पष्ट है अपनी मालिका के पद चिन्हों पर चलना प्रारम्भ किया, निस्ग्रह अस्तित्व ने आगे बढ़कर लब्बैक कही चमत्कार और विशेषता के मार्ग तय होने लगे, यहाँ तक कि आध्यात्मवाद अपने उस स्थान पर अग्रसर हो गई जहाँ पहुँच कर मनुष्य देवताओं से श्रेष्ठ हो जाता है और ईश्वर का जग उत्पत्ति का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है आप अध्यात्मकवाद के उस विशेष पद पर आसीन हुईं जिसका अन्दाज़ा लगाना एक सामान्य मनुष्य के वश में नहीं है।

संक्षिप्त रूप में ईश्वर उन सभी नेमतों से सम्मानित करता रहा जो अहलेबैत (अ.स) के लिये नाज़िल हुईं थी यह वह सत्यता है जिससे इन्कार की कोई गुन्जाईश नहीं है और एतिहासिक पृष्ठ गवाह है कि जब स्वर्ग की नेमतें (चीज़ें) अहलेबैते अतहार (अ.स) के लिये आईं तो यह भी उनमें शरीक रही, सिवाय ऐतिहासिक साक्षों के यह बात तार्किक तौर पर ईश्वरीय न्याय के विपरीत है कि जब अहलेबैत (अ.स) के साथ वह अनाहार व उपहास में बराबर की शरीक थीं और इस पर संतोष व आभार में भी, तो ईश्वरीय न्याय का तक़ाज़ा यही था कि वह आपको भी उन नेमतों में शरीक रखे और स्वंय जनाबे रसूले मक़बूल (स0 अ0) और अहलेबैते अतहार (अ.स) की पवित्र हस्तियों से भी सम्भव न था कि वह उनको शरीक न फ़रमाते वास्तव में जब कभी जन्नत से चीज़ें और खाना आया आपको उसमें सम्मिलित किया गया बल्कि स्वंय आपकी स्तुति से स्वर्गीय भोजन आया है।

यधपि अबुल क़ासिम शीराज़ी और अल्लामा मजलिसी और जनाबे शैख़े सुदूक़ ने अपनी अपनी पुस्कतों में यह घटना लिखी है कि जनाबे सलमाने फ़ारसी बयान करते हैं कि एक मर्तबा हज़रत अमीरूल मोमिनीन (अ.स) और जनाबे सैय्यदा (स0) और जनाबे हस्नैन (अ.स) ने जनाबे रसूले मक़बूल (स0 अ0) की बारी बारी दावत की। अन्तिम दिन जब हज़रत (अ.स) भोजन कर चुके तो वापिस जाने लगे तो जनाबे फ़िज़्ज़ा क़रीब दरवाज़े के आकर खड़ी हो गईं और जब सरकारे रिसालत दरवाज़े के क़रीब आये तो जनाबे फ़िज़्ज़ा ने हाथ जोड़कर कहा कि इस कनीज़ की तरफ़ से भी दावत स्वीकार कर के ग़ौरन्वित करें।

रहमतुल लिल आलमीन ने फ़िज़्ज़ा की इस दावत को स्वीकार कर लिया। दूसरे दिन जब खाने का समय आया तो हज़रत (अ.स) जनाबे सैय्यदा (स0) के निवास स्थान पर पहुँचे, बेटी और दामाद ने बढ़ कर स्वागत किया किन्तु बेवक़्त तौर पर हुज़ूर के तशरीफ़ लाने से ताज्जुब में हो गये और इस आगमन का कारण ज्ञात करना चाहा।

आपने कहा कि आज में फ़िज़्ज़ा का अतिथि हूँ। यह सुनकर दोनों आश्चर्यचकित और व्याकुल हुए क्योंकि फ़िज़्ज़ा ने किसी से ज़िक्र नहीं किया था और न खाने का कोई प्रबन्ध किया था। अतः जनाबे मासूमा इस इरादे से फ़िज़्ज़ा के पास तशरीफ़ ले गईं कि पूछें, न तो उन्होंने दावत का कोई ज़िक्र किया, न प्रबन्ध किया किन्तु जब आप वहाँ तशरीफ़ ले गईं तो अजीब मन्ज़र देखा, कहती हैं कि फ़िज़्ज़ा मुसल्ले पर सजदे में हैं और अपने ख़ालीक की बारगाह में रो रो कर कह रहीं हैं कि मेरे मालिक मैने तेरी अनुकंपा के भरोसे पर तेरे हबीब (अ.स) की दावत की है इस सेविका की इज़्ज़त तेरे हाथ है (मैं तुझे वास्ता देती हूँ अपनी मख़्दूमा और उनके पिता, तेरे हबीब (अ.स) का मेरी इज़्ज़त रख ले)

अभी यह दुआ समाप्त न हुई थी कि स्वर्गीय भोज की ख़ुश्बू जनाबे फ़िज़्ज़ा (अ.स) की नाक में पहुँची। सजदे से सिर उठाकर देखा तो ख़ानहाय जन्नत रखे हुए थे। तुरन्त सजदा ए शुक्र अदा किया और ख़ानहाय जन्नत उठाकर रसूल (स0 अ0) की सेवा में उपस्थित हुईं जैसे ही ये तबक़ रसूलुल्लाह की सेवा में पेश हुए वैसे ही हज़रत जिब्राईल अमीन रसूल (स0 अ0) की सेवा में उपस्थित हुए और कहा कि ईशवर बाद तोहफ़ा ए दुरूद व सलाम कहता है कि ऐ हमारे हबीब (स0 अ0) आज आपको हमारी कनीज़ ने आमन्त्रित किया है हमने नहीं चाहा कि उसको शर्मिन्दगी हो, अतः यह भोजन उसकी तरफ़ से हमने भेजा है।

यह थी जनाबे फ़िज़्ज़ा के किरदार व पवित्रता की मंज़िलत कि अल्लाह ने इसको पसन्द नहीं किया कि आपकी ज़रा भी (ख़ातिर शिकनी) हो अब इस से बढ़कर और क्या श्रेष्ठता हो सकती है कि ईशवर को आपकी दिलजुई स्वीकार हो कि दुआ पर स्वर्ग से भोज भेजकर आपको रसूल (स0 अ0) के समक्ष शर्मिन्दगी से सुरक्षित रखे और विदीर्ण हृदय न होने दे, केवल यही नहीं बल्कि उससे भी बढ़कर यह है कि ईश्वर ने अहलेबैत (अ.स) की प्रशंसा में आपको भी सम्मिलित किया।

सूरा ए हल अता इसका सुबूत है यह बात सर्वसम्मति से स्वीकार हो चुकी है कि ये सूरा अहलेबैत (अ.स) की प्रशंसा हेतु आया है जबकि जनाबे इमाम हसन (अ.स) और इमाम हुसैन (अ.स) बीमार हुए, आपके स्वस्थ हेतु रोज़ों (व्रत) की नज़र मानी गई और स्वस्थ होने पर सभी सदस्यों ने तीन रोज़े रखे और हर एक ने इफ़्तार के समय सायल (मांगने वाला) के सवाल पर अपने अपने इफ़्तारे सोम का खाना उठाकर सायल को दे दिया। उन खाना देने वालों में पंजतन के अलावा जनाबे फ़िज़्ज़ा भी शरीक थी।

रहमते इलाही जोश में आई और यह सूरा सब हज़रात की प्रशंसा करता हुआ उतरा और क्योंकि जनाबे फ़िज़्ज़ा भी इसमें शरीक थीं इस लिये इस सूरे ने जिन की तारीफ़ की उनमें जनाबे फ़िज़्ज़ा भी शामिल थीं (रोज़े रखने में जनाबे मक़बूल (स0 अ0) शामिल न थे) यदि जनाबे फ़िज़्ज़ा को प्रशंसा की श्रेणी में सम्मिलित न किया जाता तो यह इशवरीय न्याय के विपरीत होता।

भाष्यकारों ने इस बात पर एकता कर रखी है कि सूरा ए हल अता में जनाबे फ़िज़्ज़ा भी शरीक हैं बल्कि कुछ भाष्यकारों ने यह भी लिखा है तथाकथित सूरे में तीन स्थानों पर शब्द फ़िज़्ज़ा जो आया है उससे जनाबे फ़िज़्ज़ा का सम्मान और श्रेष्ठता उद्देश्य है (अगर भाष्यकारों की उस भाष्य को, भाष्य बिर्राय पर आधारित किया जाये, जो हमारे उलमा और मासूमीन के नजदीक हराम है) तब भी यह बात तो यक़ीनी है कि ईश्वर ने उन लोगों का स्वयं शुक्रिया अदा किया जो इस वाक्य में बराबर के शरीक थे।

अतः इन शब्दों में आधार व्यक्त किया गयाः

इन्ना हाज़ा काना लकुम जज़ा अंव व काना सअ योकुम मश्कूरा।

अनुवादः बेशक ये है तुम्हारी जज़ा और तुम्हारी कोशीश के हम शुक्रगुज़ार हैं।

हम तुम्हारे त्याग को यह प्रत्युपकार देते हैं और इन व्रतों में हमारी ख़ुश्नूदी के पेशेनज़र जो तकलीफ़े तुमने सहन की उनका हम आभार भी व्यक्त करते हैं।

स्पष्ट है कि जनाबे फ़िज़्ज़ा भी इस प्रयत्न में शरीक थीं इस लिये वह भी आभार हेतु पात्र थीं इसमें ज़्यादा क्या श्रेष्ठता हो सकती हैं कि पातिव्रत्य सदस्यों के संग उनका भी आभार ईश्वर ने व्यक्त किया इस सम्बन्ध में एक और घटना लिखी जाती है।