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शरमिन्दगी की रिवायत

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खलीफाऐ अव्वल अबुबकर बिन अबुक़हाफा एक रिवायत की बिना पर अपनी उम्र के आखरी लमहो मे तीन कामो के करने, तीन कामो के न करने, और पैग़म्बर से तीन सवालो के न पूछने से शरमिंदगी का इज़हार किया है।

 

 

इस रिवायत के बारे मे बहुत से सवाल किये जाते है कि ये रिवायत हदीस, तारीख और इल्मे रिजाल की किन शिया या सुन्नी किताबो मे आई है? इन किताबो का शिया या सुन्नी उलेमा के दरमियान क्या एतबार है ? क्या इस रिवायत की तमाम सनदे मोतबर है? इलमे रिजाल और तारीखदानो की इस रिवायत की सनद और मज़मून के बारे मे क्या नज़र है? इस रिवायत को सही मानने के नतीजे क्या होंगे?

 

जहा तक सवाल है इस बात का कि ये रिवायत शिया, सुन्नीयो की किन किताबो मे आई है तो इसका जवाब ये है कि शिया और सुन्नी दोनो के बहुत से मोहद्देसीन, तारीख़दान, मनाक़िब लिखने वाले, रिजालीयो, अदीबो, रावीयो और नाक़िलो ने इस रिवायत को चंद तरीक़ो से सिक़ह रावीयो और अलग अलग सनदो से लफ़्ज़ो और मज़मून के थोड़े बहुत फर्क़ से तीसरी सदी के पहले पचासे यानी वो ज़माना की जिसमे हदीस लिखने की शुरूआत हुई थी, से लिखा है यहां तक कि ये रिवायत मौजूदा ज़माने की रिजाल, हदीस, तारीख़ और अरबी अदब की किताबो मे भी मौजूद है।

 

और इस रिवायत का सही होना, इसकी सनद व पुरानी किताबो मे इसके होने से साबित है और इस रिवायत को सही और सच्ची मानने का नतीजा ये है कि हज़रत अबुबकर को अपनी हक़्क़ानियत और अपने सही होने पर शक था।

 

 

और क्यो कि ये रिवायत अहले सुन्नत भाईयो की किताबो मे थोड़ी बहुत कमी और ज़ियादती के साथ आई है इस लिऐ हम मजबूर है कि पूरी रिवायत को दो बड़े तारीख़दानो (तिबरी और अबुउबैद क़ासिम बिन सलाम) की किताबो से लाकर उनका तरजुमा आपके सामने पेश करे।

 

 

 

रिवायत का तरजुमा

 

 

अब्दुर रहमान बिन औफ़ कहता हैः मै अबुबकर की तबीअत पूछने गया (उस बीमारी के वक़्त कि जिसमे उन्होने इंतेक़ाल किया) मैने उन्हे सलाम किया और तबीअत पूछी (मुझे देखकर) वो उठकर बैठ गये

मैने कहा अलहम्दो लिल्लाह आप बेहतर हो गये। उन्होने कहाः क्या तुम मुझे बेहतर समझते हो? मैने कहाः जी फिर उन्होने कहाः तब भी मैं बीमार हुँ फिर कहाः मैने अपनी नज़र मे तुम मे से सबसे बेहतर को खिलाफत के लिऐ अपना जानशीन बनाया है और इसकी वजह से तुम सब के दिमाग़ो मे खुराफात पैदा होगी इस उम्मीद मे कि (काश) उसकी जगह तुम्हे ये क़ुदरत हासिल होती और तुम देखोगे कि (किस तरह) दुनिया तुम्हारी तरफ रूख़ करेगी चाहे अब न किया हो लेकिन जल्द ही तुम इसकी तरफ माएल हो जाओगे और जल्द ही तुम्हारे घर रेशमी परदो और नर्म तकीयो से आरास्ता होंगे। सादे गद्दे पर सोना तुम्हारे लिऐ इस तरह दुश्वार होगा जैसे कि तुम कांटो के बिस्तर पर सो रहे हो। खुदा की क़सम अगर बेगुनाह तुम्हे क़त्ल कर दिया जाए तो ये इससे से बेहतर है कि तुम दुनिया की लज़्ज़तो मे डूब जाओ। आने वाले ज़माने मे तुम उन अफराद मे सबसे पहले होंगे कि जो लोगो को गुमराह करेंगे और उन्हे सीधे रास्ते से उल्टी तरफ को दौड़ाऐंगे।

 

(और फिर अबुबकर ने सहाबा के हाल पर एक मिसाल दी) ऐ रहनुमा तुम खुद अंधेरो मे खो गऐ थोड़ा सब्र करो कि सुबह होने वाली है।

 

फिर अब्दुर रहमान कहता है कि ज़्यादा परेशान मत हो कि तुम्हारा हाल और खराब हो जाऐगा। तुम्हारे (खिलाफत मे जानशीन मुक़र्रर करने के) इरादे के बारे मे लोग दो हालतो से खाली नही हैं या तुम्हारे मुवाफिक़ है या मुखालिफ है जो मुवाफिक़ है वो तुम्हारे साथ है और जो तुम्हारे मुखालिफ है वो तुम्हे मशवरा देंगे। और जिसको तुमने अपने बाद ख़लीफा मुक़र्रर किया है ऐसा ही है कि जैसा तुम चाहते हो और हमने भी तुमसे खैर के अलावा कुछ नही देखा, इस दुनिया की किसी चीज़ के लिऐ ग़मजदा न हो खुदा की क़सम तुम हमेशा नेक और अच्छे कामो की हिदायत करने वाले रहे।

 

अबुबकर कहने लगेः हाँ मुझे इस दुनिया की किसी चीज़ का अफसोस नही है सिवाऐ तीन कामो के, कि जिन्हे मैने अंजाम दिया और बेहतर होता कि उन्हे अंजाम न देता और तीन कामो के, कि जिन्हे मैने अंजाम नही दिया और बेहतर होता कि उन्हे अंजाम देता और तीन सवालो के, कि चाहता था कि रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) से उन्हे मालूम कर लेता।

 

और वो तीन काम कि जिन्हे मैने अंजाम दिया और चाहता था कि अंजाम न दुँ, चाहता था कि दरे फातेमा ज़हरा को किसी भी हाल मे न खुलवाता चाहे वो मुझ से जंग की नियत से ही क्यो न बंद किया गया होता और चाहता था कि फुजाआ सलमा1 को आग मे न जलाता या उसे क़त्ल कर देता या माफ कर देता और सक़ीफा बनी साएदा के दिन चाहता था कि ख़िलाफत को इन दोनो (उमर या अबुउबैदा) के गले मे डाल देता, वो अमीर होता और मैं वज़ीर।

 

और वो तीन काम कि जिन्हे मैने अंजाम नही दिया और चाहता था कि उन्हे अंजाम दूँ वो ये हैः मै चाहता था कि जब अशअस बिन कैस गिरफ्तार होकर मेरे पास लाया गया उसी रोज़ उसे क़त्ल कर दूँ क्यों कि मेरी नज़र मे वो जहा भी बुराई को देखेगा उसे मदद करेगा और चाहता था कि जिस दिन खालिद बिन वलीद को मुरतदीन की तरफ भेजा खुद ज़ुलक़िस्सा मे रूक जाता अगर मुसलमान जीत जाते कि जीत ही गये और अगर हार जाते तो उनकी मदद को जाता या उनके लिऐ मदद भेजता और चाहता था कि जिस दिन खालिद बिन वलीद को शाम भेजा उमर को इराक़ भेज देता और अपने दोनो हाथो को खुदा की राह मे खोल देता।

 

और वो तीन सवाल कि जिन्हे रसूल अल्लाह से पूछना चाहता था वो ये है चाहता था कि रसूल अल्लाह से सवाल करुं कि उनका जानशीन कौन है ताकि कोई इस बारे मे झगड़ा न करे और चाहता था कि मालूम कर चुका होता कि क्या खिलाफत मे अंसार का भी कोई हक़ है और चाहता था कि विरासत मे फूफी और भानजी का हक़ मालूम कर चुका होता, इस के बारे मे मुझे शक है।

 

इस रिवायत के अलग अलग जुमलो के नतीजे

 

''चाहता था कि दरे फातेमा ज़हरा को किसी भी हाल मे न खुलवाता चाहे वो मुझ से जंग की नियत से ही क्यो न बंद किया गया होता''  का नतीजा

 

1.   इस बात का इकरार कि अबूबकर ने जनाबे फातिमा ज़हरा (स.अ) के घर पर हमला किया और उनके घर की हुरमत को पामाल किया और घर के दरवाज़े को जनाबे फातेमा (स.अ) की इजाज़त के बग़ैर खोला।

2.   इस बात का इकरार की जनाबे फातिमा ज़हरा (स.अ) और मौला अली (अ.स) अबुबकर से नाराज़ थे। 

 

 

''क्या खिलाफत मे अंसार का भी कोई हक़ है'' का नतीजा

 

1.   इस बात का ऐतराफ की जो हदीस अबुबकर ने सकीफा मे अंसार पर ग़लबा पाने के लिए बयान की थी जो यह (आइम्मा कुरैश मे से होंगे) गलत है इस हदीस को सिर्फ अबुबकर ने नकल किया है और किसी ने इस हदीस को रसूल अल्लाह से निस्बत नही दी है। अबुबकर ने यह कह कर कि क्या अंसार का भी खिलाफत मे कोई हक़ है अपनी बयान की हुई हदीस (आइम्मा कुरैश मे से होंगे) के जाली और नकली होने का खुद इकरार किया है।

 

 

2.   इस जुमले से अबुबकर ने अपनी खिलाफत और हकुमत के गलत होने का ऐतराफ किया है और इस जुमले से मालूम होता कि वो अपनी खिलाफत, जानशीनी और हक़्क़ानियत मे शक रखता था इस बिना पर रसूले खुदा (स.अ.व.व.) के खलीफा बनने के अपने अमल के ग़लत होने का खुद इकरार किया और अंसार के हक़ मे ज़ुल्म करने औऱ उन्हे उनके हक़ से दूर करने का इकरार किया है।     

 

 

''आपके बाद खिलाफत किसका हक़ है''  का नतीजा

 

 

1.   अबुबकर का अपनी खिलाफत, हुकुमत के सही होने पर शक और खुद अपने और अपने साथीयो के आमाल के सही होने पर शक

2.   इस बात का इकरार (आइम्मा कुरैश मे से होंगे) गलत है और अबुबकर ने एक झूठ की निस्बत रसूले खुदा से दी थी और उसके खलिफा बनने पर कोई हदीस मौजूद नही है।

3.   अपनी हुकुमत के गलत होने और अपने जानशीन और साथीयो के आमाल के गलत होने का इकरार

4.   खिलाफत के हकदार से झगड़े और उसके हक को जिहालत और नफ्सपरस्ती की वजह से छीनने का इक़रार

5.   खिलाफत के हकदार पर ज़ुल्म और उसका हक़ छीनने का इक़रार

6.   इस बात का इकरार कि उसे रसूले खुदा ने खलीफा नही बनाया था और अबुबकर के पैरोकारो की बनाई गई वो तमाम हदीसे कि जो उसके रसूले खुदा के जानशीन बनाने के बारे मे है, नकली और जाली है।

 

 

 

1.  फुजाआ सलमाः एक आदमी का नाम था कि जिसने पैग़म्बरी का दावा किया था।

 

 [[ये आरटीकल डाँ. अल्लाहो अकबरी (सदस्य इतिहास विभाग, इमाम खुमैनी युनिवर्सिटी क़ुम ईरान) के फारसी आरटीकल ''हदीसे पशेमानी'' से लिया गया है ]]

 

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