अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

राज़दारे इमाम अली जनाबे कुमैल बिन ज़्याद

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जनाबे कुमैल बिन ज़्याद का शुमार इमाम अली अलैहिस्सलाम के उन असहाब मे होता है कि जिनके नाम को हर खासो आम इमाम के करीबी शार्गिदो मे गिनता है और आपकी रिवायत की हुई दुआ कि जिसको दुआ-ऐ-कुमैल के नाम से जाना जाता है आम तौर पर जुमेरात के दिन मस्जिदो मे पढ़ी जाती है।


नसब
शैख हुसैन अंसारीयान अपनी किताब शरहे दुआ-ऐ-कुमैल मे इब्ने हज़म के हवाले से जनाबे कुमैल का नस्ब (शजरा) इस तरह बयान करते हैः कुमैल बिन ज़्याद बिन नहीक बिन हैसम बिन सअद बिन मालिक बिन हारिस बिन सोहेबान बिन सअद बिन मालिक बिन नखअ।

 
क़बीला-ऐ-कुमैल
क़बीला-ऐ-नखअ यमनी क़बीलो मे एक बड़ा क़बीला है और इस क़बीले के लोगो ने शुरुआती दौर मे ही इस्लाम क़ुबुल कर लिया था और इस क़बीले के लिऐ रसूले खुदा (स.अ.व.व) ने दुआ भी की है और इस क़बीले के लोगो ने रसूले इस्लाम के ज़माने मे होने वाली जंगो मे भी शिरकत की और दरजा-ऐ- शहादत पर फाएज़ हुऐ है। मालिक बिन अश्तर नखई भी इसी बहादुर ख़ानदान की एक शख्सीयत थे कि जिनको माविया ने धौखे से ज़हर के जरीऐ शहीद कराया था।
 

जन्म दिवस
उलामा का अंदाज़ा है कि आप 12 हिजरी मे इस दुनिया मे तशरीफ लाऐ लेकिन इब्ने हजर इस्क़लानी के हिसाब से आपकी विलादत दस हिजरी से पहले हुई है।


शख्सीयते जनाबे कुमैल
जनाबे कुमैल इमाम अली और इमाम हसन के असहाबे खास मे से थे और बाज़ रिवायतो के ऐतेबार से आपने रसूले खुदा के ज़माने को भी देखा है।
इमाम अली जनाबे कुमैल को उन दस मूरीदे इतमीनान लोगो मे शुमार करते है कि जो जंगे सिफ्फीन मे आपके साथ मौजूद थे।  


रूहानी हैसीयत
इमाम अली की वसीयते और सिफारिशे कि जो जनाबे कुमैल के लिऐ है वही उनकी रूहानी और बुलन्द हैसीयत की निशानी के लिऐ क़ाफी है और शिया और सुन्नी दोनो के उलामा ने जनाबे कुमैल की पाक शख्सीयत की हमेशा तारीफ की है।

 
गवर्नरी
जनाब कुमैल को इमाम अली ने अपने दौरे खिलाफत (ज़ाहिरी) मे इराक़ के शहर “हैत” का गवर्नर बनाया था।
 

शहादत
जब बदनामे ज़माना हज्जाज बिन युसुफ इराक़ का गवर्नर बना और अपने अमवी आक़ा के हुक्म से अहलैबैत के चाहने वालो को चुन-चुन कर मारने लगा तो जनाबे कुमैल को भी मौहब्बते अहलैबैत के जुर्म मे तलाश किया जाने लगा और जिस वक्त जनाबे कुमैल और हज्जाज बिन युसुफ का सामना हुआ तो हज्जाज ने जनाबे कुमैल से कहाः मै तुझे मारने के लिऐ ढ़ूढ़ रहा था।
जनाबे कुमैल ने कहाः तुझ से जो हो सकता हो कर ले मेरी उम्र तो तमाम हो चुकी है मै और तू जल्दी ही खु़दा से मिलेंगे और मेरे मौला इमाम अली अलैहिस्सलाम ने पहले ही मुझे बता रखा है कि मेरा क़ातिल तू है।
तभी हज्जाज ने हुक्म दिया कि कुमैल के सर को इसके बदन से जुदा कर दो।


कब्रे मुबारक
जनाबे कुमैल का मज़ारे मुक़द्दस कूफे और नजफ के दरमियान सविया (ईराक़) मे मौजूद है कि जहाँ रोज़ाना हज़ारो चाहने वाले आपकी क़ब्र की ज़ियारत के लिऐ आते है।

 

(शरहे दुआ-ऐ-कुमैल)

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