अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

इमाम अली की ख़ामोशी

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आज हम इस विषय पर चर्चा करेंगे कि जब खि़लाफ़त इमाम अ़ली का हक़ था तो क्यु आपने पैग़म्बर के स्वर्गवास के बाद अपने हक़ को अबूबकर, उस्मान या उमर से लेने की कोशिश नहीं की?

इस सवाल के जवाब में हम यहां पर यह कहना सही समझते हैं कि जहां तक बात है वापस लेने की तो इमाम अ़ली अ.स.  तीनों के ज़माने से हमेशा ज़बानी तौर पर प्रदर्शन करते रहे हैं लेकिन आप ने इन लोगों से जंग क्यों नहीं लड़ी और वह जवाबात निम्नलिखित हैं।

 

1.    अगर इमाम ताक़त और हथियार बंद आन्दोलन के द्वारा हुकूमत और खि़लाफ़त को अपने हाथ में लेना चाहते तो आपको अपने बहुत सारे चाहने वालों को अपने हाथ से खोना पड़ता कि जो आप की रहबरी और खि़लाफ़त को दिल व जान से मानते थे, इसके अलावा बहुत सारे सहाबी जो कि किन्हीं कारणों से इमाम अ़ली की खि़लाफ़त और इमामत पर राज़ी नहीं थे परन्तु दूसरी बातों में आपसे मतभेद न रखते थे इन लोगों के मरने से कि जो मूर्ती पूजा, शिर्क, यहूदियत या ईसाईयत के सामने इस्लाम की ताक़त थे इनके मरने से इस्लाम की ताक़त कमज़ोरी में बदल जाती।

 

2.    बहुत से गिरोह और क़बीले के जो पैग़म्बर की आख़री उम्र में मुसलमान हुये थे उन्होंने अभी इस्लाम की ज़रूरी चीज़ों को भी नहीं सीखा था और इस्लाम अभी पूरी तरह से उनके दिलों में नहीं उतरा था जैसे ही उन्हे रसूले अकरम (स.अ.व.व) के देहान्त की ख़बर उन लोगों के बीच फैली , उनमें से कुछ गिरोह अपने पुराने धर्मों पर पलटने लगें और मूर्ती पूजा को अपनाने लगे और मदीने में इस्लामी हुकूमत का विरोध करने लगे थे अगर इमाम अ़ली ऐसे मौक़े पर अपना आंदोलन शुरू कर देते तो मुम्किन था कि मुसलमानों के इस आपसी झगड़े का फ़ायदा दुश्मन उठा लेता और वही के वही इस्लामी हुकूमत की बिस्तर बोरिया बंध जाती।

 

3.    मुरतदीन (वो लोग कि जो इस्लाम से पलट गये और क्रमांक 2 में जिनका ज़िक्र किया गया है) के ख़तरे के अलावा नबुवत का दावा करने वालों और दूसरे नबियों जैसे मुसैलेमा, तुलैहा जैसे लोग प्रतिदिन सामने आ रहे थे और उनमें से हर एक के पास कुछ न कुछ ताक़त और तरफ़दार थे और ये लोग मदीनें पर हमला करना चाहते थे, मुसलमानों के आपसी सहयोग द्वारा ही इन लोगों को पराजित किया गया। अगर इन हालात में इमाम अ़ली अ.स. हथियार उठाते तो शायद मुसलमान आपसी सहयोग न होने की बिना पर इन लोगों को पराजित न कर पाते।

 

4.    रोमियों के हमले का ख़तरा भी इमाम अ़ली अ.स. के लिये हथियार न उठाने का एक बड़ा कारण बन सकता था क्योंकि इमाम अ़ली अ.स. जानते थे कि अगर मुसलमानों में अन्दुरूनी विद्रोह हुआ तो उसका एक नतीजा रोम वालों को ख़ुद अपनी हुकूमत पर हमले के दावत देना है जो कि बहुत दिनों से मुसलमानों पर हमले की ताक़ में है और अगर ऐसे हालात में रोमी लोग हमला करते है तो इस्लाम तथा मुसलमानों को एक बड़ा नुक़्सान उठाना पड़ सकता है।

 

उपरोक्त कारणों को पढ़ कर कोई भी समझदार व्यक्ति इस नतीजे पर पहुँच सकता है कि अगर इमाम अ़ली अ.स पैग़म्बर के स्वर्गवास के बाद अपने हक़्क़े खि़लाफ़त के लिये तलवार उठाते तो शायद आज इस्लाम का नाम भी बाक़ी न रहता।

 

(ये आरटीकल जनाब मेहदी पेशवाई की किताब सीमाये पीशवायान से लिया गया है।)

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