हज़रत आयशा की तारीख़ी हैसियत

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हज़रत आयशा की तारीख़ी हैसियत लेखक:
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हज़रत आयशा की तारीख़ी हैसियत

हज़रत आयशा की तारीख़ी हैसियत

लेखक:
हिंदी

यह किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क की तरफ से संशोधित की गई है।.


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2

अबू बकर व उमर का दौरे हुकूमत और आयशा

रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के अहद में हज़रत आयशा की पूरी ज़िन्दगी खेलकूद , हंगामा आराई , धमा चौकड़ी , नफ़रतो अदावत , रश्को हसद इख़तेलाफ़ और लड़ाई झगड़े में गुज़री जिसकी वजह से रसूल को भी बाज़ मवाक़े पर सख़्त अज़ीयतों और दुशवारियों में मुब्तिला होना पड़ा।

रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की शहादत के बाद आपकी मनचली तबीअत क़दरे सन्जीदगी की तरफ़ माएल हुई। अबू बकर का ज़माना आपकी ज़िन्दगी और शख़्सियत साज़ी का बेहतरीन ज़माना था। बाप की हुकूमत का सुकूनों आराम मयस्सर था , ख़ुशहाली और कामरानी आपके क़दमों में थी , सियाह-सफ़ेद का इख़्तियार हासिल था , गोया आप मलका ए वक़्त थीं और कुल सल्तनत आप ही की थी।

इब्ने सअद का कहना है कि अहदे अबू बकरो उमर में हज़रत आयशा फ़तवे दिया करती थीं और अकाबेरीने सहाबा उनसे पैग़म्बर के अहकामात मालूम किया करते थे। ( 1)

अबू बकर के बाद उमर के दौरे हुकूमत में भी आपको वही अज़मतों मन्ज़ेलत मयस्सर रही। ख़लीफ़ा ए वक़्त ने तमाम अज़्वाजे रसूल का सालाना वज़ीफ़ा दस हज़ार मुक़र्रर किया था लेकिन आपकी ख़ुसूसी मुराआत के तहत बारह हज़ार मिलते थे। ( 2)

(ज़ुक़वान) ग़ुलामे आयशा का बयान है कि एक मरतबा ईराक़ से उमर के पास एक सन्दूक भेजा गया जो बेशक़ीमत जवाहरात से भरा हुआ था , उमर ने लोगों से दर्याफ़्त किया कि अगर तुम लोग कहो तो मैं ये सन्दूक आयशा को दे दूं क्यों कि वह रसूल की चहीती हैं , सब ने मन्ज़ूर कर लिया और उमर ने वो सन्दूक आयशा को नज़्र कर दिया। ( 3)

हज़रत आयशा की क़द्रो मन्ज़िलत का अन्दाज़ा इस वाक़ेए से होता है कि 23 हिजरी में उमर आख़िरी हज के लिये तैय्यार हुए तो ज़ैनब और सौदा के अलावा दीगर उम्माहातुल मोमिनीन के साथ आयशा ने भी हज की ख़्वाहिश की जिसे उमर ने ब सरो चश्म मन्ज़ूर ही नहीं किया बल्कि ये हुक्म भी दिया कि सामाने सफ़र के साथ उम्मुल मोमिनीन के लिए ख़ुसूसी इन्तिज़ामात भी किये जायें और जुम्ला आसाइशें भी मुहय्यां की जायें।

चुनांचे अमारियां आरास्ता की गयीं और उन पर सब्ज़ रंग के ख़ुशनुमा पर्दे डाले गये। उस्मान बिन उफ़्फ़ान और अब्दुर रहमान बिन औफ़ ऊंटों की सारबरानी पर मुक़र्रर हुए और उम्मुल मोमिनीन इस शानो शौकत और जाहो जलाल के साथ दीगर अज़्वाज के हमराह हज के लिए रवाना हुईं कि उनके नाक़े के आगे उस्मान थे जो चीख़ चीख़ कर ये आवाज़ देते जाते थे कि...... होशियार........ ख़बरदार...... इधर को कोई रूख़ न करे और न नज़र उठा कर देखने की कोशिश करे अज़्वाजे पैग़म्बर के साथ उम्मुल मोमिनीन महवे सफ़र हैं। अब्दुर रहमान बिन औफ़ काफ़िले के पीछे चल रहे थे और उनकी भी वही हालत थी जो उस्मान की थी। ( 4)

उम्मुल मोमिनीन ज़ैनब और सौदा ने इस सफ़र में आयशा का साथ इस लिये नहीं दिया कि उनका कहना था कि अब ऊंट की पीठ हमें हरकत नहीं दे सकती। रसूले ख़ुदा के साथ हमने हज भी कर लिया और उमरा भी , अब हमारे लिये ख़ुदा का हुक्म यही है कि हम घर में बैठे।

ग़रज़ की हज़रत आयशा ख़ुसूसी तवज्जो और इनायात का अज़ीम मरकज़ थीं। ख़लीफ़ा ए सानी के दौर में उन्हें जो मरतबा हासिल हुआ वो किसी को भी नसीब न हो सका। आयशा भी उमर का पूरी तरह एहतिराम करती थीं और उन दोनों के क़ौलो अमल में बड़ी हद तक यकसानियत भी थी। बुख़ारी , बैअते उस्मान के वाक़ेआत में और इब्ने सअद ने तबक़ात में एक तवील रवायत नक़ल की है जिससे दोनों के ख़्यालात की हम आहंगी का पता चलता है , इस रवायत को नज़र अन्दाज़ कर देना ही मेरे ख़्याल से मुनासिब है।

अल्लामा इब्ने अबदरबा ने अक़्दे फ़रीद में मिम्बराने शूरा की ज़बानी उमर की गुफ़्तुगू नक़ल की है जिसका खुलासा ये है कि उमर की वसीयत ये थी कि मेरे बाद तुम लोग आयशा के हुजरे में ही ख़लीफ़ा का इन्तिख़ाब करना चुनान्चे उमर की तदफ़ीन हो चुकी तो मिक़दाद बिन अस्वद ने आयशा की मर्ज़ी से अरकाने शूरा को उनके घर में इकट्ठा किया , अमरे आस और मुगीरा बिन शैबा भी दरवाज़े पर आकर बैठ गये लेकिन सअद ने उन्हें पत्थर मार कर भगा दिया और कहा कि कल तुम दोनों भी अपने आप को मिम्बराने शूरा में शुमार करने लगोगे और लोगों से कहोगे कि हम भी शूरा में मौजूद थे। ( 5)

उमर ने अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी लम्हों तक आयशा का पासो लिहाज़ किया और इम्तियाज़ी और तरजीही सुलूक़ को बदस्तूर रवा रखा और उन्हें इस क़ुव्वतो ताक़त का मालिक बना दिया कि बाद में वो हर हुकूमत से टकरायी और उसे लिए दर्दे सर बन गयी।

उमर अगर एक तरफ़ हज़रत आयशा की ज़ात से वालिहाना अक़ीदतों मुहब्बत रखते थे तो दूसरी तरफ़ अपने मौकिफ़ में इन्तिहाई सख़्त भी थे जिसका अन्दाज़ा उल्लामा मुहिबउद्दीन तबरी की इस रवायत से होता है। वो तहरीर फ़रमाते हैः-

जब अबू बकर का इन्तिक़ाल हो गया तो आयशा ने ग़म में सफ़े मातम बिछाई और गिरया ओ मातम का एहतिमाम किया। उमर को जब ये ख़बर मालूम हुई तो वो कुछ हमराहियों के साथ आ धमके और दरवाज़े पर खड़े हो कर अपनी गरजदार आवाज़ में गिरयाओ मातम से मना करने लगे मगर जब आयशा और दूसरी औरतें रोने से बाज़ न आयीं तो उमर ने हिशाम बिन ख़ालिद को हुक्म दिया कि घर में घुस जाओ और रोने वालियों को ज़बरदस्ती घसीट लाओ। हिशाम घर में अन्दर घुस गया और आयशा की बहन उम्मे फ़रवा को ख़ींचता हुआ बाहर ले आया। उमर ने रोने के जुर्म में उम्मे फ़रवा को इतने दुर्रे मारे कि वो लहू लुहान हो गयीं।

बज़ाहिर उम्मे फ़रवा और आयशा का जुर्म एक था मगर उमर ने उम्मे फ़रवा को जदोकोब करने के बाद आयशा को छोड़ दिया , शायद इस लिये कि उनकी हुकूमत आयशा की मरहूमे मिन्नत थी।

उमर के इस इक़दाम पर आयशा जितनी भी फ़ख़्र करें कम है क्यों कि उमर ने उनका वो पासो लिहाज़ किया जो रसूल के बाद उनकी कुदसी सिफ़ात बेटी फातेमा ज़हारा (स.अ.) का भी नहीं किया।

तबरी की इस रवायत से ये भी पता चल गया कि ग़मे हुसैन (अ.स) में गिरयाओ मातम के ख़िलाफ़ बिदअत के फ़तवे इसी उमरी सीरत पर अलक का शाख़साना है।

1. तबक़ातः- जिल्द 8 पेज न. 375

2. मुसतदरक हाकिम ज़िक्रे आयशा फ़िस सहाबियात व किताबुल ख़िराजः- 25

3. तबक़ात इब्ने सअदः- जिल्द 8, पेज न. 208- 209

4. तबक़ातः- जिल्द 8 पेज न. 208- 209

5. अब्दुल फ़रीदः- जिल्द 4 पेज न. 275

उस्मान का दौरे हुकूमत और आयशा

ख़िलाफ़ते उस्मानियां के इब्तिदाई छः बरसों में हज़रत आयशा उस्मान की सरगर्म हिमायती रहीं और क़दम क़दम पर उनकी इताअत करती रहीं। उसके बाद दोनों के दर्मियान इख़तिलाफ़ पैदा हो गया। इस इख़तिलाफ़ की वजह यह बताई जाती है कि , उमर ने तमाम अज़्वाजे पैग़म्बर (स.अ.व.व) का सालाना वज़ीफ़ा 10 हज़ार मुक़र्रर किया था और आयशा को बारह हज़ार देते थे। उस्मान ने दो दो हज़ार कम करे उनका वज़ीफ़ा भी दीगर अज़्वाज के मसावी कर दिया।

रफ़्ता रफ़्ता इसी मुख़ालिफ़त ने ख़तरनाक सूरत इख़तियार कर ली और आयशा खुल कर उस्मान से मुक़ाबले के लिये मैदान में उतर आयीं। उन्होंने मुसलमानों को वरग़लाया , भड़काया और आमादा ए पैकार किया और फ़तवा दिया कि उस्मान काफ़िर हो गया है इस नअसल को क़त्ल कर दो।

जब मुसलमान उस्मान के ख़िलाफ़ पूरी तरह मुशतइल और बरगश्ता हो गये और हालात इन्तिहाई नाज़ुक मोड़ पर आ गये तो आप मदीना छोड़ कर हज के बहाने से मक्के रवाना हो गयीं। आपके जाते ही आपके हिमायती तल्हा ज़ुबैर वग़ैरह की मदद से आम मुसलमानों को आमादा कर के हुकूमते उस्मान का तख़्ता पलट दिया और उस्मान बड़ी बेदर्दी से मौत के घाट उतार दिये गये।

बलाज़री का कहना है किः-

हज़रत आयशा की वो पहली ज़ात है जिसने उस्मान की मुख़ालिफ़त में आवाज़ बलन्द की , उनके मुख़ालिफ़ीन के लिये जाए पनाह बनीं और उनसे आमादा ए पैकार लोगों की क़ियादत की। उस वक़्त पूरी ममलेकते इस्लामिया में हज़रत अबू बकर के ख़ानदान से बढ़ कर उस्मान का दुश्मन न था। ( 1)

हज़रत उस्मान से आयशा के इख़तिलाफ़ का सबब उनके वज़ीफ़े में तख़फ़ीफ़ के अलावा वो ज़ियादतियां मज़ालिम और तशद्दुद भी थे जिन्हें उस्मान और उनके आमिलों ने आम मुसलमानों पर रवा रखे थे और जिनकी वजह से मुसलमानों और असहाबे पैग़म्बर (स.अ.व.व) में ग़मों ग़ुस्सा और बरहमी की लहर पैदा हो चुकी थी। तल्हा और ज़ुबैर की वो मिली भगत भी थी जिसके ज़रिये वो लोग हुकूमतो अमारत के ख़्वाहां थे और जिसकी हक़ीक़ी तस्वीर जंगे जमल के मौक़े पर उभर कर सामने आयीं।

इस दलील के तमाम हालात और वाक़ेआत को हम अपनी किताब अल ख़ुलफ़ा हिस्सा दोम में मुफ़स्सल तौर पर तहरीर कर चुके हैं मुनासिब होगा कि कारेईने किराम उस किताब का मुतालिआ फ़रमायें।

क़त्ले उस्मान पर आयशा के ख़िलाफ़ सहाबा की गवाहियां

(माख़ज़ अज़ अल ख़ुलफ़ा)

(हिस्सा दोम)

मुग़ीरा एक दिन आयशा के पास आया तो उन्होंने उस से फ़रमाया कि ऐ अबू अब्दुल्लाह ! काश तुम जंगे जमल में देखते कि तीर किस तरह मेरे हौदज को तोड़ कर निकल रहे थे। मुग़ीरह ने कहा काश उन तीरों में से कोई तीर आपका ख़ात्मा कर देता। आयशा ने फ़रमाया , आख़िर क्यों ? मुग़ीरह ने कहा तुम्हारे क़त्ल से उस सइए क़त्ल का कफ़्फ़ारह हो जाता जो उस्मान के लिये आपने की है। ( 2)

सअद इब्ने अबी विक़ास

सअद से एक शख़्स ने पूछा कि उस्मान का क़ातिल कौन है ? उन्होंने कहा , उस तलवार से क़त्ल हुए जो आयशा ने खींची थी। ( 3)

इब्ने कलाब

हिसारे उस्मान के वक़्त आयशा मक्के चली गयी थी और जब उस्मान क़त्ल हो गये तो मक्के से फिर मदीने की तरफ़ पलटीं। सर्फ़ के मक़ाम पर इब्ने कलाब से मुलाक़ात हुई , पूछा , क्या ख़बर है ? कहा उस्मान क़त्ल कर दिये गये। ये सुन कर आयशा फिर मक्के की तरफ़ पलटीं और फ़रमाया उस्मान बे गुनाह क़त्ल हुए।

इब्ने कलाब ने कहा , आप ही ने उस्मान का क़त्ल चाहा आप ही वो हैं कि जिसने ये फ़तवा दिया कि नअसल को क़त्ल कर डालों क्यों कि ये काफ़िर हो गया है। ( 4)

अम्मार बिन यासिर

उस्मान के क़त्ल होने पर आयशा ने शोर मचाया कि उस्मान बे गुनाह क़त्ल हुए। उस पर अम्मार ने कहा , कल तुम उनके क़त्ल के लिये लोगों को भड़काती थीं और आज शोर मचाती हो। ( 5)

हज़रत आयशा का इक़रार

जब अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) के बैअत की ख़बर आयशा को मिली तो वो उस वक़्त मदीने में नहीं थी। उनसे कहा गया कि उस्मान क़त्ल हो गये और अली के हाथ पर बैअत हो गयी। ये सुन कर आयशा ने कहा , मुझे परवाह नहीं , अगर ज़मीनों आसमान मुझ पर फट पड़ें। ख़ुदा की क़सम उस्मान बेगुनाह क़त्ल हुए और अब मैं उनके ख़ून का इन्तिक़ाम लूंगी। उस पर उबैद ने कहा , ऐ उम्मुल मोमिनीन ! सबसे पहले जिसने उस्मान पर तअन की और लोगों को उनके क़त्ल पर उभारा वो आप थीं और आप ही ने कहा कि इस नअस्ल को क़त्ल कर डालो क्यों कि ये काफ़िर हो गया है। आयशा ने कहा , हां ख़ुदा की क़सम मैंने ये ज़रूर कहा और किया , मगर दूसरा क़ौल पहले क़ौल से बेहतर है। उबैद ने कहा , हमारे नज़दीक क़ातिल वो है जिसने क़त्ल का हुक्म दिया। ( 6)

अमरए आस

इब्ने क़ैबा ने अपनी किताब अल इमामत वल सियासत में तहरीर किया है कि जिस वक़्त उस्मान क़त्ल हुए अमरए आस फ़िलिस्तीन में था। उसे ख़बर मालूम हुई तो उसने सअद इब्ने अबी विक़ास को ख़त लिख कर पूछा कि उस्मान को किसने क़त्ल किया। जवाब में सअद ने लिखा , कि उस तलवार से उस्मान क़त्ल हुए जो आयशा ने तैय्यार की थी और तल्हा ने उस पर सैक़ल की थी। ( 7)

ये वो तारिख़ी शवाहिद हैं जो इस सरबस्ता राज़ पर पड़े हुए पर्दे को चाक कर देते हैं कि उस्मान का अस्ल क़ातिल कौन है ? अब सवाल ये है कि अगर आयशा ने उस्मान के क़त्ल का हुक्म दिया और इस हुक्म के अमल दर आमद पर मुसलमानों को हमवार किया तो फिर उस्मान के क़त्ल हो जाने के बाद उन्होंने ख़ूने उस्मान के क़िसास का नारा क्यों बलन्द किया जिसके नतीजे में जंगे जमल के नाम से एक हौलनाक हादसा रूनुमा हुआ। इसका जवाब यह है कि सियासी नुक़्ता ए नज़र से आयशा के लिए इससे बेहतर कोई सूरत नहीं थी कि मुसलमानों को फ़रेब में मुब्तिला कर के अपने दामन से क़त्ले उस्मान के धब्बों को साफ़ कर लें।

दूसरे ये कि वो दुश्मनी और अदावत जो हज़रत अली (अ.स) की तरफ़ से आपके दिल में थी उसके इन्तिक़ाम के लिये भी ज़रूरी था कि वो इस मौक़े से फ़ायदा उठाते हुए मैदाने कारज़ार गर्म कर दें। अगर जंग में ये कामयाब हो जातीं तो उनकी सारी दिली मुरादें पूरी हो जातीं यानी हज़रत अली (अ.स) भी क़त्ल हो जाते और हुकूमत की बागडोर भी उनके हाथों में आ जाती।

क्यों कि आयशा , तल्हा , ज़ुबैर और माविया इन चारों में हर एक ये चाहता था कि वो इक़्तिदार का मालिक बने। हज़रत आयशा की सियासत ये भी कि अगर मैं किसी वजह से इक़्तिदार की मालिक न बन सकूं तो मेरी बहन का लड़का अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर इस मनसब पर फ़ाइज़ हो। यही वजह थी कि उस्मान के क़त्ल में उन्होंने अपना पूरा सियासी ज़ोर सर्फ़ कर दिया।

1. अल निसाबुल अशरफ़ः- जिल्द 5, पेज न. 68

2. अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 2, पेज न. 190

3. अल इमामत वल सियासतः-पेज न. 49, अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 3 पेज न. 188

4. अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 3 पेज न. 187

5. तारीख़े कामिलः- जिल्द 3, पेज न. 80

6. कामिलः- जिल्द 3 पेज न 80, तबरीः- जिल्द 3, पेज न. 173

7. अल इमामत वल सियासतः- पेज न. 54

अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) के ख़िलाफ़ आयशा का मौक़फ़

एक मुहक़्क़िक़ की जुस्तुजू हज़रत अली इब्ने अली तालिब अलैहिस्सलाम के ख़िलाफ़ आयशा के मौक़फ़ में अहले बैत से दुश्मनी और अदावत के अलावा और कुछ नहीं पाती ये भी एक मोज़िजा है कि आले रसूल (स.अ.) ख़ुसूसन हज़रत अली (अ.स) से आयशा की दुश्मनी और अदावत को तारीख़ ने क़यामत तक के लिए महफ़ूज़ कर लिया है। चुनान्चे बुख़ारी का बयान है कि हज़रत अली से आयशा का बुग़्ज़ो हसद इस नुक़्ताए उरूज पर था कि वो अमीरूल मोमिनीन का नाम लेना भी गवाराह नहीं करती थीं। ( 1)

अल्लामा एहसान उल्लाह गोरखपुरी ने अपनी तारीख़े इस्लाम में तहरीर किया है कि अली और फातेमा (स.अ) से आयशा का रश्को हसद मुख़तलिफ़ वाक़ेआत से गुज़र कर नफ़रत की हदों तक पहुंच गया था। ( 2)

इमाम अहमद बिन हम्बल का कहना है कि एक रोज़ अबू बकर रसूल अल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर हुए और बारयाबी की इजाज़त चाही लेकिन घर में दाख़िल होने से क़ब्ल उन्होंने आयशा की आवाज़ सुनी जो चीख़ चीख़ कर बुलन्द आवाज़ में पैग़म्बर (स.अ.व.व) से कह रहीं थी कि ख़ुदा की क़सम आप अली को मुझसे और मेरे बाप से ज़्यादा चाहते हैं। ( 3)

इब्ने अबुल हदीदे मोअतज़ेली का बयान है कि एक दिन रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) हज़रत अली (अ.स) के हमराह गुफ़्तुगू करते हुए जा रहे थे , आयशा उनके पीछे पीछे चल रही थीं , अचानक मोअज़्ज़मा की रग भड़क गयी और वो रसूल अल्लाह और अली के दरमियान हायल होते हुए कहने लगीं कि बस बहुत हो चुकी अब ख़त्म करो इस गुफ़्तुगू को आयशा की इस नाशाइस्ता हरकत पर रसूले अकरम बेहद ग़ज़बनाक हुए। ( 4)

मसरूफ से एक रिवायत है कि मैं उम्मुल मोमिनीन आयशा की ख़िदमत में हाज़िर था और उनसे मसरूफ़े गुफ़्तुगू था कि इतने में आयशा ने अब्दुर रहमान के नाम से अपने एक हब्शी ग़ुलाम को आवाज़ दी वो आकर खड़ा हो गया। आयशा ने मुझ से फ़रमाया कि मसरूफ़ तुम्हे मालूम है कि इस ग़ुलाम का नाम अब्दुर रहमान क्यों रखा ? मैं ग़ौर ही कर रहा था कि फिर फ़रमाया कि चूंकि अब्दुर रहमान इब्ने मुलजिम अली क़ा क़ातिल था इस लिये ये नाम मुझे बहुत अज़ीज़ है और मैं इस नाम से इन्तिहाई मोहब्बत करती हूं।

इस वाक़ेए को अल्लामा शेख़ मुफ़ीद (र) ने अपनी किताब अल जमल में तहरीर फ़रमाया है और उस में शेख़ अबू जाफ़रे तूसी (र) ने अपनी किताब अशशाफ़ी जिल्द 4 स. 158 पर नक़्ल किया है।

गुजश्ता सफ़हात में हम अहलेबैत से आयशा की अदावत के नाम से तहरीर कर चुके हैं कि हज़रत अली की शहादत पर आयशा ने शुक्र का सज्दा किया मसर्रतों शादमानी का इज़हार फ़रमाया और तरबिया अशआर पढ़े।

आप हसनैन अलैहेमुस्सलाम से पर्दा करती थीं और जब इमाम हसन (अ.स) की शहादत वाक़ेए हुए तो उनके जनाज़े को रसूल (स.अ.व.व) के रौज़े में दफ़्न नहीं होने दिया हद ये है कि ख़ुद खच्चर पर सवार हो कर निकल पड़ी और इमाम के जनाज़े पर इतने तीर बरसाये कि सत्तर तीर जसदे अतहर में पेवस्त हो गये।

(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)

ये वो तारीख़ी हक़ाएक़ हैं जिन से इन्कार की कोई गुन्जाइश नहीं है।

क़त्ले उस्मान के बाद जब ख़िलाफ़त हज़रत अली की तरफ़ मुनतक़िल हुई तो आप मक्के से मदीने की तरफ़ वापस आ रही थीं , रास्ते में मालूम हुआ कि अली की बैअत हो गई तो फ़रमाने लगीं कि मुझे आसमान का फट पड़ना गवारा है मगर अली का ख़लीफ़ा होना गवारा नहीं। फिर आप क़िसासे ख़ूने उस्मान का सहारा ले कर उठ खड़ी हुई , लशकर जमा किया जिसके नतीजे में एक ऐसी ख़ूंरेज़ हौलनाक और तबाह कुन जंग हुई जो तारीख़ में जंगे जमल के नाम से याद की जाती है।

1. सहीह बुख़ारीः- जिल्द 1 पेज न. 162, जिल्द 5 पेज न. 140

2. तारीख़े इस्लामः- पेज न. 258

3. मसनद अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 4 पेज न. 275

4. शरह नहजुल बलाग़ाः- जिल्द 9 पेज न. 195

जंगे जमल की तैयारियां और उसका पस मंज़र

दुनिया की ख़ूनी जंगों में जंगे जमल वो हौलनाक और हलाकत ख़ेज़ जंग है जो ख़िलाफ़ते अली के इब्तिदाई दौर में क़िसासे ख़ूने उस्मान के नाम से लड़ी गयी।

इस तबाहकुन और ख़ुंरेज़ जंग के अफ़सोसनाक नताइज और इफ़तेराक़ बैनल मुस्लिमीन की तमामतर मुजरिमाना ज़िम्मेदारियां हज़रत आयशा , तल्हा और ज़ुबैर पर आइद होती है जो इन्तिक़ामे ख़ूने उस्मान की आड़ में अमीरूल मोमिनीन बनने का जज़्बा ले कर तलवारों के साथ उठ खड़े हुए थे। हालांकि यही लोग उस्मान की ज़िन्दगी में उनके सख़्त मुख़ालिफ़ रहे , यहां तक कि इन्ही की कोशिश से तीसरे ख़लीफ़ा बड़ी बेदर्दी के साथ मौत के घाट उतार दिये गये।

उस्मान के ख़िलाफ़ लोगों को भड़काने उकसाने और वरग़लाने में हज़रत आयशा का किरदार बहुत ही अहम है। वो इस अम्र से बख़ूबी वाक़िफ़ थीं कि रसूले अकरम (स.अ.व.व) से वालिहाना अक़ीदत की बिना पर मुसलमान हुज़ूरे (स.अ.व.व) के जिस्मे अतहर से मस होने वाले वाक़िआत और आसार की ज़ियारत को तरस रहे हैं लिहाज़ा इन्ही वाक़िआत का तवस्सुल उस्मानी हुकूमत का तख़ता पलट देने के लिये काफ़ी है। जब ये चीज़े मुसलमानों के सामने रखी जायेंगी तो वो जज़्बात से मग़लूब होकर बेक़ाबू हो जायेंगे और उनके दिलों में एक हैज़ानी कैफ़ियत पैदा हो जायेगी।

हज़रत आयशा का ये हर्बा , यक़ीनन असरदार तरीन हर्बा था। चुनान्चे उन्होंने सरकारे दो आलम की नअलैने मुबारक और पैराहने अक़दस का सहारा लिया और ये दोनों चीज़े मुसलमानों के सामने रख कर माइल ब फ़रयाद हुई कि अभी ये चीज़ें कोहना भी नहीं होने पायीं कि उस्मान ने आं हज़रत (स.अ.व.व) की शरीअत को एकदम बदल कर रख दिया। काश ! इस नअसल को कोई क़त्ल कर दे क्यों कि ये काफ़िर हो गया है।

हज़रत आयशा की ये सियासी तदबीर किसी तरह सऊदी पेट्रोल से कम न थी। इसने उस्मान के ख़िलाफ़ सुलगती हुई चिंगारी को शोला बना दिया। आवाम में ग़मों ग़ुस्से की आग भड़क उठी , और मुख़ालेफ़ीन के बिखरे हुए सैलाब ने क़सरे ख़िलाफ़त को चारों तरफ़ से घेर लिया। जब आपने देखा कि मुख़ालिफ़ीनो मोहासेरीन की गिरफ़्त मज़बूत हो चुकी है तो ज़ैद इब्ने साबित , मरवान बिन हकम और अब्दुर रहमान बिन उताब की मिन्नत समाजत के बवजूद उस्मान को मुहासरे में छोड़ कर हज के बहाने से मक्के रवाना हो गयीं। सफ़र के दौरान भी उस्मान के ख़िलाफ़ आपका तब्लीग़ी अमल जारी रहा। चुनान्चे मदीने से कुछ दूर निकल कर सलसल के मक़ाम पर जब आपकी मुलाक़ात इब्ने अब्बास से हुई जो अमीरे हज की हैसियत से मक्के जा रहे थे तो आपने उनसे भी फ़रमायाः-

ऐ इब्ने अब्बास ! ख़ुदा ने तुम्हे क़ुव्वते गोयाई अता की है तो लोगों को उस्मान की मदद से रोको और उनके बारे में उन्हें शको शुबहे में मुब्तिला करो रास्ता हमवार हो चुका है , मुख़ालिफ़ शहरों से लोग फ़ैसलाकुन अम्र के लिए मदीने में जमा हो चुके हैं। तल्हा ने बैतुल माल की कुंजियों पर क़ब्ज़ा कर लिया है अगर वो ख़लीफ़ा हो गये तो अपने इब्ने अम अबूबकर की सीरत पर अमल करेंगें। ( 1)

हज़रत आयशा की इस गुफ़्तुगू से ये अम्र पोशीदा नहीं रह जाता कि वो उस्मान के बाद तल्हा की ख़िलाफ़त का ख़्वाब देख रहीं थी और उनके ज़रिये इक़तिदार का रूख़ भी अपने ख़ानदान की तरफ़ मोड़ना चाहती थीं।

उस्मानी अहदे हुकूमत के इब्तिदाई छः सालों में हज़रत आयशा उस्मान की ख़ैरख़्वाह , हमनवा , तरफ़दार और मोईनों मददगार रहीं मगर उसके बाद मुख़ालिफ़ हो गयीं मुख़ालिफ़त की वजह ये बयान की जाती है कि हज़रत उमर ने अपने दौरे हुकूमत में अज़्वाजे रसूल का वज़ीफ़ा दस हज़ार मुक़र्रर किया था , लेकिन आयशा को तरजीही बुनियाद पर बारह हज़ार मिलता था।

उस्मान ने दो हज़ार कम करे उनका वज़ीफ़ा भी दीगर अज़्वाज के बराबर कर दिया था। जैसा कि याक़ूबी का कहना है किः-

हज़रत उस्मान और आयशा के दर्मियान मुख़ालिफ़त की वजह ये थी कि उस्मान ने उनका वज़ीफ़ा जो हज़रत उमर उन्हें दिया करते थे कम कर दिया। ( 2)

हज़रत उस्मान और उनके उम्माल की आमिराना रविश की वजह से सहाबा का एक गिरोह पहले ही से उस्मान का मुख़ालिफ़ था। मुस्तजाद ये कि आयशा की इश्तेआल अंगेज़ी ने उसे और हवा दी यहां तक कि उस मुख़ालिफ़त ने ज़ोर पकड़ लिया और लोग उस्मान के ख़िलाफ़ सरगर्मे अमल हो गये ख़ुसूसन तल्हा इब्ने उबैदुल्लाह और उनका क़बीला बनी तैम इस मुख़ालिफ़त में पेश पेश रहा जिसकी क़ाएद हज़रत आयशा थीं। उन लोगों ने क़त्ले उस्मान के असबाब फ़राहम करने में कोई कसर उठा नहीं रखी। बलाज़री रक़म तराज़ है किः-

तल्हा से बढ़ कर हज़रत उस्मान पर सख़्तगीर कोई नहीं था। ( 3)

तल्हा ने अपनी हिकमते अमली से मुहासेरीन में जोशो ख़रोश पैदा कर के उस्मान पर मुहासरे को मज़ीद तंग किया। उन पर पानी बन्द किया। रात के अन्धेरे में क़सरे ख़िलाफ़त पर तीरों की बारिश की और अब्दुर रहमान बिन अदबस को इस अम्र पर मजबूर किया कि वो उनके घर आने जाने वालों पर पाबन्दी आएद कर दें। चुनान्चे उस्मान को इन बातों का इल्म हुआ तो उन्होंने कहाः-

परवर दिगार मुझे तल्हा के शर से महफ़ूज़ रखे इसी ने लोगों को मेरे ख़िलाफ़ भड़काया है और मेरे गिर्द घेरा डलवा दिया। ( 4)

उस्मान के क़त्ल हो जाने के बाद तल्हा के रवय्ये में फ़र्क़ न आया। उनकी लाश पर पत्थर बरसाये और उन्हें जन्नतुल बक़ी में दफ़्न न होने दिया और यही हालत ज़ुबैर की भी थी कि वो मुहासेरीन के दर्मियान आयशा की इस बात को दोहराते रहते थे किः-

उस्मान को क़त्ल कर दो उसने तो तुम्हारे दीन ही को बदल दिया। ( 5)

यही वो लोग थे जिन्होंने क़त्ले उस्मान की बुनियाद रखी , और उनके ख़िलाफ़ ऐसी फ़ज़ा पैदा कर दी कि जिसके नतीजे में वो क़त्ल कर दिये गये। अगर उस्मान का क़त्ल वाक़ई जुर्म था तो ये लोग उस जुर्म से बरी हरग़िज़ नहीं क्यों कि क़ातिलों और मुजरिमों की मदद और पुश्त पनाही भी जुर्म है।

हज़रत आयशा को अपनी कामयाबी का यक़ीन था उनका बोया हुआ बीज फल ज़रूर देगा इस लिये वो क़त्ले उस्मान से बीस दिन पहले ही इस ख़्याल के तहत मदीने से खिसक लीं कि दुनिया उनको तमाम हंगामा आराइयों से बेताल्लुक़ तसव्वुर करे और जब उस्मान का काम तमाम हो जाये तो वो तल्हा या ज़ुबैर को बरसरे इक़्तिदार लाकर उस माली नुक़्सान की तलाफ़ी कर सके जो मौजूदा हुकूमत से उन्हें पहुंचा है। मगर वो अपने इस मक़सद में कामयाब न हो सकीं और उनकी अहम मौजूदगी में ही मुसलमानों ने हज़रत अली की ख़िलाफ़त का फ़ैसला कर लिया।

हज़रते उस्मान ने जो शूरा क़ायम किया था उसके रूक्न तल्हा और ज़ुबैर भी थे इस लिये उनका ज़हन भी ख़िलाफ़त के तसव्वुर से ख़ाली नहीं था , चुनान्चे क़त्ले उस्मान के सिलसिले की तमाम तर कोशिशें इसी मक़सद के हुसूल का नतीजा थीं मगर उन लोगों ने जब ये देखा कि लोग हज़रत अली की ख़िलाफ़त पर बज़िद हैं और उनके अलावा किसी की बैअत पर रज़ामन्द नहीं हैं तो उन लोगों ने भी राय आम्मा का रूख़ देख कर पेश क़दमी की और हज़रत अली की बैअत कर ली और दूसरे ही दिन ये मुतालिबा किया कि उन्हें कूफ़ा और बसरा की अमारत दे दी जाये। लेकिन हज़रत आली ने ये गवारा न किया कि उन इलाक़ों को जो हुकूमत के मुहासिल का सरचश्मा हैं उनकी बढ़ती हुई हिर्सो हवस की आमाजगाह बनने दें। चुनान्चे आपने ये कह कर इन्कार कर दिया की मैं तुम्हारे मामलात में जो बेहतर होगा वो करूगां , फ़िलहाल तुम दोनों का मेरे पास ही मरकज़ में रहना ज़्यादा बेहतर है।

तल्हा और ज़ुबैर समझ रहे थे कि कूफ़ा और बसरा में उनके असरात हैं और उन्हीं की आवाज़ पर वहां के लोग उस्मानी हुकूमत में इन्क़िलाब बरपा करने की ग़रज़ से जमा हुए थे इस लिये अमीरूल मोमिनीन उन असरो रूसूख़ से मुतास्सिर हो कर उन्हें कूफ़े और बसरे की हुकूमत का परवाना लिख देंगे। मगर मायूसी के अलावा उन्हें और कुछ हासिल न हुआ और उन्होंने समझ लिया कि अली (अ.स) के होते हुए उन्हें न तो मनमानी करने का मौक़ा फ़राहम होगा और न ही वो ख़ुसूसी मुराआत हासिल होंगी जो सबका हुकूमतों में हासिल थीं लिहाज़ा उन्होंने अपने मक़ासिद की तकमील के लिए ग़ैर आईनी ख़ुतूत पर सोचना शुरू किया और अपनी तवज्जो का रूख़ आयशा की नक़्लों हर्कत की तरफ़ मोड़ दिया ताकि उनके अज़ाइम की रौशनी में मुस्तक़बिल का प्रोगाम तरतीब दें।

हज़रत आयशा ये चाहती थीं कि उस्मान के क़त्ल के बाद , तल्हा को बरसरे इक़तिदार लायें और इस तरह ख़िलाफ़त को मुस्तक़िलन अपने क़बीले बनी तैम में मुन्तक़िल कर दें इस लिये की मक्के में क़याम के दौरान बलवाइयों की यूरिश का नतीजा मालूम करने के लिये बेचैन रहती थीं और हर आने जाने वाले से मदीने के हालात और उस्मान के अंजाम के बारे में मालूम करती रहती थीं। इसी अस्ना में मदीने से अख़ज़र नामी एक शख़्स मक्के आया। हज़रत आयशा ने उसे बुलवाकर पूछा कि मदीने की शोरिश अंगेज़ी का क्या नतीजा हुआ ? उसने कहा कि हज़रत उस्मान ने मिस्र के बलवाइयों को मौत के घाट उतार दिया है और शोरिशो हंगामें पर क़ाबू पा लिया है। इस ख़बर ने उनके सारे ख़्यालात का शीराज़ा दरहम बरहम कर दिया , उन्होंने तास्सुफ़ आमेज़ लहजे में कहाः-

इन्ना लिल्लाहे व इन्ना एलैहे राजेऊन ! क्या उन लोगों को उस्मान ने क़त्ल कर दिया जो अपना हक़ मांगने और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बलन्द करने की ग़रज़ से गये थे ? ख़ुदा की क़सम हम इस पर राज़ी नहीं हैं। ( 6)

अभी आयशा अफ़सुर्दगी की हालत में थी कि एक दूसरे शख़्स ने आकर ये इत्तिला दी कि अख़ज़र की बातें ग़लत हैं मिस्रियों में से कोई क़त्ल नहीं हुआ , वो खुले बन्दो मदीने में दनदनाते हुए फिर रहे हैं , अलबत्ता हज़रत उस्मान उन लोगों के हाथों मारे गये हैं। ये सुन कर उम्मुल मोमिनीन पर मसर्रतो शादमानी तारी हो गयी और उन्होंने मुस्कुराते हुए फ़रमायाः-

ख़ुदा उसे अपनी रहमत से दूर रखे , वो अपने करतूतों को पहुंच गया। ( 7)

इस ख़बर के बाद हज़रत आयशा के लिए मदीने जाना ज़रूरी हो गया ताकि तल्हा की ख़िलाफ़त का रास्ता हमवार करें और फ़िज़ा को उनके लिए अपने असरात से साज़गार बनायें।

चुनान्चे उन्होंने फ़ौरन सामाने सफ़र बांधा और मदीने की तरफ़ चल पड़ीं। लेकिन अभी मक्के से तक़रीबन 10 किलोमीटर का फ़ासला तय किया होगा कि सर्फ़ के मक़ाम पर उबैदुल्लाह इब्ने अबी सलमा से मुलाक़ात हुई। आपने उस्मान और मदीने के सियासी हालात के बारे में उस से दर्याफ़्त किया। उसने कहा हज़रत उस्मान क़त्ल कर दिये गये हैं पूछा , फिर क्या हुआ ? कहा ! मुसलमानों ने हज़रत अली की बैअत कर ली है। ये सुनते ही ज़मीन पैरो तले से ख़िसकने लगी और आसमान धुंवा बन कर उड़ता नज़र आने लगा। कानों को यक़ीन न आया तो फिर पूछा कि क्या वाक़ई अली की बैअत हो गयी है। भला उनसे ज़्यादा मसनदे ख़िलाफ़त का मुस्तहक़ और सज़ावार कौन था ? अब आयशा के लिये अपने जज़्बात पर क़ाबू रखना मुशकिल हो गया। तेवराकर गिरने ही वाली थीं कि बेसाख्ता उनकी ज़बान से निकलाः-

काश ये आसमान मुझ पर फट पड़े और मैं उसमें समा जांऊ। ( 8)

ग़रज़ कि मुअज़्ज़मा उल्टे पैरों मक्के की तरफ़ पलट पड़ी और रंजोग़म के स्टेज पर इन अलफ़ाज़ के साथ एक नया ड्रामा शुरू कर दियाः-

ख़ुदा की क़सम उस्मान मज़लूम मारे गये , मैं उनके ख़ून का इन्तिक़ाम ले कर रहूंगी। ( 9)

अब्दुल्लाह इब्ने अबी सलमा इस मुतज़ाद तर्ज़े अमल को देख कर हैरत और इस्तेजाब के दरिया में ग़र्क़ हो गया उसने आयशा से कहाः-

आप तो बार बार ये कहा करती थी कि इस नअस्ल को क़त्ल कर डालो ये काफ़िर हो गया है। ( 10)

अब ये तब्दीली कैसी ? कहाः-

हां ! पहले मैं यही कहा करती थी लेकिन अब ये मेरी राय पहली राय से ज़्यादा बेहतर है। हज़रत आयशा की इस बात से उबैद मुतमइन न हो सके। चुनान्चे उन्होंने कहा कि ऐ उम्मुल मोमिनीन ! ख़ुदा की क़सम ये इन्तिहाई बौदा उज़्र है। ( 11)

उसके बाद उबैद इब्ने अबी सल्मा ने हज़रत आयशा को मुख़ातिब कर के अरबी में कुछ शेर पढ़े , जिनका उर्दू तर्जमा हस्बे ज़ैल है।

1. आप ही ने पहल की आप ही ने मुख़ालिफ़त के तूफ़ान उठाये और अब आप अपना रंग बदल रही हैं।

2. आप ही ने ख़लीफ़ा के क़त्ल का हुक्म दिया और हम से कहा कि वो काफ़िर हो गया।

3. हमने माना की आपके हुक्म की तामील में ये क़त्ल हमारे हाथों से हुआ , मगर हमारे नज़्दीक अस्ल क़ातिल आप हैं जिस ने क़त्ल का हुक्म दिया।

4. (सब कुछ हो गया) मगर न आसमान हमारे ऊपर फट पड़ा और न चांद , सूरज को गहन लगा।

5. और लोगों ने उसकी बैअत कर ली जो क़ुव्वतों शिकोह से दुश्मनों को हकाने वाला है , तलवारों की धारों को क़रीब फ़टकने नहीं देता और गर्दन कशों के बल निकाल देता है।

उम्मुल मोमिनीन चूंकि जल्द अज़ जल्द मक्के पहुंच जाना चाहती थीं , इस लिये उन्होंने उबैद के अशआर पर कोई तवज्जो नहीं दी और आगे बढ़ गयीं। जब मक्के वापस पहुंची तो लोगों ने कहाः-

ऐ उम्मुल मोमिनीन ! अभी तो आप रवाना हुई थीं आख़िर पलट क्यों आयीं ? बोलीः-

उस्मान बेगुनाह मारे गये , मैं उनका ख़ून राएगां नहीं जाने दूंगी और उस वक़्त तक वापस नहीं जाऊंगी जब तक उनके ख़ून का इन्तिक़ाम नहीं ले लूंगी।

लोग उनकी साबेक़ा और मौजूदा रविश के तज़ाद पर सख़्त हैरान हो गये मगर कुछ कहने के बजाय ख़ामोश रहे। ग़रज़ कि आयशा ने उस्मान की मज़लूमियत का ढिडोंरा पीट पीट कर मक्के ही में हज़रत अली के ख़िलाफ़ एक मज़बूत महाज़ क़ायम कर लिया और जब तल्हा और ज़ुबैर को मालूम हुआ कि उनकी मादरे गिरामी मक्के में उस्मान की मज़लूमियत का प्रचार कर रही हैं और अली को उनके क़त्ल का ज़िम्मेदार ठहरा रही हैं तो उन्होंने अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर को चन्द ख़ुतूत के साथ चुपके से आयशा के पास मक्के रवाना किया और उस पर ज़ोर दिया कि वो क़िसासे ख़ूने उस्मान की तहरीक चलायें और जिस तरह मुम्किन हो मज़ीद लोगों को अली की बैअत से बाज़ रखें। इन पैग़ामात ने उनके इरादों को और मज़बूत किया और उन्होंने पूरे जोशो ख़रोश और ज़ोर शोर से क़िसासे उस्मान के नाम पर लोगों को दावत देना शुरू कर दी। चुनान्चे सब से पहले अब्दुल्लाह इब्ने आमिर ने जो उस्मान की तरफ़ से मक्के का गवर्नर था उनकी आवाज़ पर लब्बैक कही और सईद इब्ने आस और वलीद इब्ने उक़्बा भी उनके हमनवा बन गयें।

तल्हा और ज़ुबैर क़िसासे उस्मान की आड़ में हंगामा खड़ा कर के अपनी महरूमी और नाकामी का बदला लेना चाहते थें लेकिन मदीने की फ़ज़ा इस हंगामा आराई के लिए साज़गार न थी क्यों कि क़त्ले उस्मान के सिलसिले में अहले मदीना उनका किरदार देखे हुए थे। अलबत्ता मक्के में तहरीक कामियाब हो सकती थी क्यों कि उम्मुल मोमिनीन के अलावा साबिक़ा गवर्नरे मक्का मरवान बिन हकम और मदीने से निकल खड़े होने वाले दीगर बनी उमय्या वहां जमा हो गये थे। चुनान्चे उन दोनों (तल्हा ज़ुबैर) ने भी मक्का जाने का फ़ैसला किया और अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) से कहा कि हम लोग उमरा की नीयत से मक्के जाना चाहते हैं। लिहाज़ा हमें इजाज़त मरहमत फ़रमाये। अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली उनके तेवरों को फ़ौरन भांप गये कि ये लोग बैअत की जकड़ बन्दियों से निकल कर अपनी जोलानियों और शोरिशों का मरकज़ मक्के को बनाना चाहते हैं चुनान्चे आपने फ़रमायाः-

ख़ुदा की क़सम उनका इरादा उमरा का नहीं है कि ये लोग ग़द्दारी और फ़रेबदारी पर उतर आये हैं। ( 12)

अमीरूल मोमिनीन ने उन्हें समझाया कि तुम लोगों का मक्के जाना मुनासिब नहीं है मगर ये लोग बराबर इसरार करते रहे और अपनी ज़िद पर अड़े रहे बिल आख़िर हज़रत ने उन से दूबारा बैअत ले कर उन्हें मक्के जाने की इजाज़त दे दी और ये लोग भी मक्के पहुंच कर हज़रत आयशा की जमाअत के सरगर्म मिम्बर बन गये और बाक़ायदा क़िसास की मुहिम शुरू कर दी।

इस मुहिम को कामयाब बनाने के लिये सरमाये की ज़रूरत भी थी , उसका हल यूं निकल आया कि बसरा का माज़ूल हाकिम अब्दुल्लाह इब्ने आमिर बैतुलमाल की सारी पूंजी ले कर मक्के पहुंच गया और यमन से यअली इब्ने उमय्या छः लाख दिरहम और छः सौ ऊंट अपने साथ लाया और ये तमाम सरमाया जंगी इख़राजात के लिये महफ़ूज़ कर दिया गया।

अबुल फ़िदा ने तहरीर किया किः-

यअली तमाम पूंजी समेट कर निकल खड़ा हुआ और मक्के पहुंच कर आयशा तल्हा और ज़ुबैर के साथ हो गया और वो माल उनकी तहवील में दे दिया। ( 13)

अहले मक्का से भी सरमाया फ़राहम किया गया और माली एतबार से लोग मुतमइन हो गये। जंग तो बहरहाल एक तय शुदा अम्र थी मगर रज़्मगाह की तजवीज़ में फ़िक्रे लड़ी हुई थीं। चुनांचे हज़रत आयशा की रिहाइशगाह पर एक मीटिंग रखी गयी जिसमें सब लोग शरीक हुए। उम्मुल मोमिनीन की तजवीज़ थी कि मदीने पर हमला कर के उसे तराज़ो मिसमार किया जाये मगर कुछ लोगों ने इसकी मुख़ालिफ़त की और कहा कि अहले मदीना से जंग एक मुश्किल मरहला होगी लिहाज़ा किसी और मक़ाम को मरकज़ बनाना चाहिये। कुछ लोगों ने ये मशवरा भी दिया कि शाम को महाज़े जंग क़रार दिया जाये। इस पर इब्ने आमिन ने कहा कि माविया के होते हुए शाम में तुम्हारी ज़रूरत नहीं है। ( 14)

शाम को महाज़ क़रार देने ये शायद ये अम्र भी माने था कि माविया जिसने उस्मान का मातहत होते हुए भी उनकी मदद से गुरेज़ किया था , वो इन लोगों की मदद पर क्यों आमादा होता ? फिर जिसने हज़रत अली की ख़िलाफ़त को क़ुबूल न किया हो वो इन लोगों की कामयाबी के बाद तल्हा और ज़ुबैर की ख़िलाफ़त को क्यों कर तस्लीम करता ?

बेशक माविया इन लोगों का हमनवा था मगर उसी हद तक कि जिस हद तक हज़रत अली को इक़तिदार से हटाने का ताल्लुक़ हो।

आख़िरकार बड़ी रद्दोक़द और सोच विचार के बाद महाज़े जंग के लिए बसरा की सरज़मीन का इन्तिख़ाब अमल में आया। बसरा को महाज़े जंग बनाने में जहां ये मसलेहत कार फ़र्मा थी कि वहां उनके हमनवा कसरत से मौजूद थे जो जंग में उनका साथ देते वहां से फ़ायदा भी मद्देनज़र था कि हिजाज़ के एक तरफ़ शाम है जहां माविया की हुकूमत है और दूसरी तरफ़ इराक़ है। अगर इराक़ पर तसल्लुत क़ायम रह जायेगा जिसके बाद अमीरूल मोमिनीन की सिपाह को बआसानी ज़ेर करके इक़तिदार पर क़ब्ज़ा किया जा सकता है या इन दोनों ताक़तों के ज़ेरे असर उन्हें रखा जा सकता है लेकिन ये महज़ उन लोगों की ख़ाम ख़्याली थी क्यों कि साहेबे ज़ुल्फ़िक़ार से मुक़ाबिला उनके इमकान से क़तई बाहर था।

इन तमाम बातों से ये अन्दाज़ा भी होता है कि आयशा और उनके हमनवाओं के पेशेनज़र ख़ूने उस्मान का क़िसास था ही नहीं। अगर क़िसास मक़सूस होता तो ये लोग बसरा को महाज़े जंग बनाने के बजाय मदीने ही को अपनी तख़रीब कारियों की आमाजगाह बनाते जो हज़रत आय़शा की साबेक़ा जौलानियों का मसकन भी था और जहां उस्मानी हादसे के ज़िम्मेदार अफ़राद भी काफ़ी तादाद में मौजूद थे।

1. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 434

2. तारीख़े याक़ूबीः- जिल्द 2 पेज न. 132

3. अल निसाबुल अशरफ़ः- जिल्द 1 पेज न. 113

4. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 411

5. इब्ने अबिल हदीद मोअतज़ेलीः- जिल्द 2 पेज न. 404

6. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 468

7. शराह इब्ने अबिल हदीदः- जिल्द 2 पेज न. 77

8. तारीख़े कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 105

9. तारीख़े कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 105

10. कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 105

11. अल इमामत वल सियासतः- जिल्द 1 पेज न. 52

12. तारीख़े याक़ूबीः- जिल्द 2 पेज न. 156

13. अबुल फ़िदाः- जिल्द 1 पेज न. 172

14. तबरीः- ज 3 पेज न. 434

आयशा की छलांग

रसूल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम का ये दस्तूर था कि आप (स.अ.व.व) जब किसी सफ़र या मुहिम से पलट कर वापस आते तो सबसे पहले मस्जिद में जा कर दो रकअत नमाज़ अदा करते थे , फिर उसके फ़ौरन बाद अपनी ग़मगुसार बेटी हज़रत फातेमा ज़हरा सल्वातुल्लाहे अलैहा के दौलत सरा पर तशरीफ़ ले जाते उनका हाल मालूम करते , ख़ैरियत दर्याफ़्त करते और उनसे अपने सफ़र की सरगुज़श्त बयान फ़रमाते। उसके बाद नवासों से दिल बहलाते , उन्हें प्यार करते और कुछ देर वहां आराम फ़रमाते। इन तमाम बातों से फ़राग़त के बाद फिर आप (स.अ.व.व) उम्मुहातुल मोमिनीन की तरफ़ मुतवज्जे होते और एक एक के घर जाकर उनकी ख़ैरियत से आगाह होते।

हज़रत आयशा के लिए सरकारे दो आलम सल्लल्लाहे अलैहे व आले ही वसल्लम का ये तौरो तरीक़ा इन्तेहाई तकलीफ़ हद , अज़ीयत , आमेज़ और क़र्बो इज़तिराब का बाइस होता चुनान्चे आप (स.अ.व.व) अकसरो बेशतर इस नाक़ाबिले बर्दाश्त तौरो तरीक़े के बारे में पैग़म्बर (स.अ.व.व) से शिकवा शिकायत और झक झक बक बक करती रहती थीं और कभी कभी तक़रार की नौबत भी आ जाती थी।

ये भी इत्तेफ़ाक़ था कि शहज़ादिये कौनेन (स.अ) और आयशा के घर एक दूसरे से मुत्तसिल थे , दर्मियान में सिर्फ़ एक दीवार हायल थी , और उस दीवार में एक मुख़तसर सी खिड़की थी जिसका नाम ख़ोफ़ा था। आं हज़रत (स.अ.व.व) कभी कभी उसी खिड़की से आयशा के घर से हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) के घर में चले जाते थे और कभी मासूमा (स.अ) के घर से आयशा की तरफ़ आ जाते थे।

निस्फ़े शब से कुछ पहले , एक मरतबा पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) कहीं से तशरीफ़ लाए और हस्बे दस्तूर अपनी बेटी के घर गये। जनाबे फातेमा (स.अ) से गुफ़्तुगू के दौरान हुज़ूर (स.अ.व.व) की आवाज़ आयशा के कानों से टकराई बस फिर क्या था ? जवानी की उमंगे करवटें लेने लगी , बिस्तर से उठ कर बैठ गयीं....... ग़ालेबन वो शब आपकी बारी थी इस लिए कुछ देर तक हुज़ूर (स.अ.व.व) के आने का इन्तिज़ार करती रहीं फिर न जाने क्यों आप पर यक़ बारगी ऐसी जुनूनी कैफ़ियत तारी हो गयी कि आप झपट कर उठीं और दर्मियानी खिड़की खोल कर आपने मासूमा (स.अ) के घर में छलांग लगा दी और आस्तीने समेट समेट कर फातेमा ज़हरा (स.अ) और रसूले अकरम (स.अ.व.व) से लड़ने लगीं।

आयशा की इस नाशइस्ता हरकत पर सैय्यद फातेमा (स.अ) बेहद रंजीदाह व मुलूल हुई और पैग़म्बर के दिल को भी इन्तेहाई सदमा हुआ। शहज़ादी फातेमा (स.अ) की ख़्वाहिश पर दूसरे ही दिन आं हज़रत (स.अ.व.व) ने वो खिड़की बन्द करा दी( 1) ताकि आयशा की अचानक छलांग का ख़तरा आइन्दा न रहे।

1.जज़बुल क़ुलूबः- पेज न. 157, कलकत्ता

रसूल (स.अ.व.व) का पीछा करना

पैग़म्बर (स.अ.व.व) का ये उसूल मुअय्यन था कि आप अपनी अज़्वाज में हर ज़ौजा के यहां उसकी बारी की शब इस्तेराहत फ़रमाते थे , कभी कभी ऐसा भी होता था कि किसी ज़रूरत के तहत या इबादत की ग़रज़ से आपको कुछ देर के लिए बाहर भी जाना पड़ता था और किसी बीवी की ये मजाल न थी कि वो रसूल (स.अ.व.व) के इस फ़ेल पर लबकुशाई कर सके लेकिन आयशा की बारी में जब आप कहीं गये तो वो ये समझीं कि आं हज़रत (स.अ.व.व) मुझे छोड़ कर किसी दूसरी बीवी के पास चले गये हैं।

फिर आयशा ने क्या तर्ज़े अमल इख़्तियार किया इस ज़िम्न में ख़ुद मौसूफ़ा ने मुख़तलिफ़ लोगों से जो मुख़तलिफ़ बातें की हैं उन्हें हम उन की ज़बान में नक़ल कर रहे हैं फ़रमाती हैं किः-

मैंने (अपने बिस्तर पर) एक मरतबा पैग़म्बर (स.अ.व.व) को न पाया मैं समझी कि आप किसी कनीज़ के यहां तशरीफ़ ले गये हैं मैं आपकी जुस्तुजू में निकल पड़ी देखा कि आप मस्जिद में हैं और फ़रमा रहे हैं कि परवरदिगार मुझे बख़्श दे।( 1)

ये आपने हेलाल बिन यसाफ़ से फ़रमाया। फिर आपने अबू मलीका से फ़रमाया किः-

एक रात मैंने पैग़म्बर (स.अ.व.व) को अपने बिस्तर पर न पाया , मैं समझी कि वो अपनी किसी बीवी के पास चले गये हैं तलाश में निकली तो देखा कि आप हालते रूकू में हैं।( 2)

अबू हुरैरा से बयान फ़रमाया किः-

मैंने एक मरतबा पैग़म्बर (स.अ.व.व) को अपने बिस्तर पर न पाया तो इधर उधर ढूंढा मेरा हाथ आपकी तलवार पर पड़ा आप सजदे में थे और इस्तिग़फ़ार फ़रमा रहे थे।( 3)

मज़कूरा तीनों बयानात में हर बयान की नौइय्यत मुख़तलिफ़ है जिससे आयशा की सदाक़त का पता चलता है। अब आप मुअज़्ज़मा की ज़बानी पूरी हिकायत समाअत फ़रमायेः-

जब मेरी बारी की वो रात आई जिस रात पैग़म्बर (स.अ.व.व) को मेरे पास होना चाहिये था आप तशरीफ़ ले आये रिदा उतार कर रखी जूतियां पैरों के पास ही उतारी , बिस्तर पर अपनी चादर डाली और लेट गये थोड़ी देर बाद आपको यक़ीन हो गया कि मैं सो रही हूं तो चुपके से उठे दोश पर रिदा डाली , नालैन पहली आहिस्ता से दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गये और मैं ख़ामोश सब कुछ देखती रही। फिर मैं भी तेज़ी से उठी और चादर औढ़ कर पैग़म्बर (स.अ.व.व) के तअक़्क़ुब मैं पीछे पीछे चल पड़ी आं हज़रत (स.अ.व.व) बक़ीअ के क़ब्रस्तान तक गये और कुछ देर वहां खड़े रहे फिर आपने तीन मरतबा अपने हाथ को बुलन्द किया और पलट पड़े मैं भी वापस हुई पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने तेज़ क़दम उठाये ये भी तेज़ क़दमों से चलने लगीं। फिर आप दौड़ने लगे मैं भी दौड़ने लगी और इस क़दर तेज़ दौड़ी कि उन से पहले पहुंच कर अपने बिस्तर पर चुपचाप लेट गयी।

मेरे बाद जब आं हज़रत (स.अ.व.व) तशरीफ़ लाये तो उन्होंने मुझ से पूछाः- ऐ आयशा तुम्हारी सांसे क्यों फूल रहीं हैं ? मैंने कहा नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं , उस पर आपने फ़रमाया कि तुम सच सच पताओगी , कि ख़ुदा को बताना पड़ेगा।

फिर मैंने तअक़्क़ुब का सारा क़िस्सा पैग़म्बर (स.अ.व.व) से बयान कर दिया तो आपने फ़रमायाः-

अच्छा मेरे आगे जो साया था वह तुम थीं ?

मैंने कहा हां , उस पर हुज़ूर (स.अ.व.व) ने मेरी पीठ पर एक हाथ मारा और फ़रमाया किः-

क्या तुम्हे ये गुमान था कि ख़ुदा और उसका रसूल तुम्हारी हक़ तल्फ़ी करेंगे।( 4)

हज़रत आयशा के इन मुख़तलिफ़ बयानात पर ग़ौर करने से हस्बे ज़ेल उमूर का पता चलता हैः-

1. हेलाल बिन यसाफ़ , अबूमली का और अबू हुरैरा से बयान कर्दह रवायतों में रसूल का अमल तज़ाद की मन्ज़िल में हैं , आं हज़रत (स.अ.व.व) रूकू में थे , सजदे में थे या इस्तिग़फ़ार फ़रमा रहे थे ? वल्लाहो आलम , इसकी ज़िम्मेदारी आयशा पर आइद होती है।

2. आयशा को पैग़म्बर पर भरोसा और इत्मीनान नहीं था इस लिए आप आं हज़रत (स.अ.व.व) की ख़ुफ़िया निगरानी किया करती थी।

3. आयशा किसी उलझन का शिकार रहती थीं जिसकी वजह से आपको नींद नहीं आती थी।

4. आयशा इस तअक़्क़ुब में रसूल के नज़दीक एक सियाह साया थीं।

1. मसनद इमाम अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 6 पेज न. 147

2. मसनद अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 6, पेज न. 151

3. मसनद अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 6, पेज न. 201

4. मसनद अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 6 पेज न. 221

आयशा पर शैतान

ख़ुद आयशा का बयान है किः-

रसूलल्लाह (स.अ.व.व) एक रात मेरे पास से उठ कर कहीं चले गये तो मुझ पर जुनून तारी हो गया थोड़ी देर बाद आप वापस आये और मेरे जुनून को देखा तो फ़रमाया , ऐ आयशा , तुम्हे क्या हो गया है ? ये बदगुमानी , मैंने कहा , मैं आप जैसे इन्सान की तलाश क्यों न करूं ? रसूल ने फ़रमायाः-

क्या तुम पर शैतान सवार हो गया है ?(1)

हज़रत आयशा पर तसकीने नफ़्स का भूत सवार था या किसी और बात का इसकी सराहत नहीं है। लेकिन इस अम्र में कोई शको शुबहे नहीं है कि जब उन पर शैतान होता था बल्कि उनके अन्दर हुलूल कर जाता था तो मोहतर्मा से अजीबो ग़रीब हरकते सरज़द होती थीं जैसे बरतनों को तोड़ना , लिबास का फ़ाड़ना वग़ैरह।

1.मसनद अहमद बिन हम्बल जिल्द 6 पेज न. 115

तोड़ फोड़

हज़रत आयशा पर जब हसद का इब्लीस सवार होना था तो आप जुनून की हद से गुज़र कर तोड़ फोड़ पर भी उबर आती थीं। चुनांचे आपकी बारी के दिन अज़्वाजे रसूल (स.अ.व.व) में किसी ने अगर कोई अच्छी चीज़ पकाई और रसूल (स.अ.व.व) की ख़िदमत में भेजी तो आपने कभी उसके बरतन तोड़ दिये और कभी वो खाना रसूल के सामने से उठा कर फ़िकवा दिया। इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में जनाबे उम्मे सलमा से रवायत की है किः-

उम्मे सलमा पैग़म्बर (स.अ.व.व) के पास एक प्याले में खाने की कोई चीज़ ले कर हाज़िर हुई , हज़रत आयशा की नज़र पड़ी उनके हाथ में पत्थर था उस पत्थर से उन्होंने उस प्याले को तोड़ दिया। पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने आयशा का प्याला उम्मे सलमा के हवाले कर दिया। ( 1)

तोड़ फोड़ के बारे में खुद हज़रत आयशा का बयान है किः-

मेरी बारी थी , मैंने रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के लिए खाना पकाया और हफ़सा ने भी उनके लिए माहज़र का इन्तिज़ाम किया। मुझे जब यह मालूम हुआ कि हफ़सा ने भी खाना पकाया है तो मैं खौलने लगी कनीज़ को बुलाया और उससे कहा कि अगर हफ़सा ने रसूल (स.अ.व.व) के सामने खाना ला कर रख दिया है तो जाओ और उसे उठा कर फेंक दो। चुनान्चे कनीज़ ने ऐसा ही किया और वो खाना उठा कर फेंका तो बरतन टूट गया। उस पर पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने हफ़सा से फ़रमाया कि तुम अपने बरतन के बदले में दूसरा बरतन आयशा से वसूल कर लो।( 2)

ऐसा ही वाक़िआ उम्मुल मोमिनीन सफ़ीया के साथ भी पेश आया। आयशा बयान फ़रमाती हैं किः-

रसूलल्लाह (स.अ.व.व) मेरे यहां हमपाश थे कि सफ़ीया ने उनके लिए खाना भेजा। मैंने जब कनीज़ को खाना लाते देखा तो मुझ पर लर्ज़ा तारी हो गया। मैंने हाथ मार कर प्याला इस तरह उछाला कि वो टूट गया और सारा खाना गिर कर बरबाद हो गया। रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने मुझे घूर कर ग़ज़बनाक निगाहों से देखा तो मैंने ख़ुशामद की और कहा कि मैं ख़ुदा के रसूल से पनाह मांगती हूं कि आज आप मुझ पर लानत फ़रमायें। पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने गुस्से की नज़रों से मेरी तरफ़ देखा और फ़रमाया कि इस (कुसूर) का तवान अदा कर दो। मैंने पूछा इसका कफ़्फ़ारा क्या होगा ? आपने फ़रमायाः- वैसा ही खाना और वैसा ही बरतन। ( 3)

मज़कूरा तीनों ख़्याले हज़रत आयशा के तख़रीबकार मिजाज़ की अक्कासी करती हैं और उनमें तख़रीबकारी का हर पहलू साफ़ और नुमायां है इस लिए मज़ीद किसी वज़ाहत की ज़रूरत नहीं है।

1. सहीह मुस्लिम बाबुल ग़ैरत किताबुल इशरत

2. मसनद अहमद जिल्द 6, पेज न. 111, कन्ज़ुल आमाल जिल्द 3, पेज न. 44

3. मसनद अहमद जिल्द 6, पेज न. 277, सोनन निसाई जिल्द 2, पेज न. 148, हाशिया सिरते हलबीया पेज न. 183- 284

गालम गलौज

तारीख़ ये बताती है कि हज़रत आयशा वक़्ते ज़रूरत गालम गलौज पर भी उतर आती थी। तबक़ात इब्ने सअद में है किः-

हज़रत आयशा और सफ़ीया में गालम गलौज हुई इसकी वजह यह थी कि आयशा ने सफ़ीया पर अपनी बरतरी जतायी थी और इस क़दर उन्हें गालियां दी थीं कि वो बैठी रो रहीं थीं। इतने में हज़रत रसूल (स.अ.व.व) तशरीफ़ लाये और आपने सफ़ीया से रोने की वजह दरयाफ़्त की तो सफ़ीया ने कहा कि आयशा और हफ़सा मुझे गालियां देती हैं और बुरा भला कहती हैं पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने फ़रमाया कि तुमने आयशा और हफ़सा के मुक़ाबले में ये क्यों नहीं कहा कि हारून (अ.स) मेरे बाप और जनाबे मूसा (अ.स) मेरे चचा हैं( 1)

तिर्मिज़ी में हज़रत आयशा का बयान है कि मैंने रसूले ख़ुदा से कहा कि सफ़ीया ऐसी है सफ़ीया वैसी है तो पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने फ़रमाया कि तुमने ऐसी गंदी बात कही है कि अगर समन्दर के पानी में मिला दिया जाये तो सारा पानी गन्दा हो जायेगा।( 2)

गुत्थम गुत्था

हज़रत आयशा ने हज़रत सौदा को एक बार ये गुनगुनाते हुए सुनाः-

आयशा ने इसका मतलब ये समझा कि सौदा कह रही हैं कि आयशा क़बीला ए तैम और हफ़सा क़बीला ए बनी अदी से है। चुनान्चे आप आपे से बाहर हो गयीं और हफ़सा को भी उभारा कि सौदा हम दोनों को ऐसा ऐसा कह रही थीं। हफ़सा ने पूछा........ फिर क्या होना चाहिए आयशा ने कहा चलो चलें जब मैं सौदा का सर पकड़ू तो मेरी मदद करना और तमाशा देखना। वो दोनों सौदा के पास आयीं , आयशा ने उनका सर पकड़ा और हफ़सा ने मदद की। इतने में उम्मे सलमा पहुंच गई उन्होंने सौदा की मदद की। बस फिर क्या था , बाज़ाब्ता गुत्थम गुत्था शुरू हो गयी। किसी ने पैग़म्बर (स.अ.व.व) को जा कर ख़बर की कि जल्दी जाइये और अज़्वाज की ख़बर लीजिए। जब पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने ये हाल देखा तो फ़रमायाः-

वाय हो तुम पर , ये सब क्या हो रहा है ? आयशा ने कहा या रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) क्या आपने इन्हें ये कहते नहीं सुना किः-

आपने फ़रमाया , वाय हो तुम पर ! इस से मुराद तुम्हारे अदी और तैम नहीं है बल्कि इनकी मुराद तमीम के अदी और तमीम के तैम से है।( 3)

1. तबक़ात जिल्द 8 पेज न. 127, मुस्तरक हाकिम जिल्द 4, पेज न. 29.

2. तिर्मिज़ी बेनाबर रवायत ज़रकशी , इजाबा पेज न. 73, मदारेजुन्नुबवा जिल्द 2, पेज न. 616

3. इजाबाः- ज़रकशी पेज न. 18

आयशा की पिटाई

आयशा और रसूले ख़ुदा सल्लाल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम में एक मरतबा किसी बात पर लड़ाई हो रही थी , और आप इस नोक झोक से परेशान हो चुके थे कि इतने में अबू बकर वारिद हुए। हुज़ूर (स.अ.व.व) ने अबू बकर से फ़रमाया कि मैं तंग आ चुका हूं , मुझे आयशा से बचाओ।

पैग़म्बर (स.अ.व.व) की ये फ़रियाद सुन कर अबू बकर ग़ैज़ के आलम में आयशा की तरफ़ बेइख़तियार बढ़े और एक ऐसा हाथ रसीद किया कि वो लहू लोहान हो गयी। ( 1)

आप (स.अ.व.व) ने फ़रमाया कि मेरा मक़सद ये नहीं था कि तुम इन्हें इस तरह से मारो।

बुख़ारी बाबुत्तमीम और मुस्लिम बाबुल क़सम बैनज़ ज़ौजात में है कि कई मरतबा अबूबकर ने उनको अदब सिखाया है।

आयशा पर हज़रत उमर की लानत मलामत

जंगे खंन्दक के मौक़े पर आयशा के दिल में मरदान्गी का जज़्बा बेदार हुआ और उन्हें यह शौक पैदा हुआ कि मैं भी लड़ाई देखूं। चुनान्चे आप रसूल से इजाज़त हासिल किये बग़ैर घर से निकल खड़ी हुई , और मैदाने जंग के क़रीब पहुंच गयीं। रास्ते में देखा कि असहाब आलाते जंग से आरास्ता जोशो ख़रोश में रज्ज पढ़ते हुए जा रहे हैं। इतने में आपकी नज़र एक बाग़ पर पड़ी और आप उसके अन्दर चली गयीं। वहां बहुत से असहाब खड़े थे जिन में हज़रत उमर भी थे। उमर की नज़र जब आयशा पर पड़ी तो हवास बाख़्ता हो गये और डांट कर कहने लगे , तुम यहां क्यों चली आयीं ? अगर कोई बला नाज़िल हो गई तो (तुम्हे बचाने में) हम सब कट मर जायेंगे। आयशा फ़रमाती हैं कि उस वक़्त उमर ने मुझ पर इतनी लानत मलामत की कि मेरा जी चाहा कि ज़मीन फट जाये और मैं उसमें समा जाऊं। ( 2)

बुख़ारी कहते हैं कि एक मरतबा और भी आं हज़रत (स.अ.व.व) से जंग में शिरकत की इजाज़त चाही थी मगर हुज़ूर (स.अ.व.व) ने ये कह कर उन्हें रोक दिया था कि औरतों का जिहाद सिर्फ़ हज है। ( 3)

ताज्जुब , बालाए ताज्जुब ये अम्र है कि जिस बेटी का बाप हमेशा मैदाने जंग से फ़रार इख़तियार रहा हो , उसमें ये हौसला कहां से पैदा हो गया कि वो मैदाने जंग के ख़ूनी धमाकों से लुत्फ़ अन्दोज़ होने की ख़्वाहिश करें और हैरत बालाए हैरत इस बात पर है कि जब रसूल (स.अ.व.व) ने जो आयशा के शौहर भी थे इससे क़ब्ल मैदाने जंग में जाने से ये कह कर मना कर दिया था कि औरतों का जिहाद हज है तो पैग़म्बर (स.अ.व.व) की इजाज़त के बग़ैर इस मौक़े पर उन्होंने घर से बाहर क़दम क्यों निकाला ? कि अम्र को रसूल (स.अ.व.व) की एक ज़ौजा पर लानत मलामत करना पड़ी। फिर ये सवाल भी पैदा होता है कि हज़रत उमर जिन्हें मैदाने जंग में होना चाहिए , चन्द असहाब को लिए बाग़ में क्या कर रहे थे ? इसका जवाब हर वो तारीख़ दे सकती है जिसमें मैदान जन्म से हज़रत उमर के फ़रार की दास्ताने मरक़ूम हैं।

1. तबक़ात इबने सअद जिल्द 8, पेज न. 56

2. मसनद अहमदः- पेज न. 99 -141

3. सहीह बुख़ारीः- बाबे हज्जुन निसा

पैग़म्बर (स.अ.व.व) की दीगर अज़्वाज से आयशा की हसद

मोवर्रेख़ीन ने तहरीर किया है कि आयशा का रवय्या मारिया क़ब्तिया , ज़ैनब बिन्ते हजश , सफ़ीया बिन्ते हई और मलीका बिन्ते क़अब वग़ैरा से बेहद हासेदाना था क्यों कि ये सब औरतें आयशा से कहीं ज़्यादा ख़ूब सूरत और हसीन थीं। जिन्होंने अपना नफ़्स पैग़म्बर (स.अ.व.व) को हेबा कर दिया था चुनान्चे आप खुद फ़रमाती हैं किः-

मैं उन औरतों से बहुत जलती थी जिन्होंने पैग़म्बर को अपना नफ़्स हेबा कर दिया था और मैं कहा करती थी कि कहीं कोई शरीफ़ औरत अपना नफ़्स किसी को हेबा करती हैं ? (1)

(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)

इब्ने सअदे वाक़दी ने तबक़ात ( 2) में बसिलसिला ए हालाते उम्मे शरीक इस रवायत को तफ़सील से बयान किया है और लिखा है कि वो मोअज़्ज़मा जिन्होंने अपना नफ़्स पैग़म्बर (स.अ.व.व) को हेबा कर दिया था उनका नाम ग़ज़ीया था। और ये रवायत असाबा( 3) में तफ़सील से बयान हुई है। लेकिन उन मोअज़्ज़मा के नामो नसब और कुन्नियत में उलमा ने इख़्तेलाफ़ किया है। उसकी वजह ये मालूम होती है कि ऐसी कई औरतें थी जिन्होंने अपना नफ़्स पैग़म्बर (स.अ.व.व) को हेबा कर दिया था और जिन से आयशा को बेज़ारी थी आयशा ने भी अपने बयान में औरतों कह कर जमा का सीग़ा इस्तेमाल किया है नीज़ मसनद अहमद में है कि आयशा उन औरतों को ताना दिया करती थीं जिन्होंने अपना नफ़्स पैग़म्बर (स.अ.व.व) को हेबा किया था।( 4)

सहीह मुस्लिम में हिशाम से रवायत है कि ख़ूला बिन्ते हकीम भी उन औरतों में शामिल है जिन्होंने अपना नफ़्स हेबा किया था और आयशा उनके मुताल्लिफ़ फ़रमाती थीं कि इस औरत को शर्म नहीं आती कि इसने अपना नफ़्स हेबा कर दिया।( 5)

1. बुख़ारीः- जिल्द 3, पेज न. 118, मुस्लिम बाबे जवाज़े हिबाः- जिल्द 4, पेज न. 374

2. तबक़ातः- जिल्द 8, पेज न. 154

3. असाबाः- जिल्द 4, पेज न. 362, 784

4. मसनद अहमदः- जिल्द 4, पेज न. 198

5. सहीह मुस्लिमः- जिल्द 2, पेज न. 164

आऊज़ो बिल्लाहे मिनक

तबक़ात इब्ने सअद में इब्ने अब्बास से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने असमा बिन्ते नोमान (जौनिया) से अक़्द फ़रमाया , ये अपने वक़्त की इन्ताहाई हसीनों जमील और ख़ूब सूरत ख़ातून थी। पैग़म्बर की दीगर अज़्वाज ने जब अस्मा को देखा तो उन पर रश्को हसद तारी हुआ आयशा इस मामले में सब से आगे थीं लिहाज़ा उन्होंने फ़रेबकारी का एक मुनज़्ज़म मन्सूबा तैय्यार किया और असमा से ये कहा कि रसूलल्लाह उस औरत से बहुत ख़ुश होते हैं जो दुख़ूल के वक़्त उनसे आऊज़ो बिल्लाहे मिनक (यानी मैं आप से ख़ुदा की पनाह चाहती हूं) कहे। आयशा की ये बात भोली भाली असमा पर असर अन्दाज़ हुई। चुनान्चे जब पैग़म्बर (स.अ.व.व) तशरीफ़ लाए और उन्होंने असमा की तरफ़ हाथ बढ़ाना चाहा तो असमा ने कहा आऊज़ो बिल्लाहे मिनक , पैग़म्बर ने उसकी तरफ़ से हाथ ख़ींच लिया और फ़रमाया तुम ने बहुत बड़ी पनाह मांगी है लिहाज़ा मैं तुम्हे आज़ाद करता हूं तुम अपने घर जा सकती हो। ( 1)

हमज़ा बिन सईदे सायदी ने अपने बाप से रवायत की है कि वो फ़रमाते थेः-

पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने असमा बिन्ते नोमान (जौनिया) से अक़्द फ़रमाया और मुझसे लाने को कहा मैं उसे लेकर हाज़िरे ख़िदमत हुआ। हफ़सा ने आयशा से या आयशा ने हफ़सा से कहा कि तुम इसके हाथों में मेंहदी लगाओ मैं बालों में कंघी करती हूं। दोनों ने मिल कर मेंहदी लगाई और बाल संवारे। उसके बाद उन दोनों में से किसी एक ने असमा से कहा कि पैग़म्बर उस औरत को बहुत महबूब रखते हैं जो जिमा (संभोग) के वक़्त आऊज़ो बिल्लाहे मिनक कहती है। चुनान्चे जब पैग़म्बर (स.अ.व.व) उसके ख़लवत कदे में तशरीफ़ लाये और आपने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाना चाहा तो उसकी ज़बान से आऊज़ो बिल्लाहे मिनक...... निकला। हुज़ूर (स.अ.व.व) ने अपना हाथ समेट लिया और अपनी आस्तीनों से अपना चेहरा ढक लिया और तीन मरतबा इरशाद फ़रमाया कि तूने बड़ी पनाह मांगी है लिहाज़ा अपने घर चली जा। ( 2)

अबू सईद कहते हैं थोड़ी देर बाद हज़रत अली (अ.स) तशरीफ़ लाये और उन्होंने मुझसे कहा कि इसे इसके घर वालों के पास पहुंचा दो और दो जोड़े कपड़े दे दो।

इस वाक़िये के बाद असमा कहा करती थी कि मैं बद बख़्त हूं। ( 3)

तहज़ीबे इब्ने असाकर में है कि जब असमा को ग़ैरे मामूली तौर पर हसीनों जमील पाया गया तो अज़्वाज की तरफ़ से उसे धोखा दिया गया। जब रसूल को ये ख़बर हुई कि ये आयशा और हफ़सा की हरकत थी तो आपने फ़रमायाः-

ये सब युसूफ़ वालियां है और उन्हीं की तरफ़ मक्कारो फ़रेबकार भी। ( 4)

1.तबक़ात इब्ने सादः- जिल्द 8, पेज न. 145

2. तबरीः- जिल्द 3, पेज न. 79, मुसतदरकः- जिल्द 4, पेज न. 37, इस्तेयाबः- जिल्द 2, पेज न. 73

3. असाबाः- जिल्द 3, पेज न. 350

4. तहज़ीबः- इब्ने असाकरः- जिल्द 1, पेज न. 309

मलीका पर आयशा का जादू

इब्ने सअद ने तबक़ात में और इब्ने क़सीर ने अपनी तारीख़ में ये वाक़िआ नक़ल किया है कि रसूल (स.अ.व.व) ने मलीका बिन्ते काब से अक़्द किया जो हुस्नो जमाल में यकता थीं। हज़रत आयशा को ये बात नागवार गुज़री क्यों कि मलीका का ग़ैरे मामूली हुस्न उनके लिए नाक़ाबिले बर्दाश्त था।

मलीका का बाप फ़त्हे मक्का के मौक़े पर ख़ालिद बिन वलीद के हाथों क़त्ल हो चुका था चूंकि वो अपने बाप के क़ातिल के नाम से आशना थी इस लिए आयशा से जब उसका सामना हुआ तो मोहतर्मा ने उस पर अपना नफ़सियाती हर्बा इस्तेमाल किया और उससे कहा कि तुम्हें अपने बाप के क़ातिल से निकाह करते शर्म नहीं आयी। ( 1)

मलीका ने आयशा से कहाः-

अब क्या हो सकता है मुझे तो ये गुमान भी नहीं था कि रसूल (स.अ.व.व) मेरे बाप के क़ातिल है।

आयशा ने कहाः- ये सूरत हो सकती है कि जब आं हज़रत (स.अ.व.व) तुम्हारे साथ ख़लवत नशीन हों तो उनसे कहना कि मैं आप से ख़ुदा की पनाह मांगती हूं। मुम्किन है पनाह मिल जाये। चुनान्चे आयशा के भड़काने पर मलीका ने ऐसा ही किया और रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) ने उसे तलाक़ दे दी। तलाक़ के बाद मलीका के ख़ानदान वाले रसूल के पास आये और आप से कहाः

या रसूलल्लाह (स.अ.व.व) , ये नासमझ और कमसिन है , बहकावे और बरग़लाने में आ गयी है आप उससे दोबारा रूजूअ फ़रमा लें लेकिन रसूल (स.अ.व.व) ने इन्कार कर दिया। ( 2)

ये रवायत इस बात पर दलालत करती है कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) को कमसिन हसीन और ख़ूब सूरत लड़कियों से निकाह करने का कोई शौक़ नहीं था वरना वो मलीका बिन्ते काब को तलाक़ न देते क्यों कि वो कमसिन भी थीं और हुस्नों जमाल का मुजस्समा भी।

नीज़ असमा बिन्ते नोमान पर गुज़रने वाले और इस वाक़ेए की नौइयत भी तक़रीबन एक सी है जो ज़ाहिर करती है कि आयशा ने नेक और शरीफ़ औरतों को धोखे दिये और उन्हें नबी (स.अ.व.व) की ज़ौजियत से महरूम कर दिया। चुनान्चे उन्होंने असमा को फ़रेब दिया कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) उस औरत से बहुत ख़ुश होते हैं जो आऊज़ो बिल्लाहे मिनक कहती है और मलीका को ये बावर कराया कि तुम्हारे बाप के क़ातिल रसूल (स.अ.व.व) हैं ये वो जादू था कि जिसने उन दोनों सादा लौह औरतों का मुस्तक़बिल तबाहो बरबाद कर दिया जिसकी मुजरिम आयशा और सिर्फ़ आयशा है ये और बात है कि इस काम के लिए हफ़सा को भी इस्तेमाल किया।

1. तबक़ात इब्ने सअदः- जिल्द 8, पेज न. 148, तारीख़ इब्ने क़सीरः- जिल्द 5, पेज न. 299

2. असाबाः- जिल्द 4, पेज न. 392, तारीख़ इब्ने असाकरः- जिल्द 1, पेज न. 309, ज़हबीः- जिल्द 1, पेज न. 325

मारिया क़िब्तिया की सरगुज़श्त

तबक़ात इब्ने साद की रवायत है कि असकन्दर्या के शाह ने सात हिजरी में मारिया क़ब्तिया और उनकी बहन सीरीन को एक हज़ार मिस्क़ाल सोना बीस उम्दा नफ़ीस और बेशक़ीमत कपड़े अफ़ीर या बाफ़ूर नामी गधे और दुल्दुल नामी खच्चर दे कर हातिब बिन बल्का के हमराह पैग़म्बरे इस्लाम की ख़िदमत में रवाना किया और उसके साथ ही और उसके साथ ही मर्दे ख़सी जिसका नाम माबूर* था , को भी भेजा जो मारिया का भाई और एक सिन रसीदा शख़्स था। हातिब ने मारिया और सीरीन के सामने इस्सलाम क़ुबूल किया और इन्हें भी रंगबत दिलायी। चुनान्चे वो दोनों बहनें भी मुसलमान हो गयीं मगर वो मर्दे ख़सी अपने आबाई दीन पर क़ायम रहा और कुछ दिनों बाद पैग़म्बर (स.अ.व.व) की ज़िन्दगी ही में मुसलमान हो गया।

रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) इन मारिया को जो आगे चल कर इब्राहीम की मां हुई बेहद चाहते थे। ये इन्ताहाई हसीनों ख़ूबसूरत भी थी और इनके बाल भी काफ़ी लम्बे और दिल कश थे। रसूल ने इन्हें परदे में रखा और मक़ामें आलिया में ठहराया। आप उनके पास बराबर आते जाते रहे यहां तक कि ये हाम्ला हुई और वहीं उनका वज़ैहम्ल हुआ। पैग़म्बर (स.अ.व.व) की कनीज़ सलमा ने दाया की ख़िदमत अन्जाम दी और सलमा के शौहर अबूराफ़े ने पैग़म्बर (स.अ.व.व) को इब्राहीम की विलादत की ख़ुशख़बरी सुनाई। आपने उन्हें एक ग़ुलाम इनाम दिया। ये वाक़ेआ माहे ज़िल्हिज आठ हिजरी का है। ( 1)

अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती की तसनीफ़ हुस्नुल मोहाज़ेरा के मुतालिए से पता चलता है कि शाह मक़ूक़स ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) की ख़िदमत में एक ख़त इरसाल किया था जिसका खुलासा ये है किः-

जिन बातों की तरफ़ आप ने मेरी तवज्जो मबज़ूल कराई है और जिस अम्र की दावत दी है उस पर मैंने सन्जीदगी और मतानत से ग़ौर किया। मुझे मालूम था कि एक नबी आने वाले हैं मगर मैं समझता था कि वो मुल्के शाम में मबऊस होंगे। बहरहाल मुख़तसर तहाएफ़ के साथ दो लड़कियां ऐसी आपकी ख़िदमत में रवाना कर रहा हूं जो क़ब्तियों में बड़ी इज़्ज़तो शरफ़ और अज़मतों एहतराम की मालिक हैं। ( 2)

आयशा का बयान है किः-

जो हसद और जलन मुझे मारिया से थी वो किसी औरत से नहीं थी क्यों कि ये इन्तेहाई हसीनों जमील होने के साथ साथ बड़े लम्बे और ख़ूब सूरत बालों वाली थी। पैग़म्बर ने उन्हें ख़ुद पसन्द किया था और जब उन्हें ले आये तो पहले हारिस बिन नोमान के घर उतारा , फिर वो हम से घबराई और परेशान हुईं तो आं हज़रत ने उन्हें मक़ामे आलिया में मुन्तक़िल कर दिया और आप बराबर वहां आते जाते रहे। पैग़म्बर (स.अ.व.व) का मारिया के पास आना जाना मुझ पर शाक गुज़रता था और मैं हसद की आग में जलती रहती थी। यहां तक कि मारिया के बत्न से ख़ुदा ने उन्हें फ़रज़न्द अता किया और मैं महरूम रही। ( 3)

तबक़ात इब्ने सअद की रवायत हुस्नुल मोहज़रा से माख़ूज़ खुलासा ए मक़तूब और खुद आयशा के बयान से उनके हसदो जलन की मुनदर्जा ज़ैल वुजूहात का पता चलता हैः-

1. मारिया क़ाब्तिया के हुस्नों जमाल के सामने आयशा एहसासे कमतरो का शिकार थीं।

2. मारिया , शहज़ादी और अज़मतों एहतराम की मालिक थी नीज़ काफ़ी साज़ो समान के साथ बावेक़ार तौर पर रसूल (स.अ.व.व) के घर आयी थीं जब कि आयशा को अपने वाल्दैन की तरफ़ से कुछ भी न मिल सका था।

3. पैग़म्बर ने मारिया को खुद पसन्द फ़रमाया था और वो उन्हें बेहद चाहते थे।

4. मारिया के बाल लम्बे और ख़ूब सूरत थे जब कि आयशा गंजी थी और आपके बाल बीमारी की नज़्र हो चुके थे।

5. ख़ुदा ने पैग़म्बर को मारिया से औलाद अता की जब कि आयशा इस नेमत से महरूम थीं।

ये तमाम बातें ऐसी हैं जिनका तसव्वुर आयशा के लिए यक़ीनन अंगारों का बिस्तर था जिस पर आपका मजरूह पिन्दांरे ख़ुदी करवटें लिया करता था। और आप दिल ही दिल में कुढ़ती और जलती रहती थीं। फिर इब्राहीम की विलादत ने आपके वुगज़ों एनाद में और इज़ाफ़ा किया जैसा कि ख़ुद आपका बयान है कि ख़ुदा ने मारिया के बत्न से रसूल को फ़रज़न्द अता किया और मैं यूं ही रह गयी।

अब आप सोंचे समझें और ख़ुद फ़ैसला करें कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) ऐसी किसी बीवी को क्यों कर अज़ीज़ रख सकते थे जो आपकी दिगर अज़्वाज से बेपनाह रश्को हसद रखती हो। उन्हें बुरा भला कहतीं हो , उनके बरतन तोड़ती हो , लड़ाई , झगड़ा और मारपीट करती हो , उन्हें बरग़लाती और बहकाती हों , फ़रेब देती हों , झूठ बोलती हो , ग़ीबत करती हो और ऐब जुई उसका शआर हो। पैग़म्बर (स.अ.व.व) ऐसी किसी बीवी को क्यों कर मुहब्बत दे सकते थे जो आपके मासूम बच्चे इब्राहीम से नफ़रत करती हो , आपकी क़ुदसी सिफ़ात बेटी फातेमा (स.अ) से अदावत रखती हो। अपने नवासों से परदा करती हों और आपके इब्ने अम (चचा के बेटे) हज़रत अली इब्ने अबी तालीब (अ.स) की ऐसी दुशमन हों कि उनका नाम लेना भी गवारा न करती हों। पैग़म्बर (स.अ.व.व) ऐसी किसी बीवी को क्यों कर मुंह लगा सकते थे जो आपकी दूसरी बीवी को ये बावर कर दे कि उसके बाप का क़ातिल ख़ुद रसूल है।

इन्ही वजूहात की बिना पर अक़्ल ये तस्लीम करने पर तैयार नहीं होती कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) आयशा को अपनी तमाम बीवियों से ज़्यादा चाहते रहे होंगे बल्कि अक़्ल का फ़ैसला यह है कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) आयशा से नफ़रत करते थे और आपने उम्मत को भी इन के शर से बचने की तलक़ीन फ़रमाई है। ( 4)

नीज़ बुख़ारी की यह रवायत भी इस अम्र पर दलालत करती है कि हुज़ूरे अकरम (स.अ.व.व) आयशा से कतई ख़ुश नहीं थे। तहरीर फ़रमाते हैः-

मैंने क़ासिम इब्ने मोहम्मद से सुना कि उन्होंने कहाः-

आयशा ने कहा हाय मेरा सर फटा तो रसूल (स.अ.व.व) ने कहा अगर ऐसा होता तो मैं तुम्हारे लिए ख़ुदा से दुआ करता। आयशा ने कहा , बामुसीबता , ख़ुदा की क़सम आप चाहते हैं कि मैं मर जाऊं ताकि आप अपनी आख़री उम्र तक दूसरी अज़्वाज से लुत्फ़ उठाते रहें। ( 5)

1. तबक़ातः- जिल्द 8, पेज न. 212 व जिल्द 1, पेज न. 134, हालाते इब्राहीम फ़रज़न्दे नबी (स.अ.)

2. हुस्नुल मुहाज़राः- जिल्द 1 पेज न. 47 (मिस्र)

3. तबक़ात इब्ने सादः- जिल्द 8, पेज न. 150, 202

4. तबक़ात इब्ने सादः- जिल्द 2, पेज न. 29

5. बुख़ारीः- जिल्द 7, पेज न. 8

हज़रते आयशा और अज़मते रसूल (स.अ.व.व)

तारीख़ पुकार पुकार कर कहती है कि आयशा ख़ाना ए रसूल (स.अ.व.व) में एक आफ़त बनकर नाज़िल हुई थी। रसूले करीम (स.अ.व.व) से बात-बात पर तू-तू मैं-मैं , लड़ाई झगड़ा , बहसो मुबाहेसा और गुफ़्तारो तक़रार आपका मामूल था। आपकी नज़र में न तो मनसबे नुबूवत की कोई अहमियत थी और न ही रसूले पाक की अज़मतों का कोई पासो लिहाज़ था। जिसकी वजह से पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) हमेशा आप पर नराज़ो ग़ज़बनाक रहा करते थे जैसा कि ख़ुद आपका बयान है। आप फ़रमाती हैः-

(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

पैग़म्बर (स.अ.व.व) अकसर मुझ से नाराज़ो ग़ज़बनाक रहते थे...... एक बार किसी मस्अले पर मुझ से और हुज़ूर (स.अ.व.व) से बहसो तकरार हो गयी। हुज़ूर ने फ़रमाया कि तुम इस पर राज़ी हो कि उमर बिन ख़त्ताब मेरे और तुम्हारे बीच फ़ैसला करे ? मैंने कहा नहीं वो बद मिजाज़ और संगदिल इन्सान है। फ़रमाया , फिर किस को सालिस बनाना चाहती हो ? मैंने कहा अपने वालिद अबू बकर को। चुनान्चे उन्हें तलब किया गया और जब वो आये तो हुज़ूर ने सारा माजरा बयान किया। मैंने कहा ख़ुदा से डरिये और हक़ के ख़िलाफ़ कुछ न कहिये। मेरी ज़बान से ये कलमात सुन कर मेरे वालिद ने मेरे मुंह पर ऐस थप्पड़ मारा कि मेरी नाक से ख़ून जारी हो गया। ( 1)

मिस्री मोवर्रिख़ मोहक्किक़ अब्बास महमूद ओक़ाद अपनी किताब आयशा में रक़म तराज़ हैं किः-

अहादीस में हज़रत आयशा से एक रवायत मरवी है जिसमें वह कहती हैं कि एक मरतबा किसी बात पर मुझमें और रसूल में बहस हो रही थी। हुज़ूर (स.अ.व.व) ने फ़रमाया यूं नहीं , किसी को सालिस मुक़र्रर कर लो। कहो , अबू उबैदए ज़र्राह को सालिस मुक़र्रर करने पर रज़ामन्द हो ? मैंने कहा वो सादा मिजाज़ इन्सान है आपकी तरफ़दारी करेंगे। हुज़ूर ने फ़रमाया तो फिर अपने वालिद को मुक़र्रर कर लो। मैं राज़ी हो गयी हुज़ूर (स.अ.व.व) ने अबू बकर को बुलवाया और मुझसे फ़रमाया कि तुम अपनी बात बयान करो। मैंने कहा पहले आप बयान करें चुनान्चे हुज़ूर (स.अ.व.व) ने वो बात जिसके मुतालिक़ बहस हो रही थी अबू बकर से बयान की और जब बात ख़त्म हो गयी तो मैंने अपने वालिद से कहा कि अब आप बताइये क हम दोनों में किसकी बात सही है ? ये सुनते ही मेरे बाप ने मेरे मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा मारा और कहा कि रसूल की मुख़ालेफ़त करती है। तमाचा ऐसा था कि मेरी नाक से ख़ून जारी हो गया। ( 2)

क़ुरान कहता है कि रसूल (स.अ.व.व) की आवाज़ पर अपनी आवाज़ को बलन्द न करो लेकिन आयशा के नज़्दीक क़ुरानी आयात की भी कोई अहमियत नहीं थी। जैसा कि ओक़ाद की तहरीर से पता चलता है। चुनान्चे वो लिखते हैः-

एक बार हज़रत अबू बकर आयशा के हुजरे के क़रीब से गुज़रे उन्होंने अपनी बेटी को रसूलल्लाह (स.अ.व.व) से बुलन्द आवाज़ से बातें करते हुए सुना , वह ग़ुस्से की हालत में हुजरे में दाख़िल हुए और इस ग़ुस्ताख़ी की सज़ा देने के लिये आयशा को थप्पड़ मारना चाहा लेकिन रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने दर्मियान में खड़े हो कर उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। ( 3)

अल्लामा शेख़ अब्दुर रहमान शाफ़ेई भी इसी क़िस्म का एक वाक़ेआ तहरीर फ़रमाते हैः-

किसी मौक़े पर रसूलल्लाह (स.अ.व.व) और आयशा में बहसो तकरार हो गयी। रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने फ़रमाया क्या तुम अपने बाप को सालिस मुक़र्रर करने पर तैयार हो ? आयशा ने कहा हां। चुनान्चे अबूबकर सालसी के लिए तलब किये गये। उनसे रसूल (स.अ.व.व) ने फ़रमाया की ये मस्अला है और ऐसी ऐसी बातें हैं। आयशा ने कहाः ख़ुदा से डरिये और हक़ बात कहिये। उस पर अबूबकर ने उन्हें ऐसा तमाचा मारा कि नाक से ख़ून जारी हो गया फिर डंडा उठाया और इस तरह ज़दोकोब किया कि आख़िरकार वो (आयशा) भाग कर रसूल (स.अ.व.व) की पुश्त से लिपट गई। ( 4)

मज़कूरा वाक़ेआत से मुन्दर्जा ज़ेल बातों का पता चलता है।

1. आयशा रसूल (स.अ.व.व) का अदबो एहतराम कतई नहीं करती थीं।

2. आयशा रसूल (स.अ.व.व) की मुख़ालेफ़त करती थीं।

3. आयशा रसूल (स.अ.व.व) की पर आवाज़ बलन्द करती थीं।

4. आयशा रसूल (स.अ.व.व) से बहसो मुबाहेसा और तकरार करती थीं।

5. आयशा हज़रते रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) पर बोहतान और इत्तेहाम की मुर्तक़िब भी क़रार पाती हैं जैसा कि आपका बयान हैः-

हम रसूलल्लाह के लिये एक मशकीज़ा नबीज़* तैयार करते थे जिसे सुब्ह उठकर आप पी जाते थे। ( 5) (मआज़ल्लाह)

शराब के लिये अरबी ज़बान में बहुत सी लफ़्ज़े इस्तेमाल हुई हैं जिनमें ख़मर और नबीज़ भी हैं। ख़मर उस शराब को कहते हैं जो अंगूर से बनायी जाय और नबीज़ वो शराब है जो खजूर से हासिल की जाय जिसे हम अपनी इस्तेलाह में ताड़ी कहते हैं।

अब्दुल्लाह इब्ने उमर का बयान है कि मेरे बाप उमर ने मिम्बर पर तक़रीर करते हुए कहा कि ये अम्र तहक़ीक़ शुदा है कि ख़मर , अंगूर , जौ , गेहूं और शहद से तैय्यार होती है और नबीज़ खजूर से और ये दोनों चीज़े हराम हैं। ( 6)

इमाम ग़ेज़ाली अपनी किताब मनखूल में रक़म तराज़ हैः-

इमामे अबू हनीफ़ा ने शरीअत को उलट पलट दिया और निज़ामे शर्अ को दरहम बरहम कर दिया। उनके मज़हब का तज़ाद उनकी नमाज़ों की तफ़सीलों में पोशीदा हैं। नमाज़ की क़द्र ज़रूरी जो अबू हानीफ़ा ने तज़वीज की है उसमें उनका ख़ब्त ज़ाहिर है और ये ऐसी नमाज़ है जो किसी जाहिल और सुस्त आदमी के सामने भी पेश की जाये तो वो उसके इत्तेबा से बाज़ रहेगा। इस लिये कि जो शख़्स नबीज़ में ग़ोता लगाये और कुत्ते की खाल पहन कर निकले और नीयत न करे।

इमाम ग़ेज़ाली ने इमाम अबू हनीफ़ा के इस फ़त्वे का मतलब ये अख़्ज़ किया है कि अबू हनीफ़ा का ये कहना कि नबीज़ में ग़ोता लगा कर नमाज़ पढ़ना जायज़ और दुरूस्त है। अगर इमाम ग़ज़ाली के मशरब में नबीज़ हलाल होती तो वो अबू हनीफ़ा के फ़त्वे पर एतराज़ क्यों करते ?

किताब रद्दुल मुख़तार जिल्द 5 सफ़ा 301 के मुताले से ये भी मालूम होता है कि अबू हनीफ़ा हर क़िस्म की नबीज़ को दिल में हराम समझते थे मगर चूंकि साहबा ए केबार इसको बेधड़क पीते थे इस लिये वो इसके हलाल होने का फ़त्वा देने पर मजबूर थे। जैसा कि उनका ये क़ौल बहुत मशहूर है कि अगर तमाम दुनिया मेरे क़ब्ज़े में दे दी जाए तो भी मैं नबीज़ को हराम होने का फ़त्वा नहीं दे सकता। क्यों कि इससे बाज़ सहाबा का फ़ासिक़ होना साबित होगा इस लिये कि ये हज़रात बे ताम्मुल उसे पिया करते थे लेकिन अगर मुझे कोई पूरी दुनिया दे कर ये कहे कि इसे पिया करो तो मैं पियूंगा भी नहीं।

मौलाना शिबली नौमानी अपनी किताब अलमामून दूसरी जिल्द के पेज 221 पर तहरीर फ़रमाते हैं किः-

उस वक़्त इस्लामी सोसाइटियां उमूमन इस रंग में डूबी हुई थीं। मुसलमानों को उस अहद में अम्न , फ़राग़ , इत्मीनान और ज़रोमाल सब कुछ मयस्सर था। कुछ चीज़े थीं जो उनको ज़िन्दगी के पुरख़त मक़ासिद से रोक सकती थी ? एक मज़हब अलबत्ता दरअन्दाज़ हो सकता था लेकिन जिद्दत पसन्द तबीअते उसे खींच तान कर अपने ढबका बना लेती थीं। शराब की जगह नबीज़ (खजूर की ताड़ी) मौजूद थी उसको उमूमी तौर पर इराक के मज़हबी पेशवाओं से जाएज़ होने की सनद मिल चुकी थी।

नबीज़ क्या है ? इसे क्यों हलाल क़रार दिया गया ? हज़रत उमर के क़ौल , इब्ने असीर की तशरीह , इमाम ग़ेज़ाली की तन्क़ीद , इमाम अबू हनीफ़ा के फ़तवे , रद्दुल मुख़्तार के इक़तेबास और शिबली नोमानी की इबारत से ज़ाहिर है। उनकी तसरीहात की रौशनी में हज़रत आयशा की बयान करदा हदीस का मतलब ये निकलता है कि मआज़ल्लाह पैग़म्बर (स.अ.व.व) भी अपने को इससे महरूम नहीं रखते थे।

पैग़म्बर (स.अ.व.व) पर आयशा का ये इत्तेहाम यक़ीनन एक ग़ौरतलब मस्अला है।

1. कशफ़ुल ग़म्माः- जिल्द 2, पेज न. 76

2. आयशा (उक़ाद) – पेज न. 30.

3. आयशा (उक़ाद) – पेज न. 98

4. नुज़हतुल मजालिसः- जिल्द 1, पेज न. 102

* एक तरह की शराब।

5. तलख़ीसुस सहाहः- जिल्द 3, पेज न. 112, मतबुआ लाहौर

6. मिशकातः- जिल्द 5, पेज न. 42 मतबुआ लाहौर


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