अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

फ़िदक के छीने जाने पर फ़ातेमा ज़हरा (स) की प्रतिक्रिया

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जैसे कि हमने इससे पहले वाले लेख जिसका शीर्षक "फ़िदक और क़राबदतारों को उनका हक़ दे दो" था में लिखा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपने जीवन में फ़िदको हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) को दिया था और आपने उनके जीवनकाल में ही उसको उपयोग किया था और पैग़म्बर (स) की वफ़ात के बाद जैसे कि सवाएक़े मुहरक़ा ने लिखा है पहले ख़लीफ़ा अबूबक्र ने हज़रते ज़हरा (स) से फ़िदक छीन लिया।

अब हम इस लेख में बताएंगे कि जब फ़िदक छीन लिया गया तो फ़ातेमा ज़हरा (स) ने उसपर क्या प्रतिक्रिया दिखाई और उसे वापस पाने के लिए आपने क्या क्या किया।

सबसे पहली प्रतिक्रिया जो आपने दिखाई वह यह थी कि आपने गवाह पेश किए कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपने जीवन में फ़िदक मुझे उपहार में दिया था (इसके बारे में रिवायतों को हमने पहले वाले लेख में बयान किया है वहां देखा जा सकता है) और जो चीज़ पैग़म्बर (स) ने मुझे उपहार स्वरूप दी हैं उसे तुमने क्यों मुझ से छीन लिया?

सुन्नियों के लेखल बिलाज़री की पुस्तक फ़ुतूलुह बुलदान की जिल्द 1 पेज 44 पर इस प्रकार आया हैः
ان فاطمة رضي الله عنها قالت لأبي بكرالصديق رضي الله عنه. أعطني فدك فقد جعلها رسول الله صلى الله عليه وسلم لي فسألها البينة فجائت بأم أيمن و رباح مولي النبي فشهدا لها بذلک
इस हदीस में ग़ौर करने वाली बात यह है कि अबू बक्र और हज़रते फ़ातेमा (स) दोनों को रजियल्लाह (यानी ईश्वर उनसे राज़ी हो) लिखा गया है। जब्कि फ़ातेमा का स्थान यह है कि वह मासूम हैं एसा क्यों है?

वह विचारधारा जो सारे सहाबियों को आदिल यानी सच्चा समझती है, वह विचारधारा जो यह कहती है कि जिसने भी इस्लाम की अवस्था में पैग़म्बर (स) की ज़ियारत (भेंट) की चाहे वह केवल एक मिनट के लिए ही क्यों ना हो, वह आदिल हैं।

जब्कि संभव है कि यह भेंट निफ़ाक़ की हालत में हुई हो, यह वह लोग हो जो जंग से भागे हों, या यह इन्सान उन लोगों में से हो जिन्होंने पैग़म्बर (स) से जंग की हो।

यह विचारधारा कहती है कि वहशी (वह इन्सान जिसने पैग़म्बरे इस्लाम (स) के चचा हज़रते हमज़ा को शहीद किया) भी आदिल है, अबू सुफ़ियान जो फ़तहे मक्का तक इस्लाम नहीं लाया वह आदिल है और अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली इबने अबीतालिब (अ) (जिन्होंने अपने जीवन के आरम्भ से अंत तक पैग़म्बर (स) का साथ दिया और इस्लाम को हर संकट से बचाया) भी आदिल हैं और इन सबकी अदालत एक समान है।

यह विचारधारा कहती है कि जंगे सिफ़्फ़ीन में सहाबियों के दो गुट एक दूसरे के सामने आ गए, वह लोग जो अपने समय के ख़लीफ़ा के सामने खड़े हो गए लेकिन उनके बारे में कहा जाता है कि हम इन दोनों में से किसी भी गुट के बारे में कोई आपत्ति नही उठा सकते हैं, दोनों गुट आदिल हैं!!!!

लेकिन यहीं सोच रखने वालों से जब यह कहा जाता है कि अगर सारे सहाबी आदिल हैं तो वह सहाबी जिन्होंने तीसरे ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान का ख़ून किया क्या वह भी आदिल हैं? तो इसके उत्तर में वह तुरन्त कहते हैं कि नहीं वह सभी काफ़िर हैं क्योंकि उन्होंने अपने ज़माने के ख़लीफ़ा के विरुद्ध विद्रोह किया है, लेकिन अगर यही सहाबी इमाम अली (अ) के मुक़ाबले में आ जाए तो उनकी अदालत पर कोई आपत्ती नहीं होती है।

इनकी बातों में कितना विरोधाभास हैं और यह दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है!!!

बहराहल वापस हदीस की तरफ़ आते हैः
إن رسول الله صلى الله عليه وسلم جعل لي فدك فاعطني إياها
हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) ने कहा कि फ़िदक मुझे वापस दे दो, रसूल ने फ़िदक मुझे दिया था।
दुख की बात तो यह है कि यह अदालत की बात से वहशी, अबूसुफ़ियान मोआविया जैसे तो आदिल हो जाते हैं और उनकी बात सच्ची हो जाती है, लेकिन अगर रसूल की बेटी वह बेटी जिसको सिद्दीक़ा यानी सच बोलनी वाली कहा गया, जिसके बारे में क़ुरआन में आयते नाज़िल हुई जो मासूम हैं, जो इस संसार की स्त्रियों की सरदार हैं तो उसकी बात को स्वीकार नहीं किया जाता है।

हज़रते ज़हरा (स) को एक आम सहाबी के बराबर का दर्जा भी नहीं दिया जाता है।

पहले ख़लीफ़ा कहते हैं हे फ़ातेमा (स) अगर सच बोल रही हो तो गवाह लाओ!!!
فسالها البینة
आप गवाह लेकर आईं

فجائت بأم أيمن و رباح مولي النبي فشهدا لها بذلک
आप दो गवाह लाईं एक उम्मे एमन (जिनके बारे में पैग़म्बर (स) ने कहा था कि वह स्वर्ग की औरतों में से हैं और जो स्वर्ग की नारि है वह झूठ नहीं बोलती है) और दूसरा पैग़म्बर (स) का दास रेबाह।
इन दोनों ने फ़ातेमा ज़हरा (स) के हक़ में गवाही दी कि पैग़म्बर (स) ने फ़ातेमा (स) को फ़िदक उपहार स्वरूप दिया था।
قد علمت يا بنت رسول الله إن هذا الأمر لا تجوز فيه إلا شهادة رجل وامرأتين
अबूबक्र ने कहा कि यह स्वीकार नहीं है मगर यह कि एक मर्द और दो औरतें गवाही दें।

यह कहकर उम्मे एमन जो की स्वर्ग की औरतों में से हैं और रबाह की गवाही को ठुकरा दिया गया।

मैं पूछता हूँ कि एक जज गवाही किस लिए मांगता है? इसीलिए ना कि उसको पता चल सकें कि कौन सच बोल रहा है। क्या उम्मे एमन की गवाही और फ़ातेमा (स) के मुतालेबा करने से किसी को यह विश्वास नहीं होता है कि वह सच बोल रही हैं!!! ?

बिलाज़री अपनी पुस्तक फ़ुतूहुल बुलदान में दूसरी प्रकार से इसको लिखता हैः
قالت فاطمه لأبي بکر ان رسول الله جعل لي فدک

फ़ातेमा (स) ने अबूबक्र से कहा कि रसूर ने फ़िदक मेरे लिए क़रा दिया है।
فشهد لها علي بن أبيطالب
फ़िर आपके लिए हज़रत अली इबने अबीतालिब (अ) ने गवाही दी।
فسألها شاهداً آخر
आपसे दूसरा गवाह मांगा गया
फ़िदक के बारे में हज़रते फ़ातेमा ज़हरा (स) के हक़ में

उम्मे एमन की गवाही स्वीकार नहीं की गई।
इमाम अली (अ) की गवाही स्वीकार नहीं की गई।
पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ग़ुलाम रेबाह की गवाही स्वीकार नहीं की गई।

कितने आश्चर्य की बात है कि अगर क़रार यह था कि दो मर्द गवाही दें तो रेबाह और अली की गवाही से यह संख्या पूरी हो जाती थी, लेकिन फिर भी इन दोनों की गवाही को अनदेखा किया गया, जिससे पता चलता है कि उस समय की सरकार फ़िदक को वापस देना ही नहीं चाहती थी, अगर फ़ातेमा ज़हरा (स) हज़ार गवाह लातीं तब भी उसको वापस ना किया जाता क्योंकि अगर फ़िदक वापस दे दिया जाता तो स्वंय उसनी सरकार और ख़िलाफ़त के सही होने पर प्रश्नचिन्ह लग जाते, इसीलिए हम यह कहते हैं कि फ़िदक की लड़ाई केवल ज़मीन के एक टुकड़े की जंग नहीं थी यह मसअला था ख़िलाफ़त का।

अब हम बाद के लेखों में यह बताएं कि अगर फ़ातेमा ज़हरा (स) किसी बात की मांग कर रही हों तो क्या यह संभव है कि आप झूठ बोल रही हों?

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Asad:Sultan
2017-03-01 15:06:30
Asad Sultan
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