तौज़ीहुल मसाइल

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दीनियात और नमाज़ तौज़ीहुल मसाइल
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तौज़ीहुल मसाइल

तौज़ीहुल मसाइल

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.

तौज़ीहुल मसाइल

मुताबिक़े फ़तावाए

ज़ईमुल हौज़ातुल इल्मीयह आयतुल्लाहिल उज़्मा

आक़ाए हाज सैय्यद अली हुसैनी सीस्तानी दामा

ज़िल्लाहुल वारिफ़

(अनुवादकः- सैय्यद मौ0 हामिद रिज़वी करारवी)

अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क

मुकद्देमा

यह किताब शीओं के मर्जेए आला हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा आक़ाए सैय्यद अली हुसैनी सीस्तानी मद्देज़िल्लहुल आली के फ़तवों पर मुश्तमिल है ताकि आपके मुक़ल्लिदीन रोज़मर्रा पेश आने वाले मसाइल का शरई हुक्म मालूम कर सकें।

मुज्तहिद की तक़लीद

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ0) इर्शाद फ़रमाते हैः-

"लोगो को चाहिये कि फ़ुक़हा (यानी अहकामे शरीयत को तफ़सील व तहक़ीक़ (विस्तार एवं शोध) के साथ जानने वाले मुज्ताहिदीन) में से जो शख़्स (व्यक्ति) अपने को गुनाहों से बचाता हो और अपने दीन की हिफ़ाज़त (धर्म की रक्षा) करता हो (यानी दीन पर सख़्ती से क़ायम हो) अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिशात का ग़ुलाम न हो और ख़ुद अहकामी इलाही की इताअत करता हो, उसकी तक़लीद करे।" इसके बाद इमाम (अ0) ने फ़रमाया "ये औसाफ़ चन्द शीअः फ़ुक़हा में हैं, सब में नहीं ।" (एहतिजाजे तबरी जिल्द 2 सफ़्हा 263) ।

वलीय अस्र हज़रत इमाम महदी अज्जलल्लाहो तआला फ़राजुम शरीफ़ फ़रमाते हैः-

"ग़ैबते कुबरा (दीर्घकालीन परीक्षा) के ज़माने में पेश आने वाले हालात के सिलसिले में हमारी हदीसों (कथनों) को बयान करने वाले रावियों की तरफ़ रूजुउ करो क्योंकि वह हमारी तरफ़ से तुम पर उसी तरह हुज्जत हैं जिस तरह हम अल्लाह की तरफ़ से हुज्जत हैं ।" (कमालुद्दीन व तमामुन्नेम शैख़ सदूक़ रह0)

आइम्मा किराम (अ0) के मुन्दरिजा बाला फ़रमूदात (आज्ञाओं) के पेशे नज़र उन तमाम लोंगो पर जो दरजाए इज्तिहाद पर फ़ाइज़ नहीं हैं अपने ज़माने के जामेउश्शराइत मुज्तहिद (वह मुज्तहिद जिसमें सभी शर्तें पाईं जाती हों) की तक़लीद करना वाजिब (अनिवार्य) है क्योंकि इसके बग़ैर उनकी इबादात और ऐसे तमाम आमाल जिन में तक़लीद ज़रूरी है बातिल हो जाते हैं।

इस्लामे अज़ीज़ (सम्मानित इस्लाम) की शरीअते गुर्रह के फ़ुरूईमसाइल का तफ़्सीली मआख़िज़ (क़ुरआन, हदीस, इजमाअ, अक़्ल) से शरई हुक्म इस्तिबाद करने का नाम इज्तिहाद है और मुज्ताहिद के बताए हुए फ़तवों को बग़ैर दलील के जानना और उन पर अमल करना तक़लीद है। जो शख़्स रूत्बाए इज्तिहादी हासिल कर चुका हो उसके लिये तक़लीद करना जाएज़ नहीं, अलबत्ता जो ख़ुद मुज्तहिद न हो उस पर तक़लीद करना वाजिब है।

अगरचे इज्तिहाद और तक़लीद के अलावा एक तीसरी सूरत भी मुम्किन है यानी यह कि एहतियात पर अमल किया जाए लेकिन यह हर के बस की बात नहीं है। एहतियात पर वही शख़्स अमल कर सकता है जो मुख़्तलिफ़ मसाइल में तमाम मुजतहिदीन के इख़्तिलाफ़ी फ़तवों से पूरी तरह बाख़बर हो और ऐसा तरीक़ा ए अमल इख़्तियार कर सके जिसमें जामेईयत पाई जाती हो। ज़ाहिर है कि यह काम भी तक़रीबन इज्तिहाद ही की तरह दुश्वार और मुश्किल है। पस हमारे लिये दो ही सूरतें बाक़ी रह जाती हैं यानी या मुज्ताहिद बनें या फिर मुज्ताहिद की तक़लीद करें । (इदारः)

अक़वाले ज़र्री

(स्वर्णिम कथन)

"क्या तुमने पूरी तरह समझ लिया है कि इस्लाम क्या है? यह एक ऐसा दीन (धर्म) है जिसकी बुनियाद हक़ व सदाक़त (यथार्थ एवं सत्य) पर रखी गई है। यह इल्म (ज्ञान) का ऐसा सरचश्मा बृहत श्रोत) है जिसमें अक़्ल व दानिश (बुध्दि एवं विवेक) की मुतअद्दिद नदियां (अनेकों धाराऐं) फूटती हैं। यह एक ऐसा चिराग़ (दीप) है जिससे कई चिराग़ (अनेकों दीप) रौशन (ज्वलित) होंगे। यह एक बलन्द रहनुमा मिनार है जो अल्लाह की राह (मार्ग) को रौशन करता है। यह उसूलों और एतिक़ादात (सिध्दान्तों एवं श्रध्दाओं) का एक ऐसा मजमूआ (संकलन) है जो सदाक़त और हक़ीक़त (सत्य एवं यथार्थ) के हर मुतलाशी (खोज करने वाले) को इत्मीनान बख़्शता (सन्तुष्टि प्रदान) करता है।

ऐ लोगों ! जान लो कि अल्लाह तआला ने अपनी बरतरीन ख़ुशनूदी की जानिब एक शानदार रास्ता और अपनी बन्दगी और इबादत का बलन्द तरीन मेयार क़रार दिया है। उसने इसे अअला अहकाम, बलन्द उसूलों, मुहकम दलाइल, नाक़ाबिले तरदीद तफ़व्वुक़ और मुसल्लिमः दानिश से नवाज़ा है।

अब यह तुम्हारा काम है कि अल्लाह तआला ने उसे जो शान एवं अज़मत (वैभव एवं प्रतिभा) बख़्शी (प्रदान की) है उसे क़ायम रखो। उस पर ख़ुलूसे दिल से (सहृदयतः) असल करो। उसके मोतक़िदात से इन्साफ़ करो। उसके अहकाम और फ़रामीन की सहीह तौर पर तअमील (परिपालन) करो और अपनी ज़िन्दगीयों में उसे मुनासिब मक़ाम (उचित स्थान) दो।"


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