अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

मुस्लिम बिन अक़ील अलैहिस्सलाम

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मोहर्रम का दुखद: महीना वह महीना है जिसमें ख़ून ने तलवार पर विजय प्राप्त की। यह महीना पैग़म्बरे इस्लाम के प्राण प्रिय पौत्र हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के एतिहासिक आंदोलन की याद दिलाता है। इसी महीने में खून ने तलवार पर विजय प्राप्त की। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का एतिहासिक आंदोलन मानवता के लिए अविस्मरणीय सीख है। आज के कार्यक्रम में हम आपको हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के शूरवीर एवं साहसी दूत जनाब मुस्लिब बिन अक़ील से आपको परिचित करायेंगे।


हम आपको यह बतायेंगे कि हज़रत मुस्लिम कौन थे? जनाब मुस्लिम हज़रत अली अलैहिस्सलाम के भाई जनाब अक़ील के बेटे थे। जनाब मुस्लिम का लालन पालन जिस परिवार में हुआ वह पैग़म्बरे इस्लाम का ही परिवार था। आप जिस परिवार में बड़े हुए वह आध्यात्मिक गुणों का स्रोत और मानवता के लिए आदर्श है। बाल्याकाल से ही बनी हाशिम के युवाओं विशेषकर हज़रत इमाम हुसैन और हज़रत इमाम हुसैन अलैहिमस्सलाम के मध्य बड़े हुए तथा धार्मिक व शिष्टाचारिक शिक्षाओं के साथ त्याग और बलिदान की भी शिक्षा ली। जनाब मुस्लिम वह महान व्यक्ति हैं जिनके कई बेटों ने अपने प्राण हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर न्वौछावर किये। ३६ से ४० हिजरी क़मरी के मध्य हज़रत अली अलैहिस्सलाम के शासन काल में जनाब मुस्लिम कुछ सैनिक पदों पर भी थे। सिफ्फैन नामक युद्ध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने इमाम हसन, इमाम हुसैन, अब्दुल्लाह बिन जाफर और मुस्लिम बिन अक़ील को अपनी सेना में महत्वपूर्ण स्थानों पर रखा था। जनाब मुस्लिम के सदगुणों को परिवार में खोजने से पूर्व उनके सदाचरण में खोजना चाहिये जो उनके व्यक्तित्व से परिचित होने का श्रेष्ठतम मार्ग है। जनाब मुस्लिम हज़रत अली अलैहिस्सलाम के शासन काल में न्याय की प्रतिमूर्ति हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अनुसरणकर्ता थे और उनकी शहादत के बाद उनके प्राणप्रिय सुपुत्रों हज़रत इमाम हसन और इमाम हुसैन अलैहिमस्सलाम से कभी भी अलग नहीं हुए यहां तक अपने प्राण को फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के प्राणप्रिय सुपुत्र हज़रत इमाम हुसैन पर न्यौछावर कर दिया।

हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम की, जो हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बड़े सुपुत्र और दूसरे इमाम थे, १० वर्षीय इमामत के काल में जनाब मुस्लिम पूरी निष्ठा के साथ आपकी सेवा में रहे और आपकी गिनती हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के वफ़ादार साथियों में होती थी। हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद लोगों के मार्गदर्शन की ज़िम्मेदारी हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कांधों पर आ गयी यहां तक १० वर्षों बाद मोआविया के मरने के पश्चात जनाब मुस्लिम हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथ रहे। इस बीस वर्ष की अवधि में अर्थात हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत से लेकर कर्बला की दुखद एतिहासिक घटना तक धमकी, लालच आदि के कारण बहुत से लोग पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों का साथ छोड़कर मोआविया की ओर चले गये या उन्होंने अलग थलग का जीवन अपना लिया पंरतु जिन लोगों के हृदय ईमान से ओत प्रोत थे उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों को अकेला नहीं छोड़ा और तन, मन, धन से उनका साथ दिया।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने भाई जनाब अक़ील की प्रशंसा में पैग़म्बरे इस्लाम के हवाले से एक कथन का वर्णन किया है जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है" मैं दो कारणों से अक़ील से प्रेम करता हूं एक स्वयं अक़ील के कारण और दूसरे इस कारण कि अक़ील के पिता अबुतालिब उनसे प्रेम करते थे। अंत में पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को संबोधित करते हुए कहा, हे अली अक़ील का बेटा मुस्लिम तुम्हारे बेटे के प्रेम में शहीद किया जायेगा, मोमिनों अर्थात ईश्वर पर ईमान रखने वाले व्यक्ति उस पर आंसू बहायेंगे और ईश्वर के निकटवर्ती फरिश्ते उस पर सलाम भेजते हैं"

मोआविया २० वर्ष तक अत्याचारपूर्ण ढंग से शासन करने के बाद मर गया और उसके बाद उसका बेटा यज़ीद सिंहासन पर बैठा तथा लोभ एवं धमकी द्वारा उसने स्थिति पर आधिपत्य जमा लिया। उसने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत तलब की अर्थात अपने आदेशों के अनुसरण की मांग की जिसे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने ठुकरा दिया और गोपनीय ढंग से अपने परिवार के कुछ सदस्यों के साथ मदीना से बाहर निकल कर मक्का पहुंचे ताकि हज के उचित दिनों में लोगों को जागरुक बनायें। ६० हिजरी क़मरी थी। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम चार महीने तक मक्का में रहे जिसके दौरान उन्होंने बैंठके और लोगों से वार्ता करके उन्हें यज़ीद की बैअत न करने का कारण समझा दिया। विशेषकर कूफा के लोग हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क्रातिकारी कार्यवाही सुनकर प्रसन्न और आशान्वित हो गये। कूफा के लोगों को हज़रत अली अलैहिस्सलाम का चार वर्षीय शासन काल याद था और इस नगर में पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के चाहने वाले बहुत व्यक्ति थे और इसी आधार पर कूफा में जाने पहचाने शीया मुसलमानों के हस्ताक्षर एवं मोहर से लोगों ने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को पत्र लिखा जिनकी संख्या हज़ारों में थी। कूफा के लोग अपने पत्रों में हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से अपने यहां आने और बैअत करने का आग्रह करते थे तथा इस बात का बार बार आग्रह करते थे कि इमाम कूफा आकर लोगों से बैअत लें तथा यज़ीद को शासन से हटा दें।

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कूफावासियों के निरंतर आग्रह और बारम्बार के निमंत्रण के उत्तर में प्रतिक्रिया दिखाने और कार्यवाही करने का निर्णय लिया। कूफा की स्थिति का सही मूल्यांकन, लोगों के प्रेम की सीमा का आंकलन, आवश्यक भूमि उपलब्ध करना और क्रांतिकारी बलों के गठन के लिए आवश्यक था कि कोई पहले कूफा जाकर इन कार्यों को अंजाम दे तथा नगर और नगरवासियों की सूक्ष्म व सही जानकारी उन्हें दे। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इस गुप्त कार्यवाही के लिए सबसे उचित व योग्य व्यक्ति जनाब मुस्लिम बिन अक़ील को समझा क्योंकि ईश्वर से भय रखने के साथ साथ वह पर्याप्त राजनीतिक जानकारी भी रखते थे और हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से निकट भी थे। कूफावासियों की ओर से आये प्रतिनिधियों से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं अपने चचरे भाई मुस्लिम को तुम्हारे साथ भेज रहा हूं यदि लोगों ने उनसे बैअत की अर्थात आज्ञा पालन का वचन दिया तो मैं भी आऊंगा। यह कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जनाब मुस्लिम को अपने भाई और विश्वास पात्र व्यक्ति के रूप में याद किया, यही उनकी योग्यता को समझने के लिए काफी है। फ़िर आपने जनाबे मुस्लिम को बुलाया और उनसे फरमाया, कूफे जाओ और देखो यदि लोगों की ज़बान एवं दिल एक है जैसाकि इन पत्रों में लिखा है और लोग एकजुट हैं, उनके माध्यम से कुछ किया जा सकता है तो इस संबंध में अपनी राय हमें लिखो।

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जनाब मुस्लिम को तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय आदि की सिफारिश की और फरमाया कि नर्मी एवं प्रेम से काम को आगे बढ़ाओ, अपनी गतिविधियों को गुप्त रखो यदि लोगों में समन्वय हो उनके मध्य मतभेद न हो तो हमें सूचित करो। जनाब मुस्लिम का भेजा जाना कूफा से हजारों की संख्या में आये पत्रों का उत्तर था।

जनाब मुस्लिम दो व्यक्तियों के साथ पवित्र नगर मक्का से कूफे पहुंचे। शिया मुसलमान कूफे में जनाब मुख्तार के घर में आकर जनाब मुस्लिम को देखने और उनके हाथ पर बैअत करने लगे यहां तक कि कई दिनों के भीतर जनाब मुस्लिम के हाथ पर बैअत करने वालों की संख्या हज़ारों में हो गयी। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के समर्थन में इतने सारे बैअत करने वालों और यज़ीद की सरकार को उखाड़ फेंकने वालों की स्थिति की सूचना जनाब मुस्लिम ने एक पत्र लिखकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को दी और प्रतिरोध के लिए स्थिति को उपयुक्त देखकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से कूफा आने का अनुरोध किया।

उधर यज़ीद ने कूफे पर अपना शासन बाक़ी रखने के लिए अब्दुल्लाह बिन ज़ियाद जैसे क्रूर व्यक्ति को, जो बसरा का गवर्नर था, कूफे का भी गवर्नर बना दिया और इब्ने ज़ियाद को यह दायित्व सौंपा कि वह कूफे जाकर जनाब मुस्लिम को गिरफ्तार करे और उसके बाद उन्हें जेल में डाल दे या कहीं भेज या फिर उनकी हत्या कर दे। जिन लोगों ने जनाब मुस्लिम के हाथों बैअत किया था वे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आने की प्रतीक्षा में थे पर इब्ने ज़ियाद के आते ही स्थिति परिवर्तित हो गयी और अगले दिन सुबह व्यक्ति जो नमाज़ पढ़ने के लिए आये थे इब्ने ज़ियाद ने उन्हें सबोधित करके कहा, मुझे अमीरुल मोमेनीन यज़ीद ने इस नगर का गवर्नर और तुम्हारा शासक एवं जनकोष का रक्षक बनाया है और मुझे आदेश दिया है कि अत्याचारग्रस्त लोगों के साथ न्याय और वंचितों के साथ भलाई करूं तथा जो लोग मेरे आदेश का विरोध करें उनके साथ कड़ाई से पेश आऊं तो फिर हर व्यक्ति को चाहिये कि वह डरे और मेरी बात की सच्चाई अमल के समय स्पष्ट हो जायेगी। उस हाशिमी व्यक्ति को यानी जनाब मुस्लिम को बता दो कि वह मेरे क्रोध से डरे" इसके बाद स्थिति पूरी तरह परिवर्तित हो गयी। इब्ने ज़ियाद ने कूफे नगर के विभिन्न मोहल्लों एवं क़बीलों के नेताओं को बुलाया और उन्हें डराया, धमकाया तथा उनसे मांग की कि वे यज़ीद के विरोधियों की सूचना हमें दें यन्यथा उनकी जान व माल ख़तरे में है। लालच, धमकी, जासूसी और सत्ता की दूसरी की संभावनाओं से इब्ने ज़ियाद ने पूरे कूफे नगर में भय एवं आतंक का वातारण व्याप्त कर दिया संक्षेप में यह कि लोगों को गिरफ्तार और उनके साथ कठोर व निर्दयतापूर्ण बर्ताव करके पूरी स्थिति पर नियंत्रण कर लिया। जनाब मुस्लिम बिन अक़ील मुख्तार के घर में थे और स्थिति परिवर्तित हो चुकी थी। चूंकि इब्ने ज़ियाद जनांदोन व प्रतिरोध को कुचलने की चेष्टा में था और वह प्रतिरोध के नेता मुस्लिम बिन अक़ील को गिरफ्तार करने के प्रयास में था इसलिए जनाब मुस्लिम मुख्तार के घर से हानी के घर में चले गये। हानी बिन उरवह कूफा नगर के जाने पहचाने लोगों में से थे और इस नगर में उनका बहुत प्रभाव था। उस समय हानी बिन उरवह की उम्र लगभग ९० वर्ष थी, वह पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के भी काल में थे तथा जमल, नहरवान एवं सिफ्फैन नामक युद्ध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की सेना में थे और पैग़म्बरे इस्लाम एवं पवित्र उनके परिजनों के प्रति विशेष श्रृद्धा व निष्ठा रखते थे। अब एक बार फिर परीक्षा की घड़ी आ गयी थी कि वह अपनी सच्चाई, ईमान और न्याय प्रेम के प्रति अपनी निष्ठा को दर्शाते। ख़तरनाक एवं संकटग्रस्त स्थिति में उन्होंने जनाब मुस्लिम को अपना मेहमान बनाया और उन्हें भलिभांति पता था कि क्रूर अत्याचारी इब्ने ज़ियाद जनाबमुस्लिम को गिरफ्तार करने के प्रयास में है और जनाब मुस्लिम को अपने यहां रखने के परिणाम से भी अवगत थे पर उन्होंने किसी बात की परवाह न की और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के दूत को अपना अतिथित्य बनाया।

उधर इब्ने ज़ियाद जनाब मुस्लिम को गिरफ्तार करने और प्रतिरोध को समाप्त करने की कुचेष्टा में था और इस कार्य को व्यवहारिक बनाने के लिए उसने दो षडयंत्र रचे

प्रथम यह कि जनाब मुस्लिम और उनके चाहने वालों का पता लगाना और दूसरे नगर में प्रभाव रखने वाले व्यक्तियों को लोभ व लालच देकर खरीदना इब्ने ज़ियाद ने जनाब मुस्लिम के रहने का स्थान और प्रतिरोध के कार्यक्रमों का पता लगाने के लिए माक़ल नाम के व्यक्ति को तीन हज़ार दिरहम दिया और उसे अपना जासूस बनाकर भेजा तथा उसे आदेश दिया गया कि वह अपने आपको जनाब मुस्लिम का चाहने वाला दर्शाये और साथ ही यह भी दिखाये कि उसके पास तीन हज़ार दिरहम हैं जिसे वह प्रतिरोध के लिए शस्त्र आदि खरीदने के लिए जनाब मुस्लिम को देना चाहता है। इस प्रकार वह जनाब मुस्लिम का पता लगाने में सफल हो गया तथा उसने हानी बिन उरवह के घर, उनके साथ मौजूद व्यक्तियों की संख्या आदि की सूचना इब्ने ज़ियाद को भेद दी और अपने साथ मौजूद तीन हज़ार दिरहम भी जनाब मुस्लिम को दे दिया। इस प्रकार इब्ने ज़ियाद के जासूस ने अपने आपको जनाब मुस्लिम का चाहने वाला एवं प्रतिरोध का पक्षधर दिखाने में सफल हो गया। सुबह सबसे पहले जनाब मुस्लिम के पास आता था और रात को सबसे देर में उनके पास से जाता था इस प्रकार वह प्रतिरोध के भीतर की समस्त गतिविधियों की जानकारी इब्ने ज़ियाद को भेजता था। इस प्रकार जब इब्ने ज़ियाद को जनाब मुस्लिम के रहने का स्थान और प्रतिरोध के प्रभावी व्यक्तियों का पता चल गया तो उसने ख़तरे का अधिक आभास किया और इससे पहले कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाये उसने प्रतिरोध एवं उसमें प्रभावी व्यक्तियों के दमन का निर्णय किया।

प्रतिरोध में हानी बिन उरवह की भूमिका बहुत अधिक थी इसलिए इब्ने ज़ियाद ने पहले उन्हें गिरफ्तार करने का निर्णय लिया। क्योंकि वह जानता था कि जब तक हानी बिन उरवह अपने स्थान पर रहेंगे तब तक जनाब मुस्लिम बिन अक़ील को गिरफ्तार करना संभव नहीं है। इसके बाद उसने एक षडयंत्र रचकर हानी बिन उरवह को दारुल इमारह अर्थात राजभवन बुलाया और उन्हें वही पर गिरफ्तार करके उनके तथा जनाब मुस्लिम के बीच दूरी उत्पन्न कर दी। अब कूफे में जनाब मुस्लिम हानी बिन उरवह जैसे वफादार साथी से अकेले हो गये हैं रात बिताने के लिए कूफे की गलिईयों में टहल रहे हैं और उन्हें नहीं पता कि वह कहां जायें। कूफे के हर घर का दरवाज़ा जनाब मुस्लिम के लिए बंद हो चुका है कई दिनों के बाद जनाब मुस्लिम को एक महिला ने अपने घर में शरण दी परंतु उस महिला के विपरीत उसका बेटा इब्ने ज़ियाद का समर्थक था रात को जब वह अपने घर आया तो अपनी मां के व्यवहार से समझ गया कि कोई असाधारण बात है काफी पूछने के बाद उसकी मां ने बताया कि जनाब मुस्लिम के अतिरिक्त हमारे घर में कोई नहीं है यह सुनना था कि उसका बेटा बहुत प्रसन्न हो गया और सोचा कि यदि यह खबर इब्ने ज़ियाद को दे तो वह उसे इनाम देगा। जबकि उसने अपनी मां को वचन दिया था कि इस बात को वह किसी से नहीं कहेगा पर उसने यह बात इब्ने ज़ियाद से बता दी और फिर क्या था इब्ने ज़ियाद ने जनाब मुस्लिम को गिरफ्तार करने के लिए कुछ सैनिक भेजे परंतु वे सब जनाब मुस्लिम को गिरफ्तार न कर सके, जनाब मुस्लिम ने बड़ा साहसिक युद्ध किया यहां तक इब्ने ज़ियाद के सैनिकों ने उससे और सैनिक भेजने की मांग की तो उसने कहा कि एक व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए कितने सैनिकों की आवश्यकता है तो उत्तर मिला कि यह हाशिम खानदान का जवान है कोई आम व्यक्ति नहीं है अंत में इब्ने ज़ियाद ने और सैनिकों को भेजा, घमासान लड़ाई हुई पर जनाब मुस्लिम को गिरफ्तार न कर सके तो उन्होंने एक गढढा खोदा और उसे घास आदि से ढक दिया तथा जनाब मुस्लिम को धोखा देकर उस गढढे के पास लाये जिसमें वह गिर गये जिसके बाद इब्ने जियाद के सैनिक उन्हें गिरफतार करके इब्ने ज़ियाद के पास ले गये। इब्ने ज़ियाद ने उनसे कहा कि तुमने अपने स्वामी को सलाम नहीं किया, मुस्लिम ने उत्तर दिया कि मेरा स्वामी केवल हुसैन है।

क्रूर एवं निर्दयी इब्ने ज़ियाद ने उनकी हत्या का आदेश देने से पूर्व उनकी अंतिम इच्छा जानना चाही तो हज़रत मुस्लिम ने तीन इच्छायें प्रकट की जिनमें से एक यह थी कि इमाम हुसैन को यह संदेश दे दिया जाये कि कूफा वाले अपने वचन से पीछे हट गये हैं अत: वे कूफे की ओर न आयें। इज़रत मुस्लिम की कोई इच्छा पूरी नहीं की गयी और इब्ने ज़ियाद के आदेश पर उन्हें राजभवन की छत से से गिरा कर शहीद कर दिया गया।
 

 

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