अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

ज़ियारते अरबईन

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सलाम हो हुसैन पर, सलाम हो कर्बला के असीरों पर, सलाम हो कटे हुए सरों पर, सलाम हो प्यासे बच्चों पर, सलाम हो टूटे हुए कूज़ों पर,


सलाम हो उन थके हुए क़दमों पर जो चेहलुम पर हुसैन की माँ कायनात की शहज़ादी हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के सामने शोक व्यक्त करने के लिए कर्बला की तरफ़ पैदल चले जा रहे हैं।


सलाम हो उन अज़ादारों पर जो इश्के हुसैन में पैरों में पड़े हुए छालों के साथ पैदल चल रहे है


चेहलुम शीअत और इन्सानियत के इतिहास का ऐसा दिन है जब हर हुसैन का चाहने वाला यह सोंचता है कि चेहलुम के दिन आपके हरम में पहुँच कर आपको पुरसा दे आपके सामने शोक व्यक्त करे।


और यही वह दिन है जिसके बारे में हमारी दुआओं की पुस्तकों में एक ज़ियारत के बारे में लिखा गया है कि इस ज़ियारत को उस दिन पढ़ना चाहिए और वह ज़ियारत है


ज़ियारते अरबईन


ज़ियारते अरबईन के बारे में इमाम हसन अस्करी (अ) फ़रमाते हैं:


मोमिन की पाँच निशानियाँ है


1. एक दिन में 51 रकअत नमाज़ पढ़ना।


2. दाहिने हाथ में अंगूठी पहनना।


3. मिट्टी पर सजदा करना।


4. बिस्मिल्लाह को तेज़ आवाज़ में पढ़ना।


5.  ज़ियारते अरबई पढ़ना।


तो यह वह ज़ियारत है जो मोमिन की निशानियों में से है, अब प्रश्न यह उठता है कि आख़िर इस ज़ियारत में है क्या जो इसको मोमिन की निशानियों में से कहा गया है।


इस लेख में हम संक्षिप्त रूप में ज़ियारते अरबईन के बार में और उसमें क्या बयान किया गया है बताएंगे।


इमाम हुसैन (अ) के मक़ामात


यह वह महान ज़ियारत है जिसमें इमाम हुसैन (अ) के मक़ामात के बयान किया गया है कि इमाम हुसैन कौन थे और उनके क्या मक़ामात थे।


आपके बारे में कहा गया है कि हुसैन ख़ुदा के वली है, इमाम हुसैन अल्लाह के हबीब है हुसैन अल्लाह के ख़लील है।


अब यहा पर यह संदेह न पैदा हो कि यह कैसे हो सकता है कि हुसैन ख़लील और हबीब हों क्योंकि यह तो इब्राहीम और पैग़म्बर थे, तो याद रखिए कि हुसैन को नबियों का वारिस कहा गया है तो जो विशेषताएं पहले के नबियों में थी वही हुसैन में भी मौजूद हैं, अगर इब्राहीम ख़लील हुए तो वह हुसैन का सदक़ा है क्योंकि आयत में कहा गया है कि


وَإِنَّ مِن شِیعَتِهِ لَإِبْرَاهِیمَ.


इब्राहीम उनके शियों में से थे।


फिर कहा गया है कि हुसैन शहीद हैं, शहीद का महत्व क्या है ? शहादत वह स्थान है जो ख़ुदा हर एक को नही देता है


हुसैन असीरे कुरोबात हैं,

यह असीरे कुरोबात क्या है?


इसका अर्थ समझने के लिए इस मिसाल को देखें , कभी आपने किसी भेड़िये को देखा है भेड़िये की आदत यह होती है कि अगर वह किसी भेड़ के गल्ले पर हमला कर दे तो वह आख़िर कितनी भेड़ों को खा सकता है एक या दो इससे अधिक नही लेकिन अगर वह हलमा कर दे तो वह जितनी भेड़ों को पाता है मार देता है खा पाए या न खा पाए, यानी भेड़िये का गुण यह है कि जिसको पाए क़त्ल कर दो अगर एक बेड़िये की यह आदत होती है तो आप सोंचें कि अगर किसी एक भेड़ पर दस भेड़िये हमला कर दें तो उस भेड़ का क्या होगा उसमें क्या बचेगा।


इसी प्रकार इमाम हुसैन (अ) भी थे जब यज़ीदी भेड़ियों ने इमाम हुसैन पर हमला किया तो हुसैन में कुछ नहीं बचा जिसके बताया जा सकता, एक लाश ती जिसका सर कटा हुआ था लिबास नहीं था, जिस्म घोड़ों की टापों से पामाल था, जिस्म टुकड़े टुकड़े हो चुका था।


फ़ातेमा का वह हुसैन कहां था.... जिसे उन्होंने बहुत प्यार से चक्कियां पीस पीस कर पाला था।


हुसैन क़तीले अबरात हैः यानी हुसैन की शहादत रहती दुनिया तक के लिए लोगों के रिए इबरत बन गई।


फ़िर इस ज़ियारत में ज़ियारत पढ़ने वाला कहता है कि मैं गवाही देता हूँ कि हुसैन ख़ुदा के वही हैं उनको शहादत के माध्यम से सम्मान दिया गया.... और हुसैन नबियों के वारिस हैं


हुसैन नबियों के वारिस हैं हर चीज़ में अगर नूह ने अपने ज़माने में तूफ़ान देका तो वारिसे नूह ने हुमराही के तूफ़ान से मुक़ाबला किया अगर मूसा ने अपने ज़माने के फ़िरऔन को ग़र्क़ किया तो वारिसे मूसा ने युग के फ़िरऔर यज़ीद को डिबो दिया, अगर याबूक़ ने अपने यूसुफ़ को खो दिया तो वारिसे याक़ूब हुसैन ने अपने यूसुफ़ अली अक़बर के सीने पर भाला लगा देखा।


फिर इसके बाद इस ज़ियारत में उन लोगों के बारे में कहा गया है जो हुसैन के दुश्मन थे।


किन लोगों ने हुसैन से शत्रुता की


हुसैन के शत्रु वह लोग हैं जिनको इस दुनिया ने धोखा दिया, उन्होंने इस दुनिया के चार दिन के जीवन के लिए रसूल ने नवासे को शहीद कर दिया और सदैव के लिए ख़ुदा का क्रोध ख़रीद लिया, यह लोग दुनिया की चकाचौंध में खो गए और आख़ेरत को भूल गए और उसके बाद


न ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम


यह दुनिया क्या है?


दुनिया एक बूढ़ी कुवांरी औरत की तरह है जिसने श्रंगार कर लिया है और इस संसार के सारे लोगों से शादी की है लेकिन किसी हो भी स्वंय पर हावी नहीं होने दिया है और अपने सारे पतियों की हत्या कर दी है।


यह है दुनिया की वास्तविक्ता


न दुनिया मिली और न ही आख़ेरत दुनिया में लानती क़रार पाए और आख़ेरत में नर्क की आग उनका ठिकाना बनी।


यह ज़ियारत बता रही है कि हुसैन के शत्रु सभी आरम्भ से ही बेदीन नहीं थे बल्कि कुछ वह लोग भी थे जो ईश्वर की इबादत करने वाले थे लेकिन जब इम्तेहान का मौक़ा आया तो वह फ़ेल हो गए।


आपने बलअम बाऊर का वाक़ेआ तो सुना ही होगा, वह बलअम जिसके पास इसमे आज़म था जिससे वह बड़े बड़े काम कर सकता था लेकिन उसने इस इसमें आज़म को ख़ुदा के नबी मूसा के मुक़ाबले में प्रयोग किया और हमेशा के लिए ख़ुदा के क्रोध का पात्र बन गया।


इसी प्रकार वह इबादत करने वाले जो ख़ुदा के वली हुसैन के मुक़ाबले में आ गए वह हमेशा के लिए ख़ुदा के क्रोध का पात्र बन गए।


इसके बाद ज़ियारत पढ़ने वाला हुसैन पर सलाम भेजता है, सलाम हो तुम पर हे पैग़म्बर के बेटे मैं गवाही देता हूँ कि आप ख़ुदा की अमानत के अमानतदार हैं... आप मज़लूम शहीद किए गए, ख़ुदा आपका साथ छोड़ देने वालों पर अज़ाब करेगा और उन पर जिन्होंने आपको क़त्ल किया।


फिर कहता है, ख़ुदा लानत करे उस उम्मत पर जिन्होंने आपको क़त्ल किया और उस उम्मत पर जिन्होंने इसको सुना और इस पर राज़ी रहे।


हे ख़ुदा मैं मुझे गवाह बनाता हूँ कि मैं उसका दोस्त हो जिसने उनसे दोस्ती रखी और उनका दुश्मन हो जिन्होंने उनसे शत्रुता दिखाई।


मेरी सहायता आपके लिए तैयार है।


और यही कारण है कि आज जैसा जैसा समय व्यतीत होता जा रही है हुसैन का चेलहुल और अज़ीम होता जा रहा है यह पैदल चलने वालों का काफ़िला बढ़ता जा रहा है आज लोग 1000 से भी अधिक किलोमीटर का फ़ासेला पैदल तै कर के आ रहे हैं ख़तरा है, मौत का डर हैं लेकिन हुसैन के इन आशिक़ों पर किसी चीज़ का असर नहीं है, और इसीलिए कहा गया है कि इमामे ज़माना के ज़ुहूर का समय जितना पास आता जाएगा हुसैन का चेहलुम उनता ही अधिक शानदार और अज़ीम होता जाएगा।


मैं गवाही देता हूँ कि मैं आप पर विश्वास रखता हूँ और आपके पलट कर आने पर मेरा अक़ीदा है मेरा दिल आपके साथ है, मैं आपके साथ हूँ आपके साथ हूँ, आपके शत्रुओं के साथ नहीं हूँ।


ख़ुदा का सलाम हो आपकी आत्मा पर आपके शरीर पर आपके अपस्थित पर अनुपस्थित पर आपके ज़ाहिर और बातिन पर।


अंत में ईश्वर से यही प्रार्थना है कि हमको हुसैन के सच्चे मानने वालों में शुमार करे

 

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