अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

अज़ादारों की 8 ज़िम्मेदारियां

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इमाम हुसैन (अ) की अज़ादारी और आप पर रोना एक ऐसा महान कार्य है जिसके बारे में बहुत अधिक सवाब औऱ फ़ज़ीलत बताई गई है, इसी प्रकार मासूम से मिलने वाली रिवायतों में भी इसकी तरफ़ बहुत अधिक ताकीद की गई है और इसको नीन की निशानी या शआएरुल्लाह बताया गया है।


मोहर्रम में जहां एक तरफ़ इमाम हुसैन (अ) पर रोना बहुत अच्छा कार्य है वहीं अज़ादारों को चाहिये कि वह आप पर रोने के साथ साथ कुछ चीज़ों का ध्यान भी रखें। जैसे कि हर समाज में अज़ादी के कुछ उसूल हैं और जो इस्लाम की मूल शिक्षाओं के विरुद्ध भी नहीं है उनका ध्यान रखा जाना चाहिये।


हम अपने इस लेख में हुसैनी अज़ादारों की आठ ज़िम्मेदारियों की तरफ़ संक्षेप में इशारा करेंगे, एक हुसैन (अ) के अज़ादार को चाहिये कि जब वह अज़ादारी कर रहा हो जब हुसैन (अ) पर रो रहा हो जब अब्बास (अ) का अलम उठा रहा हो, जब अली अकबर के छिदे कलेजा का मातम कर रहा हो, जब क़ासिम के पामाल लाशे पर आँसू बहा रहा हो... तो वह इन आठ चीजों का ध्यान रखे।


1.    काले कपड़े पहनना।

2.    संवेदना या तलसियत व्यक्त करना।

3.    आशूरा के दिन काम धंधा छोड़ देना।

4.    ज़ियारत और ज़ियारत पढ़ना।

5.    रोना और आँसू बहाना।

6.    मजलिस रखना।

7.    ज़ोहद का ध्यान रखना और ग़मगीन रहना।

8.    दुआ व तवस्सुल

1.    काले कपड़ पहननाः


फ़िक़्ह के अनुसार आम हालात और आम दिनों में काले कपड़े पहनना मकरूह है लेकिन इमाम हुसैन (अ) और दूसरे मासूमीन की अज़ादारी इस आदेश से अलग है क्योंकि यह ग़म और शोक की निशानी और हुसैनी क्रांति का परचम है।


2.    संवेदना व्यक्त करना


किसी पर दुख पड़ने पर शोक व्यक्त करना और दुख प्रकट करना इस्लाम में मुस्तहेब है। पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं: जो भी किसी ग़मज़दा और दुखी को संवेदना दिखाए उसको उसकी के जैसा सवाब मिलेगा (1) और यह शियों के बीच रीत रही है कि वह ग़म एवं दुख के समय اَعظَمَ اللهُ اُجُورَکُم के माध्यम से संवेदना प्रकट करते हैं।


इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ) फ़रमाते हैं: जब भी शिया एक दूसरे से मुलाक़ात करते हैं तो इमाम हुसैन (अ) पर पड़ने वाली मुसीबत पर एक दूसरे से यह कहते हैं


اَعظَمَ اللهُ اُجُورَنا بمُصابنا بالحُسَین علیه السلام وَ جَعَلَنا وَ اِیاکُم مِنَ الطالبینَ بثاره مع وَلیهِ الاِمام المَهدی مِن الِ مُحَمَدٍ علیهمُ السَلامُ


अल्लाह इमाम हुसैन (अ) की अज़ादारी और सोगवारी में हमारे सवाब को बढ़े और वह हमको और तुमको अपने वली इमाम मेहदी के साथ उनके ख़ून का बदला लेने वालों में क़रार दे। (2)


यह स्पष्ट है कि शियों बल्कि हर मुसलमान एवं आज़ाद इंसान के लिये हुसैन (अ) की शहादत से बढ़कर दुख और क्या हो सकता है इसलिये हर अज़ादार को यह प्रयत्न करना चाहिये कि जब वह किसी दूसरे अज़ादार से भेंट करे तो संवेदना प्रकट करे।


3.    आशूरा के दिन काम धंधे को छोड़ देना


इमाम सादिक़ (अ) ने फ़रमायाः मैं तुम्हारी मजलिसों को दोस्त रखता हूँ, अपनी मजलिसों में हमारे अम्र (आदेशों) को जीवंत करो, अल्लाह रहम करे उस पर जो हमारे अम्र को ज़िंदा करे।


इमाम सादिक़ फ़रमाते हैं: जो भी आशूरा के दिन काम धंधे को छोड़ दे यानी काम न करे और बनी उमय्या की अंधी आँखों को जो इस दिन को शुभ और बरकत का दिन समझते हैं, अगर कोई अपने रोज़ाना की रोज़ी के लिये भी (इस दिन) कार्य न करे, अल्लाह उसकी दुनिया और आख़ेरत की आवश्यकताओं को पूरा करता है, और जो भी आशूरा के दिन को ग़म और शोक का दिन बना दे उसके बदले में क़यामत का दिन जो कि सभी के लिये भय और घबराहट का दिन होगा उसके लिये ख़ुशी का दिन होगा। (3)


4.    ज़ियारत और ज़ियारत पढ़ना


अलक़मा बिन हज़रमी इमाम बाक़िर (अ) से विनती करते हैं कि जिसे मैं दूर का नज़दीक और अपने घर से इस दिन (आशूरा का दिन) पढ़ूँ।


इमाम ने फ़रमायाः हे अलक़मा! जब भी (दुआ पढ़ना चाहो) दो रकअत नमाज़ पढ़ो और उसके बाद इस ज़ियारत (आशूरा) को पढ़ो। अगर तुमने यह ज़ियारत पढ़ी तो तुमने दुआ की है उस चीज़ की जो फ़रिश्ते इमाम हुसैन (अ) के ज़ाएर के लिये करते हैं और अल्लाह तुम्हारे लिये एक करोड़ दर्जे लिखता है और तुम उसके जैसे हो जो हुसैन (अ) के साथ शहीद हुआ हो ताकि इन लोगों के साथ इनके दर्जों में शरीक रहो और पहचाने न जाओं मगर उन तमाम शहीदों के साथ जो उनके साथ शहीद हुए हैं और तुम्हारे लिये लिखा जाता है हर पैग़म्बर और रसूल की ज़ियारत का सवाब और हर उस व्यक्ति की ज़ियारत का सवाब जिसने हुसैन (अ) की ज़ियारत की है जिस दिन से वह शहीद हुए हैं। (4)


यानी इस ज़ियारत को पढ़ने वाले का दर्जा वही है जो करबला के शहीदों का है उसको इमाम हुसैन (अ) की शहादत के बाद से लेकर जितने लोगों ने भी उनकी ज़ियारत की है सभी की ज़ियारत का सवाब उसको मिलेगा और वह स्वर्ग में इमाम हुसैन (अ) के साथ शहीद होने वालों के साथ रहेगा।


5.    रोना और आँसू बहाना


हदीसे क़ुदसी में आया है कि अल्लाह ने हज़रत मूसा से फ़रमायाः हे मूसा! मेरे बंदों में से जो भी मुस्तफ़ा (स) के बेटे की शहादत के समय (आशूरा के दिन) आँसू बहाए या रोने के जैसी हालत बनाए और पैग़म्बर के नवासे की मुसीबत पर संवेदना प्रकट करे वह सदैव स्वर्ग में रहेगा। (5)


6.    मजलिस रखना


इमाम सादिक़ (अ) ने फ़रमायाः


मैं तुम्हारी मजलिसों को दोस्त रखता हूँ, अपनी मजलिसों में हमारे अम्र (आदेशों) को जीवंत करो, अल्लाह रहम करे उस पर जो हमारे अम्र को ज़िंदा करे। (6)


7.    ज़ोहर का ध्यान रखना और ग़मगीन होना


एक अज़ादार को चाहिये कि वह मोहर्रम के दिनों में या कम से कम आशूरा के दिन अपने जीवन की कुछ अच्छी चीज़ों जैसे अच्छा खाना पीना, सोना, हर प्रकार की बात करना, प्रसन्न रहना... को छोड़ देना चाहिये और इस दिन को ग़म और आँसू का दिन बना देना चाहिये और इस प्रकार हो जाना चाहिये कि जिसने अपने बाप या बेटे को खो दिया हो।


इमाम सादिक़ (अ) ने फ़रमायाः (आशूरा के) दिन में लज़्ज़त देने वाले कार्यों से बचना चाहिये और शोक एवं ग़म की रीत अपनानी चाहिये और सूरज़ के ज़वाल (आधे दिन तक) ख़ाने और पीने से दूर रहना चाहिये, और उसके बाद वही खाना खाना चाहिये जो शोकाकुलों का ख़ाना होता है। (7)


एक आलिमे दीन फ़रमाते हैं: सात मोहर्रम जिस दिन से इमाम हुसैन (अ) पर पानी बंद किया गया कोशिश कीजिये की पानी न पिये, दूसरी पीने की चीज़ें पिये लेकिन इमाम हुसैन (अ) और अहलेबैत (अ) के सम्मान में पानी न पियें।


8.    दुआ व तवस्सुल


आशूरा के दिन को दुआ तवस्सुल, स्वंय की पवित्रता, आत्मा की शुद्धि के साथ बिताना चाहिये और अंत में अहलेबैत (अ) और वारिसे अज़ा हज़रत इमाम मेहदी (अ) से क्षमा मांगनी चाहिये कि हम अज़ादारी का वास्तविक हक़ अदा न कर सके, और यह दुआ करनी चाहिये कि यह मोहर्रम हमारा अंतिम मोहर्रम न हो और हमारे जीवन का हर आने वाला मोहर्रम हम को बंदगी की सीढ़ी पर एक ज़ीना आगे ले जाए अन्यथा मोहर्रम भी दूसरे महीनो की भाति आने और जाने वाला महीना बन कर रह जाएगा हमको अपनी आत्मा की शुद्धता और नफ़्स की पाक़ीज़गी के साथ हुसैन (अ) की हल मिन नासेरिन यनसोरोनी की आवाज़ पर लब्बैक कहना चाहिये।


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(1)    सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 2, पेज 188

(2)    मुस्तदरकुल वसाएल, जिल्द 2, पेज 216

(3)    मुस्तदरकुल वसाएल, जिल्द 2, पेज 129

(4)    मिस्बालुह मुजतहिद, पेज 714

(5)    मुस्तदरके सफ़ीनतुल बिहार, जिल्द 7, पेज 235

(6)    वसाएलुश्शिया, जिल्द 10, पेज 235

(7)    मीज़ानुल हिकमा, जिल्द 8, पेज 3783

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