अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम

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आज हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के रौज़े के पावन प्रांगण का वातावरण ही कुछ और है। आपकी शहादत के दुखद अवसर पर आपके पवित्र रौज़े और उसके प्रांगण में विभिन्न संस्कृतियों व राष्ट्रों के हज़ारों श्रृद्धालु एकत्रित हैं ताकि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों के प्रति अपनी श्रृद्धा व्यक्त कर सकें। आपके पवित्र रौज़े के कोने-कोने से क़ुरआन पढ़ने और दुआ करने की आवाज़ें आ रही हैं। श्रृद्धालुओं की अपार भीड़ यहां पर एकत्रित हुई है ताकि अपने नेत्रों के आंसूओं से अपने हृदयों के मोर्चे को छुड़ा सके और इस पवित्र रौज़े में अपने हृदय व आत्मा को तरुणाई प्रदान कर सके। श्रृद्धालुओं के हृदय शोक में डूबे हुए हैं परंतु आपके पवित्र रौज़े एवं प्रांगण में उनकी उपस्थिति से जो आभास उत्पन्न हुआ है उसका उल्लेख शब्दों में नहीं किया जा सकता।

 पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से प्रेम करने वालों के लिए आज एक अवसर है ताकि वे इन महान हस्तियों की आकांक्षाओं के साथ दोबारा प्रतिबद्धता व्यक्त करें। प्रिय श्रोताओ हम भी हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की शहादत के दुखद अवसर पर आप सबकी सेवा में हार्दिक संवेदना प्रस्तुत कर रहे हैं और हम आज के कार्यक्रम में हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के विभूतिपूर्ण जीवन के कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालेंगे। इमाम रज़ा अली बिन मूसा अलैहिस्सलाम के पावन अस्तित्व का चेराग़ उस घर में प्रकाशित हुआ जिस घर के परिवार के अभिभावक सदाचारी, ईश्वरीय दास और पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम थे। अली बिन मूसा अलैहिस्सलाम की माता मोरक्को के एक गणमान्य व प्रतिष्ठित व्यक्ति की बुद्धिमान सुपुत्री थीं जिनका नाम नज्मा था। हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का नाम अली और आपकी सबसे प्रसिद्ध उपाधि रज़ा है जिसका अर्थ प्रसन्नता है। आपके सुपुत्र हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम अपने पिता की उपाधि रज़ा रखे जाने के बारे में कहते हैं" ईश्वर ने उन्हें रज़ा की उपाधि दी क्योंकि आसमान में ईश्वर और ज़मीन में पैग़म्बरे इस्लाम तथा उनके पवित्र परिजन उनसे प्रसन्न थे और इसी तरह उनके अच्छे स्वभाव के कारण उनके मित्र, निकटवर्ती और शत्रु भी उनसे प्रसन्न थे"हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम के परिजनों में से एक हैं जिन्होंने ईश्वरीय दायित्व इमामत के काल में लोगों को पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों की शिक्षा की पहचान करवाई।

हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का ज्ञान, धैर्य, बहादुरी, उपासना, सदाचारिता एवं ईश्वरीय भय और एक वाक्य में यह कि आपका अध्यात्मिक व्यक्तित्व इस सीमा तक था कि आपके काल में किसी को भी आपके ज्ञान एवं अध्यात्मिक श्रेष्ठता में कोई संदेह नहीं था और इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम अपने समय में "आलिमे आले मोहम्मद" अर्थात हज़रत मोहम्मद के परिवार के ज्ञानी के नाम से प्रसिद्ध थे।हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के काल में इस्लामी जगत ने भौगोलिक, आर्थिक और शैक्षिक दृष्टि से बहुत अधिक प्रगति की थी परंतु इन सबके साथ ही उस समय अब्बासी शासकों की अत्याचारी सरकार जारी थी।

हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के काल में बनी अब्बास, हारून रशीद और अमीन व मामून की तीन सरकारें थीं और आपके जीवन के अंतिम पांच वर्षों में बहुत ही धूर्त और पाखंडी अब्बासी ख़लीफा मामून की सरकार थी। मामून ने अपने भाई अमीन की हत्या कर देने के बाद सत्ता की बाग़डोर अपने हाथ में ले ली और उसने अपने मंत्री फज़्ल बिन सहल की बुद्धि व चालाकी से लाभ उठाकर अपनी सरकार के आधारों को मज़बूत बनाने का प्रयास किया। इसी दिशा में उसने हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को अपना उत्तराधिकारी बनने का सुझाव दिया ताकि पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से प्रेम करने वालों के ध्यान को अपनी ओर आकर्षित कर ले और इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को अपना उत्तराधिकारी बनाकर वह अपनी सरकार को वैध दर्शाना चाहता था।

अलबत्ता उसने बहुत चालाकी से यह दिखाने का प्रयास किया कि इस कार्य में उसकी पूरी निष्ठा है और उसने हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के प्रति सच्चे हृदय, विश्वास तथा लगाव से यह कार्य किया। मामून के इस निर्णय पर अब्बासी सरकार के समर्थकों व पक्षधरों ने जो आपत्ति जताई उसके जवाब में मामून ने जो चीज़ें बयान कीं उससे उसके इस कार्य के लक्ष्य स्पष्ट हो जाते हैं। मामून ने कहा" इन्होंने अर्थात इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने अपने कार्यों को हमसे छिपा रखा है और लोगों को अपनी इमामत की ओर बुलाते हैं। इस आधार पर वह जब हमारे उत्तराधिकारी बन जायेगें तो लोगों को हमारी ओर बुलायेंगे और हमारी सरकार को स्वीकार कर लेगा और साथ ही उनके चाहने वाले भी समझ जायेंगे कि सरकार के योग्य हम हैं न कि वह"इस आधार पर यदि मामून की इच्छानुसार हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम उसके उत्तराधिकारी होने को स्वीकार कर लेते तो यह एसा कि जैसे उन्होंने बनी अब्बासी सरकार की वैधता को स्वीकार कर लिया हो और यह अब्बासी ख़लीफ़ाओं के लिए बहुत बड़ी विशिष्टता समझी जाती। दूसरी बात यह थी कि मामून यह सोचता था कि हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम द्वारा उसके उत्तराधिकारी होने को स्वीकार कर लेने से उनका स्थान व महत्व कम हो जायेगा।

विदित में मामून की ये पाखंडी व धूर्त चालें बहुत सोची- समझी हुई थीं परंतु इन षडयंत्रों के मुक़ाबले में हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की क्या प्रतिक्रिया रही है?इस षडयंत्र के मुक़ाबले में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की पहली प्रतिक्रिया यह रही कि आप मामून की सरकार के केन्द्र मर्व आने से कतराते रहे यहां तक कि मामून के कारिन्दें इमाम को विवश करके मर्व लाये। प्रसिद्ध विद्वान शेख सदूक़ ने अपनी पुस्तक "ऊयूनो अख़बारि र्रेज़ा" में लिखा है" इमाम पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व सल्लम से विदा लेने के लिए आपके मज़ार पर गये। कई बार वहां से बाहर निकले और फिर पलट आये तथा ऊंची आवाज़ में विलाप किया।

उसके पश्चात इमाम ने परिवार के लोगों को एकत्रित किया और उनसे विदा ली तथा उनसे कहा" अब मैं आप लोगों की ओर वापस नहीं आऊंगा"दूसरा महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम अपने परिवार के किसी भी व्यक्ति को अपने साथ नहीं ले गये। इन सब बातों से आपकी पहचान रखने वालों विशेषकर शीया मुसलमानों के लिए, जो सीधे आपके संपर्क में थे, स्पष्ट हो जाता है कि हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने विवश होकर इस यात्रा को स्वीकार किया था। दूसरे चरण में इमाम ने यह प्रयास किया कि अपना उत्तराधिकारी बनाने हेतु मामून के कार्य को पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के अधिकारों को पहचनवानें का माध्यम बना दें। क्योंकि उस समय तक अब्बासी और अमवी शासकों ने पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों की इस योग्यता को स्वीकार नहीं किया था कि सरकार के वास्तविक पात्र पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन ही हैं। मामून की कार्यवाही से अच्छी तरह पहले वाले अब्बासी शासकों की नीतियों व दृष्टिकोणों पर पानी फिर जाता। हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने मामून द्वारा उत्तराधिकारी का पद स्वीकार करने से पहले एक भाषण दिया जिसमें यह शर्त लगा दी कि उत्तराधिकारी का पद स्वीकार करने की स्थिति में वह किसी भी राजनीतिक मामले में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेंगे, न किसी को काम पर रखेंगे और न ही किसी को उसके पद से बर्खास्त करेंगे। सरकार की कोई परम्परा नहीं तोड़ेंगे और उनसे केवल परामर्श किया जायेगा। दूसरे शब्दों में हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने मामून की अत्याचारी सरकार के किसी काम में कोई हस्तक्षेप नहीं किया ताकि उसकी अत्याचारी सरकार के ग़ैर इस्लामी क्रिया- कलापों को इमाम के खाते में न लिख दिया जाये और लोग यह सोचें कि हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम अब्बासी सरकार का समर्थन व पुष्टि कर रहे हैं।मामून इमाम को मदीने से मर्व लाने के बाद विभिन्न विद्वानों की उपस्थिति में शास्त्रार्थ की बैठकें आयोजित करता था।

इस कार्य से उसका विदित उद्देश्य यह था कि लोग यह समझें कि वह ज्ञानप्रेमी है जबकि उसका वास्तविक उद्देश्य इमाम को इस प्रकार की बैठकों में बुलाकर उनके ज्ञान की शक्ति को प्रभावित करने की चेष्टा थी परंतु हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के ज्ञान की शक्ति से मामून के लिए समस्याएं उत्पन्न हो गयीं। शेख़ सदूक़ इस बारे में लिखते हैं" मामून हर सम्प्रदाय के उच्च कोटि के विद्वानों के मुक़ाबले में हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को लाता था ताकि वे इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की इमामत के तर्क को अस्वीकार कर दें और यह इस कारण था कि वह इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के ज्ञान के स्थान एवं सामाजिक महत्व से ईर्ष्या करता था परंतु कोई भी व्यक्ति आपके सामने नहीं आता था किन्तु यह कि वह आपके स्थान व प्रतिष्ठा को स्वीकार न कर लेता हो। इमाम की ओर से सामने वाले पक्ष के विरुद्ध जो तर्क प्रस्तुत किये जाते थे।

वे उन्हें स्वीकार करने पर बाध्य हो जाते थे। जब मामून यह समझ गया कि इस प्रकार के शास्त्राथों से केवल हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के ज्ञान का स्थान और अधिक स्पष्ट होने का कारण बना है तो उसने ख़तरे का आभास किया और इमाम को पहले से अधिक सीमित कर दिया। एक अन्य घटना ईद की नमाज़ के लिए इमाम का जाना था जिसने मामून के षडयंत्रों का रहस्योदघाटन कर दिया। मामून ने इमाम से मांग की कि वह ईद की नमाज़ पढ़ायें।

आरंभ में इमाम ने स्वीकार नहीं किया परंतु मामून के काफी आग्रह के बाद इमाम ने कहा" तो मैं अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम की भांति नमाज़ पढ़ाने जाऊंगा" मामून ने इसे भी स्वीकार कर लिया। लोगों को आशा व अपेक्षा थी कि इमाम शासकों की भांति ताम झाम और दरबारियों की भीड़ के साथ घर से निकलेंगे परंतु लोग उस समय हतप्रभ रह गये जब उन्होंने यह देखा कि इमाम नंगे पैर अल्लाहो अकबर कहते हुए रास्ता चल रहे हैं। दरबारी लोगों ने, जो सरकारी वेशभूषा में थे, जब यह आध्यात्मिक दृश्य देखा तो वे अपने अपने घोड़ों से नीचे उतर आये और उन्होंने अपने जूते उतार दिये और वे लोग भी अल्लाहो अकबर कहते हुए इमाम के पीछे पीछे चलने लगे।

इस्लामी इतिहास में आया है कि सहल बिन फज़्ल ने, जो मामून का मंत्री था, मामून से कहा कि यदि इमाम इसी तरह ईदगाह तक पहुंच गये तो लोग इमाम के श्रृद्धालु बन जायेंगे और बेहतर यही है कि तू उनसे लौटने के लिए कहे" इसके बाद मामून ने एक व्यक्ति को भेजा और उसने इमाम से लौटने के लिए कहा। मामून अच्छी तरह समझ गया कि लोगों के निकट इमाम की लोकप्रियता दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। मामून ने इस घटना से जिस ख़तरे का आभास किया था उससे वह इस सोच में पड़ गया कि इमाम का अस्तित्व न केवल उसके दर्द की दवा नहीं कर रहा है बल्कि स्थिति और भी उसके विरुद्ध हो जायेगी। इस आधार पर उसने इमाम पर कड़ी दृष्टि रखने के लिए कुछ लोगों को तैनात किर दिया ताकि इमाम की गतिविधियों पर सूक्ष्म व पैनी दृष्टि रखें और सारी बातों की जानकारी मामून को दें ताकि कहीं एसा न हो कि इमाम उसके विरुद्ध कोई कार्यवाहीं कर बैठें। जो बात सही होती थी इमाम मामून से किसी प्रकार के भय के बिना उसे बयान कर देते थे।

बहुत से अवसरों पर इमाम स्पष्ट शब्दों में मामून के क्रिया- कलापों पर टीका- टिप्पणी करते थे। उनमें से एक अवसर यह है कि जब वह ग़ैर इस्लामी क्षेत्रों पर सैनिक चढ़ाई के प्रयास में था तो इमाम ने उसे संबोधित करते हुए कहा" तू क्यों मोहम्मद के अनुयाइयों की चिंता में नहीं है और उनकी भलाई व सुधार के लिए कार्य नहीं करता? इमाम की ये बातें उनके प्रति मामून की ईर्ष्या, द्वेष और शत्रुता में वृद्धि का कारण बनीं। इस आधार पर मामून समझ गया कि इमाम को मदीने से मर्व लाने का वांछित परिणाम नहीं निकला है और यदि स्थिति इसी तरह जारी रही तो उसे एसी क्षति का सामना करना पड़ेगा जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। मामून अपनी सत्ता की सुरक्षा में किसी की हत्या करने में संकोच से काम नहीं लेता था और इस बार भी उसने अपनी सत्ता की सुरक्षा के उद्देश्य से पैग़म्बरे इस्लाम के प्राणप्रिय पौत्र की हत्या में संकोच से काम नहीं लिया।

इस प्रकार हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम भी अपने पवित्र पूर्वजों की भांति सत्य बोलने और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने के मार्ग में शहीद हो गये परंतु उन्होंने मामून की अत्याचारी सरकार के साथ सहकारिता करने के अपमान को कभी स्वीकार नहीं किया। हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की शहादत के दुःखद अवसर पर एक बार फिर आप सबकी सेवा में संवेदना प्रस्तुत करते हैं और आज के कार्यक्रम को उनके स्वर्ण कथन से समाप्त कर रहे हैं।

आप कहते हैं" ऐसा न हो कि तुम मोहम्मद के परिवार से मित्रता के आधार पर भला कर्म करना छोड़ दो और ऐसा भी न हो कि भले कार्यों के आधार पर मोहम्मद के परिवार से मित्रता करना छोड़ दो क्योंकि इनमें से कोई भी अकेले स्वीकार नहीं किया जायेगा"

 

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