अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

दोस्तों के अधिकार

0 सारे वोट 00.0 / 5

दोस्तो के हुक़ूक़, वह बुनियादी मसला है जिसके ज़रिये दोस्ती को मज़बूत से मज़बूत तर बनाया जा सकता है, मौला ए काऍनात (अ) के कलाम में दोस्तों के माद्दी व मानवी हुक़ुक़ के बयान के साथ उनकी अदायगी की भी ताईद की गयी है, चुनान्चे अमीर अल मोमिनीन (अ) इमामे हसन (अ) को तहरीर किये गये ख़त में इरशाद फ़रमाते हैं :


(احمل نفسک)) यानी “अपने नफ़्स को अपने भाई के बारे में क़ते ताअल्लुक़ के मुक़ाबले में ताअल्लुक़ जोड़ने, रूगरदानी के मुक़ाबले में मेहरबानी, बुख़्ल के मुक़ाबले में अता, दूरी के मुक़ाबले में क़ुर्बत, शिद्दत के मुक़ाबले में नर्मी और जुर्म के मुक़ाबले में माज़ेरत पर आमादा करो, गोया तुम उसके ग़ुलाम और वह तुम्हारा आक़ा व वली ए नेमत है।”


हज़रत अमीरल मोमिनीन (अ) के इस क़िस्म के फ़रामीन जिनमें इंसान को दोस्तों से हुस्ने सुलूक और उनकी ग़लतियों से दरगुज़र करने की ताकीद की गयी है दर अस्ल उन मवारिद के लिये हैं जिनमें दो दोस्तों के बहमी ताल्लुक़ात का जायज़ा लिया गया है, यानी दोस्त आपस में किस तरह का बर्ताव करें और कौन कौन सी बातों का ख़्याल रख़े। मज़कूरा फ़रामीन के अलावा क़ुछ ऐसे इरशादात भी हैं जिनमें दोस्तों की ग़ैर मौजूदगी या दूसरों के साथ दोस्तों के सिलसिले में बर्तावों का अंदाज़ बताया गया है। जैसा कि अमीरल मोमिनीन (अ) इरशाद फ़रमाते हैं:


(لا یکون الصدیق)  यानी “दोस्त उस वक़्त तक दोस्त नही हो सकता जब तक तीन मौक़ों पर दोस्त के काम न आये, मुसीबत के मौक़े पर, ग़ैर मौजूदगी में और मरने के बाद ”


एक मक़ाम पर फ़रमाते हैं :


“दोस्त वह होता है जो ग़ैर मौजूदगी में भी दोस्ती निभाये और जो तुम्हारी परवाह न करे वह तुम्हारा दुश्मन है। ”


दोस्तो के हुक़ूक़ का एक तसव्वुर हमारे यहाँ सब साँझा क़िस्म का पाया जाया है यानी दोस्त के हुक़ूक़ व मफ़ादात को इस क़िस्म का मुशतरक अम्र समझा जाता है जिसमें दूसरे को दख़ालत का पूरा पूरा हक़ हासिल होता है। और बाज़ औक़ात इस क़िस्म के तसव्वुर के नतीजे में दोस्त के हुक़ूक़ दोस्त के हाथो पामाल होते हैं। अमीरल मोमिनीन (अ) हुक़ूक़ के इस नाजायज़ इस्तेमाल से मना फ़रमाते है:


(.لا تضیعن حق اخیک ..)  यानी “ बाहमी रवाबित व दोस्ती की बुनियाद पर अपने किसी भाई की हक़ तल्फ़ी न करो क्योकि फिर वह भाई कहाँ रहा जिसका तुमने हक़ तल्फ़ कर दिया। ”


दोस्तो के बारे में लोगों की बातों पर कान न धरने के सिलसिले में आप (अ) फ़रमाते है :


(.ایها الناس من عرف من اخیه .)यानी “ ऐ लोगों अगर तुम्हे अपने किसी भाई के दीन की पुख़्तगी और अमल की दुरुस्तगी का इल्म हो तो फिर उसके बारे में लोगों की बातों को अहमियत न दो। ”


दोस्त और दोस्ती की हदें


दोस्त और दोस्ती के बे शुमार फ़वायेद और अहमियत के पेशे नज़र बहुत से लोग दोस्ती में किसी क़िस्म की हुदूद व क़ुयूद के पाबंद नही होते, और दोस्त के सामने अपने सब राज़ बयान कर देते हैं लेकिन मकतबे इमाम अली (अ) में दोस्ती इंतिहाई गहरी व पाकीज़ा होने के बावजूद एक दायरे में महदूद है। जिसे हदे एतिदाल भी कहा जाता है। चुनान्चे इमामे अली (अ) फ़रमाते है :


(احبب حبیبک هونا ما .) यानी “ दोस्त से एक महदूद हद तक दोस्ती करो क्योकि मुम्किन है कि वह एक दिन तुम्हारा दुश्मन हो जाये और दुश्मन से दुश्मनी बस एक हद तक ही रखो शायद वह किसी दिन तुम्हारा दोस्त बन जाये। ”


अमीरल मोमिनीन (अ) के इस फ़रमान में ये हिकमत पोशीदा है कि इंसान अपने राज़ का ग़ुलाम होता है, अगर इंसान किसी दोस्त के सामने अपने तमाम राज़ बयान कर दे और ज़माने के नशेब व फ़राज़ दोस्त को दुश्मन बना दें तो इंसान ख़ुद ब ख़ुद अपने दुश्मन का ग़ुलाम बन जायेगा।


हमारे मआशरे में दोस्त सिर्फ़ इन्ही अफ़राद को तसव्वुर किया जाता है जिनसे इंसान बज़ाते ख़ुद दोस्ती उस्तुवार करता है। जबकि अमीरल मोमिनीन (अ) दोस्तों के दायरे को मज़ीद वुसअत दे कर इंसान के हलक़ ए अहबाब में दो क़िस्म के दोस्तों का इज़ाफ़ा फ़रमाते हैं :


 यानी “ तुम्हारे दोस्त भी तीन तरह के हैं और दुश्मन भी तीन क़िस्म के हैं। तुम्हारा दोस्त, तुम्हारे दोस्त का दोस्त और तुम्हारे दुश्मन का दुश्मन तुम्हारे दोस्त हैं…… ”


आम तौर पर हम दोस्तों की उन दो क़िस्मों से ग़ाफ़िल रहते हैं जिसके नतीजे में बाज़ औक़ात क़रीबी दोस्तों से हाथ धोना पड़ते हैं।


दोस्तों के लिये मुफ़ीद और नुक़सान देह चीज़े


दोस्तों के हुक़ूक़ की अदायगी ही दर हक़ीक़त दोस्ती को मज़बूत और पायदार करती है लेकिन उसके अलावा भी क़ुछ ऐसे असबाब व अवामिल हैं जो दोस्ती के रिश्ते के लिये निहायत मुफ़ीद शुमार होते हैं जैसा कि अमीरल मोमिनीन (अ) फ़रमाते हैं :


(البشاشه حباله الموده) “ कुशादा रुई मोहब्बत का जाल है। ”


इसी तरह आप फ़रमाते है:


नर्म ख़ूँ, क़ौम की मुहब्बत को हमेशा के लिये हासिल कर लेता है।


इसी तरह जहाँ हुक़ूक़ की अदायगी में कोताही के नतीजे में दोस्ती जैसा मज़बूत रिश्ता कमज़ोर हो जाता है वही कुछ और चीज़ों की वजह से उसमें दराड़ पड़ जाती हैं चुनान्चे अमीरल मोमिनीन (अ) फ़रमाते हैं :


(حسد الصدیق من سقم الموده) यानी “ दोस्त का हसद करना दोस्ती की ख़ामी है। ”


या हज़रत (अ) का ये फ़रमान


(من اطاع الواشی ضیع الصدیق)  यानी “ जो चुग़ुलख़ोर की बात पर एतिमाद करता है वह दोस्त को खो देता है ”


एक और मक़ाम पर दोस्ती के लिये नुकसान देह आमिल की जानिब इशारा फ़रमाते हैं :


“ जिस ने अपने मोमिन भाई को शर्मिन्दा किया समझो कि उससे जुदा हो गया।  और दोस्ती के सिलसिले में मौला ए काऍनात (अ) के सुनहरे कलिमात को बे तरतीब से जोड़ कर दोस्त और दोस्ती के ख़्वाहिशमंद अफ़राद की ख़िदमत में इस उम्मीद बल्कि इस यक़ीन के साथ पेश कर रहे हैं कि अगर हम उन राहनुमा उसूलो को अपने लिये नमून ए अमल क़रार दें तो यक़ीनन अमीरे काऍनात (अ) के इस फ़रमान की अमली तसवीर बन सकते हैं जिसमें आप (अ) फ़रमाते हैं :


(خالطوا الناس مخالطه ان متم..)  “ लोगों के साथ इस तरह से रहो कि अगर मर जाओ तो तुम पर रोयें और अगर ज़िन्दा रहो तो तुम्हारे मुश्ताक़ हों। ”

 

आपका कमेंन्टस

यूज़र कमेंन्टस

कमेन्ट्स नही है
*
*

अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क