अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

नक़्शे इल्लल्लाह सहरा में लिख दिया

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मौसमे बहार की ख़ामोश रातों में बल्लौरी शीशों का फ़ानूस सजा कर किसी नाज़ुक सी शमा को जलाए रखना आसान हो सकता है मगर बरसात की काली रातों में सियाह आँधियों की ज़द पर चिराग़ जलाये रखना निहायत मुश्किल बल्कि ना मुमकिन अम्र है। इसी से मिलते जुलते हालात तक़रीबन चौदह सदी पहले भी पेश आये जब जज़ीर ए अरब में आफ़ताबे नुबुव्वत तुलू हुआ। जिसकी रौशनी जाहिल आराब के चश्म व गोश से गुज़र कर उन के दिलों को भी मुनव्वर कर गई और बे साख़्ता उन की ज़बान पर कलेम ए ला इलाह जारी हो गया और दीगर अदयाने इब्राहीमी के पैरव कार भी जूक़ दर जूक़ दायर ए इस्लाम में दाख़िल होने लगे। यहाँ तक कि मुशरेकीने मक्का जो इस्लाम व मुसलेमीन के सर सख़्त दुश्मन थे। उन्होने भी कलेम ए तैय्यबा पढ़ लेने में ही अपनी भलाई महसूस की और इस तरह जज़ीर ए अरब का एक बड़ा ख़ित्ता परचमे ला इलाहा के ताबेदारों में शामिल हो गया। अल्लाह के दामाने रहमत ने मुसलमानों को अपने साये में ले लिया, नेमतों का नुज़ूल हुआ। रूमी और ईरानी सक़ाफ़तों के मुक़ाबले में जाहिल अरबों को इस्लामी सक़ाफ़त का लबादा मिल गया, जिस ने रुमियों और ईरानियों पर इतना गहरा असर डाला कि कुछ अरसे बाद जब इस्लामी फ़ौजे उन की जानिब बढ़ीं तो बड़ी तेज़ी से उन की ज़मीनो को फ़तह करती हुई आगे बढ़ गयीं लेकिन ख़ुदा का क़ानून कुछ और है वह जिस क़ौम पर जितनी नेमतें नाज़िल करता है उस का उतना ही सख़्त इम्तेहान भी लेता है।

आफ़ताबे नुबुव्वत ग़ुरुब कर गया और माहताबे इमामत बादलों की ज़द में आ गया। इस मौक़े से फ़ायदा उठा कर कुछ सरकश हाथों ने शजर ए तैय्यबा से निकली हुई शाख़े इस्लाम को तराश कर शजर ए ज़क़्क़ूम में पेवन्द दे दिया। जिस के नतीजे में रफ़्ता रफ़्ता रुहे इस्लाम की मिठास जाती रही और शजर ए ज़क़्क़ूम की तल्ख़ियाँ मुसलमानों के दिल व दिमाग़ पर छाती गयीं। जिस के नतीजे में नफ़रत, हसद, झूट, मक्र व फ़रेब, अहद शिकनी, चापलूसी और दीगर सभी बुराईयों ने इस्लामी मुआशरे में अपना घर बना लिया। इस्लामी अक़दार पामाल होने लगीं। ज़ुल्म व बरबरीयत के बादल मंडलाने लगे। यहाँ तक कि मुसलमानों में इतनी जुरात बाक़ी न रही कि वह ज़बान पर हरफ़े हक़ जारी कर सकें। जो इस्लाम के रखवाले थे एक एक कर के मौत के घाट उतारे जाने लगे और शजर ए तैय्यबा की शाख़ें एक एक कर के पज मुर्दा होने लगीं। इस्लाम के बाग़े बहार पर ख़ज़ाँ की हुक्मरानी हो गई। छोटे बड़े सभी दरख़तों पर शजर ए ज़क़्क़ूम की शाख़े मुसल्लत हो गयीं।

सिर्फ़ शजर ए तैय्यबा की एक शाख़ थी जो पूरे आब व ताब से ख़ज़ाँ का मुक़ाबला कर रही थी। जो शजर ए ज़क़्क़ूम की आँख़ों में आँखें डाल कर कह रही थी कि जब तक मैं सर सब्ज़ हूँ इस्लाम को बे सहारा मत समझना और बिल आख़िर उस शाख़े तैय्यबा ने कुछ बिखरी पंखड़ियों को समेट कर फूलों का एक ऐसा गुल दस्ता बनाया जिस के वुजूद से इज़्ज़त व शराफ़त, उख़ूवत व मुहब्बत, ग़ैरत व हमीयत, सब्र व शुक्र और ईसार व क़ुर्बानी की ऐसी ख़ुशबू फूटी कि सहरा ए इस्लाम मुअत्तर हो गया। शजर ए ज़क़्क़ूम के औसान ख़ता हो गये।

नोट: इस मक़ाले के नाम का तर्जमा किया गया है।

 

 

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