अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

उलुल अज़्म

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उलुल अज़्म” (यानी साहिबाने शरीअत

हमारा अक़ीदह है कि तमाम पैग़म्बरो में से पाँच पैग़म्बर “उलुल अज़्म” (यानी साहिबाने शरीअत, किताब व आईने जदीद)थे। जिन को नाम इस तरह हैं
हज़रत नूह अलैहिस्सलाम
हज़रत इभ्राहीम अलैहिस्सलाम
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और
हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि अजमईन।
“व इअज़ अख़ज़ना मिन अन्नबिय्यीना मीसाक़ाहुम व मिनका वमिन नूहि व इब्राहीमा व मूसा वईसा इब्नि मरयमा व अख़ज़ना मिन हुम मीसाक़न ग़लीज़न ”[40] यानी उस वक़्त को याद करो जब हमने पैग़म्बरों से मीसाक़ (अहदो पैमान) लिया (जैसे) आप से ,नूह से , इब्राहीम से, मूसा से और ईसा ईब्ने मरयम से और हम ने उन सब से पक्का अहद लिया (कि वह रिसालत के तमाम काम में और आसमानी किताब को आम करने में कोशिश करें)
“फ़सबिर कमा सबरा उलुल अज़्मि मिन अर्रसुलि ”[41] यानी इस तरह सब्र करो जिस तरह उलुल अज़म पैग़म्बरों ने सब्र किया।
हमारा अक़ीदह है कि हज़रत मुहम्मद (स.)अल्लाह के आख़िरी रसूल हैं और उनकी शरिअत क़ियामत तक दुनिया के तमाम इँसानों के लिए है। यानी इस्लामी तालीमात,अहकाम मआरिफ़ इतने जामे हैं कि क़ियामत तक इँसान की तमाम माद्दी व मअनवी ज़रूरतों को पूरा करते रहेंगे। लिहाज़ा अब जो भी नबूवत का दावा करे व बातिल व बे बुनियाद है।
“व मा मुहम्मदुन अबा अहदिन मिन रिजालिकुम व लाकिन रसूलु अल्लाहि व ख़ातमि अन्नबिय्यीना व काना अल्लाहि बिकुल्लि शैइन अलीमन ”[42] यानी मुहम्मद(स.) तुम में से किसी मर्द के बाप नही है लेकिन वह अल्लाह के रसूल और सिलसिलए नबूवत को ख़त्म करने वाले हैं और अल्लाह हर चीज़ का जान ने वाला है।(यानी जो ज़रूरी था वह उन के इख़्तियार में दे दिया है)
13)आसमानी अदयान की पैरवी करने वालों के साथ ज़िन्दगी बसर करना।
वैसे तो इस ज़माने में फ़क़त इस्लाम ही अल्लाह का आईन हैं, लेकिन हम इस बात के मोतक़िद हैं कि आसमानी अदयान की पैरवी करने वाले अफ़राद के साथ मेल जोल के साथ रहा जाये चाहे वह किसी इस्लामी मुल्क में रहते हों या ग़ैरे इस्लामी मुल्क में, लेकिन अगर उन में से कोई इस्लाम या मुलसलमानों के मुक़ाबिले में आ जाये तो “ला यनहा कुमु अल्लाहु अनि अल्लज़ीना लम युक़ातिलू कुम फ़ी अद्दीनि व लम युख़रिजु कुम मिन दियारि कुम अन तबर्रु हुम व तुक़सितू इलैहिम इन्ना अल्लाहा युहिब्बुल मुक़सितीना ”[43] यानी अल्लाह ने तुम को उन के साथ नेकी और अदालत की रिआयत करने से मना नही किया है,जो दीन की वजह से तुम से न लड़ें और तुम को तुम्हारे वतन व घर से बाहर न निकालें, क्योँ कि अल्लाह अदालत की रिआयत करने वालों को दोस्त रखता है।
हमारा अक़ीदह है कि इस्लाम की हक़ीक़त व तालीमात को मनतक़ी बहसों के ज़रिये तमाम दुनिया के लोगों के सामने बयान किया जा सकता है। और हमारा अक़ीदह है कि इस्लाम में इतनी ज़्यादा जज़्ज़ाबियत पाई जाती हैं कि अगर इस्लाम को सही तरह से लोगों के सामने बयान किया जाये तो इँसानों की एक बड़ी तादाद को अपनी तरफ़ मुतवज्जेह कर सकता है, खास तौर पर इस ज़माने में जबकि बहुत से लोग इस्लाम के पैग़ाम को सुन ने के लिए आमादा है।
इसी बिना पर हमारा अक़ीदह यह है कि इस्लाम को लोगों पर ज़बर दस्ती न थोपा जाये “ला इकरह फ़ी अद्दीन क़द तबय्यना अर्रुश्दु मिन अलग़ई।” यानी दीन को क़बूल करने में कोई जबर दस्ती नही है क्योँ कि अच्छा और बुरा रास्ता आशकार हो चुका है।
हमारा अक़ीदह है कि मुस्लमानों का इस्लाम के क़वानीन पर अमल करना इस्लाम की पहचान का एक ज़रिया बन सकता है लिहाज़ा ज़ोर ज़बरदस्ती की कोई ज़रूरत ही नही है।
14- अँबिया का अपनी पूरी ज़िन्दगी में मासूम होना
हमारा अक़ीदह है कि अल्लाह के तमाम पैग़म्बर मासूम हैं यानी अपनी पूरी ज़िन्दगी में चाहे वह बेसत से पहले की ज़िन्दगी हो या बाद की गुनाह, ख़ता व ग़लती से अल्लाह की तईद के ज़रिये महफ़ूज़ रहते हैं। क्योँ कि अगर वह किसी गुनाह या ग़लती को अँजाम दे गें तो उन पर से लोगों का एतेमाद ख़त्म हो जायेगा और इस हालत में न लोग उनको अपने और अल्लाह के दरमियान एक मुतमइन वसीले के तौर पर क़बूल नही कर सकते हैं और न ही उन को अपनी ज़िन्दगी के तमाम आमाल में पेशवा क़रार दे सकते हैं।
इसी बिना पर हमारा अक़ीदह यह है कि क़ुरआने करीम कि जिन आयात में ज़ाहिरी तौर पर नबियों की तरफ़ गुनाह की निस्बत दी गई है वह “तरके औला” के क़बील से है। (तरके औला यानी दो अच्छे कामों में से एक ऐसे काम को चुन ना जिस में कम अच्छाई पाई जाती हो जबकि बेहतर यह था कि उस काम को चुना जाता जिस में ज़्यादा अच्छाई पाई जाती है।)या एक दूसरी ताबीर के तहत “हसनातु अलअबरारि सय्यिआतु अलमुक़र्राबीन”[44]कभी कभी नेक लोगों के अच्छे काम भी मुक़र्रब लोगों के गुनाह शुमार होते हैं। क्योँ के हर इँसान से उस के मक़ाम के मुताबिक़ अमल की तवक़्क़ो की जाती है।
15- अँबिया अल्लाह के फ़रमाँ बरदार बन्दे हैं।
हमारा अक़ीदह है कि पैग़म्बरों और रसूलों का का सब से बड़ा इफ़्तेख़ार यह था कि वह अल्लाह के मुती व फ़रमाँ बरदार बन्दे रहे। इसी वजह से हम हर रोज़ अपनी नमाज़ों में पैग़म्बरे इसलाम के बारे में इस जुम्ले की तकरार करते है “व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहु व रसूलुहु। ” यानी मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (स.)अल्लाह के रसूल और उसके बन्दे हैं।
हमारा अक़ीदह है कि अल्लाह के पैग़म्बरों में से न किसी ने भी उलूहिय्यत (अपने ख़ुदा होने)का दावा किया और न ही लोगों को अपनी इबादत कर ने के लिए कहा। “मा काना लिबशरिन अन युतियहु अल्लाहु अलकिताबा व अलहुक्मा व अन्नबूव्वता सुम्मा यक़ूला लिन्नासि कूनू इबादन ली मिन दूनि अल्लाह ”।[45] यानी यह किसी इँसान को ज़ेबा नही देता कि अल्लाह उसको आसमानी किताब, हिकमत और नबूवत अता करे और वह लोगों से कहे कि अल्लाह को छोड़ कर मेरी इबादत करो।
यहाँ तक कि हज़रत ईसा (अ.)ने भी लोगों को अपनी इबादत के लिए नही कहा वह हमेशा अपने आप को अल्लाह का बन्दा और उस का रसूल कहते रहे। “लन यस्तनकिफ़ा अलमसीहु अन यकूना अब्दन लिल्लाहि व ला अलमलाइकतु अलमुक़र्रबूना”[46]यानी न हज़रत ईसा (अ.)ने अल्लाह के बन्दे होने से इँकार किया और न ही उस के मुक़र्रब फ़रिश्ते उसके बन्दे होने से इँकार कर ते हैं।
ईसाईयों की आज की तारीख़ ख़ुद इस बात की गवाही दे रही है “तसलीस” का मस्ला ( तीन ख़ुदाओं का अक़ीदह)पहली सदी ईसवी में नही पाया जाता था यह फ़िक्र बाद में पैदा हुई।
16- अँबिया के मोजज़ात व इल्मे ग़ैब
पैग़म्बरो का अल्लाह का बन्दा होना इस बात की नफ़ी नही करता कि वह अल्लाह के हुक्म से हाल, ग़ुज़िश्ता और आइन्दा के पौशीदा अमूर से वाक़िफ़ न हो। “आलिमु अलग़ैबि फ़ला युज़हिरु अला ग़ैबिहि अहदन इल्ला मन इरतज़ा मिन रसूलिन।”[47] यानी अल्लाह ग़ैब का जान ने वाला है और किसी को भी अपने ग़ैब का इल्म अता नही करता मगर उन रसूलों को जिन को उस ने चुन लिया है।
हम जानते हैं कि हज़रत ईसा (अ.)का एक मोजज़ा यह था कि वह लोगो को ग़ैब की बातों से आगाह कर ते थे। “व उनब्बिउ कुम बिमा ताकुलूना व मा तद्दख़िरूना फ़ी बुयूति कुम। ”[48]मैं तुम को उन चीज़ों के बारे में बताता हूँ जो तुम खाते हो या अपने घरो में जमा करते हो।
पैग़म्बरे इस्लाम (स.)ने भी तालीमे इलाही के ज़रिये बहुत सी पौशीदा बातों को बयान किया हैं “ ज़ालिका मिन अँबाइ अलग़ैबि नुहीहि इलैका ”[49]यानी यह ग़ैब की बाते हैं जिन की हम तुम्हारी तरफ़ वही करते हैं।
इस बिना पर अल्लाह के पैग़म्बरों का वही के ज़रिये और अल्लाह के इज़्न से ग़ैब की ख़बरे देना माने नही है। और यह जो कुरआने करीम की कुछ आयतों में पैग़म्बरे इस्लाम के इल्मे ग़ैब की नफ़ी हुई है जैसे “व ला आलिमु अलग़ैबा व ला अक़ूलु लकुम इन्नी मलक”[50] यानी मुझे ग़ैब का इल्म नही और न ही मैं तुम से यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ। यहाँ पर इस इल्म से मुराद इल्मे ज़ाती और इल्मे इस्तक़लाली है न कि वह इल्म जो अल्लाह की तालीम के ज़रिये हासिल होता है। जैसा कि हम जानते हैं कि कुरआन की आयतें एक दूसरी की तफ़्सीर करती हैं।
हमारा अक़ीदह है कि अल्लाह के नबियों ने तमाम मोजज़ात व मा फ़ौक़े बशर काम अल्लाह के हुक्म से अँजाम दिये हैं और पैग़म्बरो का अल्लाह के हुक्म से ऐसे कामों को अँजाम देना का अक़ीदह रखना शिर्क नही है। जैसा कि कुरआने करीम में भी ज़िक्र है कि हज़रत ईसा (अ.)ने अल्लाह के हुक्म से मुर्दों को ज़िन्दा किया और ला इलाज बीमारों को अल्लाह के हुक्म से शिफ़ा अता की “व उबरिउ अलअकमहा व अलअबरसा व उहयि अलमौता बिइज़निल्लाह ”[51]
17- पैग़म्बरों के ज़रिये शफ़ाअत का मस्ला
हमारा अक़ीदह है कि अल्लाह के तमाम पैग़म्बर और उन मे सब से अफ़ज़ल व आला पैग़म्बरे इस्लाम (स.)को शफ़ाअत का हक़ हासिल है और वह गुनाह गैरों के एक ख़ास गिरोह की शफ़ाअक करेंगे। लेकिन यह सब अल्लाह की इजाज़त और इज़्न से है। “मा मिन शफ़िइन इल्ला मिन बअदि इज़्निहि”[52] यानी कोई शफ़ाअत करने वाला नही है मगर अल्लाह की इजाज़त के बाद।
“मन ज़ा अल्लज़ी यशफ़उ इन्दहु इल्ला बिइज़्निहि ”[53] कौन है जो उसके इज़्न के बग़ैर शफ़अत करे।
कुरआने करीम की वह आयतें जिन में मुतलक़ा तौर पर शफ़ाअत की नफ़ी के इशारे मिलते हैं उन में शफ़ाअत से मराद शफ़ाअते इस्तक़लाली और शफ़अत बदूने इजाज़त मुराद है। या फिर उन लोगों के बारे में हैं जो शफ़अत की क़ाबलियत नही रखते जैसे “मिन क़ब्लि अन यातिया यौमुन बैउन फ़ीहि व ला ख़ुल्लतुन वला शफ़ाअतुन ” [54]यानी अल्लाह की राह में ख़र्च करो इस से पहले कि वह दिन आ जाये जिस दिन न ख़रीद व फ़रोश होगी (ताकि कोई अपने लिए सआदत व निजात ख़रीद सके)न दोस्ती और न शफ़ाअत। बार बार कहा जा चुका है कि कुरआने करीम की आयतें एक दूसरे की तफ़्सीर कर ती हैं।
हमारा अक़ीदह है कि मस्ला-ए- शफ़ाअत लोगों को तरबीयत देने और उन को गुनाह के रास्ते से हटा कर सही राह पर लाने,उन के अन्दर तक़वे व परहेज़गारी का शौक़ पैदा कर ने और उन के दिलों में उम्मीद पैदा करने का एक अहम वसीला है। क्योँ कि मस्ला-ए शफ़ाअत बे हिसाब किताब नही है शफ़ाअत फ़क़त उन लोगो के लिए है जो इस की लियाक़त रखते हैं। यानी शफ़ाअत उन लोगों के लिए है जिन्होने अपने गुनाहों की कसरत की बिना पर अपने राब्ते को शफ़ाअत करने वालों से कुल्ली तौर पर मुनक़तअ न किया हो।
इस बिना पर मस्ला-ए शफ़ाअत गुनाहगारों को क़दम क़दम पर तँबीह कर ता रहता है कि अपने आमाल को बिल कुल ख़राब न करो बल्कि नेक आमल के ज़रिये अपने अन्दर शफ़ाअत की लियाक़त पैदा करो।
18- मस्ला-ए-तवस्सुल
हमारा अक़ीदह है कि मस्ला- ए- तवस्सुल भी मस्ला-ए- शफ़ाअत की तरह है। मस्ला-ए –तवस्सुल मानवी व माद्दी मुश्किल में घिरे इँसानों को यह हक़ देता है कि वह अल्लाह के वलीयों से तवस्सुल करें ताकि वह अल्लाह की इजाज़त से उन की मुश्किलों के हल को अल्लाह से तलब करें। यानी एक तरफ़ तो ख़ुद अल्लाह की बारगाह में दुआ करते हैं दूसरी तरफ़ अल्लाह के वलियों को वसीला क़रार दे।“व लव अन्ना हुम इज़ ज़लमू अनफ़ुसाहुम जाउका फ़स्तग़फ़रू अल्लाहा व अस्तग़फ़रा लहुम अर्रसूलु लवजदू अल्लाहा तव्वाबन रहीमन” [55] यानी अगर यह लोग उसी वक़्त तुम्हारे पास आ जाते जब इन्होंने अपने ऊपर ज़ुल्म किया था और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगते और रसूल भी उनके लिए तलबे मग़फ़ेरत करते तो अल्लाह को तौबा क़बूल करने वाला और रहम करने वाला पाते।
हम जनाबे यूसुफ़ के भाईयों की दास्तान में पढ़ते हैं कि उन्होंने अपने वालिद से तवस्सुल किया और कहा कि “या अबाना इस्तग़फ़िर लना इन्ना कुन्ना ख़ातेईना ” यानी ऐ बाबा हमारे लिए अल्लाह से बख़शिश की दुआ करो क्योँ कि हम ख़ताकार थे। उन के बूढ़े वालिद हबज़रत याक़ूब (अ.)ने जो कि अल्लाह के पैग़म्बरे थे उनकी इस दरख़्वास्त को क़बूल किया और उनकी मदद का वादा करते हुए कहा कि “ सौफ़ा अस्तग़फ़िरु लकुम रब्बि”[56]मैं जल्दी ही तुम्हारे लिए अपने रब से मग़फ़ेरत की दुआ करूँगा। यह इस बात पर दलील है कि गुज़िश्ता उम्मतों में भी तवस्सुल का वुजूद था और आज भी है।
लेकिन इँसान को इस हद से आगे नही बढ़ना चाहिए औलिया-ए- ख़ुदा को इस अम्र में मुस्तक़िल और अल्लाह की इजाज़त से बेनियाज़ नही समझना चाहिए क्योँ कि यह कुफ़्रो शिर्क का सबब बनता है।
और न तवस्सुल को औलिया- ए- ख़ुदा की इबादत के तौर पर करना चाहिए क्योँ कि यह भी कुफ़्र और शिर्क है। क्योँ कि औलिया- ए- ख़ुदा अल्लाह की इजाज़त के बग़ैर नफ़े नुक़्सान के मालिक नही है। “क़ुल ला अमलिकु नफ़्सी नफ़अन व ला ज़र्रन इल्ला मा शा अल्लाह ”[57]यानी इन से कह दो कि मैं अपनी ज़ात के लिए भी नफ़े नुख़्सान का मालिक नही हूँ मगर जो अल्लाह चाहे। इस्लाम के तमाम फ़िर्क़ों की अवाम के दरमियान मस्ला-ए- तवस्सुल के सिलसिले में इफ़रात व तफ़रीत पाई जाती है उन सब को हिदायत करनी चाहिए।

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