अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

मोहर्रम

आशूर की हृदय विदारक घटना का चालीसवां दिन

आशूर की हृदय विदारक घटना का चालीसवां दिन

आशूर की हृदय विदारक घटना का चालीसवां दिन गुज़र रहा है। आशूर के दिन का ख़्याल आते ही ख़ून, अत्याचार के ख़िलाफ़ आंदोलन, भाले पर इतिहास लिखने वाले अमर बलिदानों के सिर और चेहरे पर तमांचे खाए हुए बच्चों के चेहरे मन में उभरते है।

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मारेकए बद्र व ओहद और शोहदा ए करबला मुशाहिद आलम

मारेकए बद्र व ओहद और शोहदा ए करबला मुशाहिद आलम हज़रत सैय्यदुश शोहदा यूँ गोया हुए: ऐ करीम लोगो, सब्र से काम लो, इस लिये कि मौत तुम्हारे लिये एक पुल है, जिस से तुम सख़्तियों और मुसीबतों से उबूप कर के ख़ुदा की वसीअ व अरीज़ जन्नत और

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पैग़ामे कर्बला

पैग़ामे कर्बला यह कारवां ६० हिजरी क़मरी वर्ष के छठे महीने सफ़र की २८ तारीख़ को मदीने से मक्का की ओर चला था।

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कर्बला में कौन सफल हुआ? हुसैन (अ) या यज़ीद

कर्बला में कौन सफल हुआ?  हुसैन (अ) या यज़ीद कर्बला की घटना के बाद जितने इंक़ेलाब हुए शोहदा ए करबला के बदले (प्रतिशोध) के नाम से शुरू हुए, सभी का नारा था कि हम शोहदा ए करबला का बदला लेंगे।

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वो कार्य जिसे सबसे पहले इमाम हुसैन ने किया!!!

वो कार्य जिसे सबसे पहले इमाम हुसैन ने किया!!! प्रश्न यह है कि हम किस आधार पर यह कह रहे हैं कि यज़ीद की सत्ता से इस्लाम को ख़तरा था?  

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इमाम हुसैन (अ) की रुख़सते आख़िर

इमाम हुसैन (अ) की रुख़सते आख़िर मैं इसलिए आया हूँ कि तुम्हें आखिरी वसीयत करता हूँ

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कर्बला के शहीदों की श्रेष्ठ्ता का रहस्य

कर्बला के शहीदों की श्रेष्ठ्ता का रहस्य इसी वजह से इमाम हुसैन अ. को सय्यदुश् शोहदा यानी दुनिया के तमाम शहीदों का सरदार कहा जाता है और कर्बला के शहीदों को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ शहीद माना जाता है।

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करबला मे इमाम हुसैन अ.स. का पहला खुतबा

करबला मे इमाम हुसैन अ.स. का पहला खुतबा  आपने जो कुछ बयान फरमाया ये सब हम जानते है लेकिन जब तक आप भूखे प्यासे जान न देदे हम आपको छोड़ने वाले नही है।

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अज़ादारों की 8 ज़िम्मेदारियां

अज़ादारों की 8 ज़िम्मेदारियां 1.    काले कपड़े पहनना। 2.    संवेदना या तलसियत व्यक्त करना। 3.    आशूरा के दिन काम धंधा छोड़ देना। 4.    ज़ियारत और ज़ियारत पढ़ना। 5.    रोना और आँसू बहाना।

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आशूरा का रोज़ा

आशूरा का रोज़ा न बुख़ारी की मज़कूरा दूसरी रिवायत कहती है के रसूले ख़ुदा (स) जिस वक़्त मक्का से मदीना हिजरत फ़रमाई तो न सिर्फ़ ये के आप आशूर को रोज़ा नहीं रखते थे बल्कि आपको इसके बारे में कोई इत्तला भी नहीं थी और जब आपने यहूदीयों को रोज़ा रखते हुए देखा तो तअज्जुब के साथ इस रोज़े के बारे में सवाल किया, आपने जवाब में सुना के यहूद जनाबे मूसा और बनी इस्राईल की नजात की ख़ुशी में इस दिन रोज़ा रखते हैं, तो रसूले ख़ुदा ने फ़रमाया किः  

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अज़ादारी क्या है?

अज़ादारी क्या है? अगर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने मक़सद में कामयाब हुए हैं तो खुशी में जश्न क्यों नहीं मनाया जाता और इसके विपरीत क्यों रोया जाता है? क्या यह रोना और मातम इस सफलता के मुक़ाबले में सही है? जो लोग ऐतराज़ करते हैं उन्होंने वास्तव में अज़ादारी के फ़लसफ़े को समझा ही नहीं है बल्कि उन्होंने अज़ादारी को आम तौर पर कमज़ोरी से पैदा होने वाले रोने की तरह माना है।

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क्यों इमाम हुसैन यज़ीद के विरुद्ध उठ खड़े हुए?

क्यों इमाम हुसैन यज़ीद के विरुद्ध उठ खड़े हुए? जब इमाम हुसैन अ. नें देखा कि ज़िन्दा रह कर इस्लाम और दीन के लिये कुछ नहीं किया जा सकता तो मर कर ही कुछ करते हैं

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पहली मोहर्रमुल हराम से दसवी मोहर्रमुल हराम तक

पहली मोहर्रमुल हराम से दसवी मोहर्रमुल हराम तक इस्लाम से पहले अरब के लोग इस महीने में युद्ध को वर्जित समझते थे और लड़ाई झगड़ा बंद कर दिया करते थे और यही कारण है कि उसी युग से इस महीने को यह नाम यानी मोहर्रमुल हराम दिया गया। (1) और मोहर्रम के महीने को चाँद पर आधारित कलंडर का पहला महीना महीना माना जाता है। (2)

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इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद

इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद कत्ले हुसैन असल में मर्गे यज़ीद है, इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद...

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आशूरा के पैग़ाम

आशूरा के पैग़ाम बनी उमैय्या की हुकूमत की कोशिश यह थी कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की सुन्नत को मिटा कर ज़मान-ए-जाहिलियत  की सुन्नत को जारी किया जा...........

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आशूरा का पैग़ाम, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की ज़बानी

आशूरा का पैग़ाम, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की ज़बानी इमाम हुसैन अ.स. का करबला में आ कर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का कारण इस्लामी समाज में पैदा की गई वह गुमराहियां और बिदअतें थीं जिसकी बुनियाद सक़ीफ़ा में रखी गई थी, जिसके बाद से इस्लामी हुकूमत अपनी जगह से भटक कर बहुत से ग़लत रास्तों पर चली गई

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चेहलुम के दिन की अहमियत और आमाल

चेहलुम के दिन की अहमियत और आमाल यह इमाम हुसैन के चेहलुम का दिन है और शेख़ैन के कथानुसार इमाम हुसैन के अहले हरम इसी दिन शाम से मदीने की तरफ़ चले थे, इसी दिन जाबिर बिन अबदुल्लाहे अंसारी इमाम हुसैन की ज़ियारत के लिए कर्बला पहुँचे और आप ही इमाम के पहले ज़ाएर हैं, आज के दिन इमाम हुसैन की ज़ियारत करना मुस्तहेब है।

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20 सफ़र करबला के शहीदो का चेहलुम

20 सफ़र करबला के शहीदो का चेहलुम पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों की होशियारी व जानकारी ने आशूरा की एतिहासिक घटना को इतिहास की अमर घटना के रूप में सुरक्षित रखा।

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चेहलुम, इमाम हुसैन अहलैबैत की नज़र में

चेहलुम, इमाम हुसैन अहलैबैत की नज़र में शाबाश मेरी आंखों के नूर, शाबाश मेरे दिल के टुकड़े,

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चेहलुम, इमाम हुसैन की ज़ियारत पर न जाने का अज़ाब

चेहलुम, इमाम हुसैन की ज़ियारत पर न जाने का अज़ाब ज़ियारत पर न जाना आयु को घटाता है

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