अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

आशूर की हृदय विदारक घटना का चालीसवां दिन

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आशूर की हृदय विदारक घटना का चालीसवां दिन गुज़र रहा है। आशूर के दिन का ख़्याल आते ही ख़ून, अत्याचार के ख़िलाफ़ आंदोलन, भाले पर इतिहास लिखने वाले अमर बलिदानों के सिर और चेहरे पर तमांचे खाए हुए बच्चों के चेहरे मन में उभरते है।

 

कायरों के अत्याचार से बेहाल पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों की पीड़ाओं का उल्लेख करते करते चेहलुम आ पहुंचा। पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों को मरुस्थलों, गलियों और बाज़ारों में फिराया गया ताकि यज़ीद के विचार में सब लोग ये देखें कि सत्य हार गया। किन्तु हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा और इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की वीरता ने यज़ीदियों के षड्यंत्र पर ऐसा पानी फेरा कि इतिहास आज भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की अमर विजय पर हतप्रभ है।      

 

पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन उन दो अनमोल रत्नों में हैं जिन्हे पैग़म्बरे इस्लाम अपने अनुयाइयों को पथभ्रष्ता से बचाने के लिए यादगार छोड़ गए थे। पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा था, “ मैं तुम्हारे बीच दो बहुमूल्य चीज़े छोड़े जा रहा हूं कि अगर उनकी शरण में रहे तो कभी भी गुमराह नहीं होगे। एक ईश्वर की किताब क़ुरआन और दूसरे मेरे पवित्र परिजन हैं।”

 

जिस दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन का प्रतीक ध्वज हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम के हाथ कटने से ज़मीन पर गिरा और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पवित्र सिर को उनके परिजनों के सामने भाले पर चढ़ाया गया उस वक़्त यज़ीद और यज़ीदी यह सोच रहे थे कि उन्होंने इन दो मूल्यवान रत्नों में से एक को मुसलमानों से ले लिया है और इस प्रकार दूसरे रत्न अर्थात क़ुरआन में अपनी मनमानी से हेर-फेर करेंगे। किन्तु ईश्वर का इरादा कुछ और था। ईश्वर ने इरादा किया कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का ख़ून सच्चे मुसलमानों की रगों में जोश मारता रहे ताकि सत्य और न्याय, नास्तिकों व ईश्वर के दुष्मनों के षड्यंत्र के सामने न झुके।

 

इमाम हुसैन के चेहलुम का दिन शीयों और इमाम हुसैन से श्रद्धा रखने वालों के बीच हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। यह दिन पैग़म्बरे इस्लाम से श्रद्धा रखने वालों के मन में इतना महत्व रखता था कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के पहले चेहलुम से आज तक जान के ख़तरे के बावजूद, श्रद्धालु उनके रौज़े का दर्शन करते आ रहे हैं। सबसे पहले जिस व्यक्ति ने इमाम हुसैन की क़ब्र की ज़ियारत की वह जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी थे। जो पैग़म्बरे इस्लाम के निष्ठावान साथियों में थे। चेहमुल के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़ा का दर्शन करने की परंपरा आज भी पूरी शान से इराक़ में बाक़ी है। आज पूरी दुनिया अपनी आंखों से देख रही है कि करोड़ से ज़्यादा लोग, आतंकवादी हमलों की परवाह किए बिना, पूरी दुनिया से आज के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े का दर्शन कर रहे हैं। ये लोग यह बताने आए हैं कि वे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रास्ते पर चलने वाले हैं और उनके नेतृत्व में अत्याचारियों के सामने नहीं झुकेंगे और इस मार्ग में अपनी जान भी न्योछावर करने को तय्यार हैं।

 

पैग़म्बरे इस्लाम के निष्ठावान साथी जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी आंखों से वंचित होने के बावजूद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पहले चेहलुम पर उनके क़ब्र के दर्शन के लिए पहुंचे। उनके साथ क़ुरआन के व्याख्याकार अतीया बिन सअद कूफ़ी भी थे। अतीया कहते हैं, “ हम जाबिर के साथ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र के दर्शन के लिए कर्बला पहुंचे। जाबिर ने मुझसे कहा, मुझे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र तक पहुंचाओ। मैंने उनका हाथ क़ब्र पर रखा। वह खड़े होकर बेहोश हो गए। मैंने उनके चेहरे पर कुछ बूंध पानी के छिड़के तो वह होश में आ गए और तीन बार कहा, हे हुसैन! फिर कहा हे हुसैन क्यों जवाब नहीं देते? उसके बाद कहा, आप कैसे मेरा जवाब दें जबकि आपके सिर को आपके जिस्म से अलग कर दिया गया है? मैं गवाही देता हूं कि आप अंतिम ईश्वरीय दूत पैग़म्बरे इस्लाम और मोमिनों के सरदार के बेटे हैं। ईश्वर की कृपा आप पर हो।”

 

मुसलमानों की पुरानी किताबों में चेहलुम के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े के दर्शन का उल्लेख मिलता है। इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के हवाले से एक वर्णन है। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं, “ मोमिन की पांच विशेषताएं हैं। इक्यावन रकअत नमाज़ पढ़ना, चेहलुम को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े का दर्शन करना, सीधे हाथ में अंगूठी पहनना, माथे को सजदे की अवस्था में ज़मीन पर रखना, और नमाज़ में बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम को ऊंची आवाज़ में पढ़ना।” एक और वर्णन है कि अगर कोई चेहलुम के दिन कर्बला नहीं पहुंच सकता हो तो उसे दूर से इस दिन से विशेष ज़ियारत पढ़नी चाहिए। जिससे चेहलुम की अहमियत और आशूर की अत्याचार के आंदोलन की याद ताज़ा हो जाती है।

 

आशूर से चेहलुम के बीच चालीस दिन होते हैं। इन चालीस दिनों में हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने बड़ी समझदारी व वीरता से यज़ीद की जीत की आशा का गला घोंट दिया और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन का ध्वज इस तरह उठाया जो आज तक फहरा रहा है। हज़रत ज़ैनब की हस्ती थी जिसने रक्तपात से भरे आशूर से, शोकाकुल चेहलुम तक इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सच्चाई और उन पर किए गए अत्याचार के संदेश को इतनी ऊंची आवाज़ में कहा कि उसकी गूंज से शताब्दियों बाद भी अत्याचारियों का महल थर्राने लगता है और सत्य से प्रेम करने वालों को पूरी दुनिया से कर्बला के मरुस्थल तक खींच लाती है।            

 

हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने कर्बला के आंदोलन को सफलता तक पहुंचाने में बहुत बड़ा योगदान दिया। उन्होंने आशूर की घटना के बाद बंदियों की अभिभावकता का निर्वाह किया और इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की जान की रक्षा करते हुए हुसैनी इन्क़ेलाब को बड़ी कठिनाइयां सहन करते हुए अमर बना दिया। हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने अपनी ज़िम्मेदारी को बड़ी दृढ़ता से निभाया ताकि इस्लाम को विकृत न कर सकें।

 

जिस वक़्त कर्बला में बनाए गए बंदियों का कारवां कूफ़े पहुंचा, पहले तो लोग ख़ुश होकर बंदियों को देखने के लिए निकले लेकिन हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने अपने जागुरुक एवं झिंझोड़ने वाले भाषण से स्थिति को बदल दिया और ख़ुशी से तमाशा देखने वाले कूफ़ियों को रोने पर मजबूर कर दिया। हज़रत ज़ैनब ने कहा, “ हे पाखंडियो के समूह! हे बेग़ैरतो! तुम लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम के जिगर के टुकड़े व स्वर्ग के जवानों के सरदार को क़त्ल किया। वह हस्ती जो युद्ध के समय तुम्हारे लिए पनाह थी और शांति के समय तुम्हारे सुकून का स्रोत था। क्या तुम्हें होश है कि तुमने पैग़म्बरे इस्लाम के किस जिगर को टुकड़े किया और किस संधि को तोड़ा है।”

 

हज़रत ज़ैनब के झिंझोड़ने वाले भाषण ने बड़ी संख्या में कूफ़े वासियों के ध्यान को उनके पाप की ओर उन्मुख कराया। इसी प्रकार हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने कूफ़े के शासक उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद के महल में अपनी ऊंची आवाज़ से उसे उसकी हैसियत समझा दी और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन को नाकाम बनाने के उसके षड्यंत्र पर पानी फेर दिया। इस प्रकार उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद अपने महल में कर्बला के पीड़ित बंदियों की उपस्थिति से घबरा गया और उसने उन्हें जल्दी ही शाम के शासक यज़ीद की ओर रवाना कर दिया।

जिस समय कर्बला के पीड़ित बंदियों का कारवां सीरिया के केन्द्र दमिश्क़ पहुंचा तो उस समय लोग ख़ुशियां मना रहे थे और इसका कारण यज़ीद की ओर से किया गया दुष्प्रचार था। उसने यह दुष्प्रचार किया था कि इस्लामी ख़िलाफ़त के ख़िलाफ़ विद्रोह करने वाले, मारे जाने और बंदी बनाए जाने के योग्य हैं। यज़ीद ने एक सभा का आयोजन किया जिसमें उसके मंत्री और बड़े बड़े सेनापति उपस्थित थे। उसने बड़े घमन्ड से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के होंठ और दांतों का छड़ी से अनादर करते हए कहा, “ काश मेरे क़बीले के बड़े लोग जो बद्र में मारे गए, जीवित होते तो देखते कि हमने बनी हाशिम के बड़ों को मार डाला और उनसे बद्र युद्ध का बदला चुका लिया। उस ने कहा कि बनी हाशिम ने सत्ता के लिए खिलवाड़ किया न कोई ईश्वरीय वाणी थी और न ही कोई ईश्वरीय संदेश उतरा था।” इस प्रकार यज़ीद ने नशे की हालत में अपनी नास्तिकता की घोषणा कर दी। किन्तु उसी समय हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने ऐसा झिंझोड़ने वाला भाषण दिया कि लोगों को हज़रत अली के भाषण याद आ गए। हज़रत ज़ैनब ने यज़ीद के दरबार में जो ख़ुतबा दिया उसके एक भाग का अनुवाद यूं है, ईश्वर ने यह सच कहा, अंततः उनके बुरे कर्म ने उन्हें यहां तक पहुंचा दिया कि वे ईश्वर की निशानियों को झुटलाने लगे और उसका मखौल उड़ाने लगे। हे यज़ीद! हालात ऐसे हो गए हैं कि तुझसे बात करनी पड़ रही है किन्तु मेरी नज़र में तू इतना घटिया है कि तुझे बात करने के लायक़ भी नहीं समझती क्योंकि तेरा पाप इतना बड़ा है जिसे बयान हीं किया जा सकता। मगर क्या करूं। मेरी आखें मेरी प्रियजनों की मौत से नम हैं और मन में उनकी जुदाई से आग लगी हुयी है। हे यज़ीद! तेरे बस में जो है कर ले लेकिन ईश्वर की सौगंध तू ईश्वरीय संदेश को नहीं मिटा सकता और तू अपनी इस अकांक्षा से अपमानित होगा। इमाम हुसैन की हत्या का क्लंक भी तू अपने माथे से न मिटा सकेगा।

 

हज़रत ज़ैनब ने अपने तर्क व वीरता भरे भाषण से इस तरह यज़ीद को बौखला दिया कि वह हज़रत इमाम हुसैन की हत्या का आरोप कूफ़े के शासक की गर्दन पर मढ़ने पर मजबूर हो गया। यज़ीद की सभा में हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के भाषण और फिर हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के भाषण से दमिश्क़ के हालात बदल गए और लोगों को सच्चाई का पता चल गया। जी हां इस तरह हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने इमाम हुसैन की क्रान्ति के संदेश को फैलाने में अपना अनमोल योगदान दिया और फिर यज़ीद के दरबार को फ़त्ह करके इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का शोक मनाने कर्बला पहुंचीं।      

आज इमाम हुसैन के श्रद्धालु पिछले वर्षों के चेहलुम की भांति शोकाकुल मन के साथ कर्बला पहुंचे हैं। इनमें ज़्यादातर श्रद्धालु कई दिनों पैदल चलकर कर्बला पहुंचे हैं। दर्शन की यह प्यास उस हस्ती के लिए है जिसके बारे में पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है कि हुसैन मुक्ति की नौका हैं और रहती दुनिया तक इन्सानों के मार्गदर्शक हैं। कितने सौभाग्यशाली हैं ये श्रद्धालु जिन्होंने नास्तिकता व पाखंड से भरी इस दुनिया में मुक्ति की नौका में शरण ली है। श्रद्धालुओं के जमावड़े का यह दृष्य उन लोगों के मुंह पर तमांचा है जो इस्लाम की सिर्फ़ हिंसक छवि देखना चाहते हैं। यह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के ख़ून का असर है जो आज भी समय के शैतानों के षड्यंत्र को नाकाम बना रहा है।

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