अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

कुरआने करीम की किस दलील की बुनियाद पर अज़ादारी मनाना चाहिऐ?

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कुरआने करीम मे कुछ आयात ऐसी है जिनमे शआऐरे खुदा की ताज़ीम के मौजू को तक़वा और परहेज़गारी की निशानी बयान किया गया है।

من یعظم شعائر الله فانها من تقوی القلوب


 (सूरऐ हज आयत न. 32)
 

इसके अलावा खुदा की राह मे जिहाद करने वाले मुजाहेदीन और बुजुर्गो की याद मनाने की तरफ तवज्जो दिलाई गई है।


وَاذْكُرْ فِي الْكِتَابِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّهُ كَانَ صِدِّيقًا نَّبِيًّا


(सूरऐ मरयम आयत न. 41)

وَكَأَيِّن مِّن نَّبِيٍّ قَاتَلَ مَعَهُ رِبِّيُّونَ كَثِيرٌ فَمَا وَهَنُوا لِمَا أَصَابَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّـهِ وَمَا ضَعُفُوا وَمَا اسْتَكَانُوا وَاللَّـهُ يُحِبُّ الصَّابِرِينَ


(सूरऐ आले इमरान आयत 146)

और जो लोग नाहक कत्ल कर दिये गऐ है वो खुदा पर ईमान रखने की वजह से शहीद हो गऐ है।

इमाम हुसैन (अ.स.) के लिऐ अज़ादारी मनाने के मोज़ू मे भी इसी तरह की मुख्तलिफ वजहे पाई जाती है। जैसे अजादारी शआईर की ताज़ीम भी है और मुजाहेदीन की यादगार भी है और ये बात भी जाहिर है कि खुदा पर ईमान रखने की वजह से आपने दुशमनो के सामने सर नही झुकाया और इमाम हुसैन के लिऐ अजादारी मनाना एक तरह से रिसालत की उजरत भी है।

قُل لَّا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَىٰ


(सूराऐ शूरा आयत 23)

इमाम हुसैन (अ.स) के लिऐ नज़्र करने पर भी बिहारूल अनवार मे एक हदीस मौजूद है जो इस की ताईद करती है। इमाम अली (अ.स.) फरमाते हैः


” ان اللہ اختارنا و اختار لنا شیعة ینصروننا و یفرحون لفرحنا و یحزنون لحزننا و یبذلون اموالھم و انفسھم فینا اولئک منا والینا“

बेशक खुदा वंदे आलम ने हमे मुन्तखब किया है और एक ऐसे गिरोह का इंतेकाब किया है कि जो हमारी मदद करे और वो हमारी खुशी मे खुश हो और हमारे ग़मो मे ग़मगीन हो और अपनी जानो माल को हमारी राह मे कुरबान करे। वो लोग हम से है और हमारे साथ है।

लेहाज़ा अगर कोई हमसे सवाल करता है कि कुरआने करीम मे कहा अज़ादारी का जिक्र है तो उसका जवाब उपर दर्ज आयते है।

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